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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भूगोल एवं ज्योतिश्चक्रका वर्णन

श्रीसूतजी बोले—मुनियो! अब मैं भूलौकका वर्णन करता हूँ। भूलौकमें जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रीच्छ, शाक और पुष्कर नामके सात महाद्वीप हैं, जो सात समुद्रोंसे आवृत हैं। एक द्वीपसे दूसरे द्वीप क्रम-क्रमसे ठीक दूने-दूने आकार एवं विस्तारवाले हैं और एक सागरसे दूसरे सागर भी दूने आकारके हैं। क्षीरोद, इक्षुरसोद, क्षारोद, घृतोद, दध्योद, क्षीरसलिल तथा जलोद—ये सात महासागर हैं। यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत, समुद्रसे चारों ओरसे घिरी हुई तथा सात द्वीपोंसे समन्वित है। जम्बूद्वीप सभी द्वीपोंके मध्यमें सुशोभित हो रहा है। उसके मध्यमें सोनेकी कान्तिवाला महामेरु पर्वत है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। यह महामेरु पर्वत नीचेकी ओर सोलह हजार योजन पृथ्वीमें प्रविष्ट है और ऊपरी भागमें इसका विस्तार बत्तीस हजार योजन है। नीचे (तलहटी)-में इसका विस्तार सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत पृथ्वीरूप कमलकी कर्णिका (कोष)-के समान है। इस मेरु पर्वतके दक्षिणमें हिमवान्, हिमकूट और निषध नामके पर्वत हैं। उत्तरमें नील, श्वेत तथा शृंगी नामके वर्ष-पर्वत हैं। मध्यमें लक्ष्योजन प्रमाणवाले दो (निषध और नील) पर्वत हैं। उनसे दूसरे-दूसरे दस-दस हजार योजन कम हैं। (अर्थात् हेमकूट और श्वेत नब्बे हजार योजन तथा हिमवान् और शृंगी अस्सी-अस्सी हजार योजनतक फैले हुए हैं।) वे सभी दो-दो हजार योजन लम्बे और इतने ही चौड़े हैं।

द्विजो! मेरुके दक्षिण भागमें भारतवर्ष है, अनन्तर किंपुरुषवर्ष और हरिवर्ष ये मेरु पर्वतके दक्षिणमें हैं। उत्तरमें चम्पक, अश्व, हिरण्मय तथा उत्तरकुरुषवर्ष हैं। ये सब भारतवर्षके समान ही हैं। इनमेंसे प्रत्येकका विस्तार नौ सहस्र योजन है,

इनके मध्यमें इलावृतवर्ष है और उसके मध्यमें उन्नत मेरु स्थित है। मेरुके चारों ओर नौ सहस्र योजन विस्तृत इलावृतवर्ष है। महाभाग! इसके चारों ओर चार पर्वत हैं। ये चारों पर्वत मेरुकी कीलें हैं, जो दस सहस्र योजन परिमाणमें ऊँची हैं। इनमेंसे पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व है। इनपर कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट-वृक्ष हैं। महर्षिगण! जम्बूद्वीप नाम होनेका कारण महाजम्बू वृक्ष भी यहाँ है, उसके फल महान् गजराजके समान बड़े होते हैं। जब वे पर्वतपर गिरते हैं तो फटकर सब ओर फैल जाते हैं। उसीके रससे जम्बू नामकी प्रसिद्ध नदी वहाँ बहती है, जिसका जल वहाँके रहनेवाले पीते हैं। उस नदीके जलका पान करनेसे वहाँके निवासियोंको पसीना, दुर्गन्ध, बुढ़ापा और इन्द्रिय-क्षय नहीं होता। वहाँके निवासी शुद्ध हृदयवाले होते हैं। उस नदीके किनारेकी मिट्टी उस रससे मिलकर मन्द-मन्द वायुके द्वारा सुखाये जानेपर 'जाम्बूनद' नामक सुवर्ण बन जाती है, जो सिद्ध पुरुषोंका भूषण है।

मेरुके पास (पूर्वमें) भद्राश्ववर्ष और पश्चिममें केतुमालवर्ष है। इन दो वर्षोंके मध्यमें इलावृतवर्ष है। विप्रश्रेष्ठ! मेरुके ऊपर ब्रह्माका उत्तम स्थान है। उसके ऊपर इन्द्रका स्थान है और उसके ऊपर शंकरका स्थान है। उसके ऊपर वैष्णवलोका तथा उससे ऊपर दुर्गालोक है। इसके ऊपर सुवर्णमय, निराकार दिव्य ज्योतिर्मय स्थान है। उसके भी ऊपर भक्तोंका स्थान है, वहाँ भगवान् सूर्य रहते हैं। ये परमेश्वर भगवान् सूर्य ज्योतिर्मय चक्रके मध्यमें निश्चलरूपसे स्थित हैं। ये मेरुके ऊपर राशिचक्रमें भ्रमण करते हैं। भगवान् सूर्यका रथ-चक्र मेरु पर्वतकी नाभिमें रात-दिन वायुके द्वारा

