भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२४९

अग्नि-पूजन-विधि

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! नित्य-नैमित्तिक यागादिकी समाप्तिमें हवन हो जानेपर भगवान् अग्निदेवकी षोडश उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। अग्निको वायुद्वारा प्रदीप्त कर पीठस्थ देवताओंकी पूजा कर हाथमें लाल फूल ले निम्न मन्त्र पढ़कर ध्यान करे—

इष्टं शक्तिस्वस्तिकाभीतिमुच्छेदीर्घेर्दोर्भिधारयन्तं वरान्तम्। हेमाकल्पं पद्मसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्बहिर्बद्धमौलिं जटाभिः ॥

(मध्यमपर्व १।१६।३)

‘भगवान् अग्निदेवता अपने हाथोंमें उत्तम इष्ट (यज्ञपात्र), शक्ति, स्वस्तिक और अभय-मुद्रा धारण किये हैं, देदीप्यमान सुवर्ण-सदृश उनका

स्वरूप है, कमलके ऊपर विराजमान हैं, तीन नेत्र हैं तथा वे जटाओं और मुकुटसे सुशोभित हैं।’

मण्डपके पूर्व आदि द्वारदेशोंमें कामदेव, इन्द्र, वराह तथा कार्तिकेयको आवाहित कर स्थापित करे। तदनन्तर आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा गन्धादि उपचारोंसे पूजन कर आठ मुद्राएँ प्रदर्शित करे। फिर सुवर्ण-वर्णवाले निर्मल, प्रज्वलित, सर्वतोमुख, महाजिह्वा तथा महोदर भगवान् अग्निदेवकी आकाशरूपमें पूजा करे। अग्निकी जिह्वाओंका भी ध्यान करे। इसके बाद भगवान् अग्निदेवका विविध उपचारोंसे पूजन करे*।

(अध्याय १६)

  • सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्रसे तीन पुष्पगुच्छोंद्वारा अग्निदेवको आसन प्रदान करे—

आसन-मन्त्र—त्वमादिः सर्वभूतानां संसारार्णवतारकः। परमज्योतीरूपस्त्वमासनं सफलीकुरु ॥

संसार-रूपी सागरसे उद्धार करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियोंमें आदि, परम ज्योतिः-स्वरूप हे अग्निदेव! आप इस आसनको ग्रहण कर मुझे सफल बनायें। अनन्तर करबद्ध प्रार्थना करे—

प्रार्थना-मन्त्र—वैश्वानर नमस्तेऽस्तु नमस्ते हव्यवाहन। स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ शान्तिं कुरु नमोऽस्तु ते ॥

हे हव्यवाहन वैश्वानरदेव! आप देवताओंमें श्रेष्ठ हैं, आपका स्वागत है, आपको नमस्कार है, आप शान्ति प्रदान करें।

पाद्य-मन्त्र—नमस्ते भगवन् देव आपो नारायणात्मक। सर्वलोकहितार्थाय पाद्यं च प्रतिगृह्णाताम् ॥

नर-नारायणस्वरूप हे भगवान् वैश्वानरदेव! आपको नमस्कार है। आप समस्त संसारके हितके लिये इस पाद्य-जलको ग्रहण करें।

अर्घ्य-मन्त्र—नारायण परं धाम ज्योतीरूप सनातन। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं विश्वरूप नमोऽस्तु ते ॥

हे विश्वरूप! आप ज्योतीरूप हैं, आप ही सनातन, परम धाम एवं नारायण हैं, आपको नमस्कार है, आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्घ्यको ग्रहण करें।

आचमनीय-मन्त्र—जगदादित्यरूपेण प्रकाशयति यः सदा। तस्मै प्रकाशरूपाय नमस्ते जातवेदसे ॥

जो आदित्यरूपसे सम्पूर्ण संसारको नित्य प्रकाशित करते रहते हैं, ऐसे उन जातवेदा तथा प्रकाशस्वरूप भगवान् वैश्वानरको नमस्कार है। हे अग्निदेव! इस आचमनीय जलको आप ग्रहण करें।

स्नानीय-मन्त्र—धनञ्जय नमस्तेऽस्तु सर्वपापप्रणाशन। स्नानीयं ते मया दत्तं सर्वकामार्थसिद्धये ॥

सभी पापोंका नाश करनेवाले हे धनञ्जयदेव! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये मेरे द्वारा दिये गये इस स्नानीय जलको आप ग्रहण करें।

अङ्गप्रोक्षण एवं वस्त्र-मन्त्र—हुताशन महाबाहो देवदेव सनातन। शरणं ते प्रगच्छामि देहि मे परमं पदम् ॥

हे देवदेव सनातन महाबाहु हुताशन! मैं आपकी शरण हूँ, मुझे आप परम पद प्रदान करें (मेरे द्वारा प्रदत्त इस अङ्गप्रोक्षण एवं वस्त्रको आप स्वीकार करें)।

अलंकार-मन्त्र—ज्योतिषां ज्योतीरूपस्त्वमनादिनिधनाच्युत। मया दत्तमलंकारमलंकुरु नमोऽस्तु ते ॥

अपने स्थानसे कभी च्युत न होनेवाले हे अग्निदेव! आपका न आदि है न अन्त। आप ज्योतियोंके परमज्योतीरूप हैं, आपको मेरा नमस्कार है। मेरे दिये गये इस अलंकारको आप अलंकृत करें।

गन्ध-मन्त्र—देवीदेवा मुदं यान्ति यस्य सम्यक्समागमात्। सर्वदोषोपशान्त्यर्थं गन्धोऽयं प्रतिगृह्णाताम् ॥

हे देव! आपके सम्यक् संनिधानसे सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं। सम्पूर्ण दोषोंकी शान्तिके लिये मेरे द्वारा दिये गये इस गन्धको आप ग्रहण करें।

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