भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 654 में से

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पृष्ठ 261

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

विविध कर्मोंमें अग्निके नाम तथा होम-द्रव्योंका वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं शास्त्रसम्मत-विधिके अनुसार किये गये विविध यज्ञोंमें अग्निके नामोंका वर्णन करता हूँ। शतार्ध-होममें, पाँच सौ संख्यातककी आहुतिवाले यज्ञोंमें अग्निको काश्यप कहा गया है। इसी प्रकार आज्य-होममें विष्णु, तिल-यागमें वनस्पति, सहस्त्र-यागमें ब्राह्मण, अयुत-यागमें हरि, लक्ष-होममें वहि, कोटि-होममें हुताशन, शान्तिक कर्मोंमें वरुण, मारण-कर्ममें अरुण, नित्य-होममें अनल, प्रायश्चित्तमें हुताशन तथा अन्न-यज्ञमें लोहित नाम कहा गया है। देवप्रतिष्ठामें लोहित, वास्तुयाग, मण्डप तथा पद्मक-यागमें प्रजापति, प्रणा-यागमें नाग, महादानमें हविर्भुक्, गोदानमें रुद्र, कन्यादानमें योजक तथा तुला-पुरुष-दानमें धातारूपसे अग्निदेव स्थित रहते हैं। इसी प्रकार वृष्टोत्सर्गमें अग्निका सूर्य, वैश्वदेवकर्ममें पावक, दीक्षाग्रहणमें जनार्दन, उत्पीडनमें काल, शवदाहमें कव्य, पर्णदाहमें यम, अस्थिदाहमें शिखण्डिक, गर्भाधानमें मरुत्, सीमन्तमें पिङ्गल, पुंसवनमें इन्द्र, नामकरणमें पार्थिव, निष्क्रमणमें हाटक, प्राशनमें शुचि, चूडाकरणमें षडानन, त्रतोपदेशमें समुद्रव, उपनयनमें वीतिहोत्र, समावर्तनमें

धनञ्जय, उदरमें जठर, समुद्रमें वडवानल, शिखामें विभु तथा स्वरादि शब्दोंमें सरीसृप नाम है। अश्वाग्निका मन्थर, रथाग्निका जातवेदस्, गजाग्निका मन्दर, सूर्याग्निका विन्ध्य, तोयाग्निका वरुण, ब्राह्मणाग्निका हविर्भुक्, पर्वताग्निका नाम ऋतुभुक् है। दावाग्निको सूर्य कहा जाता है। दीपाग्निका नाम पावक, गृह्याग्निका धरणीपति, घृताग्निका नल और सूतिकाग्निका नाम राक्षस है।

जिन द्रव्योंका होममें उपयोग किया जाता है, उनका निश्चित प्रमाण होता है। प्रमाणके बिना किया गया द्रव्योंका होम फलदायक नहीं होता। अतः शास्त्रके अनुसार प्रमाणका परिज्ञान कर लेना चाहिये। घी, दूध, पञ्चगव्य, दधि, मधु, लाजा, गुड, ईख, पत्र-पुष्प, सुपारी, समिध, व्रीहि, डंटलके साथ जपापुष्प और केसर, कमल, जीवन्ती, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), नारियल, कूष्माण्ड, ककड़ी, गुरुच, तिटुक, तीन पतोंवाली दूब आदि अनेक होम-द्रव्य कहे गये हैं। भूजपत्र, शमी तथा समिधा प्रादेशमात्रके होने चाहिये। बिल्वपत्र तीन पत्रयुक्त, किंतु छिन्न-भिन्न नहीं होना चाहिये।

पुष्प-मन्त्र —विष्णुस्त्वं हि ब्रह्मा च ज्योतिषां गतिरीश्वर। गृहाण पुष्पं देवेश सानुलेपं जगद् भवेत् ॥

हे देवेश! आप ही ब्रह्मा, विष्णु तथा ज्योतियोंकी गति हैं और आप ही ईश्वर हैं। आप इस पुष्पको ग्रहण करें, जिससे सारा संसार पुष्पगन्धसे सुवासित हो जाय।

धूप-मन्त्र —देवतानां पितृणां च सुखमेकं सनातनम्। धूपोऽयं देवदेवेश गृह्णातां मे धनञ्जयः ॥

हे देवदेवेश धनञ्जय! आप देवताओं और पितरोंके सुख प्राप्त करनेमें एकमात्र सनातन आधार हैं। आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस धूपको ग्रहण करें।

दीप-मन्त्र —त्वमेकः सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च। परमात्मा पराकारः प्रदीपः प्रतिगृह्णाताम् ॥

परमात्मन्! आप सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंमें व्याप्त हैं। आपकी आकृति परम उत्कृष्ट है। आप इस दीपकको ग्रहण करें।

नैवेद्य-मन्त्र —नमोऽस्तु यज्ञपतये प्रभवे जातवेदसे। सर्वलोकहितार्थाय नैवेद्यं प्रतिगृह्णाताम् ॥

हे यज्ञपति जातवेदा! आप शक्तिशाली हैं तथा समस्त संसारका कल्याण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। मेरे द्वारा प्रदत्त इस नैवेद्यको आप ग्रहण करें। परम अन्नस्वरूप मधु भी नैवेद्यके रूपमें निवेदित करे तथा यज्ञसूत्र भी अर्पित करे। अन्तमें समस्त कर्म भगवान् अग्निदेवको निवेदित कर दे—

हुताशन नमस्तुभ्यं नमस्ते रुक्मवाहन। लोकनाथ नमस्तेऽस्तु नमस्ते जातवेदसे ॥

हे हुताशनदेव! आपको नमस्कार है, रुक्मवाहन लोकनाथ! आपको नमस्कार है, हे जातवेदा! आपको नमस्कार है, नमस्कार है!

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