भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
ग्रहोंके लिये लक्ष एवं कोटि होमका विधान है। गृहस्थको आधिचारिक कर्म नहीं करना चाहिये।
कुण्डोंका शास्त्रानुसार संस्कार करना चाहिये। बिना संस्कार किये होम करनेपर अर्थ-हानि होती है। अतः संस्कार करके होमादि क्रियाएँ करनी चाहिये।
कुण्डोंके स्थानका ओंकारपूर्वक अवक्षण, कुशके जलसे प्रोक्षण, त्रिशूलीकरण तथा सूत्रसे आवेष्टित करना, कीलित करना, अग्निजिह्वाकी भावना करना एवं अग्न्याहरण आदि अठारह संस्कार होते हैं। शुद्धके घरसे अग्नि कभी न लाये। स्त्रीके द्वारा भी अग्नि नहीं मँगवानी चाहिये। शुद्ध एवं पवित्र व्यक्तिद्वारा अग्नि ग्रहण करना चाहिये। तदनन्तर अग्निंका संस्कार करे और उसे अपने अभिमुख रखे। अग्नि-बीज (रं) और शिव-बीज (शं)-से उसका प्रोक्षण करे और शिव-शक्तिका ध्यान करे, इससे अभीष्ट सिद्धिकी प्राप्ति होती है। उसके बाद वायुके सहारे अग्नि प्रज्वलित करे। देवी भगवतीका और भगवान्का अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय आदिसे पूजन करे। अग्नि-पूजनमें इस मन्त्रका उपयोग करे—
‘पितृपिङ्गल दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा।’
यज्ञदत्तमुनिने अग्निंकी तीन जिह्वाएँ बतलायी हैं—हिरण्या, कनका तथा कृष्णा*। समिधा-भेदसे जिन जिह्वा-भेदोंका वर्णन है, उनका उन्हींमें विनियोग करना चाहिये। बहुरूपा, अतिरूपा और सात्त्विका—इनका योग-कर्ममें विनियोग होता है। आज्यहोममें हिरण्या, त्रिमधु (दूध, चीनी और मधु—इन तीनोंके समाहार)-से हवन करनेपर कर्णिका, शुद्ध क्षीरसे
हवन करनेपर रक्ता, नैतिक कर्ममें प्रभा, पुष्पहोममें बहुरूपा, अन्न और पायससे हवन करनेमें कृष्णा, इक्षुहोममें पद्मरागा, पद्महोममें सुवर्णा और लोहिता, बिल्वपत्रसे हवन करनेपर श्वेता, तिल-होममें धूमिनी, काष्ठ होममें करालिका, पितृहोममें लोहितास्या, देवहोममें मनोजवा नामकी अग्निज्वाला कही गयी है। जिन-जिन समिधाओंसे हवन किया जाता है, उन-उन समिधाओंमें ‘वैश्वानर’ नामक अग्निदेव स्थित रहते हैं।
अग्निंके मुखमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक आहुति पड़नेपर अग्नि देवता सभी प्रकारका अश्व्युदय करते हैं। मुखके अतिरिक्त शेष स्थानोंपर आहुति देनेसे अनिष्ट फल होता है। अग्निंकी जिह्वाएँ विशेषरूपसे घृताहुतिमें हिरण्या एवं अन्यान्य आहुतियोंमें गणना, वक्रा, कृष्णाभा, सुप्रभा, बहुरूपा तथा अतिरूपिका नामसे प्रसिद्ध हैं। कुण्डके उदरमें अर्थात् मध्यमें आहुतियाँ देनी चाहिये। इधर-उधर नहीं देनी चाहिये। चन्दन, अगरू, कपूर, पाटला तथा यूथिका (जूही)-के समान अग्निसे प्रादुर्भूत गन्ध सभी प्रकारका कल्याणकारक होता है।
यदि अग्निंकी ज्वाला छिन्न-वृत्त-रूपमें उठती हो तो मृत्युभय होता है और धनका क्षय होता है। अग्नि बुझ जाने तथा अत्यधिक धुआँ होनेपर भी महान् अनिष्ट होता है। ऐसी स्थितियोंमें प्रायश्चित्त करना चाहिये। पहले अट्टाईस आहुतियाँ देकर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। अनन्तर घीसे मूल मन्त्रद्वारा पचीस आहुतियाँ देनी चाहिये। तीनों कालोंमें महास्नान करे तथा श्रद्धा-भक्ति-पूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करे। (अध्याय १३—१५)
- प्रकारान्तरसे विश्वमूर्ति, स्कूलिङ्गिनी, धूम्रवर्णा, मनोजवा, लोहितास्या, करालास्या तथा काली—ये भी सात प्रकारकी अग्निजिह्वाएँ कही गयी हैं।
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