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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भ्रमण कराया जाता हुआ ध्रुवका आश्रय लेकर प्रतिष्ठित है। दिक्पाल आदि तथा ग्रह वहाँ दक्षिणसे उत्तर मार्गकी ओर प्रतिमास चलते रहते हैं। हास और वृद्धिके क्रमसे रविके द्वारा जब चान्द्रमास लङ्घित होता है, तब उसे मलमास कहा जाता है१। सूर्य, सोम, बुध, चन्द्र और शुक्र शीघ्रगामी ग्रह हैं। दक्षिणायन मार्गसे सूर्य गतिमान् होनेपर

सभी ग्रहोंके नीचे चलते हैं। विस्तीर्ण मण्डल कर उसके ऊपर चन्द्रमा गतिशील रहता है। सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल सोमसे ऊपर चलता है। नक्षत्रोंके ऊपर बुध और बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल और उससे ऊपर बृहस्पति तथा बृहस्पतिसे ऊपर शनि, शनिके ऊपर सप्तर्षिमण्डल और सप्तर्षिमण्डलके ऊपर ध्रुव स्थित है। (अध्याय ४)

ब्राह्मणोंकी महिमा तथा छब्बीस दोषोंका वर्णन

श्रीसूतजी बोले—हे द्विजोत्तम! तीनों वर्णोंमें ब्राह्मण जन्मसे प्रभु हैं। हव्य और कव्य सभौकी रक्षाके लिये तपस्याके द्वारा ब्राह्मणकी प्रथम सृष्टि की गयी है। देवगण इन्हींके मुखसे हव्य और पितृगण कव्य स्वीकार करते हैं। अतः इनसे श्रेष्ठ कौन हो सकता है। ब्राह्मण जन्मसे ही श्रेष्ठ हैं और सभौसे पूजनीय हैं। जिसके गर्भाधान आदि अङ्गतालीस संस्कार शास्त्रविधिसे सम्पन्न होते हैं, वही सच्चा ब्राह्मण है। द्विजकी पूजाकर देवगण स्वर्गफल भोगनेका लाभ प्राप्त करते हैं। अन्य मनुष्य भी ब्राह्मणकी पूजाकर देवत्वको प्राप्त करते हैं। जिसपर ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। वेद भी ब्राह्मणोंके मुखमें सन्निहित रहते हैं। सभी विषयोंका ज्ञान होनेके कारण ब्राह्मण ही देवताओंकी पूजा, पितृकार्य, यज्ञ, विवाह, वह्निकार्य, शान्तिकर्म, स्वस्त्ययन आदिके सम्पादनमें प्रशस्त है। ब्राह्मणके बिना देवकार्य, पितृकार्य तथा यज्ञ-कर्मोंमें दान, होम और बलि—ये सभी निष्फल होते हैं।

ब्राह्मणको देखकर श्रद्धापूर्वक अभिवादन करना

चाहिये, उसके द्वारा कहे गये 'दीर्घायुर्भव' शब्दसे मनुष्य चिरजीवी होता है। द्विजश्रेष्ठ! ब्राह्मणकी पूजासे आयु, कीर्ति, विद्या और धनकी वृद्धि होती है। जहाँ जलसे विप्रोंका पाद-प्रक्षालन नहीं किया जाता, वेद-शास्त्रोंका उच्चारण नहीं होता और जहाँ स्वाहा, स्वधा और स्वस्तिकी ध्वनि नहीं होती, ऐसा गृह श्मशानके समान है२।

विद्वानोंने नरकगामी मनुष्योंके छब्बीस दोष बतलाये हैं, जिन्हें त्यागकर शुद्धतापूर्वक निवास करना चाहिये—(१) अधम, (२) विषम, (३) पशु, (४) पिशुन, (५) कृपण, (६) पापिष्ठ, (७) नष्ट, (८) रुष्ट, (९) दुष्ट, (१०) पुष्ट, (११) हष्ट, (१२) काण, (१३) अन्ध, (१४) खण्ड, (१५) चण्ड, (१६) कुष्ठ, (१७) दत्तापहारक, (१८) वक्ता, (१९) कदर्य, (२०) दण्ड, (२१) नीच, (२२) खल, (२३) वाचाल, (२४) चपल, (२५) मलीमस तथा (२६) स्तेयी।

