भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- मध्यमपर्व, प्रथम भाग * २३५
सृष्टि उत्पन्न हुई। इस सृष्टिक्रममें स्वयम्भुव ब्रह्माने सर्वप्रथम ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया। अनन्तर क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रकी सृष्टि की। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और दिशाओंकी कल्पना की। लोकालोक, द्वीपों, नदियों, सागरों, तीर्थों, देवस्थानों, मेघगर्जनों, इन्द्रधनुषों, उल्कापातों, केतुओं तथा विद्युत् आदिको उत्पन्न किया। यथासमय ये सभी उसी परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। ध्रुवसे ऊपर एक करोड़ योजन विस्तृत महर्लोक है। ब्राह्मण-श्रेष्ठ वहाँ कल्पान्तपर्यन्त रहते हैं। महर्लोकसे ऊपर दो करोड़ योजन विस्तृत जनलोक है, वहाँ ब्रह्माके पुत्र सनकादि रहते हैं। जनलोकसे ऊपर तीन करोड़ योजनवाला तपोलोक है, वहाँ तापत्रयरहित देवगण रहते हैं। तपोलोकसे ऊपर छः करोड़ योजन विस्तृत सत्यलोक है, जहाँ भृगु, वसिष्ठ, अत्रि, दक्ष, मरीचि आदि प्रजापतियोंका निवास है। जहाँ सनत्कुमार आदि सिद्ध योगिगण निवास करते हैं, वह ब्रह्मलोक कहा जाता है। उस लोकमें विश्वात्मा विश्वतोमुख गुरु ब्रह्मा रहते हैं। आस्तिक ब्रह्मवादी, यतिगण, योगी, तापस, सिद्ध तथा जापक उन परमेष्ठी ब्रह्माजीकी गाथाका गान इस प्रकार करते हैं—'परमपदकी प्राप्तिकी इच्छा करनेवाले योगियोंका द्वार यही परमपद लोक है। वहाँ जाकर किसी प्रकारका शोक नहीं होता। वहाँ जानेवाला विष्णु एवं शंकरस्वरूप हो जाता है। करोड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान यह स्थान बड़े कष्टसे प्राप्त होता है। ज्वालामालाओंसे परिव्यास इस पुरका वर्णन नहीं किया जा सकता।' इस ब्रह्मधाममें नारायणका भी भवन है। माया-सहचर परात्पर श्रीमान् हरि यहाँ शयन करते हैं। इसे ही पुनरावृत्तिसे रहित विष्णुलोक भी कहा जाता है। यहाँ आनेपर कोई भी लौटकर नहीं जाता। भगवान्के प्रपन्न महात्मागण ही जनार्दनको प्राप्त करते हैं। ब्रह्मासनसे ऊर्ध्व परम ज्योतिर्मय शुभ स्थान है। उसके ऊपर वह्नि परिव्यास है, वहीं पार्वतीके साथ भगवान् शिव विराजमान रहते हैं। सैकड़ों-हजारों विद्वान् और मनीषियोंद्वारा वे चिन्त्यमान होकर प्रतिष्ठित रहते हैं। वहाँ नियत ब्रह्मवादी द्विजगण ही जाते हैं। महादेवमें सतत ध्यानरत, तापस, ब्रह्मवादी, अहंता-ममताके अध्याससे रहित, काम-क्रोधसे शून्य, ब्रह्मत्व-समन्वित ब्राह्मण ही उनको देख सकते हैं—वही रुद्रलोक है। ये सातों महालोक कहे गये हैं।
द्विजगणो! पृथ्वीके नीचे महातल आदि पाताललोक हैं। महातल नामक पाताल स्वर्णमय तथा सभी वर्णोंसे अलंकृत है। वह विविध प्रासादों और शुभ देवालयोंसे समन्वित है। वहाँपर भगवान् अनन्त, बुद्धिमान् मुचुकुन्द तथा बलि भी निवास करते हैं। भगवान् शंकरसे सुशोभित रसातल शैलमय है। सुतल पीतवर्ण और वितल मूँगेकी कान्तिवाला है। वितल श्वेत और तल कृष्णवर्ण है। यहाँ वासुकि रहते हैं। कालनेमि वैनतेय, नमुचि, शङ्कुकर्ण तथा विविध नाग भी यहाँ निवास करते हैं। इनके नीचे रौरव आदि अनेकों नरक हैं, उसमें पापियोंको गिराया जाता है। पातालोंके नीचे शेष नामक वैष्णवी शरीर है। वहाँ कालाग्नि रुद्रस्वरूप नरसिंह भगवान् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु नागरूपी अनन्तके नामसे प्रसिद्ध हैं। (अध्याय २-३)