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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रासाद, उद्यान आदिके निर्माणमें भूमि-परीक्षण तथा वृक्षारोपणकी महिमा

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! देवमन्दिर, तडाग आदिके निर्माण करनेमें सबसे पहले प्रमाणानुसार गृहीत की गयी भूमिका संशोधन कर दस हाथ अथवा पाँच हाथके प्रमाणमें बैलोंसे उसे जुतवाना चाहिये। देवमन्दिरके लिये गृहीत भूमिको सफेद बैलोंसे तथा कूप, बगीचे आदिके लिये काले बैलोंसे जुतवाये। यदि वह भूमि ग्रह-यागके लिये हो तो उसे जुतवानेकी आवश्यकता नहीं, मात्र उसे स्वच्छ कर लेना चाहिये। उस पूर्वोक्त स्थानको तीन दिन जुतवाना चाहिये। फिर उसमें पाँच प्रकारके धान्य बोने चाहिये। देवपक्षमें तथा उद्यानके लिये सात प्रकारके धान्य वपन करने चाहिये। मूँग, उड़द, धान, तिल तथा साँवा—ये पाँच ब्रीहिगण हैं। मसूर और मटर या चना मिलानेसे सात ब्रीहिगण होते हैं। (यदि ये बीज तीन, पाँच या सात रातोंमें अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये—तीन रातवाली भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली भूमि कनिष्ठ है। कनिष्ठ भूमिको सर्वथा त्याग देना चाहिये।) श्वेत, लाल, पीली और काली—इन चार वर्णवाली पृथ्वी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये प्रशंसित मानी गयी है। प्रासाद आदिके निर्माणमें पहले भूमिकी परीक्षा कर लेनी चाहिये। उसकी एक विधि इस प्रकार है—अरनिमात्र (लगभग एक हाथ लम्बा) बिल्वकाष्ठको बारह अंगुलके गड्डेमें, गाड़कर, उसके भूमिसे ऊपरवाले भागमें चारों ओर चार लकड़ियाँ लगाकर

उन्हें ऊनसे लपेटकर तेलसे भिगो ले। इन्हें चार बत्तियोंके रूपमें दीपककी भाँति प्रज्वलित करे। पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बत्ती जलती रहे तो शुभ तथा दक्षिण एवं उत्तरकी ओरकी जलती रहे तो अशुभ माना गया है। यदि चारों बत्तियाँ बुझ जायँ या मन्द हो जायँ तो विपत्तिकारक है१। इस प्रकार सम्यक्-रूपसे भूमिकी परीक्षा कर उस भूमिको सूत्रसे आवेष्टित तथा कीलितकर वास्तुका पूजन करे। तदनन्तर वास्तुबलि देकर भूमि खोदनेवाले खनित्रकी भी पूजा करे। वास्तुके मध्यमें एक हाथके पैमानेमें भूमिको घी, मधु, स्वर्णमिश्रित जल तथा रत्नमिश्रित जलसे ईशानाभिमुख होकर लीप दे, फिर खोदते समय 'आ ब्रह्मन्०२' इस मन्त्रका उच्चारण करे। जो वास्तुदेवताका बिना पूजन किये प्रासाद, तडाग आदिका निर्माण करता है, यमराज उसका आधा पुण्य नष्ट कर देते हैं।

अतः प्रासाद, आराम, उद्यान, महाकूप, गृहनिर्माणमें पहले वास्तुदेवताका विधिपूर्वक पूजन करना चाहिये। जहाँ स्तम्भकी आवश्यकता हो वहाँ साल, खैर, पलास, केसर, बेल तथा बकुल—इन वृक्षोंसे निर्मित यूप कलियुगमें प्रशस्त माने गये हैं। यदि वापी, कूप आदिका विधिहीन खनन एवं आम्र आदि वृक्षोंका विधिहीन रोपण करे तो उसे कुछ भी फल प्राप्त नहीं होता, अपितु केवल अधोगति ही मिलती है। नदीके किनारे, रमशान तथा अपने घरसे दक्षिणकी ओर तुलसीवृक्षका रोपण न करे, अन्यथा यम-यातना भोगनी पड़ती

१-भूमि-परीक्षा, वास्तु-विधान तथा प्रासाद आदिकी प्रतिष्ठा आदिपर विस्तृत विचार समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, बृहत्संहिता, शिल्परत्न, गृहरत्नभूषण आदि ग्रन्थोंमें हुआ है। मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें भी इसकी चर्चा आयी है। इस विद्याका संक्षिप्त उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्रों एवं मनुस्मृति ३।८९ आदिमें भी है। वास्तुविद्याके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता विश्वकर्मा और मय दानव हैं।

२-आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रं राजन्यः शूर इष्व्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्रही धेनुर्विद्वानइवानाशुः सतिः पुरिर्न्याया जिष्णु रथेष्टाः सभेयो युवास्त्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।

(यजु० २२।२२)

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है। विधिपूर्वक वृक्षोंका रोपण करनेसे उसके पत्र, पुष्प तथा फलके रज-रेणुओं आदिका समागम उसके पितरोंको प्रतिदिन तृप्त करता है।

जो व्यक्ति छाया, फूल और फल देनेवाले वृक्षोंका रोपण करता है या मार्गमें तथा देवालयमें वृक्षोंको लगाता है, वह अपने पितरोंको बड़े-बड़े पापोंसे तारता है और रोपणकर्ता इस मनुष्य-लोकमें महती कीर्ति तथा शुभ परिणामको प्राप्त करता है और अतीत तथा अनागत पितरोंको स्वर्गमें जाकर भी तारता ही रहता है। अतः द्विजगण! वृक्ष लगाना अत्यन्त शुभदायक है। जिसको पुत्र नहीं है, उसके लिये वृक्ष ही पुत्र हैं, वृक्षारोपणकर्ताके लौकिक-पारलौकिक कर्म वृक्ष ही करते रहते हैं तथा स्वर्ग प्रदान करते हैं। यदि कोई अश्वत्थ-वृक्षका आरोपण करता है तो वही उसके लिये एक लाख पुत्रोंसे भी बढ़कर है। अतएव अपनी सद्गतिके लिये कम-से-कम एक या दो अथवा तीन अश्वत्थ-वृक्ष लगाना ही चाहिये। हजार, लाख, करोड़ जो भी मुक्तिके साधन हैं, उनमें एक अश्वत्थ-वृक्ष लगानेकी बराबरी नहीं कर सकते।

अशोक-वृक्ष लगानेसे कभी शोक नहीं होता, प्लक्ष (पाकड़)-वृक्ष उत्तम स्त्री प्रदान करवाता है। ज्ञानरूपी फल भी देता है। बिल्व-वृक्ष दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है। जामुनका वृक्ष धन देता है, तेंदूका वृक्ष कुलवृद्धि कराता है। दाडिम (अनार)-का वृक्ष स्त्री-सुख प्राप्त कराता है। बकुल पाप-नाशक, वंजुल (तिनिश) बल-बुद्धिप्रद है। धातकी (धव) स्वर्ग प्रदान करता है। वटवृक्ष मोक्षप्रद, आम्रवृक्ष अभीष्ट कामनाप्रद और गुवाक (सुपारी)-का वृक्ष सिद्धिप्रद है। बल्लव, मधुक (महुआ) तथा अर्जुन-वृक्ष सब प्रकारका अन्न प्रदान करता है। कदम्ब-वृक्षसे विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तितिंडी (इमली)-का वृक्ष धर्मदूषक माना गया है। शमी-

वृक्ष रोग-नाशक है। केसरसे शत्रुओंका विनाश होता है। श्वेत वट धनप्रदाता, पनस (कटहल)-वृक्ष मन्द बुद्धिकारक है। मर्कटी (कैंवाच) एवं कदम-वृक्षके लगानेसे संततिका क्षय होता है।

शीशम, अर्जुन, जयन्ती, करवीर, बेल तथा पलाश-वृक्षोंके आरोपणसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। विधिपूर्वक वृक्षका रोपण करनेसे स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और रोपणकर्ताके तीन जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। सौ वृक्षोंका रोपण करनेवाला ब्रह्मरूप और हजार वृक्षोंका रोपण करनेवाला विष्णुरूप बन जाता है। वृक्षके आरोपणमें वैशाख मास श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ अशुभ है। आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद ये भी श्रेष्ठ हैं। आश्विन, कार्तिकमें वृक्ष लगानेसे विनाश या क्षय होता है। श्वेत तुलसी प्रशस्त मानी गयी है। अश्वत्थ, वटवृक्ष और श्रीवृक्षका छेदन करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मघाती कहलाता है। वृक्षच्छेदी व्यक्ति मूक और सैकड़ों व्याधियोंसे युक्त होता है। तितिंडीके बीजोंको इक्षुदण्डसे पीसकर उसे जलमें मिलाकर सींचनेसे अशोककी तथा नारियलके जल एवं शहद-जलसे सींचनेसे आम्रवृक्षकी वृद्धि होती है। अश्वत्थ-वृक्षके मूलसे दस हाथ चारों ओरका क्षेत्र पवित्र पुरुषोत्तम क्षेत्र माना गया है और उसकी छाया जहाँतक पहुँचती है तथा अश्वत्थ-वृक्षके संसर्गसे बहनेवाला जल जहाँतक पहुँचता है, वह क्षेत्र गङ्गाके समान पवित्र माना गया है।

सूतजी पुनः बोले— विप्रश्रेष्ठ! तान्त्रिक पद्धतिके अनुसार सभी प्रतिष्ठादि कार्योंमें शुद्ध दिन ही लेना चाहिये। वृक्षोंके उद्यानमें कुओं अवश्य बनवाना चाहिये। तुलसी-वनमें कोई याग नहीं करना चाहिये। तालाब, बड़े बाग तथा देवस्थानके मध्य सेतु नहीं बनवाना चाहिये। परंतु देवस्थानमें तडाग बनवाना चाहिये। शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठामें अन्य देवोंकी स्थापना

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नहीं करनी चाहिये। इसमें देश-काल (और शैवागमों)-की मर्यादाके अनुसार आचरण करना चाहिये। उनके विपरीत आचरण करनेपर आयुका ह्रास होता है। द्विजगण! तालाब, पुष्करिणी तथा उद्यान आदिका जो परिमाण बताया गया हो,

यदि उससे कम पैमानेपर ये बनाये जायें तो दोष है, किंतु दस हाथके परिमाणमें हों तो कोई दोष नहीं है। यदि वे दो हजार हाथोंसे अधिक प्रमाणमें बनाये गये हों तो उनकी प्रतिष्ठा विधिपूर्वक अवश्य करनी चाहिये। (अध्याय १०-११)

देव-प्रतिमा-निर्माण-विधि

सूतजी बोले!—ब्राह्मणो! अब मैं प्रतिमाका शास्त्रसम्मत लक्षण कहता हूँ। उत्तम लक्षणोंसे रहित प्रतिमाका पूजन नहीं करना चाहिये। पाषाण, काष्ठ, मूर्त्तिका, रत्न, ताम्र एवं अन्य धातु—इनमेंसे किसीकी भी प्रतिमा बनायी जा सकती है*। उनके पूजनसे सभी अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं। मन्दिरके मापके अनुसार शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न प्रतिमा बनवानी चाहिये। घरमें आठ अङ्गुलसे अधिक ऊँची मूर्त्तिका पूजन नहीं करना चाहिये। देवालयके द्वारकी जो ऊँचाई हो उसे आठ भागोंमें विभक्त कर तीन भागके मापमें पिण्डिका तथा दो भागके मापमें देव-प्रतिमा बनाये। चौरासी अङ्गुल (साढ़े तीन हाथ)-की प्रतिमा वृद्धि करनेवाली होती है। प्रतिमाके मुखकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये। मुखके तीन भागके प्रमाणमें चिबुक, ललाट तथा नासिका होनी चाहिये। नासिकाके बराबर ही कान और ग्रीवा बनानी चाहिये। नेत्र दो अङ्गुल-प्रमाणके बनाने चाहिये। नेत्रके मानके तीसरे भागमें आँखकी तारिका बनानी चाहिये। तारिकाके तृतीय भागमें सुन्दर दृष्टि बनानी चाहिये। ललाट, मस्तक तथा ग्रीवा—ये तीनों बराबर मापके हों।

