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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

२२४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

श्वेत पद्मपर स्थित हैं। सभी लक्षणोंसे समन्वित हैं। सभी अलंकारोंसे विभूषित हैं। उनके एक मुख है, दो भुजाएँ हैं। रक्त वस्त्र धारण किये हुए वे ग्रहोंके मध्यमें स्थित हैं। जो व्यक्ति तीनों समय एकाग्रचित्त होकर उनके इस रूपका ध्यान करता है, वह शीघ्र ही इस लोकमें धन-धान्य प्राप्त कर लेता है और सभी पापोंसे छूटकर तेजस्वी तथा बलवान् हो जाता है। श्वेत वर्णके चन्द्रमा, रक्त वर्णके मंगल, रक्त तथा श्याम-मिश्रित वर्णके बुध, पीत वर्णके बृहस्पति, शङ्खु तथा दूधके समान श्वेत वर्णके शुक्र, अञ्जनके समान कृष्ण वर्णके शनि, लाजावर्तके समान नील वर्णके राहु और केतु कहे गये हैं। इन ग्रहोंके साथ ग्रहोंके अधिपति भगवान् सूर्यनारायणका जो व्यक्ति ध्यान एवं पूजन करता है, उसे शीघ्र ही महसिद्धि प्राप्त हो जाती है, सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं तथा महादेवत्वकी प्राप्ति हो जाती है।

सूर्यनारायणके समान कोई देवता नहीं और न ही उनके समान कोई गति देनेवाला है। सूर्यके समान न तो ब्रह्मा हैं और न अग्नि। सूर्यके धर्मके समान न कोई धर्म है और न उनके समान कोई धन। सूर्यके अतिरिक्त कोई बन्धु नहीं है और न तो कोई शुभचिन्तक ही है। सूर्यके समान कोई माता नहीं और न तो कोई गुरु ही है। सूर्यके समान न तो कोई तीर्थ है और न उनके समान कोई पवित्र ही है। समस्त लोकों, देवताओं तथा पितरोंमें एक भगवान् सूर्य ही व्याप्त हैं, उनका ही स्तवन, अर्चन तथा पूजन करनेसे परम गतिकी प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक

सूर्यनारायणकी आराधना करता है, वह इस भवसागरको पार कर जाता है। भगवान् सूर्यके प्रसन्न हो जानेपर राजा, चोर, ग्रह, सर्प आदि पीड़ा नहीं देते तथा दरिद्रता और सभी दुःखोंसे भी निवृत्ति हो जाती है।

रविवारके दिन श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा कर नक्तव्रत करनेवाला व्यक्ति अमरत्वको प्राप्त करता है। भगवान् मार्तण्डकी प्रीतिके लिये जो संक्रान्तिमें विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। जो व्यक्ति भास्करकी प्रीतिके लिये उपवास रखकर षष्ठी या सप्तमीके दिन विधिवत् श्राद्ध करता है, वह सभी दोषोंसे निवृत्त होकर सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति सप्तमीके दिन विशेषकर रविवार अथवा ग्रहणके दिन भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा करता है, उसकी सभी मनःकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। ग्रहणके दिन भगवान् भास्करका पूजन करना उन्हें अतिप्रिय है। भगवान् आदित्य परमदेव हैं और सभी देवताओंमें पूज्य हैं। उनकी पूजा कर व्यक्ति इच्छित फलको प्राप्त कर लेता है। धन चाहनेवालेको धन, पुत्र चाहनेवालेको पुत्र तथा मोक्षार्थीको मोक्ष प्राप्त हो जाता है और वह अमर हो जाता है।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! भीष्मसे ऐसा कहकर वेदव्यासजी अपने स्थानको चले गये और भीष्मने भी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यनारायणकी विधि-विधानसे पूजा की। राजन्! आप भी भगवान् भास्करकी पूजा करें, इससे आपको शाश्वत स्थान प्राप्त होगा। (अध्याय २०३—२०७)

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  • ब्राह्मपर्व *

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सप्त-सप्तमी तथा द्वादश मास-सप्तमी-व्रतोंका वर्णन

शतानीकने कहा—मुने! भगवान् भास्करको अति प्रिय जिन अर्कसम्पुटिका आदि सात सप्तमी-व्रतोंकी आपने पूर्वमें चर्चा की है, उन्हें बतलानेकी कृपा करें।

सुमन्तुजी बोले—महामते! मैं सात सप्तमियोंका वर्णन कर रहा हूँ, उन्हें सुनिये। पहली सप्तमी अर्कसम्पुटिका नामकी है। दूसरी मरिच-सप्तमी, तीसरी निम्ब-सप्तमी, चौथी फल-सप्तमी, पाँचवीं अनोदना-सप्तमी, छठी विजय-सप्तमी तथा सातवीं कामिका नामकी सप्तमी है। इनकी संक्षिप्त विधि इस प्रकार है—

उत्तरायण या दक्षिणायनमें, शुक्ल पक्षमें, रविवारके दिन ग्रहणमें, पुँल्लिङ्गवाची नक्षत्रमें—इन सप्तमी-व्रतोंको ग्रहण करना चाहिये। व्रतीको जितेन्द्रिय, पवित्रता-सम्पन्न और ब्रह्मचारी होकर सूर्यकी अर्चनामें रत रहना चाहिये तथा जप-होमादिमें तत्पर रहना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि पञ्चमीके दिन एकभुक्त रहकर षष्ठीके दिन जितेन्द्रिय रहे एवं निन्द्य पदार्थोंका भक्षण न करे। अर्क-सेवनसे पहली सप्तमी, मरिचसे दूसरी सप्तमी तथा निम्बपत्रसे तीसरी सप्तमी व्यतीत करे। फलसप्तमीमें फलोंका भक्षण करना चाहिये। अनोदना-सप्तमीके दिन अन्न-भक्षण न करके उपवास करे। विजय-सप्तमीके दिन वायु भक्षण कर उपवास करे। कामिका-सप्तमीको भी हविष्य भोजनकर यथाविधि सम्पन्न करना चाहिये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन सप्तमी-व्रतोंको करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है।

अर्कसम्पुटिका-व्रतसे सात पीढ़ीतक अचल सम्पत्ति बनी रहती है। मरिच-सप्तमीके अनुष्ठानसे प्रिय पुत्रादिका साथ बना रहता है। निम्बसप्तमीके पालनसे सभी रोग नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है और फल-सप्तमी-व्रतके करनेसे

व्रती अनेक पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हो जाता है। अनोदना-सप्तमीके व्रतसे धन-धान्य, पशु, सुवर्ण, आरोग्य तथा सुख सदा सुलभ रहते हैं। विजय-सप्तमीका व्रत करनेसे शत्रुगण नष्ट हो जाते हैं। कामिका-सप्तमीका विधिवत् अनुष्ठान करनेसे पुत्रकी कामना करनेवाला पुत्र, अर्थकी कामना करनेवाला अर्थ, विद्या-प्राप्तिकी कामना करनेवाला विद्या और राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है। पुरुष हो या स्त्री इस व्रतको विधिपूर्वक सम्पन्न कर परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं। उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। उनके कुलमें न कोई अंधा होता है, न कुष्ठी, न नपुंसक और न कोई विकलाङ्ग तथा न निर्धन। लोभवश, प्रमादवश या अज्ञानवश यदि व्रत-भङ्ग हो जाय तो तीन दिनतक भोजन न करे और मुण्डन कराकर प्रायश्चित्त करे। पुनः व्रतके नियमोंको ग्रहण करे।

सुमन्तुजीने कहा—रजन्! चैत्रादि बारह मासोंकी शुक्ल सप्तमियोंमें गोमय, यावक, सूखे पत्ते, दूध अथवा भिक्षान्न भक्षण कर या एकभुक्त रहकर उपवास करना चाहिये। भगवान् सूर्यकी पूजा कमल-पुष्प, नाना प्रकारके गन्ध, चन्दन, गुगुल धूप आदि विविध उपचारोंसे करनी चाहिये तथा इन्हीं उपचारोंसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी भी पूजा कर उन्हें दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। इससे व्रतीको अपार दक्षिणावाले यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह सूर्यलोकमें पूजित होता है। चैत्रादि बारह महीनोंमें पूजित होनेवाले भगवान् सूर्यके बारह नाम इस प्रकार हैं—चैत्रमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में दिवाकर, श्रावणमें पर्जन्य, भाद्रपदमें वरुण, आश्विनमें मार्तण्ड, कार्तिकमें भार्गव, मार्गशीर्षमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमें भग तथा फाल्गुनमें त्वष्टा।

(अध्याय २०८-२०९)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अर्कसम्पुटिका-ससमीव्रत-विधि, ससमी-व्रत-माहात्म्यमें कौथुमिका आख्यान

सुमन्तुजी बोले—राजन्! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको अर्कससमी कहते हैं। इसमें षष्ठीको उपवास रहकर स्नान करके गन्ध, पुष्प, गुग्गुल, अर्क-पुष्प, श्वेत करवीर एवं चन्दनादिसे भगवान् दिवाकरकी पूजा करनी चाहिये। रविकी प्रसन्नताके लिये नैवेद्यमें गुडोदक समर्पित करे। इस प्रकार दिनमें भानुकी पूजा करके रातमें निद्रारहित होकर उनके मन्त्रका जप करे।

शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यका प्रिय मन्त्र कौन-सा है? उसे बतायें और धूप-दीपका भी निर्देश करें; जिससे उस मन्त्रका जप करता हुआ मैं दिवाकरकी पूजा कर सकूँ।

सुमन्तुजीने कहा—हे भरतश्रेष्ठ! मैं इस विधिको संक्षेपसे कह रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि एकाग्रचित्त होकर षडक्षर-मन्त्रका जप, होम तथा पूजा आदि सभी कर्म सम्पादित करे। सर्वप्रथम यथाशक्ति गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। सौरी गायत्री-मन्त्र इस प्रकार हैं—‘ॐ भास्कराय विचक्षे सहस्वरश्मि धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥’ इसे भगवान् सूर्यने स्वयं कहा है। यह सौरी गायत्री-मन्त्र परम श्रेष्ठ है। इसका श्रद्धापूर्वक एक बार जप करनेसे ही मानव पवित्र हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। ससमीके दिन प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो इस मन्त्रका जप करे और भक्तिपूर्वक भास्करकी पूजा करे। राजन्! यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराये। धनकी कंजूसी न करे। जो सूर्यके प्रति श्रद्धा-सम्पन्न नहीं हैं, उन्हें भोजन नहीं कराना चाहिये। शाल्योदन, मूँग, अपूप, गुड़से बने पुरे, दूध तथा दहीका भोजन कराना चाहिये। इससे भास्कर तृप्त होते हैं। भोजनके वज्य पदार्थ इस प्रकार हैं—कुलथी, मसूर, सेम तथा बड़ी। उड़द आदि, कड़वा तथा दुर्गन्धयुक्त

पदार्थ भी निवेदित नहीं करने चाहिये।

अर्कवृक्षकी ‘ॐ खरखोल्लाक्य नमः’ से पूजा कर अर्क-पल्लवोंको ग्रहण करे। फिर स्नानकर अर्क-पुष्पसे रविकी पूजा करके ब्राह्मणको भोजन कराये और ‘अकों मे प्रीयताम्’ सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों, ऐसा कहे। तदनन्तर देवताके सम्मुख दाँत और ओठसे स्पर्श किये बिना निमल्लिखित मन्त्रसे अर्कसम्पुटकी प्रार्थना करते हुए जलके साथ पूर्वाभिमुख होकर अर्कपुट निगल जाय।

