भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अर्कसम्पुटिका-ससमीव्रत-विधि, ससमी-व्रत-माहात्म्यमें कौथुमिका आख्यान

सुमन्तुजी बोले—राजन्! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको अर्कससमी कहते हैं। इसमें षष्ठीको उपवास रहकर स्नान करके गन्ध, पुष्प, गुग्गुल, अर्क-पुष्प, श्वेत करवीर एवं चन्दनादिसे भगवान् दिवाकरकी पूजा करनी चाहिये। रविकी प्रसन्नताके लिये नैवेद्यमें गुडोदक समर्पित करे। इस प्रकार दिनमें भानुकी पूजा करके रातमें निद्रारहित होकर उनके मन्त्रका जप करे।

शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यका प्रिय मन्त्र कौन-सा है? उसे बतायें और धूप-दीपका भी निर्देश करें; जिससे उस मन्त्रका जप करता हुआ मैं दिवाकरकी पूजा कर सकूँ।

सुमन्तुजीने कहा—हे भरतश्रेष्ठ! मैं इस विधिको संक्षेपसे कह रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि एकाग्रचित्त होकर षडक्षर-मन्त्रका जप, होम तथा पूजा आदि सभी कर्म सम्पादित करे। सर्वप्रथम यथाशक्ति गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। सौरी गायत्री-मन्त्र इस प्रकार हैं—‘ॐ भास्कराय विचक्षे सहस्वरश्मि धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥’ इसे भगवान् सूर्यने स्वयं कहा है। यह सौरी गायत्री-मन्त्र परम श्रेष्ठ है। इसका श्रद्धापूर्वक एक बार जप करनेसे ही मानव पवित्र हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। ससमीके दिन प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो इस मन्त्रका जप करे और भक्तिपूर्वक भास्करकी पूजा करे। राजन्! यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराये। धनकी कंजूसी न करे। जो सूर्यके प्रति श्रद्धा-सम्पन्न नहीं हैं, उन्हें भोजन नहीं कराना चाहिये। शाल्योदन, मूँग, अपूप, गुड़से बने पुरे, दूध तथा दहीका भोजन कराना चाहिये। इससे भास्कर तृप्त होते हैं। भोजनके वज्य पदार्थ इस प्रकार हैं—कुलथी, मसूर, सेम तथा बड़ी। उड़द आदि, कड़वा तथा दुर्गन्धयुक्त

पदार्थ भी निवेदित नहीं करने चाहिये।

अर्कवृक्षकी ‘ॐ खरखोल्लाक्य नमः’ से पूजा कर अर्क-पल्लवोंको ग्रहण करे। फिर स्नानकर अर्क-पुष्पसे रविकी पूजा करके ब्राह्मणको भोजन कराये और ‘अकों मे प्रीयताम्’ सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों, ऐसा कहे। तदनन्तर देवताके सम्मुख दाँत और ओठसे स्पर्श किये बिना निमल्लिखित मन्त्रसे अर्कसम्पुटकी प्रार्थना करते हुए जलके साथ पूर्वाभिमुख होकर अर्कपुट निगल जाय।

ॐ अर्कसम्पुट भद्रं ते सुभद्रं मेऽस्तु वै सदा।

ममापि कुरु भद्रं वै प्राशनाद् वित्तदो भव॥

(ब्राह्मपर्व २१०।७३)

इस मन्त्रका जप करते हुए जो अर्कका ध्यान करता है तथा अर्कसम्पुटका प्राशन करता है, वह श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है।

दाँतसे स्पर्श न किये जानेके कारण अर्कपुट अर्कसम्पुट कहलाता है। जो इस विधिसे वर्षभर सूर्यनारायणकी प्रसन्नताके लिये श्रद्धापूर्वक ससमी-व्रत करता है, उस मनुष्यका धन सात पीढ़ीतक अक्षय तथा अचल हो जाता है। हे राजन्! इस व्रतके अनुष्ठानसे सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमि कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये तथा सिद्धि प्राप्त की। साथ ही बृहदवल्लक, राजा जनक, महर्षि याज्ञवल्क्य तथा कृष्णपुत्र साम्ब—इन सबने भी भगवान् सूर्यकी पूजा करके और इस व्रतके अनुष्ठानसे उनकी साम्यता प्राप्त कर ली। यह अर्क-ससमी पवित्र, पापनाशिनी, पुण्यप्रद तथा धन्य है। अपने कल्याणके लिये इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये।

शतानीकने पूछा—मुने! जनक आदिने भगवान् सूर्यकी पूजा करके जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की, उसे तो मैंने बहुधा सुना है, किंतु महर्षि कौथुमिने किस प्रकार अर्ककी आराधना कर सिद्धि प्राप्त

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