सिरका विस्तार बत्तीस अङ्गुल होना चाहिये। नासिका, मुख और ग्रीवासे हृदय एक सीधमें होना चाहिये। मूर्त्तिकी जितनी ऊँचाई हो उसके आधेमें कटि-प्रदेश बनाना चाहिये। दोनों बाहु, जंघा तथा ऊरु परस्पर समान हों। टखने चार अङ्गुल ऊँचे बनाने चाहिये। पैरके अँगूठे तीन अङ्गुलके हों और उसका विस्तार छः अङ्गुलका हो। अँगूठेके बराबर ही तर्जनी होनी चाहिये। शेष अङ्गुलियाँ क्रमशः छोटी हों तथा सभी अङ्गुलियाँ नखयुक्त बनाये। पैरकी लम्बाई चौदह अङ्गुलमें बनानी चाहिये। अधर, ओष्ठ, वक्षःस्थल, भ्रू, ललाट, गण्डस्थल तथा कपोल भरे-पूरे सुडौल सुन्दर तथा मांसल बनाने चाहिये, जिससे प्रतिमा देखनेमें सुन्दर मालूम हो। नेत्र विशाल, फैले हुए तथा लालिमा लिये हुए बनाने चाहिये।

इस प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न प्रतिमा शुभ और पूज्य मानी गयी है। प्रतिमाके मस्तकमें मुकुट, कण्ठमें हार, बाहुओंमें कटक और अंगद पहनाने चाहिये। मूर्त्ति सर्वाङ्ग-सुन्दर, आकर्षक तथा तत्त् अङ्गोंके आभूषणोंसे अलंकृत होनी चाहिये। भगवान्की प्रतिमामें देवकलाओंका आधान होनेपर भगवत्प्रतिमा प्रत्येकको अपनी ओर बरबस आकृष्ट कर लेती है

  • मत्स्यपुराणमें प्रतिमा-निर्माणके लिये निम्न वस्तुओंको ग्राह्य बतलाया है—

सौवर्ण राजती वापि ताप्त्री रत्नमयी तथा । शैलीदारुमयी चापि लौहसीसमयी तथा ॥

रीतिकाधातुयुक्ता वा ताम्रकांस्यमयीतथा । शुभदारुमयी वापि देवतार्चाप्रशस्त्यते ॥ (२५८ । २०-२१)

सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, रत्न, पत्थर, देवदारु, लोहा-सीसा, पीतल और काँसा-मिश्रित अथवा शुभ काष्ठोंकी बनी हुई देवप्रतिमा प्रशस्त मानी गयी है।

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और अभीष्ट वस्तुका लाभ कराती है।

जिसका मुखमण्डल दिव्य प्रभासे जगमगा रहा हो, कानोंमें चित्र-विचित्र मणियोंके सुन्दर कुण्डल तथा हाथोंमें कनक-मालाएँ और मस्तकपर सुन्दर केश सुशोभित हों, ऐसी भक्तोंको वर देनेवाली, स्नेहसे परिपूर्ण, भगवतीकी सौम्य कैशोरी प्रतिमाका निर्माण कराये। भगवती विधिपूर्वक अर्चना करनेपर प्रसन्न होती हैं और उपासकोंके मनोरथोंको पूर्ण करती हैं।

नव ताल (साढ़े चार हाथ)-की विष्णुकी प्रतिमा बनवानी चाहिये। तीन तालकी वासुदेवकी, पाँच तालकी नृसिंह तथा हयग्रीवकी, आठ तालकी

नारायणकी, पाँच तालकी महेशकी, नव तालकी भगवती दुर्गाकी, तीन-तीन तालकी लक्ष्मी और सरस्वतीकी तथा सात तालकी भगवान् सूर्यकी प्रतिमा बनवानेका विधान है।

भगवान्की मूर्तिकी स्थापना तीर्थ, पर्वत, तालाब आदिके समीप करनी चाहिये अथवा नगरके मध्यभागमें या जहाँ ब्राह्मणोंका समूह हो, वहाँ करनी चाहिये। इनमें भी अविमुक्त आदि सिद्ध क्षेत्रोंमें प्रतिष्ठा करनेवालेके पूर्वापर अनन्त कुलोंका उद्धार हो जाता है। कलियुगमें चन्दन, अगुरु, बिल्च, श्रीपर्णिपक तथा पद्मकाष्ठ आदि काष्ठोंके अभावमें मृण्मयी मूर्ति बनवानी चाहिये। (अध्याय १२)

कुण्ड-निर्माण एवं उनके संस्कारकी विधि और ग्रह-शान्तिका माहात्म्य

सूतजी बोले—द्विजश्रेष्ठ! अब मैं यज्ञकुण्डोंके निर्माण एवं उनके संस्कारकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ। कुण्ड दस प्रकारके होते हैं—(१) चौकोर, (२) वृत्त, (३) पद्म, (४) अर्धचन्द्र, (५) योनिकी आकृतिका, (६) चन्द्राकार, (७) पञ्चकोण, (८) सप्तकोण (९) अष्टकोण और (१०) नौ कोणोंवाला।

सबसे पहले भूमिका संशोधन कर भूमिपर पड़े हुए तृण, केश आदि हटा देने चाहिये। फिर उस भूमिपर भस्म और अंगारे घुमाकर भूमि-शुद्धि करनी चाहिये, तदनन्तर उस भूमिपर जल-सिंचनकर बीजारोपण करे और सात दिनेके बाद कुण्ड-निर्माणके लिये खनन करना चाहिये। तत्पश्चात् अभीष्ट उपर्युक्त दस कुण्डोंमेंसे किसीका निर्माण करना चाहिये। कुण्ड-निर्माणार्थ विधिवत् नाप-जोखके लिये सूत्रका उपयोग करे। कामना-भेदसे कुण्ड भी अनेक आकारके होते हैं। कुण्डके अनुरूप ही मेखला भी बनायी जाती है। यज्ञोंमें आहुतियोंकी संख्याका भी अलग-अलग विधान है। विधि-

प्रमाणके अनुसार आहुति देनी चाहिये। मानरहित हवन करनेसे कोई फल नहीं मिलता। अतः बुद्धिमान् मनुष्यको मानका पूर्ण ज्ञान रखकर ही कुण्डका विधिवत् निर्माण कर यज्ञानुष्ठान करना चाहिये।

जिस यज्ञका जितना मान होता है, उसी मानकी ही योजना करनी चाहिये। पचास आहुतियोंका मान सामान्य है, इसके बाद सौ, हजार, अयुत, लक्ष और कोटि होम भी होते हैं। बड़े-बड़े यज्ञ सम्पत्ति रहनेपर हो सकते हैं या राजा-महाराजा कर सकते हैं, मनुष्य अपने-अपने प्राक्तन कर्मके अनुसार सुख-दुःखका उपभोग करता है तथा शुभाशुभ-फल ग्रहोंके अनुसार भोगता है। अतः शान्ति-पुष्टि-कर्ममें ग्रहोंकी शान्ति प्रयत्नपूर्वक परम भक्तिसे करनी चाहिये। दिव्य, अन्तरिक्ष और पृथिवी-सम्बन्धी बड़े-बड़े अद्भुत उत्पातोंके होनेपर शुभाशुभ फल देनेवाली ग्रह-शान्ति करनी चाहिये। इन अवसरोंपर अयुत होम करना चाहिये। काम्य-कर्म या शान्ति-पुष्टिके लिये ग्रहोंका भक्तिपूर्वक नित्य पूजन एवं हवन करना चाहिये। कलियुगमें

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

ग्रहोंके लिये लक्ष एवं कोटि होमका विधान है। गृहस्थको आधिचारिक कर्म नहीं करना चाहिये।

कुण्डोंका शास्त्रानुसार संस्कार करना चाहिये। बिना संस्कार किये होम करनेपर अर्थ-हानि होती है। अतः संस्कार करके होमादि क्रियाएँ करनी चाहिये।

कुण्डोंके स्थानका ओंकारपूर्वक अवक्षण, कुशके जलसे प्रोक्षण, त्रिशूलीकरण तथा सूत्रसे आवेष्टित करना, कीलित करना, अग्निजिह्वाकी भावना करना एवं अग्न्याहरण आदि अठारह संस्कार होते हैं। शुद्धके घरसे अग्नि कभी न लाये। स्त्रीके द्वारा भी अग्नि नहीं मँगवानी चाहिये। शुद्ध एवं पवित्र व्यक्तिद्वारा अग्नि ग्रहण करना चाहिये। तदनन्तर अग्निंका संस्कार करे और उसे अपने अभिमुख रखे। अग्नि-बीज (रं) और शिव-बीज (शं)-से उसका प्रोक्षण करे और शिव-शक्तिका ध्यान करे, इससे अभीष्ट सिद्धिकी प्राप्ति होती है। उसके बाद वायुके सहारे अग्नि प्रज्वलित करे। देवी भगवतीका और भगवान्का अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय आदिसे पूजन करे। अग्नि-पूजनमें इस मन्त्रका उपयोग करे—

‘पितृपिङ्गल दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा।’

यज्ञदत्तमुनिने अग्निंकी तीन जिह्वाएँ बतलायी हैं—हिरण्या, कनका तथा कृष्णा*। समिधा-भेदसे जिन जिह्वा-भेदोंका वर्णन है, उनका उन्हींमें विनियोग करना चाहिये। बहुरूपा, अतिरूपा और सात्त्विका—इनका योग-कर्ममें विनियोग होता है। आज्यहोममें हिरण्या, त्रिमधु (दूध, चीनी और मधु—इन तीनोंके समाहार)-से हवन करनेपर कर्णिका, शुद्ध क्षीरसे

हवन करनेपर रक्ता, नैतिक कर्ममें प्रभा, पुष्पहोममें बहुरूपा, अन्न और पायससे हवन करनेमें कृष्णा, इक्षुहोममें पद्मरागा, पद्महोममें सुवर्णा और लोहिता, बिल्वपत्रसे हवन करनेपर श्वेता, तिल-होममें धूमिनी, काष्ठ होममें करालिका, पितृहोममें लोहितास्या, देवहोममें मनोजवा नामकी अग्निज्वाला कही गयी है। जिन-जिन समिधाओंसे हवन किया जाता है, उन-उन समिधाओंमें ‘वैश्वानर’ नामक अग्निदेव स्थित रहते हैं।

अग्निंके मुखमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक आहुति पड़नेपर अग्नि देवता सभी प्रकारका अश्व्युदय करते हैं। मुखके अतिरिक्त शेष स्थानोंपर आहुति देनेसे अनिष्ट फल होता है। अग्निंकी जिह्वाएँ विशेषरूपसे घृताहुतिमें हिरण्या एवं अन्यान्य आहुतियोंमें गणना, वक्रा, कृष्णाभा, सुप्रभा, बहुरूपा तथा अतिरूपिका नामसे प्रसिद्ध हैं। कुण्डके उदरमें अर्थात् मध्यमें आहुतियाँ देनी चाहिये। इधर-उधर नहीं देनी चाहिये। चन्दन, अगरू, कपूर, पाटला तथा यूथिका (जूही)-के समान अग्निसे प्रादुर्भूत गन्ध सभी प्रकारका कल्याणकारक होता है।

यदि अग्निंकी ज्वाला छिन्न-वृत्त-रूपमें उठती हो तो मृत्युभय होता है और धनका क्षय होता है। अग्नि बुझ जाने तथा अत्यधिक धुआँ होनेपर भी महान् अनिष्ट होता है। ऐसी स्थितियोंमें प्रायश्चित्त करना चाहिये। पहले अट्टाईस आहुतियाँ देकर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। अनन्तर घीसे मूल मन्त्रद्वारा पचीस आहुतियाँ देनी चाहिये। तीनों कालोंमें महास्नान करे तथा श्रद्धा-भक्ति-पूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करे। (अध्याय १३—१५)

  • प्रकारान्तरसे विश्वमूर्ति, स्कूलिङ्गिनी, धूम्रवर्णा, मनोजवा, लोहितास्या, करालास्या तथा काली—ये भी सात प्रकारकी अग्निजिह्वाएँ कही गयी हैं।

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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अग्नि-पूजन-विधि

