भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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विधान किया जाता है, वह कनिष्ठ विधि है। क्षुद्र देवताओंकी भी प्रतिमाएँ नाना प्रकारके वृक्षोंकी लकड़ियोंसे बनायी जाती हैं।

नवीन तालाब, बावली, कुण्ड और जल-पौंसा आदिका निर्माण कर संस्कार-कार्यके लिये गणेशादि-देवपूजन तथा हवनादि कार्य करने चाहिये। तदनन्तर उनमें वापी, पुष्करिणी (नदी) आदिका पवित्र जल तथा गङ्गाजल डालना चाहिये।

एकसठ हाथका प्रासाद उत्तम तथा इससे आधे प्रमाणका मध्यम और इसके आधे प्रमाणसे निर्मित प्रासाद कनिष्ठ माना जाता है। ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवालेको देवताओंकी प्रतिमाके मानसे प्रासादका निर्माण करना चाहिये। नूतन तडागका निर्माण करनेवाला अथवा जीर्ण तडागका नवीन रूपमें निर्माण करनेवाला व्यक्ति अपने सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वापी, कूप, तालाब, बगीचा तथा जलके निर्गम-स्थानको जो व्यक्ति बार-बार स्वच्छ या संस्कृत करता है, वह मुक्तिरूप उत्तम फल प्राप्त करता है। जहाँ विप्रों एवं देवताओंका निवास हो, उनके मध्यवर्ती स्थानमें वापी, तालाब आदिका निर्माण मानवोंको करना चाहिये। नदीके तटपर और श्मशानके समीप उनका निर्माण न करे। जो मनुष्य वापी, मन्दिर आदिकी प्रतिष्ठा नहीं करता, उसे अनिष्टका भय होता है तथा वह पापका भागी भी होता है। अतः जनसंकुल गाँवोंके समीप बड़े तालाब, मन्दिर, कूप आदिका निर्माण कर उनकी प्रतिष्ठा शास्त्रविधिसे करनी चाहिये। उनके शास्त्रीय विधिसे प्रतिष्ठित होनेपर उत्तम फल प्राप्त होते हैं। अतएव प्रयत्नपूर्वक मनुष्य न्यायोपाजित धनसे शुभ मुहूर्तमें शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक प्रतिष्ठा करे। भगवान्के कनिष्ठ, मध्यम या श्रेष्ठ मन्दिरको बनानेवाला व्यक्ति विष्णुलोकको प्राप्त होता है और क्रमिक मुक्तिको प्राप्त करता है।

जो व्यक्ति गिरे हुए या गिर रहे अर्थात् जीर्ण मन्दिरका रक्षण करता है, वह समस्त पुण्योंका फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति विष्णु, शिव, सूर्य, ब्रह्मा, दुर्गा तथा लक्ष्मीनारायण आदिके मन्दिरोंका निर्माण कराता है, वह अपने कुलका उद्धार कर कोटि कल्पतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। उसके बाद वहाँसे मृत्युलोकमें आकर राजा या पूज्यतम धनी होता है। जो भगवती त्रिपुरसुन्दरीके मन्दिरमें अनेक देवताओंकी स्थापना करता है, वह सम्पूर्ण विश्वमें स्मरणीय हो जाता है और स्वर्गलोकमें सदा पूजित होता है। जलकी महिमा अपरम्पार है। परोपकार या देव-कार्यमें एक दिन भी किया गया जलका उपयोग मातृकुल, पितृकुल, भार्याकुल तथा आचार्यकुलकी अनेक पीढ़ियोंको तार देता है। उसका स्वयंका भी उद्धार हो जाता है। अविमुक्त दशार्णव तीर्थमें देवार्चन करनेसे अपना उद्धार होता है तथा अपने पितृ-मातृ आदि कुलोंको भी वह तार देता है। जलके ऊपर तथा प्रासाद (देवालय)-के ऊपर रहनेके लिये घर नहीं बनवाना चाहिये। प्रतिष्ठित अथवा अप्रतिष्ठित शिवलिङ्गको कभी उखाड़ना नहीं चाहिये। इसी प्रकार अन्य देव-प्रतिमाओं और पूजित देववृक्षोंको चालित नहीं करना चाहिये। उसे चालित करनेवाले व्यक्तिको रौरव नरककी प्राप्ति होती है, परंतु यदि नगर या ग्राम उजड़ गये हों, अपना स्थान किसी कारण छोड़ना पड़े या विप्लव मचा हो तो उसकी पुनः प्रतिष्ठा बिना विचारके करनी चाहिये।

शुभ मुहूर्तके अभावमें देवमन्दिर तथा देववृक्ष आदि स्थापित नहीं करने चाहिये। बादमें उन्हें हटानेपर ब्रह्महत्याका दोष लगता है। देवताओंके मन्दिरके सामने पुष्करिणी आदि बनाने चाहिये। पुष्करिणी बनानेवाला अनन्त फल प्राप्तकर ब्रह्मलोकसे पुनः नीचे नहीं आता। (अध्याय ९)

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