ॐ अर्कसम्पुट भद्रं ते सुभद्रं मेऽस्तु वै सदा।

ममापि कुरु भद्रं वै प्राशनाद् वित्तदो भव॥

(ब्राह्मपर्व २१०।७३)

इस मन्त्रका जप करते हुए जो अर्कका ध्यान करता है तथा अर्कसम्पुटका प्राशन करता है, वह श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है।

दाँतसे स्पर्श न किये जानेके कारण अर्कपुट अर्कसम्पुट कहलाता है। जो इस विधिसे वर्षभर सूर्यनारायणकी प्रसन्नताके लिये श्रद्धापूर्वक ससमी-व्रत करता है, उस मनुष्यका धन सात पीढ़ीतक अक्षय तथा अचल हो जाता है। हे राजन्! इस व्रतके अनुष्ठानसे सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमि कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये तथा सिद्धि प्राप्त की। साथ ही बृहदवल्लक, राजा जनक, महर्षि याज्ञवल्क्य तथा कृष्णपुत्र साम्ब—इन सबने भी भगवान् सूर्यकी पूजा करके और इस व्रतके अनुष्ठानसे उनकी साम्यता प्राप्त कर ली। यह अर्क-ससमी पवित्र, पापनाशिनी, पुण्यप्रद तथा धन्य है। अपने कल्याणके लिये इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये।

शतानीकने पूछा—मुने! जनक आदिने भगवान् सूर्यकी पूजा करके जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की, उसे तो मैंने बहुधा सुना है, किंतु महर्षि कौथुमिने किस प्रकार अर्ककी आराधना कर सिद्धि प्राप्त

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  • ब्राह्मपर्व *

२२७

की और वे कैसे कुछ-रोगसे मुक्त हुए, इसका मुझे ज्ञान नहीं है। वे कौथुमि कौन थे, उन्हें कैसे कुछ हुआ? हे द्विजश्रेष्ठ! किस प्रकार उन्होंने देवाधिदेव दिवाकरकी आराधना की? इन सभी बातोंको मुझे संक्षेपमें सुनायें।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! आपने बहुत अच्छी जिज्ञासा की है। इस विषयको आप श्रवण करें। प्राचीन कालमें हिरण्यनाभ नामके एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे अपने पुत्रके साथ महाराजा जनकके आश्रमपर गये। वहाँ अनेक ब्राह्मणोंके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। क्रोधवश कौथुमिसे एक ब्राह्मणका वध हो गया। पुत्रके द्वारा विप्रको मारा गया देखकर पिताने कौथुमिका परित्याग कर दिया। सज्जनों तथा कुटुम्बियोंने भी उनका बहिष्कार कर दिया। शोक और दुःखसे दुःखी होकर वे दिव्य देवालयोंमें गये और उन्होंने अनेक तीर्थोंकी यात्राएँ कीं, किंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिल सकी। ब्रह्महत्याके कारण उन्हें भयंकर कुछ नामक व्याधिने ग्रस्त कर लिया। नाक, कान आदि अङ्ग गलकर गिर गये। शरीरसे पीब और रक्त बहने लगा। समस्त पृथ्वीपर घूमते हुए वे पुनः अपने पिताके घर आये। दुःखसे व्याकुलचित्त हो उन्होंने अपने पितासे कहा—'तात! मैं पवित्र तीर्थों और अनेक देवालयोंमें गया, किंतु इस क्रूर ब्रह्महत्यासे मुक्त नहीं हो सका। प्रायश्चित्त करनेपर भी मुझे इससे छुटकारा नहीं मिला है। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कैसे मैं रोगसे मुक्ति पाऊँ? हे अनघ! अल्प परिश्रम-साध्य जिस कर्मके करनेसे इस ब्रह्महत्यारूपी व्याधिसे मुझे छुटकारा मिले, उस उपायको आप शीघ्र बतायें और मेरा कल्याण करें।'

हिरण्यनाभने कहा—पुत्र! पृथ्वीमें घूमते हुए तुमने जो क्लेश प्राप्त किया है, उसे मैं भलीभाँति जानता हूँ। तुम अनेक तीर्थोंमें गये और प्रायश्चित्त भी किये, परंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिली, अब मैं एक उपाय बताता हूँ, उस उपायसे तुम अनायास ही ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाओगे।

कौथुमिने कहा—विभो! मैं ब्रह्मादि देवोंमें किसकी आराधना करूँ? मैं तो शरीरसे भी विकल हूँ, अतः सभी कर्मोंका यथावत् सम्पादन मुझसे सम्भव नहीं है, फिर किस प्रकार मैं देवताको संतुष्ट कर सकूँगा।

हिरण्यनाभने कहा—ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, वरुण आदि देवताओंने भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा की है और इसी कारण वे स्वर्गलोकमें आनन्दित हो रहे हैं। हे पुत्र! मैं भगवान् सूर्यके समान किसी भी देवताको नहीं जानता हूँ। वे सभी कामनाओंको देनेवाले और माता-पिता तथा सभीके मान्य हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिये तुम उनके मन्त्रका जप करते हुए तथा सामवेदके मन्त्रोंका गान करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करो और उनसे सम्बन्धित इतिहास-पुराण आदिका श्रवण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही रोगसे मुक्ति मिलेगी और तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमिने श्रद्धा-समन्वित हो अपने पिताद्वारा निर्दिष्ट सूर्योपासनाकी विधिसे भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् भास्करकी कृपासे महर्षि कौथुमि दिव्य मूर्तिमान् हो गये और उन्होंने भगवान् भास्करके दिव्य मण्डलमें प्रवेश किया*। (अध्याय २१०-२११)

  • महर्षि कौथुमि एक वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। सामवेद-संहिताकी कौथुमी शाखा अत्यन्त प्रसिद्ध है और इस समय वही प्राप्त है। उसके द्रष्टा ऋषि यही हैं। ये प्राच्य सामग भी कहलाते हैं। शौनकीय चरणव्यूह-ग्रन्थमें सामवेदकी प्रायः एक हजार शाखाओंकी विस्तृत चर्चा है।

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२२८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मरिच-ससमी-व्रत-वर्णन

सुमन्तुजीने कहा—हे वीर! मैंने तुमको अर्कसम्पुटिका-व्रतकी संक्षिप्त विधि बतलायी। अब मरिच-ससमीका वर्णन कर रहा हूँ, इसमें मरिचका भक्षण किया जाता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिको उपवास रहकर सौर-धर्मकी विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये। 'ॐ वं फट्' यह महाबलशाली मन्त्र साक्षात् सूर्यस्वरूप ही है। इसका बारम्बार स्मरण एवं जप करनेसे मानव एक वर्षमें ही देवेश भगवान् भास्करका दर्शन प्राप्त कर लेता है और अन्तमें व्याधि तथा मृत्युसे मुक्त हो सूर्यलोकको प्राप्त करता है। व्रती आत्मशुद्ध्यर्थ मरिच-ससमीके दिन सौर-मन्त्रों एवं मुद्राओंसे हृदयादि अङ्गन्यास कर प्राणायाम आदि करे। भगवान्को अर्घ्य प्रदान करे। विविध पुष्पोंको अर्पित करे। स्नान कराये, नैवेद्य अर्पित करे। संयत होकर सूर्यमन्त्रोंका जप करे। व्योममुद्रा दिखाकर प्रदक्षिणा करे, हवन करे और हृदयमुद्रासे भगवानका विसर्जन करे। भगवान्के पूजन आदि कर्मोंमें तत्तद मुद्राओंको दिखाये। मुद्राओंके नाम इस प्रकार हैं—किंकिणी, व्योम, अस्त्र, पञ्चिनी, अर्किणी, ज्वालिनी, तेजनी, गभस्तिनी, शंखिनी, सूर्यवक्त्रा, सहस्रकिरण, उदया, मध्यमा, अस्तमनी, मालिनी, तर्जनी तथा कुम्भमुद्रा। इन मुद्राओंके

साथ जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उससे वे प्रसन्न हो जाते हैं। इस विधिसे ब्रह्मणे भगवान् सूर्यकी पूजा की थी। राजन्! तुम भी इस विधिसे भास्करकी पूजा करो। इस विधिसे जो सदा रविकी पूजा करता है, वह भगवान् सूर्यदेवके दिव्य धामको प्राप्त कर लेता है। नृप! इस विधिसे देवेशकी पूजा कर यथाशक्ति ब्राह्मणको विधिपूर्वक भोजन कराकर ससमीके दिन मन्त्रपूर्वक सूर्यका स्मरण करते हुए मौन होकर भोजन करे और भोजनसे पहले मरिचकी इस प्रकार प्रार्थना करे— ॐ खखोल्लेकाय स्वाहा। प्रीयतां प्रियसङ्गद्वो भव स्वाहा॥

ऐसा करनेसे व्रतीको प्रिय व्यक्तिका समागम उसी क्षण प्राप्त हो जाता है। यह मरिच-ससमी प्रियसंगमदायिनी और पुण्यको प्रदान करनेवाली तथा कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली है। एक वर्षतक इस ससमी-व्रतका पालन करनेसे पुत्रादिकोंसे वियोग नहीं होता। इसलिये महाबाहो! इस प्रियदायिनी ससमीको तुम भी करो। देवराज इन्द्रने इस मरिच-सप्तमीको उपवास कर महाराज्ञी शचीका सङ्ग प्राप्त किया था। महाबलशाली राजा नलने भी इस ससमीको उपवास कर दमयन्तीको प्राप्त किया था और श्रीरामने भी इस ससमीके दिन उपवास कर भगवती सीताको प्राप्त किया था।

(अध्याय २१२—२१४)

निम्ब-ससमी तथा फलससमी-व्रतका वर्णन

सुमन्तुजीने कहा—हे वीर! अब मैं तृतीय निम्ब-ससमी (वैशाख शुक्ला ससमी)-की विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें। इसमें निम्ब-पत्रका सेवन किया जाता है। यह ससमी सभी तरहके व्याधियोंको हरनेवाली है। इस दिन हाथमें शार्ङ्गधनुष, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये हुए

भगवान् सूर्यका ध्यान कर उनकी पूजा करनी चाहिये। भगवान् सूर्यका मूल मन्त्र है—'ॐ खखोल्लेकाय नमः'। 'ॐ आदित्याय विद्महे विश्वभागाय धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥' यह सूर्यका गायत्री-मन्त्र है।

पूजामें सर्वप्रथम समाहित-चित्त होकर प्रयत्नपूर्वक

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  • ब्राह्मपर्व *

२२९

मन्त्रपूत जलसे पूजाके उपचारोंका प्रोक्षण करे। अपनेमें भगवान् सूर्यकी भावना करके उनका ध्यान करते हुए मन्त्रवित् हृदय आदि अङ्गोंमें मन्त्रका विन्यास करे। सम्प्राजनी मुद्रासे दिशाओंका प्रतिबोधन करे। भूशोधन करना चाहिये। पूजाकी यह विधि सभीके लिये अभीष्ट फल देनेवाली है।