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! नित्य-नैमित्तिक यागादिकी समाप्तिमें हवन हो जानेपर भगवान् अग्निदेवकी षोडश उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। अग्निको वायुद्वारा प्रदीप्त कर पीठस्थ देवताओंकी पूजा कर हाथमें लाल फूल ले निम्न मन्त्र पढ़कर ध्यान करे—

इष्टं शक्तिस्वस्तिकाभीतिमुच्छेदीर्घेर्दोर्भिधारयन्तं वरान्तम्। हेमाकल्पं पद्मसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्बहिर्बद्धमौलिं जटाभिः ॥

(मध्यमपर्व १।१६।३)

‘भगवान् अग्निदेवता अपने हाथोंमें उत्तम इष्ट (यज्ञपात्र), शक्ति, स्वस्तिक और अभय-मुद्रा धारण किये हैं, देदीप्यमान सुवर्ण-सदृश उनका

स्वरूप है, कमलके ऊपर विराजमान हैं, तीन नेत्र हैं तथा वे जटाओं और मुकुटसे सुशोभित हैं।’

मण्डपके पूर्व आदि द्वारदेशोंमें कामदेव, इन्द्र, वराह तथा कार्तिकेयको आवाहित कर स्थापित करे। तदनन्तर आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा गन्धादि उपचारोंसे पूजन कर आठ मुद्राएँ प्रदर्शित करे। फिर सुवर्ण-वर्णवाले निर्मल, प्रज्वलित, सर्वतोमुख, महाजिह्वा तथा महोदर भगवान् अग्निदेवकी आकाशरूपमें पूजा करे। अग्निकी जिह्वाओंका भी ध्यान करे। इसके बाद भगवान् अग्निदेवका विविध उपचारोंसे पूजन करे*।

(अध्याय १६)

  • सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्रसे तीन पुष्पगुच्छोंद्वारा अग्निदेवको आसन प्रदान करे—

आसन-मन्त्र—त्वमादिः सर्वभूतानां संसारार्णवतारकः। परमज्योतीरूपस्त्वमासनं सफलीकुरु ॥

संसार-रूपी सागरसे उद्धार करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियोंमें आदि, परम ज्योतिः-स्वरूप हे अग्निदेव! आप इस आसनको ग्रहण कर मुझे सफल बनायें। अनन्तर करबद्ध प्रार्थना करे—

प्रार्थना-मन्त्र—वैश्वानर नमस्तेऽस्तु नमस्ते हव्यवाहन। स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ शान्तिं कुरु नमोऽस्तु ते ॥

हे हव्यवाहन वैश्वानरदेव! आप देवताओंमें श्रेष्ठ हैं, आपका स्वागत है, आपको नमस्कार है, आप शान्ति प्रदान करें।

पाद्य-मन्त्र—नमस्ते भगवन् देव आपो नारायणात्मक। सर्वलोकहितार्थाय पाद्यं च प्रतिगृह्णाताम् ॥

नर-नारायणस्वरूप हे भगवान् वैश्वानरदेव! आपको नमस्कार है। आप समस्त संसारके हितके लिये इस पाद्य-जलको ग्रहण करें।

अर्घ्य-मन्त्र—नारायण परं धाम ज्योतीरूप सनातन। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं विश्वरूप नमोऽस्तु ते ॥

हे विश्वरूप! आप ज्योतीरूप हैं, आप ही सनातन, परम धाम एवं नारायण हैं, आपको नमस्कार है, आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्घ्यको ग्रहण करें।

आचमनीय-मन्त्र—जगदादित्यरूपेण प्रकाशयति यः सदा। तस्मै प्रकाशरूपाय नमस्ते जातवेदसे ॥

जो आदित्यरूपसे सम्पूर्ण संसारको नित्य प्रकाशित करते रहते हैं, ऐसे उन जातवेदा तथा प्रकाशस्वरूप भगवान् वैश्वानरको नमस्कार है। हे अग्निदेव! इस आचमनीय जलको आप ग्रहण करें।

स्नानीय-मन्त्र—धनञ्जय नमस्तेऽस्तु सर्वपापप्रणाशन। स्नानीयं ते मया दत्तं सर्वकामार्थसिद्धये ॥

सभी पापोंका नाश करनेवाले हे धनञ्जयदेव! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये मेरे द्वारा दिये गये इस स्नानीय जलको आप ग्रहण करें।

अङ्गप्रोक्षण एवं वस्त्र-मन्त्र—हुताशन महाबाहो देवदेव सनातन। शरणं ते प्रगच्छामि देहि मे परमं पदम् ॥

हे देवदेव सनातन महाबाहु हुताशन! मैं आपकी शरण हूँ, मुझे आप परम पद प्रदान करें (मेरे द्वारा प्रदत्त इस अङ्गप्रोक्षण एवं वस्त्रको आप स्वीकार करें)।

अलंकार-मन्त्र—ज्योतिषां ज्योतीरूपस्त्वमनादिनिधनाच्युत। मया दत्तमलंकारमलंकुरु नमोऽस्तु ते ॥

अपने स्थानसे कभी च्युत न होनेवाले हे अग्निदेव! आपका न आदि है न अन्त। आप ज्योतियोंके परमज्योतीरूप हैं, आपको मेरा नमस्कार है। मेरे दिये गये इस अलंकारको आप अलंकृत करें।

गन्ध-मन्त्र—देवीदेवा मुदं यान्ति यस्य सम्यक्समागमात्। सर्वदोषोपशान्त्यर्थं गन्धोऽयं प्रतिगृह्णाताम् ॥

हे देव! आपके सम्यक् संनिधानसे सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं। सम्पूर्ण दोषोंकी शान्तिके लिये मेरे द्वारा दिये गये इस गन्धको आप ग्रहण करें।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

विविध कर्मोंमें अग्निके नाम तथा होम-द्रव्योंका वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं शास्त्रसम्मत-विधिके अनुसार किये गये विविध यज्ञोंमें अग्निके नामोंका वर्णन करता हूँ। शतार्ध-होममें, पाँच सौ संख्यातककी आहुतिवाले यज्ञोंमें अग्निको काश्यप कहा गया है। इसी प्रकार आज्य-होममें विष्णु, तिल-यागमें वनस्पति, सहस्त्र-यागमें ब्राह्मण, अयुत-यागमें हरि, लक्ष-होममें वहि, कोटि-होममें हुताशन, शान्तिक कर्मोंमें वरुण, मारण-कर्ममें अरुण, नित्य-होममें अनल, प्रायश्चित्तमें हुताशन तथा अन्न-यज्ञमें लोहित नाम कहा गया है। देवप्रतिष्ठामें लोहित, वास्तुयाग, मण्डप तथा पद्मक-यागमें प्रजापति, प्रणा-यागमें नाग, महादानमें हविर्भुक्, गोदानमें रुद्र, कन्यादानमें योजक तथा तुला-पुरुष-दानमें धातारूपसे अग्निदेव स्थित रहते हैं। इसी प्रकार वृष्टोत्सर्गमें अग्निका सूर्य, वैश्वदेवकर्ममें पावक, दीक्षाग्रहणमें जनार्दन, उत्पीडनमें काल, शवदाहमें कव्य, पर्णदाहमें यम, अस्थिदाहमें शिखण्डिक, गर्भाधानमें मरुत्, सीमन्तमें पिङ्गल, पुंसवनमें इन्द्र, नामकरणमें पार्थिव, निष्क्रमणमें हाटक, प्राशनमें शुचि, चूडाकरणमें षडानन, त्रतोपदेशमें समुद्रव, उपनयनमें वीतिहोत्र, समावर्तनमें

धनञ्जय, उदरमें जठर, समुद्रमें वडवानल, शिखामें विभु तथा स्वरादि शब्दोंमें सरीसृप नाम है। अश्वाग्निका मन्थर, रथाग्निका जातवेदस्, गजाग्निका मन्दर, सूर्याग्निका विन्ध्य, तोयाग्निका वरुण, ब्राह्मणाग्निका हविर्भुक्, पर्वताग्निका नाम ऋतुभुक् है। दावाग्निको सूर्य कहा जाता है। दीपाग्निका नाम पावक, गृह्याग्निका धरणीपति, घृताग्निका नल और सूतिकाग्निका नाम राक्षस है।

जिन द्रव्योंका होममें उपयोग किया जाता है, उनका निश्चित प्रमाण होता है। प्रमाणके बिना किया गया द्रव्योंका होम फलदायक नहीं होता। अतः शास्त्रके अनुसार प्रमाणका परिज्ञान कर लेना चाहिये। घी, दूध, पञ्चगव्य, दधि, मधु, लाजा, गुड, ईख, पत्र-पुष्प, सुपारी, समिध, व्रीहि, डंटलके साथ जपापुष्प और केसर, कमल, जीवन्ती, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), नारियल, कूष्माण्ड, ककड़ी, गुरुच, तिटुक, तीन पतोंवाली दूब आदि अनेक होम-द्रव्य कहे गये हैं। भूजपत्र, शमी तथा समिधा प्रादेशमात्रके होने चाहिये। बिल्वपत्र तीन पत्रयुक्त, किंतु छिन्न-भिन्न नहीं होना चाहिये।

पुष्प-मन्त्र —विष्णुस्त्वं हि ब्रह्मा च ज्योतिषां गतिरीश्वर। गृहाण पुष्पं देवेश सानुलेपं जगद् भवेत् ॥

हे देवेश! आप ही ब्रह्मा, विष्णु तथा ज्योतियोंकी गति हैं और आप ही ईश्वर हैं। आप इस पुष्पको ग्रहण करें, जिससे सारा संसार पुष्पगन्धसे सुवासित हो जाय।

धूप-मन्त्र —देवतानां पितृणां च सुखमेकं सनातनम्। धूपोऽयं देवदेवेश गृह्णातां मे धनञ्जयः ॥

हे देवदेवेश धनञ्जय! आप देवताओं और पितरोंके सुख प्राप्त करनेमें एकमात्र सनातन आधार हैं। आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस धूपको ग्रहण करें।

दीप-मन्त्र —त्वमेकः सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च। परमात्मा पराकारः प्रदीपः प्रतिगृह्णाताम् ॥

परमात्मन्! आप सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंमें व्याप्त हैं। आपकी आकृति परम उत्कृष्ट है। आप इस दीपकको ग्रहण करें।

नैवेद्य-मन्त्र —नमोऽस्तु यज्ञपतये प्रभवे जातवेदसे। सर्वलोकहितार्थाय नैवेद्यं प्रतिगृह्णाताम् ॥

हे यज्ञपति जातवेदा! आप शक्तिशाली हैं तथा समस्त संसारका कल्याण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। मेरे द्वारा प्रदत्त इस नैवेद्यको आप ग्रहण करें। परम अन्नस्वरूप मधु भी नैवेद्यके रूपमें निवेदित करे तथा यज्ञसूत्र भी अर्पित करे। अन्तमें समस्त कर्म भगवान् अग्निदेवको निवेदित कर दे—

हुताशन नमस्तुभ्यं नमस्ते रुक्मवाहन। लोकनाथ नमस्तेऽस्तु नमस्ते जातवेदसे ॥

हे हुताशनदेव! आपको नमस्कार है, रुक्मवाहन लोकनाथ! आपको नमस्कार है, हे जातवेदा! आपको नमस्कार है, नमस्कार है!

