भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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मन्त्रपूत जलसे पूजाके उपचारोंका प्रोक्षण करे। अपनेमें भगवान् सूर्यकी भावना करके उनका ध्यान करते हुए मन्त्रवित् हृदय आदि अङ्गोंमें मन्त्रका विन्यास करे। सम्प्राजनी मुद्रासे दिशाओंका प्रतिबोधन करे। भूशोधन करना चाहिये। पूजाकी यह विधि सभीके लिये अभीष्ट फल देनेवाली है।
पवित्र स्थानमें कर्णिकायुक्त एक अष्टदल-कमल बनाये, उसमें आवाहिनी मुद्राके द्वारा भगवान् सूर्यका आवाहन करे। वहाँपर मनोहर-स्वरूप खरबोलक भगवान् सूर्यको स्नान कराये। मन्त्रमूर्ति भगवान् सूर्यकी स्थापना और स्नान आदि कर्म मन्त्रोंद्वारा करने चाहिये। आग्नेय दिशामें भगवान् सूर्यके हृदयकी, ईशानकोणमें सिरकी, नैऋत्यकोणमें शिखाकी एवं पूर्वदिशामें दोनों नेत्रोंकी भावना करे। इसके अनन्तर ईशानकोणमें सोम, पूर्व दिशामें मंगल, आग्नेयमें बुध, दक्षिणमें बृहस्पति, नैऋत्य दिशामें शुक्ल, पश्चिममें शनि, वायव्यमें केतु और उत्तरमें राहुकी स्थापना करे। कमलकी द्वितीय कक्षामें भगवान् सूर्यके तेजसे उत्पन्न द्वादश आदित्यों—भग, सूर्य, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, चन्द्र तथा विष्णुको स्थापित करे। पूर्वमें इन्द्र, दक्षिणमें यम, पश्चिममें वरुण, उत्तरमें कुबेर, ईशानमें ईश्वर, अग्निकोणमें अग्निदेवता, नैऋत्यमें पितृदेव, वायव्यमें वायु तथा जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, शेष, वासुकि, रेवती, विनायक, महाश्वेता, राज्ञी, सुवर्चला आदि तथा अन्य देवताओंके समूहको यथास्थान स्थापित करना चाहिये। सिद्धि, वृद्धि, स्मृति, उत्पलमालिनी तथा श्री इनको अपने दक्षिण पार्श्वमें स्थापित करना चाहिये। प्रज्ञावती, विभा, हारीता, बुद्धि, ऋद्धि, विसृष्टि, पौर्णमासी तथा विभावरी आदि देव-
शक्तियोंको अपने उत्तर भगवान् सूर्यके समीप स्थापित करना चाहिये।
इस प्रकार भगवान् सूर्य तथा उनके परिकरों एवं देव-शक्तियोंकी स्थापना करनेके अनन्तर मन्त्रपूर्वक धूप, दीप, नैवेद्य, अलंकार, वस्त्र, पुष्प आदि उपचारोंको भगवान् सूर्य तथा उनके अनुगामी देवोंको प्रदान करे। इस विधिसे जो भास्करकी सदा अर्चना करता है, वह सभी कामनाओंको पूर्ण कर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। निम्नलिखित मन्त्रद्वारा निम्बकी प्रार्थना कर उसे भगवान्को निवेदित करके प्राशन करे—
त्वं निम्ब कटुकात्मासि आदित्यनिलयस्तथा।
सर्वरोगहरः शान्तो भव मे प्राशनं सदा॥
‘हे निम्ब! तुम भगवान् सूर्यके आश्रयस्थान हो। तुम कटु स्वभाववाले हो, तुम्हारे भक्षण करनेसे मेरे सभी रोग सदाके लिये नष्ट हो जायें और तुम मेरे लिये शान्तस्वरूप हो जाओ।’
इस मन्त्रसे निम्बका प्राशन कर भगवान् सूर्यके समक्ष पृथ्वीपर बैठकर सूर्यमन्त्रका जप करे। इसके बाद यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे। अनन्तर संयत-वाक् हो लवणवर्जित मधुर भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक इस निम्ब-ससमीका व्रत करनेवाला व्यक्ति सभी रोगोंसे मुक्त हो सूर्यलोकको जाता है।
सुमन्तुजीने कहा—राजन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी ससमी तिथिको उपवास कर भगवान् सूर्यकी सौर-विधानसे पूजा करनी चाहिये। पुनः अष्टमीको स्नानकर दिवाकरकी पूजा कर ब्राह्मणोंको खजूर नारियल, मातुलुङ्ग (बिजौरा) तथा आम्रके फलोंको भगवान्के सम्मुख रखना चाहिये और ‘मार्तण्डः प्रीयताम्’ ऐसा कहकर इन्हें ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। यह फल-ससमी कहलाती है। ‘सर्वे भवन्तु
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