भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नहीं करनी चाहिये। इसमें देश-काल (और शैवागमों)-की मर्यादाके अनुसार आचरण करना चाहिये। उनके विपरीत आचरण करनेपर आयुका ह्रास होता है। द्विजगण! तालाब, पुष्करिणी तथा उद्यान आदिका जो परिमाण बताया गया हो,

यदि उससे कम पैमानेपर ये बनाये जायें तो दोष है, किंतु दस हाथके परिमाणमें हों तो कोई दोष नहीं है। यदि वे दो हजार हाथोंसे अधिक प्रमाणमें बनाये गये हों तो उनकी प्रतिष्ठा विधिपूर्वक अवश्य करनी चाहिये। (अध्याय १०-११)

देव-प्रतिमा-निर्माण-विधि

सूतजी बोले!—ब्राह्मणो! अब मैं प्रतिमाका शास्त्रसम्मत लक्षण कहता हूँ। उत्तम लक्षणोंसे रहित प्रतिमाका पूजन नहीं करना चाहिये। पाषाण, काष्ठ, मूर्त्तिका, रत्न, ताम्र एवं अन्य धातु—इनमेंसे किसीकी भी प्रतिमा बनायी जा सकती है*। उनके पूजनसे सभी अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं। मन्दिरके मापके अनुसार शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न प्रतिमा बनवानी चाहिये। घरमें आठ अङ्गुलसे अधिक ऊँची मूर्त्तिका पूजन नहीं करना चाहिये। देवालयके द्वारकी जो ऊँचाई हो उसे आठ भागोंमें विभक्त कर तीन भागके मापमें पिण्डिका तथा दो भागके मापमें देव-प्रतिमा बनाये। चौरासी अङ्गुल (साढ़े तीन हाथ)-की प्रतिमा वृद्धि करनेवाली होती है। प्रतिमाके मुखकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये। मुखके तीन भागके प्रमाणमें चिबुक, ललाट तथा नासिका होनी चाहिये। नासिकाके बराबर ही कान और ग्रीवा बनानी चाहिये। नेत्र दो अङ्गुल-प्रमाणके बनाने चाहिये। नेत्रके मानके तीसरे भागमें आँखकी तारिका बनानी चाहिये। तारिकाके तृतीय भागमें सुन्दर दृष्टि बनानी चाहिये। ललाट, मस्तक तथा ग्रीवा—ये तीनों बराबर मापके हों।

सिरका विस्तार बत्तीस अङ्गुल होना चाहिये। नासिका, मुख और ग्रीवासे हृदय एक सीधमें होना चाहिये। मूर्त्तिकी जितनी ऊँचाई हो उसके आधेमें कटि-प्रदेश बनाना चाहिये। दोनों बाहु, जंघा तथा ऊरु परस्पर समान हों। टखने चार अङ्गुल ऊँचे बनाने चाहिये। पैरके अँगूठे तीन अङ्गुलके हों और उसका विस्तार छः अङ्गुलका हो। अँगूठेके बराबर ही तर्जनी होनी चाहिये। शेष अङ्गुलियाँ क्रमशः छोटी हों तथा सभी अङ्गुलियाँ नखयुक्त बनाये। पैरकी लम्बाई चौदह अङ्गुलमें बनानी चाहिये। अधर, ओष्ठ, वक्षःस्थल, भ्रू, ललाट, गण्डस्थल तथा कपोल भरे-पूरे सुडौल सुन्दर तथा मांसल बनाने चाहिये, जिससे प्रतिमा देखनेमें सुन्दर मालूम हो। नेत्र विशाल, फैले हुए तथा लालिमा लिये हुए बनाने चाहिये।

इस प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न प्रतिमा शुभ और पूज्य मानी गयी है। प्रतिमाके मस्तकमें मुकुट, कण्ठमें हार, बाहुओंमें कटक और अंगद पहनाने चाहिये। मूर्त्ति सर्वाङ्ग-सुन्दर, आकर्षक तथा तत्त् अङ्गोंके आभूषणोंसे अलंकृत होनी चाहिये। भगवान्की प्रतिमामें देवकलाओंका आधान होनेपर भगवत्प्रतिमा प्रत्येकको अपनी ओर बरबस आकृष्ट कर लेती है

  • मत्स्यपुराणमें प्रतिमा-निर्माणके लिये निम्न वस्तुओंको ग्राह्य बतलाया है—

सौवर्ण राजती वापि ताप्त्री रत्नमयी तथा । शैलीदारुमयी चापि लौहसीसमयी तथा ॥

रीतिकाधातुयुक्ता वा ताम्रकांस्यमयीतथा । शुभदारुमयी वापि देवतार्चाप्रशस्त्यते ॥ (२५८ । २०-२१)

सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, रत्न, पत्थर, देवदारु, लोहा-सीसा, पीतल और काँसा-मिश्रित अथवा शुभ काष्ठोंकी बनी हुई देवप्रतिमा प्रशस्त मानी गयी है।

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