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२५१

इनमें शास्त्र-निर्दिष्ट प्रमाणसे न्यूनता या अधिकता नहीं होनी चाहिये। अभीष्ट-प्राप्तिके निमित्त किये

जानेवाले शान्तिकर्म शास्त्रोक्त रीतिसे सम्पन्न होने चाहिये। (अध्याय १७-१८)

यज्ञ-पात्रोंका स्वरूप और पूर्णाहुतिकी विधि

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! यज्ञक्रियाके उपयोगमें आनेवाली सुवाके निर्माणमें—श्रीपणी, शिशपा, क्षीरी (दूधवाले वृक्ष), बिल्व और खदिरके काष्ठ प्रशस्त माने गये हैं। याग-क्रियामें इनसे बने सुवाके उपयोगसे सिद्धि प्राप्त होती है। देव-प्रतिष्ठामें आँवला, खदिर और केसरके वृक्षको भी सुवाके लिये शास्त्रज्ञोंने उत्तम कहा है। सुवा प्रतिष्ठाकार्यमें, सम्प्राशन तथा संस्कार-कर्ममें और यज्ञादि कार्योंमें प्रयुक्त होता है। सुवाके निर्माणमें बिल्व-काष्ठ ग्रहण करना चाहिये, परंतु उसके ग्रहणके समय रिक्ता आदि तिथियाँ न हों। उस काष्ठको ग्रहण करनेवाला व्यक्ति पहले उपवास करे और मद्य, मांस आदि सभी वस्तुओंका परित्याग कर दे, स्त्री-सम्पर्कसे भी दूर रहे। एक काष्ठसे सुवा और स्तुक् दोनोंका निर्माण किया जा सकता है। इनका निर्माण शास्त्रोक्त विधिके अनुसार करना चाहिये। दर्वी अर्थात् करछुलका निर्माण स्वर्ण या ताँबेसे किया जाना चाहिये। यदि काष्ठसे करछुल बनानी हो तो गंभारी-वृक्ष, तेंदूका वृक्ष और दूधवाले वृक्षके काष्ठसे बारह अङ्गुलकी बनानी चाहिये। उसका नीचेका मण्डल दो अङ्गुलका होना चाहिये। यज्ञ-साधनमें यह उपयोगी है। ताँबेकी करछुल चालीस तोले, प्रायः आधा किलोकी होती है और उसका मण्डल पाँच अङ्गुलका तथा लम्बाई आठ हाथकी होती है। यही दर्वी (करछुल) पायस-निर्माणमें उपयोगी है। आज्य-शोधनके लिये दस तोलेकी ताम्रमयी करछुल होती है। इसके अभावमें पीपलके काष्ठसे सोलह अङ्गुलके मापमें दर्वी (करछुल) बनाये। आज्य-स्थाली ताँबेकी

या मिट्टीकी भी हो सकती है।

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं पूर्णाहुतिकी विधि बतला रहा हूँ, इसके अनुष्ठानसे यज्ञ पूर्ण होता है। अतएव पूर्णाहुति विधिपूर्वक करनी चाहिये। पूर्णाहुतिके बाद यज्ञमें आवाहित किये गये देवताओंको अर्घ्य देना चाहिये।

यदि यज्ञ अपूर्ण रहे तो यजमान श्रीविहीन हो जाता है और यज्ञ पूर्ण फलप्रद नहीं होता। सुवामें चरु रखकर भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। यज्ञ सम्पन्न हो जानेपर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर यजमान घरमें प्रवेश कर कुल-देवताओंकी प्रार्थना करे—प्रतिष्ठा-यागमें पूर्णाहुतिके समय 'सप्त ते०' (यजु० १७।७९), 'देहि मे०' (यजु० ३।५०), 'पूर्णा दर्वि०' (यजु० ३।४९) तथा 'पुनन्तु०' (यजु० १९।३९) इन मन्त्रोंका पाठ करे तथा नित्य-नैमित्तिक यागमें 'पुनन्तु०', 'पूर्णा दर्वि०', 'सप्त ते०' तथा 'देहि मे०'—का पाठ करे। विद्वानोंको इनमें अपने कुल-परम्पराका भी विचार करना चाहिये। पूर्णाहुति खड़ा होकर सम्पन्न करना चाहिये, बैठकर नहीं। ग्रहहोम तथा शतहोममें एक पूर्णाहुति देनी चाहिये। सहस्रयागमें दो, अयुत-होममें चार, सहस्र पुष्पहोममें एक, मृदु पुष्प-होममें एक, शत इक्षु-होममें दो, गर्भाधान, अन्नप्राशन, सीमन्तोन्नयन संस्कारोंमें और प्रायश्चित्तादि कर्म तथा नैमित्तिक वैश्वदेव-यागमें एक पूर्णाहुति देनेका विधान है।

मन्त्रोच्चारणमें ऋषि-छन्द, विनियोगादिका प्रयोग करना चाहिये। यदि इनका प्रयोग न किया जाय

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२५२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तो फल-प्राप्तिमें न्यूनता होती है। 'सप्त तेः' इस ब्राह्मण-मन्त्रके कौण्डिन्य ऋषि, जगती छन्द और अग्नि देवता हैं। 'देहि मेः' इस मन्त्रके प्रजापति ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और प्रजापति देवता हैं। 'पूर्णा दक्षिः' इस मन्त्रके शतक्रतु ऋषि, अनुष्टुप् छन्द एवं अग्नि देवता हैं। 'पुनन्तुः' इस मन्त्रके पवन ऋषि, जगती छन्द तथा देवता अग्नि हैं।

इस रीतिसे तत्तद् मन्त्रोंके उच्चारणके समय ऋषि, छन्द एवं देवताका स्मरण करना चाहिये। जप-कालमें मन्त्रोंकी संख्या अवश्य पूरी करनी चाहिये। निर्दिष्ट संख्याके बिना किया गया जप फलदायी नहीं होता। अयुत-होम, लक्ष-होम और कोटि-होममें जिन ऋत्विक् ब्राह्मणोंका वर्ण किया जाय, वे शान्त एवं काम-क्रोधरहित हों। ऋत्विजोंकी संख्या अभीष्ट होमानुसार करनी चाहिये। प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजाकर एवं दक्षिणा प्रदान कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक याग-कर्म करनेवाला व्यक्ति वसु, आदित्य और मरुदग्गणोंके द्वारा शिवलोकमें पूजित होता है तथा अनेक कल्पोंतक वहाँ

निवास कर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है। जो किसी कामनाके बिना अर्थात् निष्काम-भावपूर्वक ईश्वरार्पण-बुद्धिसे लक्ष-होम करता है, वह अपने अभीष्टको प्राप्त कर परमपद प्राप्त कर लेता है। पुत्रार्थी पुत्र, धनार्थी धन, भार्यार्थी भार्या और कुमारी शुभ पतिको प्राप्त करती है। राज्यभ्रष्ट राज्य तथा लक्ष्मीकी कामनावाला व्यक्ति अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है। जो व्यक्ति निष्कामभावपूर्वक कोटि-होम करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। ब्रह्माने स्वयं बतलाया है कि कोटि-होम लक्ष-होमसे सौ गुना श्रेष्ठ है। ऋत्विज् ब्राह्मणोंके अभावमें आचार्य भी होता बन सकता है। आसनोंमें कुशासन प्रशस्त माना गया है।

देवता पद्मासनपर स्थित रहते हैं और वास भी करते हैं, अतः पद्मासनस्थ होकर ही अर्चना करनी चाहिये। 'देवो भूत्वा देवान् यजेत' इस न्यायके अनुसार पद्मासनस्थ देवताओंका अर्चन पद्मासनस्थ होकर ही करना चाहिये। यदि ऐसा न किया जाय तो सम्पूर्ण फल यक्षिणी हरण कर लेती है। (अध्याय १९-२१)

॥ प्रथम भाग सम्पूर्ण ॥

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

मध्यमपर्व

( द्वितीय भाग )

यज्ञादि कर्मोंके मण्डल-निर्माणका विधान तथा कौञ्ज्यादि पक्षियोंके दर्शनका फल

सूतजीने कहा—ब्राह्मणगण! अब मैं आपलोगोंसे पुराणोंमें वर्णित मण्डल-निर्माणके विषयमें कहूँगा। बुद्धिमान् व्यक्ति हाथसे नापकर मण्डलका माप निश्चित करे। फिर उसे तत्त् स्थानोंमें विधि-विहित लाल आदि रंग भरे। उनमें देवताओंके अस्त्र-विशेष बाहर, मध्य और कोणमें लिखकर प्रदर्शित करे। शम्भु, गौरी, ब्रह्मा, राम और कृष्ण आदिका अनुक्रमसे निर्देश करे। फिर सीमा-रेखाको एक अङ्गुल ऊँचा उन-उन अर्ध-भागोंसे युक्त करे। शिव और विष्णुके महायागमें शम्भुसे प्रारम्भ कर देवताओंकी परिकल्पना—ध्यान करे। प्रतिष्ठामें रामपर्यन्त, जलाशयमें कृष्णपर्यन्त और दुर्गायागमें ब्रह्मादिकी परिकल्पना करे। मण्डलका निर्माण अधम ब्राह्मण एवं शूद्र न करे। सूतजीने पुनः कहा—अब मैं कौञ्ज्याका स्वरूप बतलाता हूँ। सभी शास्त्रोंमें उसका उल्लेख मिलता है जो गोपनीय है। यह कौञ्ज्य (पक्षी-विशेष)-महाकौञ्ज्य, मध्य-कौञ्ज्य और कनिष्ठ-कौञ्ज्य-भेद तीन प्रकारका

वर्णित है। इसका दर्शन सैकड़ों जन्मोंमें किये गये पापोंको नष्ट करता है। मयूर, वृषभ, सिंह, कौञ्ज्य और कपिको घरमें, खेतमें और वृक्षपर भूलसे भी देख ले तो उसको नमस्कार करे, ऐसा करनेसे दर्शकके सैकड़ों ब्रह्महत्याजनित पाप नष्ट हो जाते हैं। उनके पोषणसे कीर्ति मिलती है और दर्शनसे धन तथा आयु बढ़ती है। मयूर ब्रह्माका, वृषभ सदाशिवका, सिंह दुर्गाका, कौञ्ज्य नारायणका, बाघ त्रिपुरसुन्दरी लक्ष्मीका रूप है। स्नानकर यदि प्रतिदिन इनका दर्शन किया जाय तो ग्रहदोष मिट जाता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक इनका पोषण करना चाहिये। सभी यज्ञोंमें सर्वतोभद्रमण्डल सभी प्रकारकी पुष्टि प्रदान करता है। सर्वशक्तिमान् ईश्वरने साधकोंके हितके लिये उसका प्रकाश किया है। सम्पूर्ण स्मार्त-यागोंमें सर्वतोभद्रमण्डलका विशेषरूपसे निर्माण किया जाता है और तत्-तत् स्थानोंमें तत्-तत् रंगोंसे पूरित किया जाता है।

(अध्याय १-२)

यज्ञादि कर्ममें दक्षिणाका माहात्म्य, विभिन्न कर्मोंमें पारिश्रमिक व्यवस्था और कलश-स्थापनका वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! शास्त्रविहित यज्ञादि कार्य दक्षिणारहित एवं परिमाणविहीन कभी नहीं करना चाहिये। ऐसा यज्ञ कभी सफल नहीं होता। जिस यज्ञका जो माप बतलाया गया है, उसीके अनुसार विधान करना चाहिये। मानरहित यज्ञ करनेवाले व्यक्ति नरकमें जाते हैं। आचार्य, होता, ब्रह्मा तथा जितने भी सहयोगी हों, वे सभी

विधिवत् हों।

अस्सी वराटों (कौड़ियों)-का एक पण होता है। सोलह पणोंका एक पुराण कहा जाता है, सात पुराणोंकी एक रजतमुद्रा तथा आठ रजतमुद्राओंकी एक स्वर्णमुद्रा कही जाती है, जो यज्ञ आदिमें दक्षिणा दी जाती है। बड़े उद्यानोंकी प्रतिष्ठा-यज्ञमें दो स्वर्णमुद्राएँ, कूपोत्सर्गमें आधी स्वर्णमुद्रा (निष्क),

