भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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१८८* संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अगस्त्यके पुष्पोंसे जो एक बार भी भक्तिपूर्वक सूर्यकी पूजा करता है, वह दस लाख गोदानका फल प्राप्त करता है और उसे स्वर्ग प्राप्त होता है।

मालती, रक्त कमल, चमेली, पुंनाग, चम्पक, अशोक, श्वेत मन्दार, कचनार, अंधुक, करवीर, कल्हार, शमी, तगर, कनेर, केसर, अगस्त्य, बक तथा कमल-पुष्पोंद्वारा यथाशक्ति भगवान् सूर्यकी पूजा करनेवाला कोटि सूर्यके समान देदीप्यमान विमानसे सूर्यलोकको प्राप्त करता है अथवा पृथ्वी या जलमें उत्पन्न पुष्पोंद्वारा श्रद्धापूर्वक पूजन करनेवाला सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

(अध्याय १६३)


सूर्यषष्ठी-व्रतकी महिमा

सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! अब आप भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय सूर्यषष्ठी-व्रतके विषयमें सुनें। सूर्यषष्ठी-व्रत करनेवालेको जितेन्द्रिय एवं क्रोधरहित होकर अयाचित-व्रतका पालन करते हुए भगवान् सूर्यकी पूजामें तत्पर रहना चाहिये। व्रतीको अल्प और सात्त्विक-भोजी तथा रात्रिभोजी होना चाहिये। स्नान एवं अग्निकार्य करते रहने चाहिये और अधःशायी होना चाहिये। मध्याह्नमें देवताओंद्वारा, पूर्वाह्णमें ऋषियोंद्वारा, अपराह्णमें पितरोंद्वारा और संध्यामें गुह्यकोंद्वारा भोजन किया जाता है। अतः इन सभी कालोंका अतिक्रमण कर सूर्यव्रतीके भोजनका समय रात्रि ही माना गया है। मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीसे यह व्रत आरम्भ करना चाहिये। इस दिन भगवान् सूर्यकी ‘अंशुमान्’ नामसे पूजा करनी चाहिये तथा रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर निराहार हो विश्राम करना चाहिये। ऐसा करनेवाला व्यक्ति अतिरात्र-यज्ञका फल प्राप्त करता है। इसी प्रकार पौषमें भगवान् सूर्यकी ‘सहस्त्रांशु’ नामसे पूजा करे तथा घृतका प्राशन करे, इससे वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है। माघ मासमें कृष्ण पक्षकी षष्ठीको रात्रिमें गोदुग्ध-पान करे। सूर्यकी पूजा ‘दिवाकर’ नामसे करे, इससे महान् फल प्राप्त होता है। फाल्गुन मासमें ‘मार्तण्ड’ नामसे पूजाकर, गोदुग्धका पान करनेसे अनन्त कालतक सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। चैत्र मासमें भास्करकी ‘विवस्वान्’ नामसे भक्तिपूर्वक पूजाकर हविष्य-भोजन करनेवाला सूर्यलोकमें अप्सराओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। वैशाख मासमें ‘चण्डकिरण’ नामसे सूर्यकी पूजा करनेसे दस हजार वर्षोंतक सूर्यलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। इसमें पयोव्रती होकर रहना चाहिये। ज्येष्ठ मासमें भगवान् भास्करकी ‘दिवस्पति’ नामसे पूजा कर गो-शृङ्गका जल-पान करना चाहिये। ऐसा करनेसे कोटि गोदानका फल प्राप्त होता है। आषाढ़ मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीको ‘अर्क’ नामसे सूर्यकी पूजा कर, गोमयका प्राशन करनेसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। श्रावण मासमें ‘अर्यमा’ नामसे सूर्यका पूजन कर दुग्ध-पान करे, ऐसा करनेवाला सूर्यलोकमें दस हजार वर्षोंतक आनन्दपूर्वक रहता है। भाद्रपद मासमें ‘भास्कर’ नामसे सूर्यकी पूजा कर पञ्चगव्य-प्राशन करे, इससे सभी यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीमें ‘भग’ नामसे सूर्यकी पूजा करे, इसमें एक पल गोमूत्रका प्राशन करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। कार्तिक मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीको ‘शक्र’ नामसे सूर्यकी पूजाकर दूर्वाङ्कुरका एक बार भोजन करनेसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त होता है।

वर्षके अन्तमें सूर्य-भक्तिपरायण ब्राह्मणोंको मधुसंयुक्त पायसका भोजन कराये तथा यथाशक्ति स्वर्ण और वस्त्रादि समर्पित करे। भगवान् सूर्यके