भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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गौएँ तेजमें सूर्यके समान हैं। ये सम्पूर्ण संसारका उपकार करनेके लिये एवं देवताओंकी तृप्तिके लिये और मुझे स्नान करानेके लिये उत्पन्न हुई हैं। ये मेरा ही आधार लेकर स्थित हैं। गौओंके सभी अङ्ग पवित्र हैं। उनमें छहों रस निहित हैं। गायके गोबर, मूत्र, गोरोचन, दूध, दही तथा घृत—ये छः पदार्थ परम पवित्र हैं तथा सभी सिद्धियोंको देनेवाले हैं। सूर्यका परम प्रिय बिल्ववृक्ष गोमयसे ही उत्पन्न हुआ है, उस वृक्षपर कमलहस्ता लक्ष्मी विराजमान रहती हैं, अतः यह श्रीवृक्ष कहा जाता है। गोमयसे पङ्क उत्पन्न होता है और उससे कमल उत्पन्न हुए हैं। गोरोचन परम मङ्गलमय, पवित्र और सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। गोमूत्रसे सभी देवोंका आहार-स्वरूप विशेषकर भास्करके लिये भोग्य एवं प्रियदर्शन सुगन्धित गुग्गुल उत्पन्न हुआ है। जगत्के सभी बीज क्षीरसे उत्पन्न हुए हैं। कामनाकी सिद्धिके लिये सभी माङ्गल्य वस्तु दहीसे उत्पन्न समझें। देवोंका अतिशय प्रिय अमृत घृतसे उत्पन्न है, अतः घी, दूध, दहीसे भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। अनन्तर उष्ण जल और कषायसे स्नान कराना चाहिये। फिर शीतल जलसे स्नान कराकर गोरोचनका लेपन एवं बिल्वपत्र, कमल और नीलकमलसे
पूजन करना चाहिये। शर्करायुक्त गुग्गुलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। दूध, दही, भात, मधुके साथ शर्करा एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंको निवेदित करे। इसके बाद भगवान् भास्करकी प्रदक्षिणा कर उनसे क्षमा-याचना करे।
इस विधिसे जो दिनपति भगवान् भानुकी पडङ्ग-पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्तकर अपने कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंको स्वर्गमें ले जाता है तथा उन्हें वहाँ प्रतिष्ठित कर स्वयं ज्योतिष्क नामक स्थानको प्राप्त करता है। भगवान् भास्करकी पूजामें पत्र, पुष्प, फल, जल जो भी अर्पित होता है वह सब तथा सूर्य-सम्बन्धी गौएँ भी सूर्यलोकको प्राप्त करती हैं, इसमें संदेह नहीं है। देश, काल तथा विधिके अनुरूप श्रद्धापूर्वक सुपात्रको दिया गया अल्प भी दान अक्षय होता है। हे वीर! तिलका अर्धपरिमाणमात्र सत्पात्रको दिया गया श्रद्धापूर्वक दान सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। जिसने ज्ञानरूपी जलसे स्नान कर लिया है और शीलरूपी भस्मसे अपनेको शुद्ध कर लिया है, वह सभी पात्रोंमें उत्तम सत्पात्र माना गया है। जप, इन्द्रियदमन और संयम मनुष्यको संसार-सागरसे पार उतारनेवाले साधन हैं। (अध्याय १८७)
पञ्चमहायज्ञ एवं अतिथि-माहात्म्य-वर्णन, सौर-धर्ममें दानकी महत्ता और पात्रापात्रका निर्णय तथा पञ्च महापातक
समाश्रवाहन ( भगवान् सूर्य )-ने कहा—हे वीर! जो प्राणी सूर्य, अग्नि, गुरु तथा ब्राह्मणको निवेदन किये बिना स्वयं जो कुछ भी भक्षण
करता है वह पाप-भक्षण करता है। गृहस्थ मनुष्योंके कृषिकार्यसे, वाणिज्यसे, क्रोध और असत्य आदिके आचरणसे तथा पञ्चसूना*-दोषसे
- भोजन पकानेका स्थान (चूल्हा), आटा आदि पीसनेका स्थान (चक्की आदि) मसाला आदि कूटने-पीसनेका स्थान (लोढ़ा, सिलवट आदि), जल रखनेका स्थान तथा झाडू देनेका काम—इनमें अनजाने ही हिंसाकी सम्भावना रहती है। अतः गृहस्थके लिये इन्हें ही पञ्चसूना-दोष कहा गया है।
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