भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

चाहिये। यव, तिल, दधि, गन्ध-पुष्पादिसे युक्त अर्घ्यद्वारा सबकी पूजा करनी चाहिये तथा सभी ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको मधुर मिष्ठान् भोजन कराना चाहिये। भोजनमें कटु पदार्थ नहीं होने चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पिण्डदान देना चाहिये। दही-अक्षतका पिण्ड बनाये। एक चौंस मण्डप बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करे। सव्य होकर हाथसे पूर्वाग्र कुशों तथा पुष्पोंको चढ़ाना चाहिये। माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता, पितामही, प्रपितामही, वृद्धप्रपितामही तथा अन्य अपने कुलमें जो भी माताएँ हों, उन्हें आदरपूर्वक निमन्त्रित करना चाहिये। इस प्रकार माताओंको उद्दिष्ट कर छः पिण्ड बनाकर पूजन

करना चाहिये। नान्दीमुखको उद्दिष्ट कर पाँच उत्तम ब्राह्मणोंको पाँच पितरोंके रूपमें भोजन कराना चाहिये। नान्दीमुख-श्राद्धमें ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये।

खगपते! श्राद्धमें दौहित्र अर्थात् नाती, कुतुप वेला (एक बजे दिनका समय) और तिल—ये तीन पवित्र माने गये हैं तथा तीन प्रशंसायोग्य कहे गये हैं—शुद्धि, अक्रोध और शीघ्रता न करना। एक वस्त्र धारण कर देव-पूजन और पितरोंके कर्म नहीं करने चाहिये। बिना उत्तरीय वस्त्र धारण किये पितर, देवता और मनुष्योंका पूजन, अर्चन तथा भोजन आदि सब कार्य निष्फल होता है। (अध्याय १८५)

सौर-धर्ममें शुद्धि-प्रकरण

भगवान् भास्करने कहा—खगाधिप! ब्राह्मणोंको नित्य पवित्र तथा मधुरभाषी होना चाहिये, उन्हें प्रतिदिन स्नानादिसे पवित्र हो चन्दनादि सुगन्धित द्रव्योंको धारणकर देवताओंका पूजन आदि करना चाहिये। सूर्यको निष्प्रयोजन नहीं देखना चाहिये और नग्न स्त्रीको भी नहीं देखना चाहिये। मैथुनसे दूर रहना चाहिये। जलमें मूत्र तथा विष्टाका परित्याग नहीं करना चाहिये। शास्त्रोक्त नियमोंके अनुसार कर्म करने चाहिये। शास्त्र-वर्णित कर्मानुष्ठानके अतिरिक्त कोई भी व्रतादि नहीं करने चाहिये।

खगाधिपते! अभक्ष्य-भक्षण सभी वर्णोंके लिये वर्जित है। द्रव्यकी शुद्धि होनेपर ही कर्मकी शुद्धि होती है अन्यथा कर्मके फलकी प्राप्तिमें संशय ही बना रहता है। जातिसे दुष्ट, क्रियासे दुष्ट, कालसे दुष्ट, संसर्गसे दुष्ट, आश्रयसे दुष्ट तथा सहल्लेख (स्वभावतः निन्दित एवं अभक्ष्य) पदार्थमें अथवा दूषित हृदयके एवं कपटी व्यक्तिके स्वभावमें परिवर्तन नहीं होता। लहसुन, गाजर, प्याज, कुकुरमुत्ता,

बैंगन (सफेद) तथा मूली (लाल) आदि जाल्या दूषित हैं। इनका भक्षण नहीं करना चाहिये। जो वस्तु क्रियाके द्वारा दूषित हो गयी हो अथवा पतितोंके संसर्गसे दूषित हो गयी हो, उसका प्रयोग न करे। अधिक समयतक रखा गया पदार्थ कालदूषित कहलाता है, वह हानिकर होता है, पर दही तथा मधु आदि पदार्थ कालदूषित नहीं होते। सुरा, लहसुन तथा सात दिनके अंदर ब्यायी हुई गायके दूधसे युक्त पदार्थ और कुत्तेद्वारा स्पर्श किये गये पदार्थ संसर्ग-दुष्ट कहे जाते हैं। इन पदार्थोंका परित्याग करना चाहिये। शूद्रसे तथा विकलाङ्ग आदिसे स्मृष्ट पदार्थ आश्रय-दूषित कहा जाता है। जिस वस्तुके भक्षण करनेमें मनमें स्वभावतः घृणा उत्पन्न हो जाती है, जैसे पुरीष (विष्टा)-के प्रति स्वभावतः घृणा उत्पन्न होती है—उसे ग्रहण नहीं करना चाहिये। वह सहल्लेख दोषयुक्त पदार्थ कहा गया है। खीर, दूध, पाकादिका भक्षण शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ही करना चाहिये।

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