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२५४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तुलसी एवं आमलकी-यागमें एक स्वर्णमुद्रा (निष्क) दक्षिणारूपमें विहित है। लक्ष-होममें चार स्वर्ण-मुद्रा, कोटि-होम, देव-प्रतिष्ठा तथा प्रासादके उत्सर्गमें अठारह स्वर्ण-मुद्राएँ दक्षिणारूपमें देनेका विधान है। तडाग तथा पुष्करिणी-यागमें आधी-आधी स्वर्णमुद्रा देनी चाहिये। महादान, दीक्षा, वृषोत्सर्ग तथा गया-श्राद्धमें अपने विभवके अनुसार दक्षिणा देनी चाहिये। महाभारतके श्रवणमें अस्सी रत्ती तथा ग्रहयाग, प्रतिष्ठाकर्म, लक्षहोम, अयुतहोम तथा कोटिहोममें सौ-सौ रत्ती सुवर्ण देना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्रोंमें निर्दिष्ट सत्पात्र व्यक्तिको ही दान देना चाहिये, अपात्रको नहीं। यज्ञ, होममें द्रव्य, काष्ठ, घृत आदिके लिये शास्त्र-निर्दिष्ट विधिका ही अनुसरण करना चाहिये। यज्ञ, दान तथा व्रतादि कर्मोंमें दक्षिणा (तत्काल) देनी चाहिये। बिना दक्षिणाके ये कार्य नहीं करने चाहिये। ब्राह्मणोंका जब वरण किया जाय तब उन्हें रत्न, सुवर्ण, चाँदी आदि दक्षिणारूपमें देना चाहिये। वस्त्र एवं भूमि-दान भी विहित हैं। अन्यान्य दानों एवं यज्ञोंमें दक्षिणा एवं द्रव्योंका अलग-अलग विधान है। विधानके अनुसार नियत दक्षिणा देनेमें असमर्थ होनेपर यज्ञ-कार्यकी सिद्धिके लिये देव-प्रतिमा, पुस्तक, रत्न, गाय, धान्य, तिल, रुद्राक्ष, फल एवं पुष्प आदि भी दिये जा सकते हैं। सूतजी पुनः बोले—ब्राह्मणो! अब मैं पूर्णपात्रका स्वरूप बतलाता हूँ। उसे सुनै। काम्य-होममें एक मुष्टिके पूर्णपात्रका विधान है। आठ मुट्ठी अन्नको एक कुञ्चिका कहते हैं। इसी प्रमाणसे पूर्णपात्रोंका निर्माण करना चाहिये। उन पात्रोंको अलग कर द्वार-प्रदेशमें स्थापित करे।

कुण्ड और कुड्मलोंके निर्माणके पारिश्रमिक इस प्रकार हैं—चौकोर कुण्डके लिये रौप्यादि,

सर्वतोभद्रकुण्डके लिये दो रौप्य, महासिंहासनके लिये पाँच रौप्य, सहस्सार तथा मेरुपृष्ठकुण्डके लिये एक बैल तथा चार रौप्य, महाकुण्डके निर्माणमें द्विगुणित स्वर्णपाद, वृत्तकुण्डके लिये एक रौप्य, पञ्चकुण्डके लिये वृषभ, अर्धचन्द्रकुण्डके लिये एक रौप्य, योनिकुण्डके निर्माणमें एक धेनु तथा चार माशा स्वर्ण, शैवयागमें तथा उद्यापनमें एक माशा स्वर्ण, इष्टिकाकरणमें प्रतिदिन दो पण पारिश्रमिक देना चाहिये। खण्ड-कुण्ड-(अर्ध गोलाकार-) निर्माताको दस वराट (एक वराट बराबर अस्सी कौड़ी), इससे बड़े कुण्डके निर्माणमें एक काकिणी (माशेका चौथाई भाग), सात हाथके कुण्ड-निर्माणमें एक पण, बृहत्कूपके निर्माणमें प्रतिदिन दो पण, गृह-निर्माणमें प्रतिदिन एक रत्ती सोना, कोष्ठ बनवाना हो तो आधा पण, रंगसे रँगनेमें एक पण, वृक्षोंके रोपणमें प्रतिदिन डेढ़ पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसी तरह पृथक् कर्मोंमें अनेक रीतिसे पारिश्रमिकका विधान किया गया है। यदि नापित सिरसे मुण्डन करे तो उसे दस काकिणी देनी चाहिये। स्त्रियोंके नख आदिके रञ्जनके लिये काकिणीके साथ पण भी देना चाहिये। धानके रोपणमें एक दिनका एक पण पारिश्रमिक होता है। तैल और क्षारसे वर्जित वस्त्रकी धुलाईके लिये एक पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसमें वस्त्रकी लम्बाईके अनुसार कुछ वृद्धि भी की जा सकती है। मिट्टीके खोदनेमें, कुदाल चलानेमें, इक्षुदण्डके निष्पीडन तथा सहस्त्र पुष्प-चयनमें दस-दस काकिणी पारिश्रमिक देना चाहिये। छोटी माला बनानेमें एक काकिणी, बड़ी माला बनानेमें दो काकिणी देना चाहिये। दीपकका आधार काँसे या पीतलका होना चाहिये। इन दोनोंके अभावमें मिट्टीका भी आधार बनाया जा सकता है*।

  • भविष्यपुराणका यह अध्याय इतिहासकी दृष्टिसे बड़े महत्त्वका है। केवल कोटिल्य अर्थशास्त्र और शुक्रनीतिसे ही भारतकी प्राचीन

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२५५

सूतजी पुनः बोले—ब्राह्मणो! अब मैं कलशोंके विषयमें निश्चित मत प्रकट करता हूँ, जिसका उपयोग करनेसे मङ्गल होता है और यात्रामें सिद्धि प्राप्त होती है। कलशमें सात अङ्ग अथवा पाँच अङ्ग होते हैं। कलशमें केवल जल भरनेसे ही सिद्धि नहीं होती, इसमें अक्षत और पुष्पोंसे देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन भी करना चाहिये—ऐसा न करनेसे पूजन निष्फल हो जाता है। वट, अश्वत्थ, धव-वृक्ष और बिल्व-वृक्षके पल्लवोंको कलशके ऊपर रखे*। कलश सोना, चाँदी, ताँबा या मृत्तिकाके बनाये जाते हैं। कलशका निर्माण

अपनी सामर्थ्यके अनुसार करे। कलश अभेद्य, निशिच्छद्र, नवीन, सुन्दर एवं जलसे पूरित होना चाहिये। कलशके निर्माणके विषयमें भी निश्चित प्रमाण बतलाया गया है। बिना मानके बना हुआ कलश उपयुक्त नहीं माना गया है। जहाँ देवताओंका आवाहन-पूजन किया जाय, उन्हींकी संनिधिमें कलशकी स्थापना करनी चाहिये। व्यतिक्रम करनेपर फलका अपहरण राक्षस कर लेते हैं। स्वस्तिक बनाकर उसके ऊपर निर्दिष्ट विधिसे कलश स्थापित कर वरूणादि देवताओंका आवाहन करके उनका पूजन करना चाहिये। (अध्याय ३-५)

चतुर्विध मास-व्यवस्था एवं मलमास-वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं (विभिन्न प्रकारके) मासोंका वर्णन करता हूँ। मास चार प्रकारके होते हैं—चान्द्र, सौर, सावन तथा नाक्षत्र। शुक्ल प्रतिपदासे लेकर अमावास्यातकका मास चान्द्र-मास कहा जाता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तिमें प्रवेश करनेका समय सौर-मास कहलाता है। पूरे तीस दिनोंका सावन-मास होता है। अश्विनीसे लेकर रेवतीपर्यन्त नाक्षत्र-मास होता है। सूर्योदयसे दूसरे सूर्योदयतक जो दिन होता है, उसे सावन-दिन कहते हैं। एक तिथिमें चन्द्रमा जितना भोग करता है, वह चान्द्र-दिवस कहलाता है। राशिके तीसवें भागको सौर-दिन कहते हैं। दिन-रातको मिलाकर अहोरात्र होता है। किसी भी तिथिको लेकर तीस-दिन बाद आनेवाली तिथितकका समय सावन-मास होता है। प्रायश्चित्त, अन्नप्राशन तथा मन्त्रोपासनमें, राजाके कर-ग्रहणमें,

व्यवहारमें, यज्ञमें तथा दिनकी गणना आदिमें सावन-मास ग्राह्य है। सौर-मास विवाहदि-संस्कार, यज्ञ-व्रत आदि सत्कर्म तथा स्नानादिमें ग्राह्य है। चान्द्र-मास पार्वण, अष्टकाश्राद्ध, साधारण श्राद्ध, धार्मिक कार्यों आदिके लिये उपयुक्त है। चैत्र आदि मासोंमें तिथिको लेकर जो कर्म विहित हैं, वे चान्द्र-माससे करने चाहिये। सोम या पितृगणोंके कार्य आदिमें नाक्षत्र-मास प्रशस्त माना गया है। चित्रा नक्षत्रके योगसे चैत्री पूर्णिमा होती है, उससे उपलक्षित मास चैत्र कहा जाता है। चैत्र आदि जो बारह चान्द्र-मास हैं, वे तत्-तत्-नक्षत्रके योगसे तत्-तत्-नामवाले होते हैं।

जिस महीनेमें पूर्णिमाका योग न हो, वह प्रजा, पशु आदिके लिये अहितकर होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों नित्य तिथिका भोग करते हैं। जिन तीस दिनोंमें संक्रमण न हो, वह मलिल्लुच,

मुद्राओं एवं पारिश्रमिकका पता चलता है। अन्य किसी पुराण या धार्मिक ग्रन्थोंमें इनका कोई संकेत नहीं किया गया है। गीताप्रेससे प्रकाशित 'माक्सवाद और रामराज्य' पुस्तकके पारिश्रमिकवाले प्रकरणमें इसपर पूरा विचार किया गया है तथा 'कल्याण' सन् १९६४ ई० के अङ्कमें भी इसपर विचार प्रकट किया गया है।

  • प्रचलित परम्परामें आम, पीपल, बरगद, प्लक्ष (पाकड़) तथा उदुम्बर (गूलर)—ये पञ्च-पल्लव कहे गये हैं।

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२५६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मलमास या अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) कहलाता है, उसमें सूर्यकी कोई संक्रान्ति नहीं होती। प्रायः अढ़ाई वर्ष (बत्तीस मास) के बाद यह मास आता है। इस महीनेमें सभी तरहकी प्रेत-क्रियाएँ तथा सपिण्डन-क्रियाएँ की जा सकती हैं। परंतु यज्ञ, विवाहादि कार्य नहीं होते। इसमें तीर्थस्नान, देव-दर्शन, व्रत-उपवास आदि, सीमन्तोन्नयन, ऋतुशान्ति, पुंसवन और पुत्र आदिका मुख-दर्शन किया जा सकता है। इसी तरह शुक्रास्तमें भी ये क्रियाएँ की जा सकती हैं। राज्याभिषेक भी मलमासमें हो सकता है। व्रतारम्भ, प्रतिष्ठा,

चूडाकर्म, उपनयन, मन्त्रोपासना, विवाह, नूतन-गृह-निर्माण, गृह-प्रवेश, गौ आदिका ग्रहण, आश्रमान्तरमें प्रवेश, तीर्थ-यात्रा, अभिषेक-कर्म, वृषोत्सर्ग, कन्याका द्विरागमन तथा यज्ञ-यागादि—इन सबका मलमासमें निषेध है। इसी तरह शुक्रास्त एवं उसके वार्धक्य और बाल्यत्वमें भी इनका निषेध है। गुरुके अस्त एवं सूर्यके सिंह राशिमें स्थित होनेपर अधिक मासमें जो निषिद्ध कर्म हैं, उन्हें नहीं करना चाहिये। कर्क राशिमें सूर्यके आनेपर भगवान् शयन करते हैं और उनके तुलाराशिमें आनेपर निद्राका त्याग करते हैं। (अध्याय ६)

काल-विभाग, तिथि-निर्णय एवं वर्षभरके विशेष पर्वों तथा तिथियोंके पुण्यप्रद कृत्य

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! देव-कर्म या पैतृक-कर्म कालके आधारपर ही सम्पन्न होते हैं और कर्म भी नियत समयपर किये जानेपर पूर्णरूपेण फलप्रद होते हैं। समयके बिना की गयी क्रियाओंका फल तीनों कालों तथा लोकोंमें भी प्राप्त नहीं होता। अतः मैं कालके विभागोंका वर्णन करता हूँ।

यद्यपि काल अमूर्तरूपमें एक तथा भगवान्का ही अन्यतम स्वरूप है तथापि उपाधियोंके भेदसे वह दीर्घ, लघु आदि अनेक रूपोंमें विभक्त है। तिथि, नक्षत्र, वार तथा रात्रिका सम्बन्ध आदि जो कुछ है, वे सभी कालके ही अङ्ग हैं और पक्ष, मास आदि रूपसे वर्षान्तरोंमें भी आते-जाते रहते हैं तथा वे ही सब कर्मोंके साधन हैं। समयके बिना कोई भी स्वतन्त्ररूपसे कर्म करनेमें समर्थ नहीं। धर्म या अधर्मका मुख्य द्वार काल ही है। तिथि आदि काल-विशेषोंमें निषिद्ध और विहित कर्म बताये गये हैं। विहित कर्मोंका पालन करनेवाला स्वर्ग प्राप्त करता है और विहितका

