भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भूगोल एवं ज्योतिश्चक्रका वर्णन
श्रीसूतजी बोले—मुनियो! अब मैं भूलौकका वर्णन करता हूँ। भूलौकमें जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रीच्छ, शाक और पुष्कर नामके सात महाद्वीप हैं, जो सात समुद्रोंसे आवृत हैं। एक द्वीपसे दूसरे द्वीप क्रम-क्रमसे ठीक दूने-दूने आकार एवं विस्तारवाले हैं और एक सागरसे दूसरे सागर भी दूने आकारके हैं। क्षीरोद, इक्षुरसोद, क्षारोद, घृतोद, दध्योद, क्षीरसलिल तथा जलोद—ये सात महासागर हैं। यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत, समुद्रसे चारों ओरसे घिरी हुई तथा सात द्वीपोंसे समन्वित है। जम्बूद्वीप सभी द्वीपोंके मध्यमें सुशोभित हो रहा है। उसके मध्यमें सोनेकी कान्तिवाला महामेरु पर्वत है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। यह महामेरु पर्वत नीचेकी ओर सोलह हजार योजन पृथ्वीमें प्रविष्ट है और ऊपरी भागमें इसका विस्तार बत्तीस हजार योजन है। नीचे (तलहटी)-में इसका विस्तार सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत पृथ्वीरूप कमलकी कर्णिका (कोष)-के समान है। इस मेरु पर्वतके दक्षिणमें हिमवान्, हिमकूट और निषध नामके पर्वत हैं। उत्तरमें नील, श्वेत तथा शृंगी नामके वर्ष-पर्वत हैं। मध्यमें लक्ष्योजन प्रमाणवाले दो (निषध और नील) पर्वत हैं। उनसे दूसरे-दूसरे दस-दस हजार योजन कम हैं। (अर्थात् हेमकूट और श्वेत नब्बे हजार योजन तथा हिमवान् और शृंगी अस्सी-अस्सी हजार योजनतक फैले हुए हैं।) वे सभी दो-दो हजार योजन लम्बे और इतने ही चौड़े हैं।
द्विजो! मेरुके दक्षिण भागमें भारतवर्ष है, अनन्तर किंपुरुषवर्ष और हरिवर्ष ये मेरु पर्वतके दक्षिणमें हैं। उत्तरमें चम्पक, अश्व, हिरण्मय तथा उत्तरकुरुषवर्ष हैं। ये सब भारतवर्षके समान ही हैं। इनमेंसे प्रत्येकका विस्तार नौ सहस्र योजन है,
इनके मध्यमें इलावृतवर्ष है और उसके मध्यमें उन्नत मेरु स्थित है। मेरुके चारों ओर नौ सहस्र योजन विस्तृत इलावृतवर्ष है। महाभाग! इसके चारों ओर चार पर्वत हैं। ये चारों पर्वत मेरुकी कीलें हैं, जो दस सहस्र योजन परिमाणमें ऊँची हैं। इनमेंसे पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व है। इनपर कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट-वृक्ष हैं। महर्षिगण! जम्बूद्वीप नाम होनेका कारण महाजम्बू वृक्ष भी यहाँ है, उसके फल महान् गजराजके समान बड़े होते हैं। जब वे पर्वतपर गिरते हैं तो फटकर सब ओर फैल जाते हैं। उसीके रससे जम्बू नामकी प्रसिद्ध नदी वहाँ बहती है, जिसका जल वहाँके रहनेवाले पीते हैं। उस नदीके जलका पान करनेसे वहाँके निवासियोंको पसीना, दुर्गन्ध, बुढ़ापा और इन्द्रिय-क्षय नहीं होता। वहाँके निवासी शुद्ध हृदयवाले होते हैं। उस नदीके किनारेकी मिट्टी उस रससे मिलकर मन्द-मन्द वायुके द्वारा सुखाये जानेपर 'जाम्बूनद' नामक सुवर्ण बन जाती है, जो सिद्ध पुरुषोंका भूषण है।
मेरुके पास (पूर्वमें) भद्राश्ववर्ष और पश्चिममें केतुमालवर्ष है। इन दो वर्षोंके मध्यमें इलावृतवर्ष है। विप्रश्रेष्ठ! मेरुके ऊपर ब्रह्माका उत्तम स्थान है। उसके ऊपर इन्द्रका स्थान है और उसके ऊपर शंकरका स्थान है। उसके ऊपर वैष्णवलोका तथा उससे ऊपर दुर्गालोक है। इसके ऊपर सुवर्णमय, निराकार दिव्य ज्योतिर्मय स्थान है। उसके भी ऊपर भक्तोंका स्थान है, वहाँ भगवान् सूर्य रहते हैं। ये परमेश्वर भगवान् सूर्य ज्योतिर्मय चक्रके मध्यमें निश्चलरूपसे स्थित हैं। ये मेरुके ऊपर राशिचक्रमें भ्रमण करते हैं। भगवान् सूर्यका रथ-चक्र मेरु पर्वतकी नाभिमें रात-दिन वायुके द्वारा
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