भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सफलता मम कामाः समन्ततः ।' ऐसा कहकर स्वयं भी उन्हीं फलोंका भक्षण करे। इस फल-ससमीका एक वर्षतक श्रद्धा-भक्तिपूर्वक व्रत करनेसे पुत्र-पौत्रोंकी प्राप्ति होती है१। (अध्याय २१५)
ब्राह्मपर्व-श्रवणका माहात्म्य, पुराण-श्रवणकी विधि, पुराणों तथा पुराणवाचक व्यासकी महिमा
सुमन्तुजीने कहा—राजन्! भविष्यपुराणके इस प्रथम ब्राह्मपर्वके सुननेसे मानव सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सहस्रों अश्वमेध, वाजपेय एवं राजसूय-यज्ञों, सभी तीर्थ-यात्राओं, वेदाभ्यास तथा पृथ्वीदान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। इतिहास-पुराणके श्रवणके अतिरिक्त ऐसा कोई साधन नहीं है, जो सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर सके। पुराण-श्रवणका जो फल बतलाया गया है, वही फल पुराणके पाठसे भी होता है, इसमें कोई संदेह नहीं२।
शतानीकने पूछा—भगवन्! महाभारत, रामायण एवं पुराणोंका श्रवण तथा पठन किस विधानसे करना चाहिये? पुराण-वाचकके क्या लक्षण हैं? भगवान् खखोल्लकका क्या स्वरूप है? वाचककी विधिवत् पूजा करनेसे क्या फल होता है? पर्वकी समाप्तिपर वाचकोंको क्या देना चाहिये? इसे आप बतानेकी कृपा करें।
सुमन्तुजी बोले—राजन्! आपने इतिहास-पुराणके सम्बन्धमें अच्छी जिज्ञासा की है। महाबाहो! इस सम्बन्धमें पूर्वकालमें देवगुरु बृहस्पति तथा ब्रह्माजीके
मध्य जो संवाद हुआ था, उसे आप श्रवण करें।
मानव विशेष भक्तिपूर्वक इतिहास और पुराणका श्रवण कर ब्रह्महत्यादि सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पवित्र होकर प्रातः, सायं तथा रात्रिमें जो पुराणका श्रवण करता है, उस व्यक्तिसे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश संतुष्ट हो जाते हैं। प्रातःकाल भगवान् ब्रह्मा, सायंकाल विष्णु और रात्रिमें महादेव प्रसन्न होते हैं३। राजन्! अब वाचकके विधानको सुनिये। पवित्र वस्त्र पहनकर शुद्ध होकर प्रदक्षिणापूर्वक जब वाचक आसनपर बैठता है तो वह देवस्वरूप हो जाता है। आसन न बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा। वाचकके आसनकी सदा वन्दना की जानी चाहिये। वाचकके आसनको व्यासपीठ कहा जाता है। पीठको गुरुका आसन समझना चाहिये। वाचकके आसनपर सुननेवालेको कभी भी नहीं बैठना चाहिये। देवताओंकी अर्चना करके विशेषरूपसे ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। सभी समागत व्यक्तियोंको साथमें लेकर पुराण-ग्रन्थ वाचकके लिये प्रदान
१-यहाँ भविष्यपुराणका पाठ कुछ त्रुटि प्रतीत होता है। सात सप्तमी-व्रतोंमेंसे अवशिष्ट अनोदना, विजय तथा कामिका-सप्तमी-व्रत छूट गये हैं। चतुर्वर्ग-चिन्तामणि (हेमाद्रि)-के व्रतखण्डमें भविष्यपुराणके नामसे इन व्रतोंका विस्तारसे वर्णन आता है। वैशाख शुक्ला सप्तमी अनोदना-सप्तमी, माघ शुक्ला सप्तमी विजया-सप्तमी तथा फाल्गुन शुक्ला सप्तमी कामिका-सप्तमी कही गयी है। विजया-सप्तमीमें सूर्यसहस्रनाम स्तोत्र भी पढ़ा गया है। इससे लगता है कि हेमाद्रिके पास भविष्यपुराणकी प्रामाणिक एवं पूर्ण शुद्ध प्रति सुरक्षित थी। पुराणोंकी उपेक्षासे ही इस समयकी प्रतिमें वह अंश खण्डित हो गया है।
२-इतिहासपुराणाभ्यां न त्वन्यत् पावनंनुणाम्। येषां श्रवणमात्रेण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥
विधिना राजशादृलं शृण्वतां यत्फलं किल। यथोक्तं नात्र संदेहः पठतां च विशाम्यते ॥ (ब्राह्मपर्व २१६।३४-३५)
३-इतिहासपुराणानि श्रुत्वा भक्त्या विशेषतः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्महत्यादिभिर्विभो ॥
सायं प्रातस्तथा रात्रौ शुचिर्भूत्वा शृणोति यः। तस्य विष्णुस्तथा ब्रह्मा तुष्यते शंकरस्तथा ॥
प्रत्युषे भगवान् ब्रह्मा दिनान्ते तुष्यतेहरिः। महादेवस्तथा रात्रौ शृण्वतां तुष्यते विभुः ॥
(ब्राह्मपर्व २१६।४३-४५)
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