त्याग कर निषिद्ध कर्म करनेसे अधोगति प्राप्त करता है। पूर्वाह्नव्यापिनी तिथिमें वैदिक क्रियाएँ करनी चाहिये। एकोद्विष्ट श्राद्ध मध्याह्नव्यापिनी तिथिमें और पार्वण-श्राद्ध अपराह्न-व्यापिनी तिथिमें करना चाहिये। वृद्धिश्राद्ध आदि प्रातःकालमें करने चाहिये। ब्रह्माजीने देवताओंके लिये तिथियोंके साथ पूर्वाह्नकाल दिया है और पितरोंको अपराह्न। पूर्वाह्नमें देवताओंका अर्चन करना चाहिये।

तिथियाँ तीन प्रकारकी होती हैं—खर्वा, दर्पा और हिंसा। लङ्घित होनेवाली खर्वा, तिथिवृद्धि दर्पा तथा तिथिहानि हिंसा कही जाती है। इनमें खर्वा और दर्पा आगेकी लेनी चाहिये और हिंसा (क्षय-तिथि) पूर्वमें लेनी चाहिये। शुक्ल पक्षमें परा लेनी चाहिये और कृष्ण पक्षमें पूर्वा। भगवान् सूर्य जिस तिथिको प्राप्त कर उदित होते हैं, वह तिथि स्नान-दान आदि कृत्योंमें उचित है। यदि अस्त-समयमें भगवान् सूर्य दस घटीपर्यन्त रहते हैं तो वह तिथि रात-दिन समझनी चाहिये।

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२५७

शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्षमें खर्चा या दर्पा तिथिके अस्तपर्यन्त सूर्य रहे तो पितृकार्यमें वही तिथि ग्राह्य है। दो दिनमें मध्याह्नकालव्यापिनी तिथि होनेपर अस्तपर्यन्त रहनेवाली प्रथम तिथि श्राद्ध आदिमें विहित है। द्वितीया तृतीयासे तथा चतुर्थी पञ्चमीसे युक्त हों तो ये तिथियाँ पुण्यप्रद मानी गयी हैं और उसके विपरीत होनेपर पुण्यका ह्रास करती हैं। षष्ठी पञ्चमीसे एवं अष्टमी सप्तमीसे विद्ध हो तथा दशमीसे एकादशी, त्रयोदशीसे चतुर्दशी और चतुर्दशीसे अमावास्या विद्ध हो तो उनमें उपवास नहीं करना चाहिये, अन्यथा पुत्र, कलत्र और धनका ह्रास होता है। पुत्र-भार्यादिसे रहित व्यक्ति का यज्ञमें अधिकार नहीं है। जिस तिथिको लेकर सूर्य उदित होते हैं, वह तिथि स्नान, अध्ययन और दानके लिये श्रेष्ठ समझनी चाहिये। कृष्ण पक्षमें जिस तिथिमें सूर्य अस्त होते हैं, वह स्नान, दान आदि कर्मोंमें पितरोंके लिये उत्तम मानी जाती है।

सूतजी कहते हैं— ब्राह्मणो! अब मैं ब्रह्माजीद्वारा बतलायी गयी श्रेष्ठ तिथियोंका वर्णन करता हूँ। आश्विन, कार्तिक, माघ और चैत्र इन महीनोंमें स्नान, दान और भगवान् शिव तथा विष्णुका पूजन दस गुना फलप्रद होता है। प्रतिपदा तिथिमें अग्निदेवका यजन और हवन करनेसे सभी तरहके धान्य और ईप्सित धन प्राप्त होते हैं। यदि शुक्ल पक्षमें द्वितीया तिथि बृहस्पतिवारसे युक्त हो तो उस तिथिमें विधिपूर्वक भगवान् अग्निदेवका पूजन और नक्तव्रत करनेसे इच्छित ऐश्वर्य प्राप्त होता है। मिथुन (आषाढ़) और कर्क (श्रावण) राशिके सूर्यमें जो द्वितीया आये, उसमें उपवास करके भगवान् विष्णुका पूजन करनेवाली स्त्री कभी विधवा नहीं होती। अशून्य-शयन द्वितीया

(श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी द्वितीया तिथि)–को गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्योंसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करनी चाहिये। (इस व्रतसे पति-पत्नीका परस्पर वियोग नहीं होता।) वैशाख शुक्ल पक्षकी तृतीयामें गङ्गाजीमें स्नान करनेवाला सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वैशाख मासकी तृतीया स्वाती नक्षत्र और माघकी तृतीया रोहिणीयुक्त हो तथा आश्विन-तृतीया वृषराशिसे युक्त हो तो उसमें जो भी दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है। विशेषरूपसे इनमें हविष्यान्न एवं मोदक देनेसे अधिक लाभ होता है तथा गुड़ और कर्पूरसे युक्त जलदान करनेवालेकी विद्वान् पुरुष अधिक प्रशंसा करते हैं, वह मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। यदि बुधवार और श्रवणसे युक्त तृतीया हो तो उसमें स्नान और उपवास करनेसे अनन्त फल प्राप्त होता है। भरणी नक्षत्रयुक्त चतुर्थीमें यमदेवताकी उपासना करनेसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिलती है। भाद्रपदकी शुक्ला चतुर्थी शिवलोकमें पूजित है। कार्तिक और माघ मासके ग्रहणोंमें स्नान, जप, तप, दान, उपवास और श्राद्ध करनेसे अनन्त फल मिलता है। चतुर्थीमें सम्पूर्ण विघ्नोंके नाश तथा इच्छापूर्तिके लिये भगवान् गणेशकी पूजा मोदक आदिसे भक्तिपूर्वक करनी चाहिये।

श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीमें द्वार-देशके दोनों ओर गोमयसे नागोंकी रचना कर दूध, दही, सिन्दूर, चन्दन, गङ्गाजल एवं सुगन्धित द्रव्योंसे नागोंका पूजन करना चाहिये। नागोंका पूजन करनेवालोंके कुलमें निर्भयता रहती है एवं प्राणोंकी रक्षा भी होती है। श्रावण कृष्ण पञ्चमीको घरके आँगनमें नीमके पत्तोंसे मनसादेवीकी पूजा करनेसे कभी सर्पभय नहीं होता। भाद्रपदकी षष्ठीमें स्नान, दान आदि करनेसे अनन्त पुण्य

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

होता है। विप्रगणो! माघ और कार्तिककी षष्ठीमें व्रत करनेसे इहलोक और परलोकमें असीम कीर्ति प्राप्त होती है। शुक्ल पक्षकी सप्तमीमें यदि संक्रान्ति पड़े तो उसका नाम महाजया या सूर्यप्रिया होती है। भाद्रपदकी सप्तमी अपराजिता है। शुक्ल या कृष्ण पक्षकी षष्ठी या सप्तमी रविवारसे युक्त हो तो वह ललिता नामकी तिथि पुत्र-पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाली और महान् पुण्यदायिनी है।

आश्विन एवं कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें अष्टादशभुजाका पूजन करना चाहिये। आषाढ़ और श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें चण्डिकादेवीका प्रातःकाल स्नान करके अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजन कर रात्रिमें अभिषेक करना चाहिये। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें अशोक-पुष्पसे मृण्मयी भगवती देवीका अर्चन करनेसे सम्पूर्ण शोक निवृत्त हो जाते हैं। श्रावण मासमें अथवा सिंह-संक्रान्तिमें रोहिणीयुक्त अष्टमी हो तो उसकी अत्यन्त प्रशंसा की गयी है। प्रतिमासकी नवमीमें देवीकी पूजा करनी चाहिये। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी दशमीको शुद्ध आहारपूर्वक रहनेवाले ब्रह्मलोकमें जाते हैं। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी दशमी गङ्गादशहरा कहलाती है। आश्विनकी दशमी विजया और कार्तिककी दशमी महापुण्या कहलाती है।

एकादशीव्रत करनेसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रतमें दशमीको जितेन्द्रिय होकर एक ही बार भोजन करना चाहिये। दूसरे दिन एकादशीमें उपवास कर द्वादशीमें पारणा करनी चाहिये। द्वादशी तिथि द्वादश पापोंका हरण करती है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें अनेक पुष्पादि सामग्रियोंसे कामदेवकी पूजा करे। इसे अनङ्ग-त्रयोदशी कहा जाता है। चैत्र मासके कृष्ण

पक्षकी अष्टमी शनिवार या शतभिषा नक्षत्रसे युक्त हो तो गङ्गामें स्नान करनेसे सैकड़ों सूर्यग्रहणका फल प्राप्त होता है। इसी मासके कृष्ण पक्षकी त्रयोदशी यदि शनिवार या शतभिषासे युक्त हो तो वह महावाराणी-पर्व कहलाता है। इसमें किया गया स्नान, दान एवं श्राद्ध अक्षय होता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी दम्भभंजिनी कही जाती है। इस दिन धतूरेकी जड़में कामदेवका अर्चन करना चाहिये, इससे उत्तम स्थान प्राप्त होता है। अनन्त-चतुर्दशीका व्रत सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला है। इसे भक्तिपूर्वक करनेसे मनुष्य अनन्त सुख प्राप्त करता है। प्रेत-चतुर्दशी (यम-चतुर्दशी)-को तपस्वी ब्राह्मणोंको भोजन और दान देनेसे मनुष्य यमलोकमें नहीं जाता। फाल्गुन मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी शिवरात्रिके नामसे प्रसिद्ध है और वह सम्पूर्ण अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाली है। इस दिन चारों पहरोमें स्नान करके भक्तिपूर्वक शिवजीकी आराधना करनी चाहिये। चैत्रमासकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र तथा गुरुवारसे युक्त हो तो वह महाचैत्री कही जाती है। वह अनन्त पुण्य प्रदान करनेवाली है। इसी प्रकार विशाखादि नक्षत्रसे युक्त वैशाखी, महाज्येष्ठी आदि बारह पूर्णिमाएँ होती हैं। इनमें किये गये स्नान, दान, जप, नियम आदि सत्कर्म अक्षय होते हैं और व्रतीके पितर संतुष्ट होकर अक्षय विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। हरिद्वारमें महावैशाखीका पर्व विशेष पुण्य प्रदान करता है। इसी प्रकार शालग्राम-क्षेत्रमें महाचैत्री, पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें महाज्येष्ठी, शुद्धल-क्षेत्रमें महाषाढ़ी, केदारमें महाश्रावणी, बदरिकाक्षेत्रमें महाभाद्री, पुष्कर तथा कान्यकुब्जमें महाकार्तिकी, अयोध्यामें महामार्गशीर्षी तथा महापौषी, प्रयागमें महामाघी तथा नैमिषारण्यमें महाफाल्गुनी

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२५९

पूर्णिमा विशेष फल देनेवाली है। इन पर्वोंमें जो भी शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं, वे अक्षय हो जाते हैं। आश्विनकी पूर्णिमा कौमुदी कही गयी है, इसमें चन्द्रोदय-कालमें विधिपूर्वक लक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक अमावास्याको तर्पण और श्राद्धकर्म अवश्य करना चाहिये। कार्तिक

मासके कृष्ण पक्षकी अमावास्यामें प्रदोषके समय लक्ष्मीका सविधि पूजन कर उनकी प्रीतिके लिये दीपोंको प्रज्वलित करना चाहिये एवं नदीतीर, पर्वत, गोष्ठ, श्मशान, वृक्षमूल, चौराहा, अपने घरमें और चत्वरमें दीपोंको सजाना चाहिये।

(अध्याय ७-८)

गोत्र-प्रवर आदिके ज्ञानकी आवश्यकता

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! गोत्र-प्रवरकी परम्पराको जानना अत्यन्त आवश्यक होता है, इसलिये अपने-अपने गोत्र या प्रवरको पिता, आचार्य तथा शास्त्रद्वारा जानना चाहिये। गोत्र-प्रवरको जाने बिना किया गया कर्म विपरीत फलदायी होता है। कश्यप, वसिष्ठ, विश्वामित्र, आङ्गिरस, च्यवन, मौकुन्य, वत्स, कात्यायन, अगस्त्य आदि अनेक गोत्रप्रवर्तक ऋषि हैं। गोत्रोंमें एक, दो, तीन, पाँच आदि प्रवर होते हैं। समान

