भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रासाद, उद्यान आदिके निर्माणमें भूमि-परीक्षण तथा वृक्षारोपणकी महिमा

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! देवमन्दिर, तडाग आदिके निर्माण करनेमें सबसे पहले प्रमाणानुसार गृहीत की गयी भूमिका संशोधन कर दस हाथ अथवा पाँच हाथके प्रमाणमें बैलोंसे उसे जुतवाना चाहिये। देवमन्दिरके लिये गृहीत भूमिको सफेद बैलोंसे तथा कूप, बगीचे आदिके लिये काले बैलोंसे जुतवाये। यदि वह भूमि ग्रह-यागके लिये हो तो उसे जुतवानेकी आवश्यकता नहीं, मात्र उसे स्वच्छ कर लेना चाहिये। उस पूर्वोक्त स्थानको तीन दिन जुतवाना चाहिये। फिर उसमें पाँच प्रकारके धान्य बोने चाहिये। देवपक्षमें तथा उद्यानके लिये सात प्रकारके धान्य वपन करने चाहिये। मूँग, उड़द, धान, तिल तथा साँवा—ये पाँच ब्रीहिगण हैं। मसूर और मटर या चना मिलानेसे सात ब्रीहिगण होते हैं। (यदि ये बीज तीन, पाँच या सात रातोंमें अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये—तीन रातवाली भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली भूमि कनिष्ठ है। कनिष्ठ भूमिको सर्वथा त्याग देना चाहिये।) श्वेत, लाल, पीली और काली—इन चार वर्णवाली पृथ्वी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये प्रशंसित मानी गयी है। प्रासाद आदिके निर्माणमें पहले भूमिकी परीक्षा कर लेनी चाहिये। उसकी एक विधि इस प्रकार है—अरनिमात्र (लगभग एक हाथ लम्बा) बिल्वकाष्ठको बारह अंगुलके गड्डेमें, गाड़कर, उसके भूमिसे ऊपरवाले भागमें चारों ओर चार लकड़ियाँ लगाकर

उन्हें ऊनसे लपेटकर तेलसे भिगो ले। इन्हें चार बत्तियोंके रूपमें दीपककी भाँति प्रज्वलित करे। पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बत्ती जलती रहे तो शुभ तथा दक्षिण एवं उत्तरकी ओरकी जलती रहे तो अशुभ माना गया है। यदि चारों बत्तियाँ बुझ जायँ या मन्द हो जायँ तो विपत्तिकारक है१। इस प्रकार सम्यक्-रूपसे भूमिकी परीक्षा कर उस भूमिको सूत्रसे आवेष्टित तथा कीलितकर वास्तुका पूजन करे। तदनन्तर वास्तुबलि देकर भूमि खोदनेवाले खनित्रकी भी पूजा करे। वास्तुके मध्यमें एक हाथके पैमानेमें भूमिको घी, मधु, स्वर्णमिश्रित जल तथा रत्नमिश्रित जलसे ईशानाभिमुख होकर लीप दे, फिर खोदते समय 'आ ब्रह्मन्०२' इस मन्त्रका उच्चारण करे। जो वास्तुदेवताका बिना पूजन किये प्रासाद, तडाग आदिका निर्माण करता है, यमराज उसका आधा पुण्य नष्ट कर देते हैं।

अतः प्रासाद, आराम, उद्यान, महाकूप, गृहनिर्माणमें पहले वास्तुदेवताका विधिपूर्वक पूजन करना चाहिये। जहाँ स्तम्भकी आवश्यकता हो वहाँ साल, खैर, पलास, केसर, बेल तथा बकुल—इन वृक्षोंसे निर्मित यूप कलियुगमें प्रशस्त माने गये हैं। यदि वापी, कूप आदिका विधिहीन खनन एवं आम्र आदि वृक्षोंका विधिहीन रोपण करे तो उसे कुछ भी फल प्राप्त नहीं होता, अपितु केवल अधोगति ही मिलती है। नदीके किनारे, रमशान तथा अपने घरसे दक्षिणकी ओर तुलसीवृक्षका रोपण न करे, अन्यथा यम-यातना भोगनी पड़ती

१-भूमि-परीक्षा, वास्तु-विधान तथा प्रासाद आदिकी प्रतिष्ठा आदिपर विस्तृत विचार समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, बृहत्संहिता, शिल्परत्न, गृहरत्नभूषण आदि ग्रन्थोंमें हुआ है। मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें भी इसकी चर्चा आयी है। इस विद्याका संक्षिप्त उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्रों एवं मनुस्मृति ३।८९ आदिमें भी है। वास्तुविद्याके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता विश्वकर्मा और मय दानव हैं।

२-आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रं राजन्यः शूर इष्व्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्रही धेनुर्विद्वानइवानाशुः सतिः पुरिर्न्याया जिष्णु रथेष्टाः सभेयो युवास्त्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।

(यजु० २२।२२)

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