भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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अष्टाङ्ग अर्घ—जल, दूध, कुशका अग्रभाग, घी, दही, मधु, लाल कनेरका फूल तथा लाल चन्दन—बनाकर भगवान् सूर्यको निवेदित करता है, वह दस हजार वर्षतक सूर्यलोकमें विहार करता है। यह अष्टाङ्ग अर्घ भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है*।
बाँसके पात्रसे अर्घ—दान करनेसे सौ गुना फल मिट्टीके पात्रसे होता है, मिट्टीके पात्रसे सौ गुना फल ताम्रके पात्रसे होता है और पलाश एवं कमलके पत्तोंसे अर्घ देनेपर ताम्रपात्रका फल प्राप्त होता है। रजतपात्रके द्वारा अर्घ प्रदान करना लाख गुना फल देता है। सुवर्णपात्रके द्वारा दिया गया अर्घ कोटि गुना फल देनेवाला होता है। इसी प्रकार स्नान, अर्घ, नैवेद्य, धूप आदिका क्रमशः विभिन्न पात्रोंकी विशेषतासे उत्तरोत्तर श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है।
धनिक या दरिद्र दोनोंको समान ही फल मिलता है, किंतु जो भगवान् सूर्यके प्रति भक्ति-भावनासे सम्पन्न रहता है, उसे अधिक फल मिलता है। वैभव रहनेपर भी मोहवश जो पूर्व विधि-विधानके साथ पूजन आदि नहीं करता, वह लोभसे आक्रान्त-चित्त होनेके कारण उसका फल नहीं प्राप्त कर पाता। इसलिये मन्त्र, फल, जल तथा चन्दन आदिसे विधिपूर्वक सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। इससे वह अनन्त फलको प्राप्त करता है। इस अनन्त फल-प्राप्तिसमें भक्ति ही मुख्य हेतु है। भक्तिपूर्वक पूजा करनेसे वह सौ दिव्य कोटि वर्ष सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
राजन्! सूर्यको भक्तिपूर्वक तालपत्रका पंखा समर्पित करनेवाला दस हजार वर्षतक सूर्यलोकमें निवास करता है। मयूर-पंखका सुन्दर पंखा सूर्यको
समर्पित करनेवाला सौ कोटि वर्षोंतक सूर्यलोकमें निवास करता है।
नरश्रेष्ठ! हजारों पुष्पोंसे कनेरका पुष्प श्रेष्ठ है, हजारों बिल्वपत्रोंसे एक कमल-पुष्प श्रेष्ठ है। हजारों कमल-पुष्पोंसे एक अगस्त्य-पुष्प श्रेष्ठ है, हजारों अगस्त्य-पुष्पोंसे एक मोंगरा-पुष्प श्रेष्ठ है, सहस्र कुशाओंसे शमीपत्र श्रेष्ठ है तथा हजार शमी-पत्रोंसे नीलकमल श्रेष्ठ है। सभी पुष्पोंमें नीलकमल ही श्रेष्ठ है। लाल कनेरके द्वारा जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह अनन्त कल्पोंतक सूर्यलोकमें सूर्यके समान श्रीमान् तथा पराक्रमी होकर निवास करता है। चमेली, गुलाब, विजय, श्वेत मदार तथा अन्य श्वेत पुष्प भी श्रेष्ठ माने गये हैं। नाग-चम्पक, सदाबहार-पुष्प, मुद्गर (मोंगरा) ये सब समान ही माने गये हैं। गन्धयुक्त किंतु अपवित्र पुष्पोंको देवताओंपर नहीं चढ़ाना चाहिये। गन्धहीन होते हुए भी पवित्र कुशादिकोंको ग्रहण करना चाहिये। पवित्र पुष्प सात्त्विक पुष्प हैं और अपवित्र पुष्प तामसी हैं। रात्रिमें मोंगरा और कदम्बका पुष्प चढ़ाना चाहिये। अन्य सभी पुष्पोंको दिनमें ही समर्पित करना चाहिये। अधखिले पुष्प तथा अपक्व पदार्थ भगवान् सूर्यको नहीं चढ़ाने चाहिये। फलोंके न मिलनेपर पुष्प, पुष्प न मिलनेपर पत्र और इनके अभावमें तृण, गुल्म और औषध भी समर्पित किये जा सकते हैं। इन सबके अभावमें मात्र भक्तिपूर्वक पूजन-आराधनसे भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं। जो माघ मासके कृष्णपक्षमें सुगन्धित मुक्ता-पुष्पोंद्वारा सूर्यकी पूजा करता है, उसे अनन्त फल प्राप्त होता है। संयतचित्त होकर करवीर-पुष्पोंसे पूजा करनेवाला सभी पापोंसे रहित हो सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
- आपः क्षीरं कुशाग्राणि घृतं दधिं तथा मधु । रक्तानि करवीराणि तथा रक्तं च चन्दनम् ॥ अष्टाङ्ग एष अर्घो वै ब्रह्मणा परिकीर्तितः । सततं प्रीतिजननो भास्करस्य नराधिप ॥
(ब्राह्मपर्व १६३।३७-३८)
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