गोत्रमें विवाहादि सम्बन्धोंका निषेध है। अपने गोत्र-प्रवरादिका ज्ञान शास्त्रान्तरोंसे कर लेना चाहिये।

वास्तवमें देखा जाय तो सारा जगत् महामुनि कश्यपसे उत्पन्न हुआ है। अतः जिन्हें अपने गोत्र और प्रवरका ज्ञान नहीं है, उन्हें अपने पिताजीसे ज्ञात कर लेना चाहिये। यदि उन्हें मालूम न हो तो स्वयंको काश्यप१ गोत्रीय मानकर उनका प्रवर लगाकर शास्त्रानुसार कर्म करना चाहिये।

(अध्याय ९)

वास्तु-मण्डलके निर्माण एवं वास्तु-पूजनकी संक्षिप्त विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं वास्तु-मण्डलका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूँ। पहले भूमिपर अङ्गुरोंका रोपण करके भूमिकी परीक्षा कर ले।

तदनन्तर उत्तम भूमिके मध्यमें वास्तु-मण्डलका निर्माण करे। वास्तु-मण्डलके देवता पैतालीस हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—(१) शिखी, (२) पर्जन्य,

१-गोत्र-प्रवर-निर्णयपर 'गोत्र-प्रवर-निबन्ध-कदम्ब' आदि कई स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ हैं। मत्स्यपुराणके अध्याय १९५-२०५ तकमें विस्तारसे यह विषय आया है तथा स्कन्दपुराणके माहेश्वरखण्ड एवं ब्रह्मखण्डमें भी इसपर विचार किया गया है।

२-सबके लिये एकमात्र परमात्मा ही परमकल्याणार्थ ध्येय-ज्ञेय हैं और कश्यपनन्दन सूर्यके रूपमें वे प्रत्यक्षरूपसे संसारका पालन, संचालन—उष्मा तथा प्रकाशके रूपमें, फिर वायु—प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंके जीवन बने हैं। इसलिये सभी वैष्णव और संन्यासी अपनेको अच्युत-गोत्रीय ही मानते हैं। प्राचीन परम्पराके अनुसार वेदाध्ययनमें वैदिक शाखा, सूत्र, ऋषि, गोत्र और प्रवरका ज्ञान आवश्यक था। यह विषय आश्वलायन गृह्यसूत्रमें भी निर्दिष्ट है।

३-जिस भूमिपर मनुष्यादि प्राणी निवास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है। इसके गृह, देवप्रासाद, ग्राम, नगर, पुर, दुर्ग आदि अनेक भेद हैं। इसपर वास्तुराजवल्लभ, समराङ्गणसूत्रधार, वृहत्संहिता, शिल्पस्तु, गृहरत्नभूषण, हयशीर्षपाञ्चरात्र तथा कपिलपाञ्चरात्र आदि ग्रन्थोंमें पूर्ण विचार किया गया है। पुराणोंमें मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें भी यह महत्त्वपूर्ण विषय आया है। 'कल्याण' के देवताङ्गमें भी वास्तु-चक्रादिके विषयमें सामग्री संकलित की गयी है। वास्तुके आविर्भावके विषयमें मत्स्यपुराणमें आया है कि अन्धकासुरके वधके समय भगवान् शंकरके ललाटेसे जो स्वेदबिन्दु गिरे उनसे एक भयंकर आकृतिवाला पुरुष प्रकट हुआ। जब वह त्रिलोकीका भक्षण करनेके लिये उद्यत हुआ, तब शंकर आदि देवताओंने उसे पृथ्वीपर सुलाकर वास्तुदेवता (वास्तुपुरुष)-के रूपमें प्रतिष्ठित किया और उसके शरीरमें सभी

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२६०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

(३) जयन्त, (४) कुलिशायुध, (५) सूर्य, (६) सत्य, (७) वृष, (८) आकाश, (९) वायु, (१०) पूषा, (११) वितथ, (१२) गुहा, (१३) यम, (१४) गन्धर्व, (१५) मृगराज, (१६) मृग, (१७) पितृगण, (१८) दौवारिक, (१९) सुग्रीव, (२०) पुष्पदन्त, (२१) वरुण, (२२) असुर, (२३) पशु, (२४) पाश, (२५) रोग, (२६) अहि, (२७) मोक्ष, (२८) भल्लाट, (२९) सोम, (३०) सर्प, (३१) अदिति, (३२) दिति, (३३) अपू, (३४) सावित्र, (३५) जय, (३६) रूद्र, (३७) अर्यमा, (३८) सविता, (३९) विवस्वान्, (४०) विबुधाधिप, (४१) मित्र, (४२) राजयक्ष्मा, (४३) पृथ्वीधर, (४४) आपवत्स तथा (४५) ब्रह्मा।

इन पैतालीस देवताओंके साथ ही वास्तु-मण्डलके बाहर ईशानकोणमें चरकी, अग्निकोणमें विदारी, नैऋत्यकोणमें पूतना तथा वायव्यकोणमें पापराक्षसीकी स्थापना करनी चाहिये। मण्डलके पूर्व दिशामें स्कन्द, दक्षिणमें अर्यमा, पश्चिममें जृम्भक तथा उत्तरमें पिलिपिच्छकी स्थापना करनी चाहिये। इस प्रकार वास्तु-मण्डलमें तिरपन देवी-देवताओंकी स्थापना होती है। इन सभीका अलग-अलग मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। मण्डलके बाहर ही पूर्वादि दस दिशाओंमें दस दिक्पाल देवताओं—इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा तथा अनन्तकी भी यथास्थान पूजा कर उन्हें बलि (नैवेद्य) निवेदित करनी चाहिये। वास्तु-मण्डलकी रेखाएँ श्वेत वर्णसे तथा मध्यमें कमल लाल वर्णसे अनुरञ्जित करना चाहिये। शिखी आदि पैतालीस

देवताओंके कोष्ठकोंको रक्तादि रंगोंसे अनुरञ्जित करना चाहिये। गृह, देवमन्दिर, महाकूप आदिक निर्माणमें तथा देव-प्रतिष्ठा आदिमें वास्तु-मण्डलका निर्माण कर वास्तुमण्डलस्थ देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन आदि करना चाहिये। पवित्र स्थानपर लिपी-पुती डेढ़ हाथके प्रमाणकी भूमिपर पूर्वसे पश्चिम तथा उत्तरसे दक्षिण दस-दस रेखाएँ खींचे। इससे इक्यासी कोष्ठकके वास्तुपद-चक्रका निर्माण होगा। इसी प्रकार ९-९ रेखाएँ खींचनेसे चौंसठ पदका वास्तुचक्र बनता है।

वास्तु-मण्डलमें जिन देवताओंका उल्लेख किया गया है, उनका ध्यान और पूजन अलग-अलग मन्त्रसे किया जाता है। उल्लिखित देवताओंकी तुष्टिके लिये विधिके अनुसार स्थापना तथा पूजा करके हवन-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सुवर्ण आदि दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये।

वास्तु-यागादिमें एक विस्तृत मण्डलके अन्तर्गत योनि तथा मेखलाओंसे समन्वित एक कुण्ड और वास्तु-वेदीका विधिके अनुसार निर्माण करना चाहिये। मण्डलके ईशानकोणमें कलश स्थापित कर गणेशजीका एवं कुण्डके मध्यमें विष्णु, दिक्पाल और ब्रह्मा आदिका तत्तद् मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। प्राणायाम करके भूतशुद्धि करे। तदनन्तर वास्तुपुरुषका ध्यान इस प्रकार करे—वास्तुदेवता श्वेतवर्णके चार भुजावाले शान्तस्वरूप और कुण्डलोंसे अलंकृत हैं। हाथमें पुस्तक, अक्षमाला, वरद एवं अभय-मुद्रा धारण किये हुए

देवताओंने वास किया। इसीलिये वह वास्तुदेवता कहलाया। देवताओंने उसे पूजित होनेका वर भी प्रदान किया। वास्तुदेवताकी पूजाके लिये वास्तुप्रतिमा तथा वास्तुचक्र बनाया जाता है। वास्तुचक्र प्रायः ४९ से लेकर एक सहस्र पदात्मक होता है। भिन्न-भिन्न अवसरोंपर भिन्न-भिन्न वास्तुचक्रोंका निर्माण कर उनमें देवताओंका आवाहन, स्थापन एवं पूजन किया जाता है। चौंसठ पदात्मक तथा इक्यासी पदात्मक वास्तुचक्रके पूजनकी परम्परा विशेषरूपसे प्रचलित है। इस सभी वास्तुचक्रके भेदोंमें प्रायः इन्द्रादि दस दिक्पालोंके साथ शिखी आदि पैतालीस देवताओंका पूजन किया जाता है तथा उन्हें पायसन्न बलि प्रदान की जाती है। वास्तुकलशमें वास्तुदेवता (वास्तोष्पति)-की पूजा कर उनसे सर्वविधि शान्ति एवं कल्याणकी प्रार्थना की जाती है।

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

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हैं। पितरों और वैश्वानरसे युक्त हैं तथा कुटिल भूसे सुशोभित हैं। उनका मुख भयंकर है। हाथ जानुपर्यन्त लम्बे हैं१। ऐसे वास्तुपुरुषका विधिके अनुसार पूजन कर उन्हें स्नान कराये। 'वास्तोष्पते' यह वास्तुदेवताके पूजनका मुख्य मन्त्र है२। पूजाकी जितनी सामग्री है, उसे प्रोक्षणद्वारा शुद्ध कर ले। आसनकी शुद्धि कर गणेश, सूर्य, इन्द्र और आधारशक्तिरूप पृथ्वी तथा ब्रह्माका पूजन करे। तदनन्तर हाथमें श्वेत चन्दनयुक्त श्वेत पुष्प लेकर विष्णुरूप वास्तुपुरुषका ध्यान कर उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क आदि प्रदान करे और विविध उपचारोंसे उनकी पूजा करे।

विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि कुण्ड और वास्तुदेवीके मध्यमें कलशकी स्थापना करे। कलशमें पर्वतके शिखर, गजशाला, वल्मीक, नदीसंगम, राजद्वार, चौराहे तथा कुशके मूलकी—यह सात प्रकारकी मिट्टी छोड़े। साथ ही उसमें इन्द्रवल्ली (पारिजात), विष्णुकान्ता (कृष्ण शङ्खुपुष्पी), अमृती (आमलकी), त्रपुष (खीरा), मालती, चम्पक

तथा ऊर्वारुक (ककड़ी)—इन वनस्पतियोंको छोड़े। पारिभद्र (नीम)-के पत्रोंसे कलशके कण्ठका परिवेष्टन करे और कलशके मुखमें फणाकाररूपमें पञ्चपल्लवोंकी स्थापना करे। उसके ऊपर श्रीफल, बीजपूर, नारिकेल, दाड़िम, धात्री तथा जम्बूफल रखे। कलशमें सुवर्णादि पञ्चरत्न छोड़े। गन्ध-पुष्पादि पञ्चोपचारोंसे कलशका पूजन करे। कलशमें वरुणका आवाहन करे। कलशका स्पर्श करते हुए उसमें समस्त समुद्रों, तीर्थों, गङ्गादि नदियों तथा पवित्र जलाशयों आदिके पवित्र जलकी भावना कर, उनका आवाहन करे। कलश-स्थापनके अनन्तर तिल, चावल, मध्वाज्य तथा दही, दूध आदिसे यथाविधि वास्तु-होम करे। वास्तु-हवनके समय वास्तु-देवताके मन्त्रका जप करे। अनन्तर वास्तु-मण्डलके समस्त देवताओंको पायसात्र, कृशरात्र आदि पृथक्-पृथक् क्रमशः बलि निवेदित करे। सभी देवताओंको उन्हींके अनुरूप पताका भी प्रदान करे। अपनी सामर्थ्यके अनुसार मन्त्र-जप और वास्तुपुरुषस्तवका पाठ करे३। भगवान्

१-श्वेतं चतुर्भुजं शान्तं कुण्डलाधैरलंकृतम्। पुस्तकं चाक्षमालां च वराभयकरं परम्॥

पितृवैश्वानरोपेतं कुटिलभूपशोभितम्। करालवदनं चैव आजानुकरलम्बितम्॥ (मध्यमपर्व २।११।११-१२)

