भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- मध्यमपर्व, प्रथम भाग *
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है। विधिपूर्वक वृक्षोंका रोपण करनेसे उसके पत्र, पुष्प तथा फलके रज-रेणुओं आदिका समागम उसके पितरोंको प्रतिदिन तृप्त करता है।
जो व्यक्ति छाया, फूल और फल देनेवाले वृक्षोंका रोपण करता है या मार्गमें तथा देवालयमें वृक्षोंको लगाता है, वह अपने पितरोंको बड़े-बड़े पापोंसे तारता है और रोपणकर्ता इस मनुष्य-लोकमें महती कीर्ति तथा शुभ परिणामको प्राप्त करता है और अतीत तथा अनागत पितरोंको स्वर्गमें जाकर भी तारता ही रहता है। अतः द्विजगण! वृक्ष लगाना अत्यन्त शुभदायक है। जिसको पुत्र नहीं है, उसके लिये वृक्ष ही पुत्र हैं, वृक्षारोपणकर्ताके लौकिक-पारलौकिक कर्म वृक्ष ही करते रहते हैं तथा स्वर्ग प्रदान करते हैं। यदि कोई अश्वत्थ-वृक्षका आरोपण करता है तो वही उसके लिये एक लाख पुत्रोंसे भी बढ़कर है। अतएव अपनी सद्गतिके लिये कम-से-कम एक या दो अथवा तीन अश्वत्थ-वृक्ष लगाना ही चाहिये। हजार, लाख, करोड़ जो भी मुक्तिके साधन हैं, उनमें एक अश्वत्थ-वृक्ष लगानेकी बराबरी नहीं कर सकते।
अशोक-वृक्ष लगानेसे कभी शोक नहीं होता, प्लक्ष (पाकड़)-वृक्ष उत्तम स्त्री प्रदान करवाता है। ज्ञानरूपी फल भी देता है। बिल्व-वृक्ष दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है। जामुनका वृक्ष धन देता है, तेंदूका वृक्ष कुलवृद्धि कराता है। दाडिम (अनार)-का वृक्ष स्त्री-सुख प्राप्त कराता है। बकुल पाप-नाशक, वंजुल (तिनिश) बल-बुद्धिप्रद है। धातकी (धव) स्वर्ग प्रदान करता है। वटवृक्ष मोक्षप्रद, आम्रवृक्ष अभीष्ट कामनाप्रद और गुवाक (सुपारी)-का वृक्ष सिद्धिप्रद है। बल्लव, मधुक (महुआ) तथा अर्जुन-वृक्ष सब प्रकारका अन्न प्रदान करता है। कदम्ब-वृक्षसे विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तितिंडी (इमली)-का वृक्ष धर्मदूषक माना गया है। शमी-
वृक्ष रोग-नाशक है। केसरसे शत्रुओंका विनाश होता है। श्वेत वट धनप्रदाता, पनस (कटहल)-वृक्ष मन्द बुद्धिकारक है। मर्कटी (कैंवाच) एवं कदम-वृक्षके लगानेसे संततिका क्षय होता है।
शीशम, अर्जुन, जयन्ती, करवीर, बेल तथा पलाश-वृक्षोंके आरोपणसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। विधिपूर्वक वृक्षका रोपण करनेसे स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और रोपणकर्ताके तीन जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। सौ वृक्षोंका रोपण करनेवाला ब्रह्मरूप और हजार वृक्षोंका रोपण करनेवाला विष्णुरूप बन जाता है। वृक्षके आरोपणमें वैशाख मास श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ अशुभ है। आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद ये भी श्रेष्ठ हैं। आश्विन, कार्तिकमें वृक्ष लगानेसे विनाश या क्षय होता है। श्वेत तुलसी प्रशस्त मानी गयी है। अश्वत्थ, वटवृक्ष और श्रीवृक्षका छेदन करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मघाती कहलाता है। वृक्षच्छेदी व्यक्ति मूक और सैकड़ों व्याधियोंसे युक्त होता है। तितिंडीके बीजोंको इक्षुदण्डसे पीसकर उसे जलमें मिलाकर सींचनेसे अशोककी तथा नारियलके जल एवं शहद-जलसे सींचनेसे आम्रवृक्षकी वृद्धि होती है। अश्वत्थ-वृक्षके मूलसे दस हाथ चारों ओरका क्षेत्र पवित्र पुरुषोत्तम क्षेत्र माना गया है और उसकी छाया जहाँतक पहुँचती है तथा अश्वत्थ-वृक्षके संसर्गसे बहनेवाला जल जहाँतक पहुँचता है, वह क्षेत्र गङ्गाके समान पवित्र माना गया है।
सूतजी पुनः बोले— विप्रश्रेष्ठ! तान्त्रिक पद्धतिके अनुसार सभी प्रतिष्ठादि कार्योंमें शुद्ध दिन ही लेना चाहिये। वृक्षोंके उद्यानमें कुओं अवश्य बनवाना चाहिये। तुलसी-वनमें कोई याग नहीं करना चाहिये। तालाब, बड़े बाग तथा देवस्थानके मध्य सेतु नहीं बनवाना चाहिये। परंतु देवस्थानमें तडाग बनवाना चाहिये। शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठामें अन्य देवोंकी स्थापना
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