भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मरिच-ससमी-व्रत-वर्णन
सुमन्तुजीने कहा—हे वीर! मैंने तुमको अर्कसम्पुटिका-व्रतकी संक्षिप्त विधि बतलायी। अब मरिच-ससमीका वर्णन कर रहा हूँ, इसमें मरिचका भक्षण किया जाता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिको उपवास रहकर सौर-धर्मकी विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये। 'ॐ वं फट्' यह महाबलशाली मन्त्र साक्षात् सूर्यस्वरूप ही है। इसका बारम्बार स्मरण एवं जप करनेसे मानव एक वर्षमें ही देवेश भगवान् भास्करका दर्शन प्राप्त कर लेता है और अन्तमें व्याधि तथा मृत्युसे मुक्त हो सूर्यलोकको प्राप्त करता है। व्रती आत्मशुद्ध्यर्थ मरिच-ससमीके दिन सौर-मन्त्रों एवं मुद्राओंसे हृदयादि अङ्गन्यास कर प्राणायाम आदि करे। भगवान्को अर्घ्य प्रदान करे। विविध पुष्पोंको अर्पित करे। स्नान कराये, नैवेद्य अर्पित करे। संयत होकर सूर्यमन्त्रोंका जप करे। व्योममुद्रा दिखाकर प्रदक्षिणा करे, हवन करे और हृदयमुद्रासे भगवानका विसर्जन करे। भगवान्के पूजन आदि कर्मोंमें तत्तद मुद्राओंको दिखाये। मुद्राओंके नाम इस प्रकार हैं—किंकिणी, व्योम, अस्त्र, पञ्चिनी, अर्किणी, ज्वालिनी, तेजनी, गभस्तिनी, शंखिनी, सूर्यवक्त्रा, सहस्रकिरण, उदया, मध्यमा, अस्तमनी, मालिनी, तर्जनी तथा कुम्भमुद्रा। इन मुद्राओंके
साथ जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उससे वे प्रसन्न हो जाते हैं। इस विधिसे ब्रह्मणे भगवान् सूर्यकी पूजा की थी। राजन्! तुम भी इस विधिसे भास्करकी पूजा करो। इस विधिसे जो सदा रविकी पूजा करता है, वह भगवान् सूर्यदेवके दिव्य धामको प्राप्त कर लेता है। नृप! इस विधिसे देवेशकी पूजा कर यथाशक्ति ब्राह्मणको विधिपूर्वक भोजन कराकर ससमीके दिन मन्त्रपूर्वक सूर्यका स्मरण करते हुए मौन होकर भोजन करे और भोजनसे पहले मरिचकी इस प्रकार प्रार्थना करे— ॐ खखोल्लेकाय स्वाहा। प्रीयतां प्रियसङ्गद्वो भव स्वाहा॥
ऐसा करनेसे व्रतीको प्रिय व्यक्तिका समागम उसी क्षण प्राप्त हो जाता है। यह मरिच-ससमी प्रियसंगमदायिनी और पुण्यको प्रदान करनेवाली तथा कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली है। एक वर्षतक इस ससमी-व्रतका पालन करनेसे पुत्रादिकोंसे वियोग नहीं होता। इसलिये महाबाहो! इस प्रियदायिनी ससमीको तुम भी करो। देवराज इन्द्रने इस मरिच-सप्तमीको उपवास कर महाराज्ञी शचीका सङ्ग प्राप्त किया था। महाबलशाली राजा नलने भी इस ससमीको उपवास कर दमयन्तीको प्राप्त किया था और श्रीरामने भी इस ससमीके दिन उपवास कर भगवती सीताको प्राप्त किया था।
(अध्याय २१२—२१४)
निम्ब-ससमी तथा फलससमी-व्रतका वर्णन
सुमन्तुजीने कहा—हे वीर! अब मैं तृतीय निम्ब-ससमी (वैशाख शुक्ला ससमी)-की विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें। इसमें निम्ब-पत्रका सेवन किया जाता है। यह ससमी सभी तरहके व्याधियोंको हरनेवाली है। इस दिन हाथमें शार्ङ्गधनुष, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये हुए
भगवान् सूर्यका ध्यान कर उनकी पूजा करनी चाहिये। भगवान् सूर्यका मूल मन्त्र है—'ॐ खखोल्लेकाय नमः'। 'ॐ आदित्याय विद्महे विश्वभागाय धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥' यह सूर्यका गायत्री-मन्त्र है।
पूजामें सर्वप्रथम समाहित-चित्त होकर प्रयत्नपूर्वक
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