२-पूरा मन्त्र इस प्रकार है—

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्तस्वावेशो अनभीवो भवानः। यत् त्वेमेहे प्रति तन्नो जुपस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥

(ऋ७।५४।१)

हे वास्तुदेव! हम आपके सच्चे उपासक हैं, इसपर आप पूर्ण विश्वास करें और हमारी स्तुति-प्रार्थनाओंको सुनकर हम सभी उपासकोंको आधि-व्याधिमुक्त कर दें तथा जो हम अपने धन-श्रेयर्थकी कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तुक्षेत्र या गृहमें निवास करनेवाले हमारे स्त्री-पुत्रादि-परिवार-परिजनोंके लिये कल्याणकारक हों एवं हमारे अधीनस्थ गौ, अश्वदि सभी चतुष्पद प्राणियोंका भी कल्याण करें।

३-भगवान् शंकरके द्वारा की गयी 'ब्रह्मस्तव' नामकी विष्णु-स्तुति इस प्रकार है—

विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्ज्यो यज्ञियो यज्ञपालकः। नारायणो नरो हंसो विष्वक्सेनो हुताशनः॥

यज्ञेशः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः। आदिदेवो जगत्कर्ता मण्डलेशो महीधरः॥

पद्मनाभो हृषीकेशो दाता दामोदरो हरिः। त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो ब्रह्मणः प्रीतिवर्धनः॥

भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यवाक्यो ध्रुवः शुचिः। संन्यासी शास्त्रतत्त्वज्ञस्त्रिपञ्चाशदगुणात्मकः॥

विदारी विनयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतप्रभः। यज्ञस्त्वं हि वषट्कारस्त्वमंकारस्त्वमन्यः॥

त्वं स्वधा त्वं हि स्वाहा त्वं सुधा च पुरुषोत्तमः।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

शंकरने भगवान् विष्णुस्वरूप वास्तोष्पतिकी इस स्तुतिको कहा है। इसका जो प्रयत्नपूर्वक निरन्तर पाठ करता है, उसे अमरता प्राप्त हो जाती है और जो हल्कमलके मध्य निवास करनेवाले भगवान् अच्युत-विष्णुका ध्यान करता है, वह वैष्णवी सिद्धि प्राप्त करता है। यज्ञकर्मीकी पूर्णतामें आचार्यको पयस्विनी गौ तथा सुवर्ण दक्षिणामें दे, अन्य ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण प्रदान करे। प्राजापत्य और स्विष्टकृत हवन करे। आचार्य और ऋत्विज मिलकर यजमानपर कलशके जलसे अभिषेक करें। पूर्णाहुति देकर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। ब्राह्मणोंकी

आज्ञा लेकर यजमान घरमें प्रवेश करे, अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराये। दीन, अन्ध और कृपणोंका अपनी शक्तिके अनुसार सम्मान करे। फिर अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भोजन करे। उस दिन भोजनमें दूध, कसैले पदार्थ, भुने हुए शाक तथा करेला आदि निषिद्ध पदार्थोंका उपयोग न करे। शाल्यन्त्र, मूली, कटहल, आम, मधु, घी, गुड़, सेंधा नमकके साथ मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), बदरीफल, धात्रीफल एवं तिल और मरिच आदिसे बने पदार्थ भोजनमें प्रशस्त कहे गये हैं।

(अध्याय १०—१३)

कुशकण्डिका-विधान तथा अग्नि-जिह्वाओंके नाम

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं याग-विशेषोंमें स्वगृह्याग्नि-विधि कह रहा हूँ। अपनी वेदादि शाखाके अनुकूल ही गृह्याग्नि-विधि करनी चाहिये। दूसरेकी शाखाके विधानसे याग-विशेषोंका अनुष्ठान करनेपर भयकी प्राप्ति होती है और कीर्तिका नाश होता है। पुत्र, कन्या और आगे उत्पन्न होनेवाले पुत्रादि गृह्यानामसे कहे जाते हैं। यजमानके जितने दायद होते हैं, वे सब गृह्यानामसे कहे जाते हैं। उनके संस्कार, याग और शान्तिकर्म-क्रियाओंमें अपने गृह्याग्निसे ही अनुष्ठान करना चाहिये। आचार्यद्वारा विहित कल्पको दक्षस्मृतिमें कहा गया है। आचार्य इन कर्मोंमें तीन कुशाओंका परिग्रहण करता है। जिस मन्त्रसे कुशा ग्रहण करता है, उसके ऋषि दक्ष, जगती छन्द और विष्णु देवता हैं। पृथ्वीके शोधनमें 'भूरसिः' (यजु० १३।१८) इस मन्त्रका विनियोग करे। इस मन्त्रके ऋषि सुवर्ण हैं, गायत्री और

जगती छन्द तथा सूर्य देवता हैं। अनन्तर उन तीन कुशाओंको तर्जनी तथा अँगूटसे पकड़कर ईशानकोणसे लेकर दक्षिण होते हुए ईशानकोणतक वलयाकृतितमें घुमाये तथा उनसे भूमिका मार्जन करे। यही परिसमूहन-क्रिया है। 'मा नस्तोके ०' (यजु० १६।१६) इस मन्त्रके द्वारा गोमयसे भूमिका उपलेपन करे। तदनन्तर (खैरकी लकड़ीसे बने स्पयके द्वारा) रेखाकरण करे। पूरबसे पश्चिमकी ओर तीन रेखाएँ खींचे। पहली रेखा दक्षिणकी ओर अनन्तर उत्तरकी ओर बढ़े। इसके विपरीत करनेपर अमङ्गल होता है। इसके बाद अङ्गुष्ठ तथा अनामिकासे उन तीनों रेखाओंसे मिट्टी निकाले, इसे उद्घरण कहा जाता है। इस समय 'मित्रावरुणाभ्यां' (यजु० ७।२३) इत्यादि मन्त्रोंका स्मरण करे। अनन्तर कुशपुष्पोदक अथवा पञ्चगव्य या पञ्चरत्नोदक अथवा पञ्चपल्लवोंके जलसे अभ्युक्षण (अभिस्निग्धन) करे। अनन्तर

नमो देवादिदेवाय विष्णवे शाश्वताय च । अनन्तायाप्रमेयाय नमस्ते गरुडध्वज ॥

ब्रह्मस्त्वमिमं प्रोक्तं महादेवेन भाषितम् । प्रयत्नाद् यः पठेन्नित्यममृतत्वं स गच्छति ॥

ध्यायन्ति ये नित्यमनन्तामच्युतं हृत्पद्ममध्ये स्वयमाव्यवस्थितम् ।

उपासकानां प्रभुमेकमीश्वरं ते यन्ति सिद्धिं परमां तु वैष्णवीम् ॥ (मध्यमपर्व २।१२।१५६—१६३)

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

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कर्मसाधनभूत लौकिक स्मार्त अथवा श्रौताग्निका आनयन करे और अपने सामने स्थापित करे। इस क्रियामें 'मे गृह्णाभिः' इस मन्त्रका पाठ करे। 'ऋव्यादमग्निः' (यजुः ३५।१९) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लायी गयी अग्निमेंसे कुछ आग दक्षिण दिशाकी ओर फेंक दे, यह 'ऋव्यादाग्निः' कही गयी है। ऋव्यादाग्निका ग्रहण न करे। 'संसरक्षः' इस मन्त्रसे उस अग्निका आवाहन करे। तदनन्तर 'वैश्वानरः' (यजुः २६।७) इस मन्त्रसे कुण्ड आदिमें अग्नि-स्थापन करे। 'बध्नासिः' इस मन्त्रसे अग्निकी प्रदक्षिणा करे तथा अग्निदेवको नमस्कार करे। अग्निके दक्षिणमें वरण किये गये ब्रह्माको कुशके आसनपर 'ब्रह्मन् इह उपविश्यताम्' कहकर बैठाये। उस समय 'ब्रह्म जज्ञानं' (यजुः १३।३) तथा 'दोग्धी धेनुः' इन दो मन्त्रोंका पाठ करे। अग्निके उत्तरभागमें प्रणीता-पात्रको स्थापित करे। 'इमं मे वरुणः' (यजुः २१।१) इस मन्त्रसे प्रणीता-पात्रको जलसे भर दे। इसके अनन्तर कुण्डके चारों ओर कुश-परिस्तरण करे और काष्ठ (समिधा), व्रीहि, अन्न, तिल, अपूप, भुङ्गराज, फल, दही, दूध, पनस, नारिकेल, मोदक आदि यज्ञ-सम्बन्धी प्रयोज्य पदार्थोंको यथास्थान स्थापित करे। विकंकतवृक्षकी लकड़ीसे बनी खुवा तथा शमी, शमीपत्र, चरुस्थाली आदि भी स्थापित करे। प्रणीता-पात्रका स्पर्श होम-कालमें नहीं करना चाहिये। स्नान-कुम्भको यज्ञपर्यन्त स्थिर रखना चाहिये। प्रादेशमात्रके दो पवित्रक बनाकर प्रोक्षणी-पात्रमें स्थापित करे। प्रणीता-पात्रके जलसे प्रोक्षणी-पात्रमें तीन बार जल डाले। प्रोक्षणी-पात्रको बायें हाथमें रखकर मध्यमा तथा अङ्गुष्ठसे पवित्रक ग्रहण कर 'पवित्रं ते' (ऋ ९।८३।१) इस मन्त्रसे तीन बार जल छिड़के, स्थापित पदार्थोंका प्रोक्षण करे और

प्रोक्षणी-पात्रको प्रणीता-पात्रके दक्षिण-भागमें यथास्थान रख दे। प्रादेशमात्रके अन्तरमें आज्यस्थाली रखे। घीको अग्निमें तपाये, घीमेंसे अपद्रव्योंका निरसन करे। इसके बाद पर्यग्निकरण करे। एक जलते हुए आगके अंगारेको लेकर आज्यस्थाली और चरुस्थालीके ऊपर भ्रमण कराये। इस समय 'कुलायिनी' (यजुः १४।२) इस मन्त्रका पाठ करे। अनन्तर खुवाको दायें हाथमें ग्रहण कर अग्निपर तपाये। सम्मार्जन-कुशाओंसे खुवाको मूलसे अग्रभागकी ओर सम्माजित करे। इसके बाद प्रणीताके जलसे तीन बार प्रोक्षण करे। पुनः खुवाको आगपर तपाये और प्रोक्षणीके उत्तरकी ओर रख दे। आज्यपात्रको सामने रख ले। पवित्रीसे घीका तीन बार उत्प्लवन कर ले। पवित्रीसे ईशानसे आरम्भकर दक्षिणावर्त होते हुए ईशानपर्यन्त पर्युक्षण करे। अनन्तर अग्निदेवका इस प्रकार ध्यान करे—'अग्नि देवताका रक्त वर्ण है, उनके तीन मुख हैं, वे अपने बायें हाथमें कमण्डलु तथा दाहिने हाथमें खुवा ग्रहण किये हुए हैं।' ध्यानके अनन्तर खुवा लेकर हवन करे।

इस प्रकार स्वगृह्योक्त विधिके द्वारा ब्रह्मा तथा ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। कुशकण्डिका-कर्म करके अग्निका पूजन करे। आधार, आज्यभाग, महाव्याहृति, प्रायश्चित्त, प्राजापत्य तथा स्वष्टकृत् हवन करे। प्रजापति और इन्द्रके निमित्त दी गयी आहुतियाँ आधारसंज्ञक हैं। अग्नि और सोमके निमित्त दी जानेवाली आहुतियाँ आज्यभाग कहलाती हैं। 'भूर्भुवः स्वः'—ये तीन महाव्याहृतियाँ हैं। 'अयाश्रग्ने' इत्यादि पाँच मन्त्र प्रायश्चित्त-संज्ञक हैं। एक प्राजापत्य आहुति तथा एक स्वष्टकृत् आहुति—इस प्रकार होममें चौदह आहुतियाँ नित्य-संज्ञक हैं। इस प्रकार चतुर्दश आहुत्यात्मक हवन कर कर्म-निमित्तक देवताको उद्देश्यकर प्रधान

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