भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 245
२३४* संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वैदिक कर्म दो प्रकारके हैं। ज्ञानपूर्वक त्याग संन्यास है, संन्यासियों एवं योगियोंके कर्म निवृत्तिपरक हैं और गृहस्थोंके वेद-शास्त्रानुकूल कर्म प्रवृत्तिपरक हैं। अतः प्रवृत्तिके सिद्ध हो जानेपर मोक्षकामीको प्रवृत्तिका आश्रय लेना चाहिये, नहीं तो पुनः-पुनः संसारमें आना पड़ता है। शम, दम, दया, दान, अलोभ, विषयोंका त्याग, सरलता या निश्छलता, निष्क्रोध, अनसूया, तीर्थयात्रा, सत्य, संतोष, आस्तिकता, श्रद्धा, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजन, विशेषरूपसे ब्राह्मणपूजा, अहिंसा, सत्यवादिता, निन्दाका परित्याग, शुभानुष्ठान, शौचाचार, प्राणियोंपर दया—ये श्रेष्ठ आचरण सभी वर्णोंके लिये सामान्य रूपसे कहे गये हैं। श्रद्धामूलक कर्म ही धर्म कहे गये हैं, धर्म श्रद्धाभावमें ही स्थित है, श्रद्धा ही निष्ठा है, श्रद्धा ही प्रतिष्ठा है और श्रद्धा ही धर्मकी जड़ है। विधिपूर्वक गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंको प्रजापतिलोक, क्षत्रियोंको इन्द्रलोक, वैश्योंको अमृतलोक और तीनों वर्णोंकी परिचर्यापूर्वक जीवन व्यतीत करनेवाले शूद्रोंको गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है। (अध्याय १)


सृष्टि तथा सात ऊर्ध्व एवं सात पाताल लोकोंका वर्णन

श्रीसूतजी बोले—मुनियो! अब मैं कल्पके अनुसार सैकड़ों मन्वन्तरोंके अनुगत ईश्वर-सम्बन्धी कालचक्रका वर्णन करता हूँ।

सृष्टिके पूर्व यह सब परम अन्धकार-निमग्न एवं सर्वथा अप्रतिज्ञात-स्वरूप था। उस समय परम कारण, व्यापक एकमात्र रुद्र ही अवस्थित थे। सर्वव्यापक भगवान्ने आत्मस्वरूपमें स्थित होकर सर्वप्रथम मनकी सृष्टि की। फिर अहंकारकी सृष्टि की। उससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध नामक पञ्चतन्मात्रा तथा पञ्चमहाभूतोंकी उत्पत्ति की। इनमेंसे आठ प्रकृति हैं (अर्थात् दूसरेको उत्पन्न करनेवाली हैं)—प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्शकी तन्मात्राएँ। पाँच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन—ये सोलह इनकी विकृतियाँ हैं। ये किसीकी भी प्रकृति नहीं हैं, क्योंकि इनसे किसीकी उत्पत्ति नहीं होती। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं। कानका शब्द, त्वक्‌का स्पर्श, चक्षुका रूप, जिह्वाका रस, नासिकाका गन्ध है। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यानके भेदसे वायुके पाँच प्रकार हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण कहे गये हैं। प्रकृति त्रिगुणात्मिका है और उससे उत्पन्न सारा चराचर विश्व भी त्रिगुणात्मक है। उस भगवान् वासुदेवके तेजसे ब्रह्मा, विष्णु और शम्भुका आविर्भाव हुआ है। वासुदेव अशरीरी, अजन्मा तथा अयोनिज हैं। उनसे परे कुछ भी नहीं है। वे प्रत्येक कल्पमें जगत् और प्राणियोंकी सृष्टि एवं उपसंहार भी करते हैं।

बहत्तर युगोंका एक मन्वन्तर तथा चौदह मन्वन्तरका एक कल्प होता है। यह कल्प ब्रह्माका एक दिन और रात है। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक और ब्रह्मलोक—ये सात लोक कहे गये हैं। पाताल, वितल, अतल, तल, तलातल, सुतल और रसातल—ये सात पाताल हैं। इनके आदि, मध्य और अन्तमें रुद्र रहते हैं। महेश्वर लीलाके लिये संसारको उत्पन्न करते हैं और संहार भी करते हैं। ब्रह्मप्राप्तिकी इच्छा करनेवालेकी ऊर्ध्वगति कही गयी है।

ऋषि सर्वदर्शी (परमात्मा)-ने सर्वप्रथम प्रकृतिकी सृष्टि की। उस प्रकृतिसे विष्णुके साथ ब्रह्मा उत्पन्न हुए। द्विजश्रेष्ठो! इसके बाद बुद्धिसे नैमित्तिकी