भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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खगश्रेष्ठ ! पाप करनेवालोंको अपने पापके निमित्त घोर संत्रास भोगना पड़ता है। गर्भस्थ, जायमान, बालक, तरुण, मध्यम, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, नपुंसक सभी शरीरधारियोंको यमलोकमें अपने किये गये शुभ और अशुभ फलोंको भोगना पड़ता है। वहाँ सत्यवादी चित्रगुप्त आदि धर्मराजको जो भी शुभ और अशुभ कर्म बतलाते हैं, उन कर्मोंका फल उस प्राणीको अवश्य ही भोगना पड़ता है। जो सौम्य-हृदय, दया-समन्वित एवं शुभकर्म करनेवाले हैं, वे सौम्य पथसे और जो मनुष्य क्रूर कर्म करनेवाले एवं पापाचारमें संलग्न हैं, वे घोर दक्षिण-मार्गसे कष्ट सहन करते हुए यमपुरीमें जाते हैं। वैवस्वतपुरी छियासी हजार अस्सी योजनामें है। शुभ कर्म करनेवाले व्यक्तियोंको यह धर्मपुरी समीप ही प्रतीत होती है और रौद्रमार्गसे जानेवाले पापियोंको अतिशय दूर। यमपुरीका मार्ग अत्यन्त भयंकर है, कहीं काँटे बिछे हैं और कहीं बालू-ही-बालू है, कहीं तलवारकी धारके समान है, कहीं नुकीले पर्वत हैं, कहीं असह्य कड़ी धूप है, कहीं खाइयाँ और कहीं लोहेकी कीले हैं। कहीं वृक्षों तथा पर्वतोंसे गिराया जाता हुआ वह पापी व्यक्ति प्रेतोंसे युक्त मार्गमें दुःखित हो यात्रा करता है। कहीं ऊबड़-खाबड़, कहीं कँकरीले और कहीं तस बालुकामय मार्गोंसे चलना पड़ता है। कहीं अन्धकाराच्छन्न भयंकर कष्टमय मार्गसे बिना किसी आश्रयके जाना पड़ता है। कहीं सींगसे परिव्याप्त मार्गसे, कहीं
दावागिनसे परिपूर्ण मार्गसे, कहीं तस पर्वतसे, कहीं हिमाच्छादित मार्गसे और कहीं अग्नियमय मार्गसे गुजरना पड़ता है। उस मार्गमें कहीं सिंह, कहीं व्याघ्र, कहीं काटनेवाले भयंकर कीड़े, कहीं भयंकर जोंक, कहीं अजगर, कहीं भयंकर मक्षिकाएँ, कहीं विष वमन करनेवाले सर्प, कहीं विशाल बलोन्मत्त प्रमादी गजसमूह, कहीं भयंकर बिच्छू, कहीं बड़े-बड़े शृंगोंवाले महिष, रौद्र डाकिनियाँ, कराल राक्षस तथा महान् भयंकर व्याधियाँ उसे पीड़ित करती हैं, उन्हें भोगता हुआ पापी व्यक्ति यममार्गमें जाता है। उसपर कभी पाषाणकी वृष्टि होती है, कभी बिजली गिरती है तथा कभी वायुके झंझावातोंमें वह उलझाया जाता है और कहीं अंगारोंकी वृष्टि होती है। ऐसे भयंकर मार्गोंसे पापाचरण करनेवाले भूख-प्याससे व्याकुल मूढ़ पापीको यमदूत यमलोककी ओर ले जाते हैं।
अतः पाप छोड़कर पुण्य-कर्मका आचरण करना चाहिये। पुण्यसे देवत्व प्राप्त होता है और पापसे नरककी प्राप्ति होती है। जो थोड़े समयके लिये भी मनसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह कभी भी यमपुरी नहीं जाता। जो इस पृथिवीपर सभी प्रकारसे भगवान् भास्करकी पूजा करते हैं, वे पापसे वैसे ही लिस नहीं होते, जैसे कमलपत्र जलसे लिस नहीं होता। इसलिये सभी प्रकारसे भुवनभास्करकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिये। (अध्याय १९०-१९२)
ससमी-व्रतमें दन्तधावन-विधि-वर्णन
भगवान् सूर्यने कहा—विनतानन्दन अरुण ! अयनकाल, विषुवकाल, संक्रान्ति तथा ग्रहणकालमें सदा भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। ससमीमें तो विशेषरूपसे उनकी पूजा करनी चाहिये। ससमियोंँ
सात प्रकारकी कही गयी हैं—अर्कसम्पुटिका-ससमी, मरीचि-ससमी, निम्ब-ससमी, फल-ससमी, अनोदना-ससमी, विजय-ससमी तथा सातवीं कामिका-ससमी। माघ मास या मार्गशीर्ष मासमें
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