भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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करे। उस ग्रन्थको नतमस्तक हो प्रणाम करे। तब शान्तचित्त होकर श्रवण करे।
ग्रन्थका सूत्र (धागा) वासुकि कहा गया है। ग्रन्थका पत्र भगवान् ब्रह्मा, उसके अक्षर जनार्दन, सूत्र शंकर तथा पंक्तियाँ सभी देवता हैं। सूत्रके मध्यमें अग्नि और सूर्य स्थित रहते हैं। इनके आगे सभी ग्रह तथा दिशाएँ अवस्थित रहती हैं। शंकुको मेरु कहा गया है। रित्कस्थानको आकाश कहा गया है। ग्रन्थके ऊपर तथा नीचे रहनेवाले दो काष्ठफलक छावा-पृथिवीरूपमें सूर्य और चन्द्रमा हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ देवमय है और देवताओंद्वारा पूजित है। इसलिये अपने कल्याणकी कामनासे इतिहास-पुराणादि श्रेष्ठ ग्रन्थोंको अपने घरमें रखना चाहिये, उन्हें नमस्कार करना चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये*।
राजन्! वाचक ग्रन्थको हाथमें ग्रहण कर ब्रह्मा, व्यास, वाल्मीकि, विष्णु, शिव, सूर्य आदिको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके श्रद्धासमन्वित होकर ओजस्वी स्वरमें अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण करते हुए तथा सात स्वरोंसे युक्त यथासमय यथोचित रस एवं भावोंको प्रकट करते हुए ग्रन्थका पाठ करे। इस प्रकार वाचकके मुखसे जो श्रोता नियमतः श्रद्धापूर्वक इतिहास-पुराण और रामचरितको सुनता है, वह सभी फलोंको प्राप्त कर सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है और विपुल पुण्यको प्राप्त कर भगवान्के उत्तम और अद्भुत स्थानको प्राप्त करता है।
श्रोताको चाहिये कि वह स्नानादिसे पवित्र होकर वाचकको प्रणाम करके उसके सम्मुख आसनपर बैठे और वाणीको संयत कर सुसमाहित हो वाचककी बातोंको सुने।
महाबाहो! व्यासस्वरूप वाचकको नमस्कार करनेपर संशयके बिना अन्य कुछ भी नहीं बोलना चाहिये। कथा-सम्बन्धी धार्मिक शंका या जिज्ञासा उत्पन्न होनेपर वाचकसे नप्रतापूर्वक पूछना चाहिये, क्योंकि व्यासस्वरूप वक्ता उसका गुरु और धर्मबन्धु है। वाचकको भी भलीभाँति उसे समझाना चाहिये, क्योंकि वह गुरु है, इसीलिये सबपर अनुग्रह करना उसका धर्म है। उत्तरके अनन्तर 'तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर पुनः आगेकी कथा सुनानी चाहिये। श्रोताको अपनी वाणीपर नियन्त्रण रखना चाहिये। वाचक ब्राह्मणको ही होना चाहिये। प्रत्येक मासमें पारण करे तथा वाचककी पूजा करे, महीनाके पूर्ण होनेपर वाचकको स्वर्ण प्रदान करे।
प्रथम पारणामें वाचककी अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करनेपर अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है। कार्तिकसे आरम्भकर आश्विनतक प्रत्येक मासमें एक-एक पारणापर पूजन करनेसे क्रमशः अग्निष्टोम, गोसव, ज्योतिष्टोम, सौत्रामणि, वाजपेय, वैष्णव, माहेश्वर, ब्राह्म, पुण्डरीक, आदित्य, राजसूय तथा अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। इस प्रकार यज्ञ-फलोंकी प्राप्ति कर वह निःसंदेह उत्तम लोकको प्राप्त करता है।
पर्वकी समाप्तिपर गन्ध, माला, विविध वस्त्र आदिसे वाचककी पूजा करनी चाहिये। स्वर्ण, रजत, गाय, काँसेका दोहन-पात्र आदि वाचकको प्रदान कर कथा-श्रवणका फल प्राप्त करना चाहिये। वाचकसे बढ़कर दान देने योग्य सुपात्र और कोई नहीं है, क्योंकि उसकी जिह्वाके अग्रभागपर सभी शास्त्र विराजमान रहते हैं। जो श्रद्धापूर्वक वाचकको भोजन कराता है, उसके पितर सौ वर्षतक तृप्त
- इत्थं देवमयं द्वैतत् पुस्तकं देवपूजितम् । नमस्यं पूजनीयं च गृहे स्थाप्यं विभूतये ॥ (ब्राह्मपर्व २१६।५८)
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