पवित्र स्थानमें कर्णिकायुक्त एक अष्टदल-कमल बनाये, उसमें आवाहिनी मुद्राके द्वारा भगवान् सूर्यका आवाहन करे। वहाँपर मनोहर-स्वरूप खरबोलक भगवान् सूर्यको स्नान कराये। मन्त्रमूर्ति भगवान् सूर्यकी स्थापना और स्नान आदि कर्म मन्त्रोंद्वारा करने चाहिये। आग्नेय दिशामें भगवान् सूर्यके हृदयकी, ईशानकोणमें सिरकी, नैऋत्यकोणमें शिखाकी एवं पूर्वदिशामें दोनों नेत्रोंकी भावना करे। इसके अनन्तर ईशानकोणमें सोम, पूर्व दिशामें मंगल, आग्नेयमें बुध, दक्षिणमें बृहस्पति, नैऋत्य दिशामें शुक्ल, पश्चिममें शनि, वायव्यमें केतु और उत्तरमें राहुकी स्थापना करे। कमलकी द्वितीय कक्षामें भगवान् सूर्यके तेजसे उत्पन्न द्वादश आदित्यों—भग, सूर्य, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, चन्द्र तथा विष्णुको स्थापित करे। पूर्वमें इन्द्र, दक्षिणमें यम, पश्चिममें वरुण, उत्तरमें कुबेर, ईशानमें ईश्वर, अग्निकोणमें अग्निदेवता, नैऋत्यमें पितृदेव, वायव्यमें वायु तथा जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, शेष, वासुकि, रेवती, विनायक, महाश्वेता, राज्ञी, सुवर्चला आदि तथा अन्य देवताओंके समूहको यथास्थान स्थापित करना चाहिये। सिद्धि, वृद्धि, स्मृति, उत्पलमालिनी तथा श्री इनको अपने दक्षिण पार्श्वमें स्थापित करना चाहिये। प्रज्ञावती, विभा, हारीता, बुद्धि, ऋद्धि, विसृष्टि, पौर्णमासी तथा विभावरी आदि देव-

शक्तियोंको अपने उत्तर भगवान् सूर्यके समीप स्थापित करना चाहिये।

इस प्रकार भगवान् सूर्य तथा उनके परिकरों एवं देव-शक्तियोंकी स्थापना करनेके अनन्तर मन्त्रपूर्वक धूप, दीप, नैवेद्य, अलंकार, वस्त्र, पुष्प आदि उपचारोंको भगवान् सूर्य तथा उनके अनुगामी देवोंको प्रदान करे। इस विधिसे जो भास्करकी सदा अर्चना करता है, वह सभी कामनाओंको पूर्ण कर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। निम्नलिखित मन्त्रद्वारा निम्बकी प्रार्थना कर उसे भगवान्को निवेदित करके प्राशन करे—

त्वं निम्ब कटुकात्मासि आदित्यनिलयस्तथा।

सर्वरोगहरः शान्तो भव मे प्राशनं सदा॥

‘हे निम्ब! तुम भगवान् सूर्यके आश्रयस्थान हो। तुम कटु स्वभाववाले हो, तुम्हारे भक्षण करनेसे मेरे सभी रोग सदाके लिये नष्ट हो जायें और तुम मेरे लिये शान्तस्वरूप हो जाओ।’

इस मन्त्रसे निम्बका प्राशन कर भगवान् सूर्यके समक्ष पृथ्वीपर बैठकर सूर्यमन्त्रका जप करे। इसके बाद यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे। अनन्तर संयत-वाक् हो लवणवर्जित मधुर भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक इस निम्ब-ससमीका व्रत करनेवाला व्यक्ति सभी रोगोंसे मुक्त हो सूर्यलोकको जाता है।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी ससमी तिथिको उपवास कर भगवान् सूर्यकी सौर-विधानसे पूजा करनी चाहिये। पुनः अष्टमीको स्नानकर दिवाकरकी पूजा कर ब्राह्मणोंको खजूर नारियल, मातुलुङ्ग (बिजौरा) तथा आम्रके फलोंको भगवान्के सम्मुख रखना चाहिये और ‘मार्तण्डः प्रीयताम्’ ऐसा कहकर इन्हें ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। यह फल-ससमी कहलाती है। ‘सर्वे भवन्तु

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२३०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सफलता मम कामाः समन्ततः ।' ऐसा कहकर स्वयं भी उन्हीं फलोंका भक्षण करे। इस फल-ससमीका एक वर्षतक श्रद्धा-भक्तिपूर्वक व्रत करनेसे पुत्र-पौत्रोंकी प्राप्ति होती है१। (अध्याय २१५)

ब्राह्मपर्व-श्रवणका माहात्म्य, पुराण-श्रवणकी विधि, पुराणों तथा पुराणवाचक व्यासकी महिमा

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! भविष्यपुराणके इस प्रथम ब्राह्मपर्वके सुननेसे मानव सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सहस्रों अश्वमेध, वाजपेय एवं राजसूय-यज्ञों, सभी तीर्थ-यात्राओं, वेदाभ्यास तथा पृथ्वीदान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। इतिहास-पुराणके श्रवणके अतिरिक्त ऐसा कोई साधन नहीं है, जो सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर सके। पुराण-श्रवणका जो फल बतलाया गया है, वही फल पुराणके पाठसे भी होता है, इसमें कोई संदेह नहीं२।

शतानीकने पूछा—भगवन्! महाभारत, रामायण एवं पुराणोंका श्रवण तथा पठन किस विधानसे करना चाहिये? पुराण-वाचकके क्या लक्षण हैं? भगवान् खखोल्लकका क्या स्वरूप है? वाचककी विधिवत् पूजा करनेसे क्या फल होता है? पर्वकी समाप्तिपर वाचकोंको क्या देना चाहिये? इसे आप बतानेकी कृपा करें।

सुमन्तुजी बोले—राजन्! आपने इतिहास-पुराणके सम्बन्धमें अच्छी जिज्ञासा की है। महाबाहो! इस सम्बन्धमें पूर्वकालमें देवगुरु बृहस्पति तथा ब्रह्माजीके

मध्य जो संवाद हुआ था, उसे आप श्रवण करें।

मानव विशेष भक्तिपूर्वक इतिहास और पुराणका श्रवण कर ब्रह्महत्यादि सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पवित्र होकर प्रातः, सायं तथा रात्रिमें जो पुराणका श्रवण करता है, उस व्यक्तिसे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश संतुष्ट हो जाते हैं। प्रातःकाल भगवान् ब्रह्मा, सायंकाल विष्णु और रात्रिमें महादेव प्रसन्न होते हैं३। राजन्! अब वाचकके विधानको सुनिये। पवित्र वस्त्र पहनकर शुद्ध होकर प्रदक्षिणापूर्वक जब वाचक आसनपर बैठता है तो वह देवस्वरूप हो जाता है। आसन न बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा। वाचकके आसनकी सदा वन्दना की जानी चाहिये। वाचकके आसनको व्यासपीठ कहा जाता है। पीठको गुरुका आसन समझना चाहिये। वाचकके आसनपर सुननेवालेको कभी भी नहीं बैठना चाहिये। देवताओंकी अर्चना करके विशेषरूपसे ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। सभी समागत व्यक्तियोंको साथमें लेकर पुराण-ग्रन्थ वाचकके लिये प्रदान

१-यहाँ भविष्यपुराणका पाठ कुछ त्रुटि प्रतीत होता है। सात सप्तमी-व्रतोंमेंसे अवशिष्ट अनोदना, विजय तथा कामिका-सप्तमी-व्रत छूट गये हैं। चतुर्वर्ग-चिन्तामणि (हेमाद्रि)-के व्रतखण्डमें भविष्यपुराणके नामसे इन व्रतोंका विस्तारसे वर्णन आता है। वैशाख शुक्ला सप्तमी अनोदना-सप्तमी, माघ शुक्ला सप्तमी विजया-सप्तमी तथा फाल्गुन शुक्ला सप्तमी कामिका-सप्तमी कही गयी है। विजया-सप्तमीमें सूर्यसहस्रनाम स्तोत्र भी पढ़ा गया है। इससे लगता है कि हेमाद्रिके पास भविष्यपुराणकी प्रामाणिक एवं पूर्ण शुद्ध प्रति सुरक्षित थी। पुराणोंकी उपेक्षासे ही इस समयकी प्रतिमें वह अंश खण्डित हो गया है।

२-इतिहासपुराणाभ्यां न त्वन्यत् पावनंनुणाम्। येषां श्रवणमात्रेण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥

विधिना राजशादृलं शृण्वतां यत्फलं किल। यथोक्तं नात्र संदेहः पठतां च विशाम्यते ॥ (ब्राह्मपर्व २१६।३४-३५)

३-इतिहासपुराणानि श्रुत्वा भक्त्या विशेषतः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्महत्यादिभिर्विभो ॥

सायं प्रातस्तथा रात्रौ शुचिर्भूत्वा शृणोति यः। तस्य विष्णुस्तथा ब्रह्मा तुष्यते शंकरस्तथा ॥

प्रत्युषे भगवान् ब्रह्मा दिनान्ते तुष्यतेहरिः। महादेवस्तथा रात्रौ शृण्वतां तुष्यते विभुः ॥

(ब्राह्मपर्व २१६।४३-४५)

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  • ब्राह्मपर्व *

२३९

करे। उस ग्रन्थको नतमस्तक हो प्रणाम करे। तब शान्तचित्त होकर श्रवण करे।

ग्रन्थका सूत्र (धागा) वासुकि कहा गया है। ग्रन्थका पत्र भगवान् ब्रह्मा, उसके अक्षर जनार्दन, सूत्र शंकर तथा पंक्तियाँ सभी देवता हैं। सूत्रके मध्यमें अग्नि और सूर्य स्थित रहते हैं। इनके आगे सभी ग्रह तथा दिशाएँ अवस्थित रहती हैं। शंकुको मेरु कहा गया है। रित्कस्थानको आकाश कहा गया है। ग्रन्थके ऊपर तथा नीचे रहनेवाले दो काष्ठफलक छावा-पृथिवीरूपमें सूर्य और चन्द्रमा हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ देवमय है और देवताओंद्वारा पूजित है। इसलिये अपने कल्याणकी कामनासे इतिहास-पुराणादि श्रेष्ठ ग्रन्थोंको अपने घरमें रखना चाहिये, उन्हें नमस्कार करना चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये*।

राजन्! वाचक ग्रन्थको हाथमें ग्रहण कर ब्रह्मा, व्यास, वाल्मीकि, विष्णु, शिव, सूर्य आदिको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके श्रद्धासमन्वित होकर ओजस्वी स्वरमें अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण करते हुए तथा सात स्वरोंसे युक्त यथासमय यथोचित रस एवं भावोंको प्रकट करते हुए ग्रन्थका पाठ करे। इस प्रकार वाचकके मुखसे जो श्रोता नियमतः श्रद्धापूर्वक इतिहास-पुराण और रामचरितको सुनता है, वह सभी फलोंको प्राप्त कर सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है और विपुल पुण्यको प्राप्त कर भगवान्के उत्तम और अद्भुत स्थानको प्राप्त करता है।

श्रोताको चाहिये कि वह स्नानादिसे पवित्र होकर वाचकको प्रणाम करके उसके सम्मुख आसनपर बैठे और वाणीको संयत कर सुसमाहित हो वाचककी बातोंको सुने।

महाबाहो! व्यासस्वरूप वाचकको नमस्कार करनेपर संशयके बिना अन्य कुछ भी नहीं बोलना चाहिये। कथा-सम्बन्धी धार्मिक शंका या जिज्ञासा उत्पन्न होनेपर वाचकसे नप्रतापूर्वक पूछना चाहिये, क्योंकि व्यासस्वरूप वक्ता उसका गुरु और धर्मबन्धु है। वाचकको भी भलीभाँति उसे समझाना चाहिये, क्योंकि वह गुरु है, इसीलिये सबपर अनुग्रह करना उसका धर्म है। उत्तरके अनन्तर 'तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर पुनः आगेकी कथा सुनानी चाहिये। श्रोताको अपनी वाणीपर नियन्त्रण रखना चाहिये। वाचक ब्राह्मणको ही होना चाहिये। प्रत्येक मासमें पारण करे तथा वाचककी पूजा करे, महीनाके पूर्ण होनेपर वाचकको स्वर्ण प्रदान करे।

प्रथम पारणामें वाचककी अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करनेपर अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है। कार्तिकसे आरम्भकर आश्विनतक प्रत्येक मासमें एक-एक पारणापर पूजन करनेसे क्रमशः अग्निष्टोम, गोसव, ज्योतिष्टोम, सौत्रामणि, वाजपेय, वैष्णव, माहेश्वर, ब्राह्म, पुण्डरीक, आदित्य, राजसूय तथा अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। इस प्रकार यज्ञ-फलोंकी प्राप्ति कर वह निःसंदेह उत्तम लोकको प्राप्त करता है।

पर्वकी समाप्तिपर गन्ध, माला, विविध वस्त्र आदिसे वाचककी पूजा करनी चाहिये। स्वर्ण, रजत, गाय, काँसेका दोहन-पात्र आदि वाचकको प्रदान कर कथा-श्रवणका फल प्राप्त करना चाहिये। वाचकसे बढ़कर दान देने योग्य सुपात्र और कोई नहीं है, क्योंकि उसकी जिह्वाके अग्रभागपर सभी शास्त्र विराजमान रहते हैं। जो श्रद्धापूर्वक वाचकको भोजन कराता है, उसके पितर सौ वर्षतक तृप्त

  • इत्थं देवमयं द्वैतत् पुस्तकं देवपूजितम् । नमस्यं पूजनीयं च गृहे स्थाप्यं विभूतये ॥ (ब्राह्मपर्व २१६।५८)

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२३२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

रहते हैं। जैसे सभी देवोंमें सूर्य श्रेष्ठ हैं वैसे ही ब्राह्मणोंमें वाचक श्रेष्ठ है। वाचक व्यास कहा जाता है। जिस देश, नगर, गाँवमें ऐसा व्यास निवास करता है, वह क्षेत्र श्रेष्ठ माना जाता है। वहाँके निवासी धन्य हैं, कृतार्थ हैं, इसमें संदेह नहीं। वाचकको प्रणाम करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उस फलकी प्राप्ति अन्य कर्मोंसे नहीं होती।

जैसे कुरुक्षेत्रके समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं, गङ्गाके समान कोई नदी नहीं, भास्करसे श्रेष्ठ कोई देवता नहीं, अश्वमेधके समान कोई यज्ञ

नहीं, पुत्र-जन्मके तुल्य सुख नहीं, वैसे ही पुराणवाचक व्यासके समान कोई ब्राह्मण नहीं हो सकता। देवकार्य, पितृकार्य सभी कर्मोंमें यह परम पवित्र है*।

राजन्! इस प्रकार मैंने पुराणश्रवणकी विधि तथा वाचकके माहात्म्यको बतलाया। विधिके अनुसार ही पुराणादिका श्रवण एवं पाठ करना चाहिये। स्नान, दान, जप, होम, पितृपूजन तथा देवपूजन आदि सभी श्रेष्ठ कर्म विधिपूर्वक अनुष्ठित होनेपर ही उत्तम फल प्रदान करते हैं।

(अध्याय २१६)

॥ भविष्यपुराणान्तर्गत ब्राह्मपर्व सम्पूर्ण ॥

  • कुरुक्षेत्रसमं तीर्थं न द्वितीयं प्रचक्षते । न नदी गङ्गा तुल्या न देवो भास्कराद्वरः ॥ नाश्वमेधसमं पुण्यं न पापं ब्रह्महत्या । पुत्रजन्मसुखैस्तुल्यं न सुखं विद्यते यथा ॥ तथा व्याससमो विप्रो न क्वचित् प्राप्यते नृप । दैवे कर्मणि पित्यै च पावनः परमो नृणाम् ॥

(ब्राह्मपर्व २१६।१०९-१११)

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

मध्यमपर्व

(प्रथम भाग)

गृहस्थाश्रम एवं धर्मकी महिमा

जयति भुवनदीपो भास्करो लोककर्ता

जयति च शितिदेहः शार्ङ्गधन्वा मुरारिः ।

जयति च शशिमौली रुद्रनामाभिधेयो

जयति सकलमौलिर्भानुमांश्चित्रभानुः ॥

‘संसारकी सृष्टि करनेवाले भुवनके दीपस्वरूप भगवान् भास्करकी जय हो। श्याम शरीरवाले शार्ङ्गधनुर्धारी भगवान् मुरारिकी जय हो। मस्तकपर चन्द्रमा धारण किये हुए भगवान् रुद्रकी जय हो। सभीके मुकुटमणि तेजोमय भगवान् चित्रभानु (सूर्य)-की जय हो।’

एक बार पौराणिकोंमें श्रेष्ठ रोमहर्षण सूतजीसे मुनियोंने प्रणामपूर्वक पुराण-संहिताके विषयमें पूछा। सूतजी मुनियोंके वचन सुनकर अपने गुरु सत्यवती-पुत्र महर्षि वेदव्यासको प्रणामकर कहने लगे। मुनियो! मैं जगत्के कारण ब्रह्मस्वरूपको धारण करनेवाले भगवान् हरिको प्रणामकर पापका सर्वथा नाश करनेवाले पुराणकी दिव्य कथा कहता हूँ, जिसके सुननेसे सभी पापकर्म नष्ट हो जाते हैं और परमगति प्राप्त होती है। द्विजगण! भगवान् विष्णुके द्वारा कहा गया भविष्यपुराण अत्यन्त पवित्र एवं आयुष्यप्रद है। अब मैं उसके मध्यमपर्वका वर्णन करता हूँ, जिसमें देव-प्रतिष्ठा आदि इष्टापूर्त-कर्मोंका वर्णन है। उसे आप सुनें—

इस मध्यमपर्वमें धर्म तथा ब्राह्मणादिकी प्रशंसा, आपद्वर्मका निरूपण, विद्या-माहात्म्य, प्रतिमा-निर्माण, प्रतिमा-स्थापना, प्रतिमाका लक्षण, काल-व्यवस्था, सर्ग-प्रतिसर्ग आदि पुराणका लक्षण, भूगोलका निर्णय, तिथियोंका निरूपण, श्राद्ध, संकल्प, मन्वन्तर, मुमुक्षु-

मरणासन्नके कर्म, दानका माहात्म्य, भूत, भविष्य, युग-धर्मानुशासन, उच्च-नीच-निर्णय, प्रायश्चित्त आदि विषयोंका भी समावेश है।

मुनियो! तीनों आश्रमोंका मूल एवं उत्पत्तिका स्थान गृहस्थाश्रम ही है। अन्य आश्रम इसीसे जीवित रहते हैं, अतः गृहस्थाश्रम सबसे श्रेष्ठ है। गार्हस्थ्य-जीवन ही धर्मानुशासित जीवन है। धर्मरहित होनेपर अर्थ और काम उसका परित्याग कर देते हैं। धर्मसे ही अर्थ और काम उत्पन्न होते हैं, मोक्ष भी धर्मसे ही प्राप्त होता है, अतः धर्मका ही आश्रयण करना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम यही त्रिवर्ग हैं। प्रकारान्तरसे ये क्रमशः त्रिगुण अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुणात्मक हैं। सात्त्विक अथवा धार्मिक व्यक्ति ही सच्ची उन्नति करते हैं, राजस मध्य स्थानको प्राप्त करते हैं। जघन्यगुण अर्थात् तामस व्यवहारवाले निम्न भूमिको प्राप्त करते हैं। जिस पुरुषमें धर्मसे समन्वित अर्थ और काम व्यवस्थित रहते हैं, वे इस लोकमें सुख भोगकर मरनेके अनन्तर मोक्षको प्राप्त करते हैं, इसलिये अर्थ और कामको समन्वित कर धर्मका आश्रय ग्रहण करे। ब्रह्मवादियोंने कहा है कि धर्मसे ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है। स्यावर-जङ्गम अर्थात् सम्पूर्ण चराचर विश्वको धर्म ही धारण करता है। धर्ममें धारण करनेकी जो शक्ति है, वह ब्राह्मी शक्ति है, वह आद्यन्तरहित है। कर्म और ज्ञानसे धर्म प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं। अतः ज्ञानपूर्वक कर्मयोगका आचरण करना चाहिये। प्रवृत्तिमूलक और निवृत्तिमूलकके भेदसे

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२३४* संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वैदिक कर्म दो प्रकारके हैं। ज्ञानपूर्वक त्याग संन्यास है, संन्यासियों एवं योगियोंके कर्म निवृत्तिपरक हैं और गृहस्थोंके वेद-शास्त्रानुकूल कर्म प्रवृत्तिपरक हैं। अतः प्रवृत्तिके सिद्ध हो जानेपर मोक्षकामीको प्रवृत्तिका आश्रय लेना चाहिये, नहीं तो पुनः-पुनः संसारमें आना पड़ता है। शम, दम, दया, दान, अलोभ, विषयोंका त्याग, सरलता या निश्छलता, निष्क्रोध, अनसूया, तीर्थयात्रा, सत्य, संतोष, आस्तिकता, श्रद्धा, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजन, विशेषरूपसे ब्राह्मणपूजा, अहिंसा, सत्यवादिता, निन्दाका परित्याग, शुभानुष्ठान, शौचाचार, प्राणियोंपर दया—ये श्रेष्ठ आचरण सभी वर्णोंके लिये सामान्य रूपसे कहे गये हैं। श्रद्धामूलक कर्म ही धर्म कहे गये हैं, धर्म श्रद्धाभावमें ही स्थित है, श्रद्धा ही निष्ठा है, श्रद्धा ही प्रतिष्ठा है और श्रद्धा ही धर्मकी जड़ है। विधिपूर्वक गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंको प्रजापतिलोक, क्षत्रियोंको इन्द्रलोक, वैश्योंको अमृतलोक और तीनों वर्णोंकी परिचर्यापूर्वक जीवन व्यतीत करनेवाले शूद्रोंको गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है। (अध्याय १)


सृष्टि तथा सात ऊर्ध्व एवं सात पाताल लोकोंका वर्णन

श्रीसूतजी बोले—मुनियो! अब मैं कल्पके अनुसार सैकड़ों मन्वन्तरोंके अनुगत ईश्वर-सम्बन्धी कालचक्रका वर्णन करता हूँ।

सृष्टिके पूर्व यह सब परम अन्धकार-निमग्न एवं सर्वथा अप्रतिज्ञात-स्वरूप था। उस समय परम कारण, व्यापक एकमात्र रुद्र ही अवस्थित थे। सर्वव्यापक भगवान्ने आत्मस्वरूपमें स्थित होकर सर्वप्रथम मनकी सृष्टि की। फिर अहंकारकी सृष्टि की। उससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध नामक पञ्चतन्मात्रा तथा पञ्चमहाभूतोंकी उत्पत्ति की। इनमेंसे आठ प्रकृति हैं (अर्थात् दूसरेको उत्पन्न करनेवाली हैं)—प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्शकी तन्मात्राएँ। पाँच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन—ये सोलह इनकी विकृतियाँ हैं। ये किसीकी भी प्रकृति नहीं हैं, क्योंकि इनसे किसीकी उत्पत्ति नहीं होती। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं। कानका शब्द, त्वक्‌का स्पर्श, चक्षुका रूप, जिह्वाका रस, नासिकाका गन्ध है। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यानके भेदसे वायुके पाँच प्रकार हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण कहे गये हैं। प्रकृति त्रिगुणात्मिका है और उससे उत्पन्न सारा चराचर विश्व भी त्रिगुणात्मक है। उस भगवान् वासुदेवके तेजसे ब्रह्मा, विष्णु और शम्भुका आविर्भाव हुआ है। वासुदेव अशरीरी, अजन्मा तथा अयोनिज हैं। उनसे परे कुछ भी नहीं है। वे प्रत्येक कल्पमें जगत् और प्राणियोंकी सृष्टि एवं उपसंहार भी करते हैं।

बहत्तर युगोंका एक मन्वन्तर तथा चौदह मन्वन्तरका एक कल्प होता है। यह कल्प ब्रह्माका एक दिन और रात है। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक और ब्रह्मलोक—ये सात लोक कहे गये हैं। पाताल, वितल, अतल, तल, तलातल, सुतल और रसातल—ये सात पाताल हैं। इनके आदि, मध्य और अन्तमें रुद्र रहते हैं। महेश्वर लीलाके लिये संसारको उत्पन्न करते हैं और संहार भी करते हैं। ब्रह्मप्राप्तिकी इच्छा करनेवालेकी ऊर्ध्वगति कही गयी है।

ऋषि सर्वदर्शी (परमात्मा)-ने सर्वप्रथम प्रकृतिकी सृष्टि की। उस प्रकृतिसे विष्णुके साथ ब्रह्मा उत्पन्न हुए। द्विजश्रेष्ठो! इसके बाद बुद्धिसे नैमित्तिकी

  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग * २३५

सृष्टि उत्पन्न हुई। इस सृष्टिक्रममें स्वयम्भुव ब्रह्माने सर्वप्रथम ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया। अनन्तर क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रकी सृष्टि की। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और दिशाओंकी कल्पना की। लोकालोक, द्वीपों, नदियों, सागरों, तीर्थों, देवस्थानों, मेघगर्जनों, इन्द्रधनुषों, उल्कापातों, केतुओं तथा विद्युत् आदिको उत्पन्न किया। यथासमय ये सभी उसी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। ध्रुवसे ऊपर एक करोड़ योजन विस्तृत महर्लोक है। ब्राह्मण-श्रेष्ठ वहाँ कल्पान्तपर्यन्त रहते हैं। महर्लोकसे ऊपर दो करोड़ योजन विस्तृत जनलोक है, वहाँ ब्रह्माके पुत्र सनकादि रहते हैं। जनलोकसे ऊपर तीन करोड़ योजनवाला तपोलोक है, वहाँ तापत्रयरहित देवगण रहते हैं। तपोलोकसे ऊपर छः करोड़ योजन विस्तृत सत्यलोक है, जहाँ भृगु, वसिष्ठ, अत्रि, दक्ष, मरीचि आदि प्रजापतियोंका निवास है। जहाँ सनत्कुमार आदि सिद्ध योगिगण निवास करते हैं, वह ब्रह्मलोक कहा जाता है। उस लोकमें विश्वात्मा विश्वतोमुख गुरु ब्रह्मा रहते हैं। आस्तिक ब्रह्मवादी, यतिगण, योगी, तापस, सिद्ध तथा जापक उन परमेष्ठी ब्रह्माजीकी गाथाका गान इस प्रकार करते हैं—'परमपदकी प्राप्तिकी इच्छा करनेवाले योगियोंका द्वार यही परमपद लोक है। वहाँ जाकर किसी प्रकारका शोक नहीं होता। वहाँ जानेवाला विष्णु एवं शंकरस्वरूप हो जाता है। करोड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान यह स्थान बड़े कष्टसे प्राप्त होता है। ज्वालामालाओंसे परिव्यास इस पुरका वर्णन नहीं किया जा सकता।' इस ब्रह्मधाममें नारायणका भी भवन है। माया-सहचर परात्पर श्रीमान् हरि यहाँ शयन करते हैं। इसे ही पुनरावृत्तिसे रहित विष्णुलोक भी कहा जाता है। यहाँ आनेपर कोई भी लौटकर नहीं जाता। भगवान्‌के प्रपन्न महात्मागण ही जनार्दनको प्राप्त करते हैं। ब्रह्मासनसे ऊर्ध्व परम ज्योतिर्मय शुभ स्थान है। उसके ऊपर वह्नि परिव्यास है, वहीं पार्वतीके साथ भगवान् शिव विराजमान रहते हैं। सैकड़ों-हजारों विद्वान् और मनीषियोंद्वारा वे चिन्त्यमान होकर प्रतिष्ठित रहते हैं। वहाँ नियत ब्रह्मवादी द्विजगण ही जाते हैं। महादेवमें सतत ध्यानरत, तापस, ब्रह्मवादी, अहंता-ममताके अध्याससे रहित, काम-क्रोधसे शून्य, ब्रह्मत्व-समन्वित ब्राह्मण ही उनको देख सकते हैं—वही रुद्रलोक है। ये सातों महालोक कहे गये हैं।

द्विजगणो! पृथ्वीके नीचे महातल आदि पाताललोक हैं। महातल नामक पाताल स्वर्णमय तथा सभी वर्णोंसे अलंकृत है। वह विविध प्रासादों और शुभ देवालयोंसे समन्वित है। वहाँपर भगवान् अनन्त, बुद्धिमान् मुचुकुन्द तथा बलि भी निवास करते हैं। भगवान् शंकरसे सुशोभित रसातल शैलमय है। सुतल पीतवर्ण और वितल मूँगेकी कान्तिवाला है। वितल श्वेत और तल कृष्णवर्ण है। यहाँ वासुकि रहते हैं। कालनेमि वैनतेय, नमुचि, शङ्कुकर्ण तथा विविध नाग भी यहाँ निवास करते हैं। इनके नीचे रौरव आदि अनेकों नरक हैं, उसमें पापियोंको गिराया जाता है। पातालोंके नीचे शेष नामक वैष्णवी शरीर है। वहाँ कालाग्नि रुद्रस्वरूप नरसिंह भगवान् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु नागरूपी अनन्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। (अध्याय २-३)

२३६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भूगोल एवं ज्योतिश्चक्रका वर्णन

श्रीसूतजी बोले—मुनियो! अब मैं भूलौकका वर्णन करता हूँ। भूलौकमें जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रीच्छ, शाक और पुष्कर नामके सात महाद्वीप हैं, जो सात समुद्रोंसे आवृत हैं। एक द्वीपसे दूसरे द्वीप क्रम-क्रमसे ठीक दूने-दूने आकार एवं विस्तारवाले हैं और एक सागरसे दूसरे सागर भी दूने आकारके हैं। क्षीरोद, इक्षुरसोद, क्षारोद, घृतोद, दध्योद, क्षीरसलिल तथा जलोद—ये सात महासागर हैं। यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत, समुद्रसे चारों ओरसे घिरी हुई तथा सात द्वीपोंसे समन्वित है। जम्बूद्वीप सभी द्वीपोंके मध्यमें सुशोभित हो रहा है। उसके मध्यमें सोनेकी कान्तिवाला महामेरु पर्वत है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। यह महामेरु पर्वत नीचेकी ओर सोलह हजार योजन पृथ्वीमें प्रविष्ट है और ऊपरी भागमें इसका विस्तार बत्तीस हजार योजन है। नीचे (तलहटी)-में इसका विस्तार सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत पृथ्वीरूप कमलकी कर्णिका (कोष)-के समान है। इस मेरु पर्वतके दक्षिणमें हिमवान्, हिमकूट और निषध नामके पर्वत हैं। उत्तरमें नील, श्वेत तथा शृंगी नामके वर्ष-पर्वत हैं। मध्यमें लक्ष्योजन प्रमाणवाले दो (निषध और नील) पर्वत हैं। उनसे दूसरे-दूसरे दस-दस हजार योजन कम हैं। (अर्थात् हेमकूट और श्वेत नब्बे हजार योजन तथा हिमवान् और शृंगी अस्सी-अस्सी हजार योजनतक फैले हुए हैं।) वे सभी दो-दो हजार योजन लम्बे और इतने ही चौड़े हैं।

द्विजो! मेरुके दक्षिण भागमें भारतवर्ष है, अनन्तर किंपुरुषवर्ष और हरिवर्ष ये मेरु पर्वतके दक्षिणमें हैं। उत्तरमें चम्पक, अश्व, हिरण्मय तथा उत्तरकुरुषवर्ष हैं। ये सब भारतवर्षके समान ही हैं। इनमेंसे प्रत्येकका विस्तार नौ सहस्र योजन है,

इनके मध्यमें इलावृतवर्ष है और उसके मध्यमें उन्नत मेरु स्थित है। मेरुके चारों ओर नौ सहस्र योजन विस्तृत इलावृतवर्ष है। महाभाग! इसके चारों ओर चार पर्वत हैं। ये चारों पर्वत मेरुकी कीलें हैं, जो दस सहस्र योजन परिमाणमें ऊँची हैं। इनमेंसे पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व है। इनपर कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट-वृक्ष हैं। महर्षिगण! जम्बूद्वीप नाम होनेका कारण महाजम्बू वृक्ष भी यहाँ है, उसके फल महान् गजराजके समान बड़े होते हैं। जब वे पर्वतपर गिरते हैं तो फटकर सब ओर फैल जाते हैं। उसीके रससे जम्बू नामकी प्रसिद्ध नदी वहाँ बहती है, जिसका जल वहाँके रहनेवाले पीते हैं। उस नदीके जलका पान करनेसे वहाँके निवासियोंको पसीना, दुर्गन्ध, बुढ़ापा और इन्द्रिय-क्षय नहीं होता। वहाँके निवासी शुद्ध हृदयवाले होते हैं। उस नदीके किनारेकी मिट्टी उस रससे मिलकर मन्द-मन्द वायुके द्वारा सुखाये जानेपर 'जाम्बूनद' नामक सुवर्ण बन जाती है, जो सिद्ध पुरुषोंका भूषण है।

मेरुके पास (पूर्वमें) भद्राश्ववर्ष और पश्चिममें केतुमालवर्ष है। इन दो वर्षोंके मध्यमें इलावृतवर्ष है। विप्रश्रेष्ठ! मेरुके ऊपर ब्रह्माका उत्तम स्थान है। उसके ऊपर इन्द्रका स्थान है और उसके ऊपर शंकरका स्थान है। उसके ऊपर वैष्णवलोका तथा उससे ऊपर दुर्गालोक है। इसके ऊपर सुवर्णमय, निराकार दिव्य ज्योतिर्मय स्थान है। उसके भी ऊपर भक्तोंका स्थान है, वहाँ भगवान् सूर्य रहते हैं। ये परमेश्वर भगवान् सूर्य ज्योतिर्मय चक्रके मध्यमें निश्चलरूपसे स्थित हैं। ये मेरुके ऊपर राशिचक्रमें भ्रमण करते हैं। भगवान् सूर्यका रथ-चक्र मेरु पर्वतकी नाभिमें रात-दिन वायुके द्वारा

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२३७

भ्रमण कराया जाता हुआ ध्रुवका आश्रय लेकर प्रतिष्ठित है। दिक्पाल आदि तथा ग्रह वहाँ दक्षिणसे उत्तर मार्गकी ओर प्रतिमास चलते रहते हैं। हास और वृद्धिके क्रमसे रविके द्वारा जब चान्द्रमास लङ्घित होता है, तब उसे मलमास कहा जाता है१। सूर्य, सोम, बुध, चन्द्र और शुक्र शीघ्रगामी ग्रह हैं। दक्षिणायन मार्गसे सूर्य गतिमान् होनेपर

सभी ग्रहोंके नीचे चलते हैं। विस्तीर्ण मण्डल कर उसके ऊपर चन्द्रमा गतिशील रहता है। सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल सोमसे ऊपर चलता है। नक्षत्रोंके ऊपर बुध और बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल और उससे ऊपर बृहस्पति तथा बृहस्पतिसे ऊपर शनि, शनिके ऊपर सप्तर्षिमण्डल और सप्तर्षिमण्डलके ऊपर ध्रुव स्थित है। (अध्याय ४)

ब्राह्मणोंकी महिमा तथा छब्बीस दोषोंका वर्णन

श्रीसूतजी बोले—हे द्विजोत्तम! तीनों वर्णोंमें ब्राह्मण जन्मसे प्रभु हैं। हव्य और कव्य सभौकी रक्षाके लिये तपस्याके द्वारा ब्राह्मणकी प्रथम सृष्टि की गयी है। देवगण इन्हींके मुखसे हव्य और पितृगण कव्य स्वीकार करते हैं। अतः इनसे श्रेष्ठ कौन हो सकता है। ब्राह्मण जन्मसे ही श्रेष्ठ हैं और सभौसे पूजनीय हैं। जिसके गर्भाधान आदि अङ्गतालीस संस्कार शास्त्रविधिसे सम्पन्न होते हैं, वही सच्चा ब्राह्मण है। द्विजकी पूजाकर देवगण स्वर्गफल भोगनेका लाभ प्राप्त करते हैं। अन्य मनुष्य भी ब्राह्मणकी पूजाकर देवत्वको प्राप्त करते हैं। जिसपर ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। वेद भी ब्राह्मणोंके मुखमें सन्निहित रहते हैं। सभी विषयोंका ज्ञान होनेके कारण ब्राह्मण ही देवताओंकी पूजा, पितृकार्य, यज्ञ, विवाह, वह्निकार्य, शान्तिकर्म, स्वस्त्ययन आदिके सम्पादनमें प्रशस्त है। ब्राह्मणके बिना देवकार्य, पितृकार्य तथा यज्ञ-कर्मोंमें दान, होम और बलि—ये सभी निष्फल होते हैं।

ब्राह्मणको देखकर श्रद्धापूर्वक अभिवादन करना

चाहिये, उसके द्वारा कहे गये 'दीर्घायुर्भव' शब्दसे मनुष्य चिरजीवी होता है। द्विजश्रेष्ठ! ब्राह्मणकी पूजासे आयु, कीर्ति, विद्या और धनकी वृद्धि होती है। जहाँ जलसे विप्रोंका पाद-प्रक्षालन नहीं किया जाता, वेद-शास्त्रोंका उच्चारण नहीं होता और जहाँ स्वाहा, स्वधा और स्वस्तिकी ध्वनि नहीं होती, ऐसा गृह श्मशानके समान है२।

विद्वानोंने नरकगामी मनुष्योंके छब्बीस दोष बतलाये हैं, जिन्हें त्यागकर शुद्धतापूर्वक निवास करना चाहिये—(१) अधम, (२) विषम, (३) पशु, (४) पिशुन, (५) कृपण, (६) पापिष्ठ, (७) नष्ट, (८) रुष्ट, (९) दुष्ट, (१०) पुष्ट, (११) हष्ट, (१२) काण, (१३) अन्ध, (१४) खण्ड, (१५) चण्ड, (१६) कुष्ठ, (१७) दत्तापहारक, (१८) वक्ता, (१९) कदर्य, (२०) दण्ड, (२१) नीच, (२२) खल, (२३) वाचाल, (२४) चपल, (२५) मलीमस तथा (२६) स्तेयी।

उपर्युक्त छब्बीस दोषोंके भी अनेक भेद-प्रभेद बतलाये गये हैं। विप्रेन्द्र! इन (छब्बीस) दोषोंका विवरण संक्षेपमें इस प्रकार है—

१-रविणा लङ्घितो मासश्चान्द्रः ख्यातो मलित्मनुचः। (मध्यमपर्व १।४।२७)

प्रकारान्तरे यद् श्लोक ज्योतिषके 'संक्रान्तिरहितो मासो मलमास उदाहृतः।' इसी वचनके भावका द्योतक है।

२-न विप्रपादोदककर्दमानि न वेदशास्त्रप्रतिगजितानि। स्वाहास्वधार्स्वस्तिविर्वाजितानि श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि ॥

(मध्यमपर्व १।५।२२)

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२३८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

१. गुरु तथा देवताके सम्मुख जूता और छाता धारणकर जानेवाले, गुरुके सम्मुख उच्च आसनपर बैठनेवाले, यानपर चढ़कर तीर्थ-यात्रा करनेवाले तथा तीर्थमें ग्राम्य धर्मका आचरण करनेवाले—ये सभी अधम-संज्ञक दोषयुक्त व्यक्ति कहे गये हैं। २. प्रकटमें प्रिय और मधुर वाणी बोलनेवाले पर हृदयमें हालाहल विष धारण करनेवाले, कहते कुछ और हैं तथा आचरण कुछ और ही करते हैं—ये दोनों विषम-संज्ञक दोषयुक्त व्यक्ति कहे जाते हैं। ३. मोक्षकी चिन्ता छोड़कर सांसारिक चिन्ताओंमें श्रम करनेवाले, हरिकी सेवासे रहित, प्रयागमें रहते हुए भी अन्यत्र स्नान करनेवाले, प्रत्यक्ष देवको छोड़कर अदृष्टकी सेवा करनेवाले तथा शास्त्रोंके सार-तत्त्वको न जाननेवाले—ये सभी पशु-संज्ञक दोषयुक्त व्यक्ति हैं। ४. बलसे अथवा छल-छद्मसे या मिथ्या प्रेमका प्रदर्शन कर ठगनेवाले व्यक्तिको पिशुन दोषयुक्त कहा गया है। ५. देव-सम्बन्धी और पितृ-सम्बन्धी कर्मोंमें मधुर अन्नकी व्यवस्था रहते हुए भी म्लान और तित्त अन्नका भोजन करानेवाला दुर्बुद्धि मानव कृपण है, उसे न तो स्वर्ग मिलता है और न मोक्ष ही। जो अप्रसन्न मनसे कुत्सित वस्तुका दान करता एवं क्रोधके साथ देवता आदिकी पूजा करता है, वह सभी धर्मोंसे बहिष्कृत कृपण कहा जाता है। निर्दुष्ट होते हुए भी शुभका परित्याग तथा शुभ शरीरका विक्रय करनेवाला कृपण कहलाता है। ६. माता-पिता और गुरुका त्याग करनेवाला, पवित्राचाररहित, पिताके सम्मुख निःसंकोच भोजन करनेवाला, जीवित पिता-माताका परित्याग करनेवाला, उनकी कभी भी सेवा न करनेवाला तथा होम-यज्ञादिका लोप करनेवाला पापिष्ट कहलाता है। ७. साधु आचरणका परित्याग कर

छूटी सेवाका प्रदर्शन करनेवाले, वेश्यागामी, देव-धनके द्वारा जीवन-यापन करनेवाले, भायोंके व्यभिचारद्वारा प्राप्त धनसे जीवन-यापन करनेवाले या कन्याको बेचकर अथवा स्त्रीके धनसे जीवन-यापन करनेवाले—ये सब नष्ट-संज्ञक व्यक्ति हैं—ये स्वर्ग एवं मोक्षके अधिकारी नहीं हैं। ८. जिसका मन सदा क्रुद्ध रहता है, अपनी हीनता देखकर जो क्रोध करता है, जिसकी भाँहें कुटिल हैं तथा जो क्रुद्ध और रुष्ट स्वभाववाला है—ऐसे ये पाँच प्रकारके व्यक्ति रुष्ट कह गये हैं। ९. अकार्यमें या निन्दित आचारमें ही जीवन व्यतीत करनेवाला, धर्मकार्यमें अस्थिर, निद्रालु, दुर्व्यसनमें आसक्त, मद्यपायी, स्त्री-सेवी, सदैव दुष्टोंके साथ वार्तालाप करनेवाला—ऐसे सात प्रकारके व्यक्ति दुष्ट कहे गये हैं। १०. अकेले ही मधुर-मिष्टान्न भक्षण करनेवाले, वञ्चक, सज्जनोंके निन्दक, शूकरके समान वृत्तिवाले—ये सब पुष्ट संज्ञक व्यक्ति कहे जाते हैं। ११. जो निगम (वेद), आगम (तन्त्र)-का अध्ययन नहीं करता है और न इन्हें सुनता ही है, वह पापात्मा हष्ट कहा जाता है। १२-१३. श्रुति और स्मृति ब्राह्मणोंके ये दो नेत्र हैं। एकसे रहित व्यक्ति काना और दोनोंसे हीन अन्धा कहा जाता है*। १४. अपने सहोदरसे विवाद करनेवाला, माता-पिताके लिये अप्रिय वचन बोलनेवाला खण्ड कहा जाता है। १५. शास्त्रकी निन्दा करनेवाला, चुगलखोर, राजगामी, शूद्रसेवक, शूद्रकी पत्नीसे अनाचरण करनेवाला, शूद्रके घरपर पके हुए अन्नको एक बार भी खानेवाला या शूद्रके घरपर पाँच दिनोंतक निवास करनेवाला व्यक्ति चण्डदोषवाला कहा जाता है। १६. आठ प्रकारके कुष्टोंसे समन्वित, त्रिकुष्टी, शास्त्रमें निन्दित व्यक्तियोंके साथ वार्तालाप करनेवाला अधम व्यक्ति कुष्ट-दोषयुक्त कहा जाता

  • श्रुति स्मृतिश्च विप्राणां नयने द्वे विनिर्मिते। एकेन विकलः काणो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ॥ (मध्यमपर्व १।५।५७)

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२३९

है। १७. कीटके समान भ्रमण करनेवाला, कुत्सित-दोषसे युक्त व्यापार करनेवाला दतापहारक कहा गया है। १८. कुपण्डित एवं अज्ञानी होते हुए भी धर्मका उपदेश देनेवाला वक्ता है। १९. गुरुजनोंकी वृत्तिको हरण करनेकी चेष्टा करनेवाला तथा काशी-निवासी व्यक्ति यदि बहुत दिन काशीको छोड़कर अन्यत्र निवास करता है, वह कर्दय (कंजूस) है। २०. मिथ्या क्रोधका प्रदर्शन करनेवाला तथा राजा न होते हुए भी दण्ड-विधान करनेवाला व्यक्ति दण्ड (उदण्ड) कहा जाता है। २१. ब्राह्मण, राजा और देव-सम्बन्धी धनका हरण कर, उस धनसे अन्य देवता या ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेवाला या उस धनका भोजन या अन्नको देनेवाला व्यक्ति खरके समान नीच है, जो अक्षर-अभ्यासमें तत्पर व्यक्ति केवल पढ़ता है, किंतु समझता नहीं, व्याकरण-शास्त्रशून्य व्यक्ति पशु है, जो गुरु और देवताके आगे कहता कुछ है और करता कुछ और है, अनाचारी-दुराचारी है वह नीच कहा जाता है। २२. गुणवान् एवं सज्जनोंमें जो दोषका अन्वेषण करता है वह व्यक्ति खल कहलाता है। २३. भाग्यहीन व्यक्तिसे परिहासयुक्त वचन बोलनेवाला तथा चाण्डालोंके साथ निर्लज्ज होकर वार्तालाप

करनेवाला वाचाल कहा जाता है। २४. पक्षियोंके पालनेमें तत्पर, बिल्लीके द्वारा आनीत भक्ष्यको बाँटनेके बहाने बंदरकी भाँति स्वयं भक्षण करनेवाला, व्यर्थमें तृणका छेदक, मिट्टीके ढेलेको व्यर्थमें भेदन करनेवाला, मांस भक्षण करनेवाला और अन्यकी स्त्रीमें आसक्त रहनेवाला व्यक्ति चपल कहलाता है। २५. तैल, उबटन आदि न लगानेवाला, गन्ध और चन्दनसे शून्य, नित्यकर्मको न करनेवाला व्यक्ति मलीमस कहलाता है। २६. अन्यायसे अन्यके घरका धन ले लेनेवाला तथा अन्यायसे धन कमानेवाला, शास्त्र-निषिद्ध धनोंको ग्रहण करनेवाला, देव-पुस्तक, रत्न, मणि-मुक्ता, अश्म, गौ, भूमि तथा स्वर्णका हरण करनेवाला स्तेयी (चोर) कहा जाता है। साथ ही देव-चिन्तन तथा परस्पर कल्याण-चिन्तन न करनेवाले, गुरु तथा माता-पिताका पोषण न करनेवाले और उनके प्रति पालनीय कर्तव्यका आचरण न करनेवाले एवं उपकारी व्यक्तिके साथ समुचित व्यवहार न करनेवाले—ये सभी स्तेयी हैं। इन सभी दोषोंसे युक्त व्यक्ति रक्तपूर्ण नरकमें निवास करते हैं। इनका सम्यक् ज्ञान सम्पन्न हो जानेपर मनुष्य देवत्वको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय ५)

माता, पिता एवं गुरुकी महिमा

श्रीसूतजी बोले—द्विजश्रेष्ठ! चारों वर्णोंके लिये पिता ही सबसे बड़ा अपना सहायक है। पिताके समान अन्य कोई अपना बन्धु नहीं है, ऐसा वेदोंका कथन है। माता-पिता और गुरु—ये तीनों पथप्रदर्शक हैं, पर इनमें माता ही सर्वोपरि है। भाइयोंमें जो क्रमशः बड़े हैं, वे क्रम-क्रमसे

ही विशेष आदरके पात्र हैं। इन्हें द्वादशी, अमावास्या तथा संक्रान्तिके दिन यथारुचि मणियुक्त वस्त्र दक्षिणाके रूपमें देना चाहिये, दक्षिणायन और उत्तरायणमें, विषुव संक्रान्तिमें तथा चन्द्र-सूर्य-ग्रहणके समय यथाशक्ति इन्हें भोजन कराना चाहिये; अनन्तर इन मन्त्रोंसे* इनकी चरण-वन्दना करनी चाहिये;

  • स्वर्गापवर्गप्रदमेकमाद्यं ब्रह्मस्वरूपं पितरं नमामि । यतो जगत् पश्यति चारूपं तं तर्पयामः सलिलैस्तिलैर्युतैः ॥

पितरो जनयन्तीह पितरः पालयन्ति च । पितरो ब्रह्मरूपा हि तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥

यस्माद्विजयते लोकस्तस्माद्धर्मः प्रवर्तते । नमस्तुभ्यं पितः साक्षाद्ब्रह्मरूपं नमोऽस्तु ते ॥

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२४०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

क्योंकि विधिपूर्वक वन्दन करनेसे ही सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग और अपवर्ग-रूपी फलको प्रदान करनेवाले एक आद्य ब्रह्मस्वरूप पिताको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनकी प्रसन्नतासे संसार सुन्दररूपमें दिखायी देता है, उन पिताका मैं तिलयुक्त जलसे तर्पण करता हूँ। पिता ही जन्म देता है, पिता ही पालन करता है, पितृगुण ब्रह्मस्वरूप हैं, उन्हें नित्य पुनः-पुनः नमस्कार है। हे पितः ! आपके अनुग्रहसे लोकधर्म प्रवर्तित होता है, आप साक्षात् ब्रह्मरूप हैं, आपको नमस्कार है।

जो अपने उदररूपी विवरमें रखकर स्वयं उसकी सभी प्रकारसे रक्षा करती है, उस परा प्रकृतिस्वरूपा जननीदेवीको नमस्कार है। मातः ! आपने बड़े कष्टसे मुझे अपने उदर-प्रदेशमें धारण किया, आपके अनुग्रहसे मुझे यह संसार देखनेको मिला, आपको बार-बार नमस्कार है। पृथिवीपर जितने तीर्थ और सागर आदि हैं उन सबकी स्वरूपभूता आपको अपनी कल्याण-प्राप्तिके लिये मैं नमस्कार करता हूँ। जिन गुरुदेवके प्रसादसे मैं यशस्करी विद्या प्राप्त की है,

उन भवसागरके सेतुस्वरूप शिवरूप गुरुदेवको मेरा नमस्कार है। अग्रजन्मन् ! वेद और वेदाङ्ग-शास्त्रोंके तत्त्व आपमें प्रतिष्ठित हैं। आप सभी प्राणियोंके आधार हैं, आपको मेरा नमस्कार है। ब्राह्मण सम्पूर्ण संसारके चलते-फिरते परम पावन तीर्थस्वरूप हैं। अतः हे विष्णुरूपी भूदेव ! आप मेरा पाप नष्ट करें, आपको मेरा नमस्कार है।

द्विजो ! जैसे पिता श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पिताके बड़े-छोटे भाई और अपने बड़े भाई भी पिताके समान ही मान्य एवं पूज्य हैं। आचार्य ब्रह्माकी, पिता प्रजापतिकी, माता पृथ्वीकी और भाई अपनी ही मूर्ति हैं। पिता मेरुस्वरूप एवं वसिष्ठ-स्वरूप सनातन धर्ममूर्ति हैं। ये ही प्रत्यक्ष देवता हैं, अतः इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार पितामह एवं पितामही (दादा-दादी)-के भी पूजन-वन्दन, रक्षण, पालन और सेवनकी अत्यन्त महिमा है। इनकी सेवाके पुण्योंकी तुलनामें कोई नहीं है, क्योंकि ये माता-पिताके भी परम पूज्य हैं। (अध्याय ६)

पुराण-श्रवणकी विधि तथा पुराण-वाचककी महिमा

श्रीसूतजी बोले—ब्राह्मणो ! पूर्वकालमें महातेजस्वी ब्रह्माजीने पुराण-श्रवणकी जिस विधिको मुझसे कहा था, उसे मैं आपको सुना रहा हूँ, आप सुनें। इतिहास-पुराणोंके भक्तिपूर्वक सुननेसे ब्रह्महत्या

आदि सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है, जो प्रातः-सायं तथा रात्रिमें पवित्र होकर पुराणोंका श्रवण करता है, उसपर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर संतुष्ट हो जाते हैं*। प्रातःकाल इसके पढ़ने और सुननेवालेसे

या कुक्षिविरे कृत्वा स्वयं रक्षति सर्वतः । नमामि जननीं देवीं परां प्रकृतिरूपिणीम् ॥ कुच्छेण महता देव्या धारितोऽहं यथोदरे । त्वत्प्रसादाज्जगददृष्टं मातरित्यं नमोऽस्तु ते ॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि सागरादीनि सर्वशः । वसन्ति यत्र तां नौमि मातरं भूतिहेतवे ॥ गुरुदेवप्रसादेन लब्धा विद्यायशस्करी । शिवरूपं नमस्तस्मै संसारार्णवसेतवे ॥ वेदवेदाङ्गशास्त्राणां तत्त्वं यत्र प्रतिष्ठितम् । आधारः सर्वभूतानामग्रजन्मन् नमोऽस्तु ते ॥ ब्राह्मणो जगतां तीर्थं पावनं परमं यतः । भूदेव हर मे पापं विष्णुरूपिन् नमोऽस्तु ते ॥

(मध्यमपर्व १।६।६-१४)

  • इतिहासपुराणानि श्रुत्वा भक्त्याद्विजोत्तमाः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्महत्याशतं च यत् ॥

सायं प्रातस्तथा राज्ञो शुचिर्भूत्वा शृणोतियः । तस्य विष्णुस्तथा ब्रह्मा तुष्ट्यते शङ्करस्तथा ॥

(मध्यमपर्व १।७।३-४)

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२४९

ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं तथा सायंकालमें भगवान् विष्णु और रातमें भगवान् शंकर संतुष्ट होते हैं। पुराण-श्रवण करनेवालेको शुक्ल वस्त्र धारण कर कृष्ण-मृगचर्म तथा कुशके आसनपर बैठना चाहिये। आसन न अधिक ऊँचा हो और न अधिक नीचा। पहले देवता और गुरुकी तीन प्रदक्षिणा करे, तदनन्तर दिव्यालोंको नमस्कार करे। फिर ओंकारमें अधिष्ठित देवताओंको नमस्कार करे एवं शाश्वत धर्ममें अधिष्ठित धर्मशास्त्र-ग्रन्थोंको भी नमस्कार करे।

श्रोताका मुख दक्षिण दिशाकी ओर और वाचकका मुख उत्तरकी ओर हो। पुराण और महाभारत कथाकी यही विधि कही गयी है। हरिवंश, रामायण और धर्मशास्त्रके श्रवणकी इससे विपरीत विधि कही गयी है। अतः निर्दिष्ट विधिसे सुनना या पढ़ना चाहिये। देवालय या तीर्थोंमें इतिहास-पुराणके वाचनके समय सर्वप्रथम उस स्थान और उस तीर्थके माहात्म्यका वर्णन करना चाहिये। अनन्तर पुराणादिका वाचन करना चाहिये। माहात्म्यके श्रवणसे गोदानका फल मिलता है। गुरुकी आज्ञासे माता-पिताका अभिवादन करना चाहिये। ये वेदके समान, सर्वधर्ममय तथा सर्वज्ञानमय हैं। अतः द्विजश्रेष्ठ! माता-पिताकी सेवासे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।

पुराणादि पुस्तकोंका हरण करनेवाला नरकको प्राप्त होता है। वेदादि ग्रन्थों तथा तान्त्रिक मन्त्रोंको स्वयं लिखकर उनका वाचन न करे। वाचकोंको चाहिये कि वेदमन्त्रोंका विपरीत अर्थ न बतलायें और न वेदमन्त्रोंका अशुद्ध पाठ करें। क्योंकि ये दोनों अत्यन्त पवित्र हैं, ऐसा करनेपर उन्हें पावमानी ऋचाओंका सौ बार जप करना चाहिये। पुराणादिके प्रारम्भ, मध्य और अवसानमें तथा मन्त्रमें प्रणवका उच्चारण करना चाहिये।

देवनिर्मित पुस्तकको त्रिदेव-स्वरूप समझकर

गन्ध-पुष्पादिसे उसकी पूजा करनी चाहिये। ग्रन्थके बाँधनेवाले (धागा) सूत्रको नागराज वासुकिका स्वरूप समझना चाहिये। इनका सम्मान न करनेपर दोष होता है। अतः उसका कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिये। ग्रन्थके पत्रोंको भगवान् ब्रह्मा, अक्षरोंको जनार्दन, अक्षरोंमें लगी मात्राओंको अव्यय प्रकृति, लिपिको महेश तथा लिपिकी मात्राओंको सरस्वती समझना चाहिये।

पुराण-वाचकको चाहिये कि पुराण-संहिताओंमें परिगणित सभी व्यास, जैमिनि आदि महर्षियों तथा शंकर, विष्णु आदि देवताओंको आदि, मध्य और अवसानमें नमस्कार करे। इनका स्मरण कर धर्मशास्त्रार्थवेत्ता विप्रको पुराणादिका एकाग्रचित्त हो पाठ करना चाहिये। वाचकको स्पष्टाक्षरोंमें उच्चारण करते हुए सुन्दर ध्वनिमें सभी प्रकारणोंके तात्त्विक अर्थोंको स्पष्ट बतलाना चाहिये। पुराणादि-धर्मसंहिताके श्रवणसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र विशेषतः अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करते हैं एवं सभी कामनाओंको भी प्राप्त कर लेते हैं तथा सभी पापोंसे मुक्त होकर बहुत-से पुण्योंकी प्राप्ति कर लेते हैं।

जो वाचक सदा सम्पूर्ण ग्रन्थके अर्थ एवं तात्पर्यको सम्यक् रूपसे जानता है, वही उपदेश करनेके योग्य है और वही विप्र व्यास कहा जाता है। ऐसे वाचक विप्र जिस नगर या ग्राममें रहते हैं, वह पुण्यक्षेत्र कहा जाता है। वहाँके निवासी धन्य तथा सफल-आत्मा हैं, कृतार्थ हैं एवं उनके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

जैसे सूर्यरहित दिन, चन्द्रशून्य रात्रि, बालकोंसे शून्य गृह तथा सूर्यके बिना ग्रहोंकी शोभा नहीं होती, वैसे ही व्याससे रहित सभाकी भी शोभा नहीं होती।

श्रीसूतजी बोले—द्विजोत्तम! गुरुको चाहिये

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२४२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कि अध्यात्मविषयक पुराणका अध्यापन ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, भक्त, शान्त, वैष्णव, क्रोधरहित तथा जितेन्द्रिय शिष्यको कराये। अन्यायसे धनार्जन करनेवाले, निर्भय, दाम्भिक, द्वेषी, निरर्थक और मन्थर गतिवाले एवं सेवारहित, यज्ञ न करनेवाले, पुरुषत्वहीन, कठोर, क्रुद्ध, कृपण, व्यसनी तथा निन्दक शिष्यको दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। पुत्र-पौत्र आदिके अतिरिक्त नम्र व्यक्तिको भी विद्या देनी चाहिये। विद्याको अपने साथ लेकर मर जाना अच्छा है, किंतु अनधिकारी व्यक्तिको विद्या नहीं देनी चाहिये। विद्या कहती है कि मुझे भक्तिहीन, दुर्जन तथा दुष्टात्मा व्यक्तिको प्रदान मत करो, मुझे अप्रमादी, पवित्र, ब्रह्मचारी, सार्थक तथा विधिज्ञ

सज्जनको ही दो। यदि निषिद्ध व्यक्तिको श्रेष्ठ विद्याधन दिया जाता है तो दाता और ग्रहणकर्ता—इन दोनोंमेंसे एक स्वल्प समयमें ही यमपुरी चला जाता है। पढ़नेवालेको चाहिये कि वह आध्यात्मिक, वैदिक, अलौकिक विद्या पढ़ानेवालेको प्रथम सादर प्रणाम कर अध्ययन करे। कर्मकाण्डका अध्ययन बिना ज्योतिषज्ञानके नहीं करना चाहिये। जो विषय शास्त्रोंमें नहीं कहे गये हैं और जो म्लेच्छोद्गारा कथित हैं, उनका कभी भी अभ्यास नहीं करना चाहिये। जो स्वयं धर्माचरण कर धर्मका उपदेश करता है, वही ज्ञान देनेवाला पिता एवं गुरु-स्वरूप है तथा ऐसे ज्ञानदाताका ही धर्म प्रवर्तित होता है। (अध्याय ७-८)

पूर्त-कर्म-निरूपण

सूतजीने कहा—ब्राह्मणो! युगान्तरमें ब्रह्माने जिस अन्तर्वेदि और बहिर्वेदिकी बात बतलायी है, वह द्वापर और कलियुगके लिये अत्यन्त उत्तम मानी गयी है। जो कर्म ज्ञानसाध्य है, उसे अन्तर्वेदिकर्म कहते हैं। देवताकी स्थापना और पूजा बहिर्वेदि (पूर्त)-कर्म है। वह बहिर्वेदिकर्म दो प्रकारका है—कुओं, पोखरा, तालाब आदि खुदवाना और ब्राह्मणोंको संतुष्ट करना तथा गुरुजनोंकी सेवा।

निष्कामभावपूर्वक किये गये कर्म तथा व्यसनपूर्वक किया गया हरिस्मरणादि श्रेष्ठ कर्म अन्तर्वेदि-कर्मके अन्तर्गत आते हैं, इनके अतिरिक्त अन्य कर्म बहिर्वेदिकर्म कहलाते हैं। धर्मका कारण राजा होता है, इसलिये राजाको धर्मका पालन करना चाहिये और राजाका आश्रय लेकर प्रजाको भी बहिर्वेदि (पूर्त)-कर्मोंका पालन करना चाहिये। यों तो बहिर्वेदि (पूर्त)-कर्म सतासी प्रकारके कहे गये हैं, फिर भी इनमें तीन प्रधान हैं—

देवताका स्थापन, प्रासाद और तडाग आदिका निर्माण। इसके अतिरिक्त गुरुजनोंकी पूजापूर्वक पितृपूजा, देवताओंका अधिवासन और उनकी प्रतिष्ठा, देवता-प्रतिमा-निर्माण तथा वृक्षारोपण आदि भी पूर्त-कर्म हैं।

देवताओंकी प्रतिष्ठा उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ-भेदसे तीन प्रकारकी होती है। प्रतिष्ठामें पूजा, हवन तथा दान आदि ये तीन कर्म प्रधान हैं। तीन दिनोंमें सम्पन्न होनेवाले प्रतिष्ठा-विधानोंमें अट्टाईस देवताओंकी पूजा तथा जापकरूपमें सोलह ब्राह्मण रखकर प्रतिष्ठा करानी चाहिये। प्रतिष्ठाकी यह उत्तम विधि कही गयी है। ऐसा करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। मध्यम प्रतिष्ठा-विधिमें यजन करनेवाले चार विद्वान् ब्राह्मण तथा तेईस देवता होते हैं। इसमें नवग्रह, दिक्पाल, वरुण, पृथ्वी, शिव आदि देवताओंकी एक दिनमें ही पूजा सम्पन्न कर देवताकी प्रतिष्ठा की जाती है। जो मात्र गणपति, ग्रह-दिकपाल-वरुण और शिवकी अर्चना कर प्रतिष्ठा-

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२४३

विधान किया जाता है, वह कनिष्ठ विधि है। क्षुद्र देवताओंकी भी प्रतिमाएँ नाना प्रकारके वृक्षोंकी लकड़ियोंसे बनायी जाती हैं।

नवीन तालाब, बावली, कुण्ड और जल-पौंसा आदिका निर्माण कर संस्कार-कार्यके लिये गणेशादि-देवपूजन तथा हवनादि कार्य करने चाहिये। तदनन्तर उनमें वापी, पुष्करिणी (नदी) आदिका पवित्र जल तथा गङ्गाजल डालना चाहिये।

एकसठ हाथका प्रासाद उत्तम तथा इससे आधे प्रमाणका मध्यम और इसके आधे प्रमाणसे निर्मित प्रासाद कनिष्ठ माना जाता है। ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवालेको देवताओंकी प्रतिमाके मानसे प्रासादका निर्माण करना चाहिये। नूतन तडागका निर्माण करनेवाला अथवा जीर्ण तडागका नवीन रूपमें निर्माण करनेवाला व्यक्ति अपने सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वापी, कूप, तालाब, बगीचा तथा जलके निर्गम-स्थानको जो व्यक्ति बार-बार स्वच्छ या संस्कृत करता है, वह मुक्तिरूप उत्तम फल प्राप्त करता है। जहाँ विप्रों एवं देवताओंका निवास हो, उनके मध्यवर्ती स्थानमें वापी, तालाब आदिका निर्माण मानवोंको करना चाहिये। नदीके तटपर और श्मशानके समीप उनका निर्माण न करे। जो मनुष्य वापी, मन्दिर आदिकी प्रतिष्ठा नहीं करता, उसे अनिष्टका भय होता है तथा वह पापका भागी भी होता है। अतः जनसंकुल गाँवोंके समीप बड़े तालाब, मन्दिर, कूप आदिका निर्माण कर उनकी प्रतिष्ठा शास्त्रविधिसे करनी चाहिये। उनके शास्त्रीय विधिसे प्रतिष्ठित होनेपर उत्तम फल प्राप्त होते हैं। अतएव प्रयत्नपूर्वक मनुष्य न्यायोपाजित धनसे शुभ मुहूर्तमें शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक प्रतिष्ठा करे। भगवान्के कनिष्ठ, मध्यम या श्रेष्ठ मन्दिरको बनानेवाला व्यक्ति विष्णुलोकको प्राप्त होता है और क्रमिक मुक्तिको प्राप्त करता है।

जो व्यक्ति गिरे हुए या गिर रहे अर्थात् जीर्ण मन्दिरका रक्षण करता है, वह समस्त पुण्योंका फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति विष्णु, शिव, सूर्य, ब्रह्मा, दुर्गा तथा लक्ष्मीनारायण आदिके मन्दिरोंका निर्माण कराता है, वह अपने कुलका उद्धार कर कोटि कल्पतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। उसके बाद वहाँसे मृत्युलोकमें आकर राजा या पूज्यतम धनी होता है। जो भगवती त्रिपुरसुन्दरीके मन्दिरमें अनेक देवताओंकी स्थापना करता है, वह सम्पूर्ण विश्वमें स्मरणीय हो जाता है और स्वर्गलोकमें सदा पूजित होता है। जलकी महिमा अपरम्पार है। परोपकार या देव-कार्यमें एक दिन भी किया गया जलका उपयोग मातृकुल, पितृकुल, भार्याकुल तथा आचार्यकुलकी अनेक पीढ़ियोंको तार देता है। उसका स्वयंका भी उद्धार हो जाता है। अविमुक्त दशार्णव तीर्थमें देवार्चन करनेसे अपना उद्धार होता है तथा अपने पितृ-मातृ आदि कुलोंको भी वह तार देता है। जलके ऊपर तथा प्रासाद (देवालय)-के ऊपर रहनेके लिये घर नहीं बनवाना चाहिये। प्रतिष्ठित अथवा अप्रतिष्ठित शिवलिङ्गको कभी उखाड़ना नहीं चाहिये। इसी प्रकार अन्य देव-प्रतिमाओं और पूजित देववृक्षोंको चालित नहीं करना चाहिये। उसे चालित करनेवाले व्यक्तिको रौरव नरककी प्राप्ति होती है, परंतु यदि नगर या ग्राम उजड़ गये हों, अपना स्थान किसी कारण छोड़ना पड़े या विप्लव मचा हो तो उसकी पुनः प्रतिष्ठा बिना विचारके करनी चाहिये।

शुभ मुहूर्तके अभावमें देवमन्दिर तथा देववृक्ष आदि स्थापित नहीं करने चाहिये। बादमें उन्हें हटानेपर ब्रह्महत्याका दोष लगता है। देवताओंके मन्दिरके सामने पुष्करिणी आदि बनाने चाहिये। पुष्करिणी बनानेवाला अनन्त फल प्राप्तकर ब्रह्मलोकसे पुनः नीचे नहीं आता। (अध्याय ९)

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