भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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की और वे कैसे कुछ-रोगसे मुक्त हुए, इसका मुझे ज्ञान नहीं है। वे कौथुमि कौन थे, उन्हें कैसे कुछ हुआ? हे द्विजश्रेष्ठ! किस प्रकार उन्होंने देवाधिदेव दिवाकरकी आराधना की? इन सभी बातोंको मुझे संक्षेपमें सुनायें।
सुमन्तुजीने कहा—राजन्! आपने बहुत अच्छी जिज्ञासा की है। इस विषयको आप श्रवण करें। प्राचीन कालमें हिरण्यनाभ नामके एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे अपने पुत्रके साथ महाराजा जनकके आश्रमपर गये। वहाँ अनेक ब्राह्मणोंके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। क्रोधवश कौथुमिसे एक ब्राह्मणका वध हो गया। पुत्रके द्वारा विप्रको मारा गया देखकर पिताने कौथुमिका परित्याग कर दिया। सज्जनों तथा कुटुम्बियोंने भी उनका बहिष्कार कर दिया। शोक और दुःखसे दुःखी होकर वे दिव्य देवालयोंमें गये और उन्होंने अनेक तीर्थोंकी यात्राएँ कीं, किंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिल सकी। ब्रह्महत्याके कारण उन्हें भयंकर कुछ नामक व्याधिने ग्रस्त कर लिया। नाक, कान आदि अङ्ग गलकर गिर गये। शरीरसे पीब और रक्त बहने लगा। समस्त पृथ्वीपर घूमते हुए वे पुनः अपने पिताके घर आये। दुःखसे व्याकुलचित्त हो उन्होंने अपने पितासे कहा—'तात! मैं पवित्र तीर्थों और अनेक देवालयोंमें गया, किंतु इस क्रूर ब्रह्महत्यासे मुक्त नहीं हो सका। प्रायश्चित्त करनेपर भी मुझे इससे छुटकारा नहीं मिला है। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कैसे मैं रोगसे मुक्ति पाऊँ? हे अनघ! अल्प परिश्रम-साध्य जिस कर्मके करनेसे इस ब्रह्महत्यारूपी व्याधिसे मुझे छुटकारा मिले, उस उपायको आप शीघ्र बतायें और मेरा कल्याण करें।'
हिरण्यनाभने कहा—पुत्र! पृथ्वीमें घूमते हुए तुमने जो क्लेश प्राप्त किया है, उसे मैं भलीभाँति जानता हूँ। तुम अनेक तीर्थोंमें गये और प्रायश्चित्त भी किये, परंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिली, अब मैं एक उपाय बताता हूँ, उस उपायसे तुम अनायास ही ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाओगे।
कौथुमिने कहा—विभो! मैं ब्रह्मादि देवोंमें किसकी आराधना करूँ? मैं तो शरीरसे भी विकल हूँ, अतः सभी कर्मोंका यथावत् सम्पादन मुझसे सम्भव नहीं है, फिर किस प्रकार मैं देवताको संतुष्ट कर सकूँगा।
हिरण्यनाभने कहा—ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, वरुण आदि देवताओंने भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा की है और इसी कारण वे स्वर्गलोकमें आनन्दित हो रहे हैं। हे पुत्र! मैं भगवान् सूर्यके समान किसी भी देवताको नहीं जानता हूँ। वे सभी कामनाओंको देनेवाले और माता-पिता तथा सभीके मान्य हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिये तुम उनके मन्त्रका जप करते हुए तथा सामवेदके मन्त्रोंका गान करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करो और उनसे सम्बन्धित इतिहास-पुराण आदिका श्रवण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही रोगसे मुक्ति मिलेगी और तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।
सुमन्तुजीने कहा—राजन्! सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमिने श्रद्धा-समन्वित हो अपने पिताद्वारा निर्दिष्ट सूर्योपासनाकी विधिसे भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् भास्करकी कृपासे महर्षि कौथुमि दिव्य मूर्तिमान् हो गये और उन्होंने भगवान् भास्करके दिव्य मण्डलमें प्रवेश किया*। (अध्याय २१०-२११)
- महर्षि कौथुमि एक वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। सामवेद-संहिताकी कौथुमी शाखा अत्यन्त प्रसिद्ध है और इस समय वही प्राप्त है। उसके द्रष्टा ऋषि यही हैं। ये प्राच्य सामग भी कहलाते हैं। शौनकीय चरणव्यूह-ग्रन्थमें सामवेदकी प्रायः एक हजार शाखाओंकी विस्तृत चर्चा है।
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