भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

१९०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

निक्षुभार्क-ससमी तथा निक्षुभार्क-चतुष्टय-व्रत-माहात्म्य-वर्णन

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो स्त्री उत्तम पुत्रकी आकाङ्क्षा रखती है, उसे निक्षुभार्क नामका व्रत करना चाहिये। यह व्रत स्त्री एवं पुरुषमें परस्पर प्रीतिवर्धक, अवियोगकारक और धर्म, अर्थ तथा कामका साधक है। इस व्रतको षष्ठी, ससमी, संक्रान्ति या रविवारके दिन करना चाहिये। भगवान् सूर्यके सहित उनकी पत्नी महादेवी निक्षुभाकी द्यौ-रूपमें कांस्य, रजत तथा सुवर्णकी सुन्दर प्रतिमा बनवाये। उसे घृतादिसे स्नान कराकर गन्ध-माल्यादि तथा वस्त्रोंसे अलंकृत करे। अनन्तर प्रतिमा स्थापित किये उस वितान और छत्रसे शोभित पात्रको सिरपर रखकर भगवान् सूर्यके मन्दिरमें ले जाय। उस प्रतिमाको एक वेदीपर स्थापित करे और प्रदक्षिणापूर्वक उसे नमस्कार कर क्षमा-याचना करे एवं उपवास रहकर हविके द्वारा हवन करे। फिर सूर्य-भक्त ब्राह्मणोंको शुक्ल वस्त्र पहनाकर भोजन कराये। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति देदीप्यमान महायानसे सूर्यलोकमें सूर्यभक्तोंके साथ आनन्द प्राप्त करता है, फिर वह अनन्त वर्षोंतक विष्णुलोकमें आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है।

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो स्त्री सौभाग्यकी आकाङ्क्षासे संयतेन्द्रिय होकर षष्ठी अथवा ससमीको एक वर्षतक भोजन नहीं करती और वर्षके अन्तमें निक्षुभा तथा सूर्यकी प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक स्नानादि पूर्वोक्त क्रियाएँ करती है, वह पूर्वोक्त फलोंको प्राप्त करती है तथा चारों द्वारोंसे सुशोभित स्वर्णमय यानके द्वारा रमणीय

सूर्यलोकमें जाकर सभी फलोंको प्राप्तकर सौर आदि सभी लोकोंमें अभीप्सित फलका उपभोग कर इस लोकमें जन्म ग्रहण करती है तथा राजाको पतिरूपमें प्राप्त करती है।

इसी प्रकार जो नारी कृष्ण पक्षकी ससमीको उपवास कर वर्षके अन्तमें शालिके चूर्णसे सुन्दर निक्षुभार्ककी प्रतिमाका निर्माण करके पीत रंगकी मालासे और पीत वस्त्रोंसे उनकी पूजा करती है तथा ये सभी कर्म सूर्यको निवेदित करती है, वह हाथी-दाँतके समान कान्तिवाले महायानसे सातों लोकोंमें गमनकर, सौ करोड़ वर्षतक सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होती है। नरश्रेष्ठ! सौर आदि लोकोंमें भोगोंका उपभोगकर क्रमशः इस लोकमें जन्म ग्रहण करती तथा अभीप्सित धन-धान्य-समन्वित मनोऽनुकूल पतिको प्राप्त करती है*।

जो दृढवती नारी माघ मासके कृष्ण पक्षकी ससमीको सभी भोगोंका परित्याग कर एक वर्षतक प्रत्येक ससमीको उपवास करती और वर्षके अन्तमें गन्धादि पदार्थ निक्षुभार्कको निवेदित करती है तथा मगकी स्त्रियोंको भोजन कराती है, वह गन्धर्वसे सुशोभित विचित्र दिव्य महायानद्वारा सूर्यलोकमें जाकर अनेक सहस्र वर्षोंतक निवास करती है। वहाँ यथेष्ट सभी भोगोंका उपभोग कर इस लोकमें आनेपर राजाको पतिरूपमें वरण करती है।

राजन्! जो स्त्री पाप और भयका नाश करनेवाले इस निक्षुभार्क-व्रतको करती है, वह परमपदको प्राप्त करती है। एक वर्षतक परम श्रद्धाके साथ

  • चतुर्वर्गचिन्तामणि (हेमाद्रि)-के व्रत-खण्डमें भविष्यपुराणके नामसे निक्षुभार्क-चतुष्टय नामक इस व्रतका संग्रह हुआ है। उपलब्ध भविष्यपुराणमें पाठका कुछ अंश कम है, जिसे हेमाद्रिके आधारपर यहाँ दिया जा रहा है—

जो नारी एक वर्षतक संयतेन्द्रिय होकर ससमीको निराहार व्रत रखती है और जिसकी कणिकाएँ सुवर्णकी हों ऐसे चाँदीके कमलको, पिष्टमय गजका निर्माणकर उसकी पीठपर स्थापित कर वर्षान्तमें उसका दान करती है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। शेष पूजन पूर्वोक्त विधिसे ही करना चाहिये। इससे वह पुरुषरूपसे सभी सौरादि लोकोंमें भ्रमण करते हुए पृथ्वीलोकमें आकर कुलीन तथा रूपसम्पन्न महाबली राजाको पतिरूपमें प्राप्त करती है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth