भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
मध्यमपर्व
(प्रथम भाग)
गृहस्थाश्रम एवं धर्मकी महिमा
जयति भुवनदीपो भास्करो लोककर्ता
जयति च शितिदेहः शार्ङ्गधन्वा मुरारिः ।
जयति च शशिमौली रुद्रनामाभिधेयो
जयति सकलमौलिर्भानुमांश्चित्रभानुः ॥
‘संसारकी सृष्टि करनेवाले भुवनके दीपस्वरूप भगवान् भास्करकी जय हो। श्याम शरीरवाले शार्ङ्गधनुर्धारी भगवान् मुरारिकी जय हो। मस्तकपर चन्द्रमा धारण किये हुए भगवान् रुद्रकी जय हो। सभीके मुकुटमणि तेजोमय भगवान् चित्रभानु (सूर्य)-की जय हो।’
एक बार पौराणिकोंमें श्रेष्ठ रोमहर्षण सूतजीसे मुनियोंने प्रणामपूर्वक पुराण-संहिताके विषयमें पूछा। सूतजी मुनियोंके वचन सुनकर अपने गुरु सत्यवती-पुत्र महर्षि वेदव्यासको प्रणामकर कहने लगे। मुनियो! मैं जगत्के कारण ब्रह्मस्वरूपको धारण करनेवाले भगवान् हरिको प्रणामकर पापका सर्वथा नाश करनेवाले पुराणकी दिव्य कथा कहता हूँ, जिसके सुननेसे सभी पापकर्म नष्ट हो जाते हैं और परमगति प्राप्त होती है। द्विजगण! भगवान् विष्णुके द्वारा कहा गया भविष्यपुराण अत्यन्त पवित्र एवं आयुष्यप्रद है। अब मैं उसके मध्यमपर्वका वर्णन करता हूँ, जिसमें देव-प्रतिष्ठा आदि इष्टापूर्त-कर्मोंका वर्णन है। उसे आप सुनें—
इस मध्यमपर्वमें धर्म तथा ब्राह्मणादिकी प्रशंसा, आपद्वर्मका निरूपण, विद्या-माहात्म्य, प्रतिमा-निर्माण, प्रतिमा-स्थापना, प्रतिमाका लक्षण, काल-व्यवस्था, सर्ग-प्रतिसर्ग आदि पुराणका लक्षण, भूगोलका निर्णय, तिथियोंका निरूपण, श्राद्ध, संकल्प, मन्वन्तर, मुमुक्षु-
मरणासन्नके कर्म, दानका माहात्म्य, भूत, भविष्य, युग-धर्मानुशासन, उच्च-नीच-निर्णय, प्रायश्चित्त आदि विषयोंका भी समावेश है।
मुनियो! तीनों आश्रमोंका मूल एवं उत्पत्तिका स्थान गृहस्थाश्रम ही है। अन्य आश्रम इसीसे जीवित रहते हैं, अतः गृहस्थाश्रम सबसे श्रेष्ठ है। गार्हस्थ्य-जीवन ही धर्मानुशासित जीवन है। धर्मरहित होनेपर अर्थ और काम उसका परित्याग कर देते हैं। धर्मसे ही अर्थ और काम उत्पन्न होते हैं, मोक्ष भी धर्मसे ही प्राप्त होता है, अतः धर्मका ही आश्रयण करना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम यही त्रिवर्ग हैं। प्रकारान्तरसे ये क्रमशः त्रिगुण अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुणात्मक हैं। सात्त्विक अथवा धार्मिक व्यक्ति ही सच्ची उन्नति करते हैं, राजस मध्य स्थानको प्राप्त करते हैं। जघन्यगुण अर्थात् तामस व्यवहारवाले निम्न भूमिको प्राप्त करते हैं। जिस पुरुषमें धर्मसे समन्वित अर्थ और काम व्यवस्थित रहते हैं, वे इस लोकमें सुख भोगकर मरनेके अनन्तर मोक्षको प्राप्त करते हैं, इसलिये अर्थ और कामको समन्वित कर धर्मका आश्रय ग्रहण करे। ब्रह्मवादियोंने कहा है कि धर्मसे ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है। स्यावर-जङ्गम अर्थात् सम्पूर्ण चराचर विश्वको धर्म ही धारण करता है। धर्ममें धारण करनेकी जो शक्ति है, वह ब्राह्मी शक्ति है, वह आद्यन्तरहित है। कर्म और ज्ञानसे धर्म प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं। अतः ज्ञानपूर्वक कर्मयोगका आचरण करना चाहिये। प्रवृत्तिमूलक और निवृत्तिमूलकके भेदसे
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