उपर्युक्त छब्बीस दोषोंके भी अनेक भेद-प्रभेद बतलाये गये हैं। विप्रेन्द्र! इन (छब्बीस) दोषोंका विवरण संक्षेपमें इस प्रकार है—

१-रविणा लङ्घितो मासश्चान्द्रः ख्यातो मलित्मनुचः। (मध्यमपर्व १।४।२७)

प्रकारान्तरे यद् श्लोक ज्योतिषके 'संक्रान्तिरहितो मासो मलमास उदाहृतः।' इसी वचनके भावका द्योतक है।

२-न विप्रपादोदककर्दमानि न वेदशास्त्रप्रतिगजितानि। स्वाहास्वधार्स्वस्तिविर्वाजितानि श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि ॥

(मध्यमपर्व १।५।२२)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

१. गुरु तथा देवताके सम्मुख जूता और छाता धारणकर जानेवाले, गुरुके सम्मुख उच्च आसनपर बैठनेवाले, यानपर चढ़कर तीर्थ-यात्रा करनेवाले तथा तीर्थमें ग्राम्य धर्मका आचरण करनेवाले—ये सभी अधम-संज्ञक दोषयुक्त व्यक्ति कहे गये हैं। २. प्रकटमें प्रिय और मधुर वाणी बोलनेवाले पर हृदयमें हालाहल विष धारण करनेवाले, कहते कुछ और हैं तथा आचरण कुछ और ही करते हैं—ये दोनों विषम-संज्ञक दोषयुक्त व्यक्ति कहे जाते हैं। ३. मोक्षकी चिन्ता छोड़कर सांसारिक चिन्ताओंमें श्रम करनेवाले, हरिकी सेवासे रहित, प्रयागमें रहते हुए भी अन्यत्र स्नान करनेवाले, प्रत्यक्ष देवको छोड़कर अदृष्टकी सेवा करनेवाले तथा शास्त्रोंके सार-तत्त्वको न जाननेवाले—ये सभी पशु-संज्ञक दोषयुक्त व्यक्ति हैं। ४. बलसे अथवा छल-छद्मसे या मिथ्या प्रेमका प्रदर्शन कर ठगनेवाले व्यक्तिको पिशुन दोषयुक्त कहा गया है। ५. देव-सम्बन्धी और पितृ-सम्बन्धी कर्मोंमें मधुर अन्नकी व्यवस्था रहते हुए भी म्लान और तित्त अन्नका भोजन करानेवाला दुर्बुद्धि मानव कृपण है, उसे न तो स्वर्ग मिलता है और न मोक्ष ही। जो अप्रसन्न मनसे कुत्सित वस्तुका दान करता एवं क्रोधके साथ देवता आदिकी पूजा करता है, वह सभी धर्मोंसे बहिष्कृत कृपण कहा जाता है। निर्दुष्ट होते हुए भी शुभका परित्याग तथा शुभ शरीरका विक्रय करनेवाला कृपण कहलाता है। ६. माता-पिता और गुरुका त्याग करनेवाला, पवित्राचाररहित, पिताके सम्मुख निःसंकोच भोजन करनेवाला, जीवित पिता-माताका परित्याग करनेवाला, उनकी कभी भी सेवा न करनेवाला तथा होम-यज्ञादिका लोप करनेवाला पापिष्ट कहलाता है। ७. साधु आचरणका परित्याग कर

छूटी सेवाका प्रदर्शन करनेवाले, वेश्यागामी, देव-धनके द्वारा जीवन-यापन करनेवाले, भायोंके व्यभिचारद्वारा प्राप्त धनसे जीवन-यापन करनेवाले या कन्याको बेचकर अथवा स्त्रीके धनसे जीवन-यापन करनेवाले—ये सब नष्ट-संज्ञक व्यक्ति हैं—ये स्वर्ग एवं मोक्षके अधिकारी नहीं हैं। ८. जिसका मन सदा क्रुद्ध रहता है, अपनी हीनता देखकर जो क्रोध करता है, जिसकी भाँहें कुटिल हैं तथा जो क्रुद्ध और रुष्ट स्वभाववाला है—ऐसे ये पाँच प्रकारके व्यक्ति रुष्ट कह गये हैं। ९. अकार्यमें या निन्दित आचारमें ही जीवन व्यतीत करनेवाला, धर्मकार्यमें अस्थिर, निद्रालु, दुर्व्यसनमें आसक्त, मद्यपायी, स्त्री-सेवी, सदैव दुष्टोंके साथ वार्तालाप करनेवाला—ऐसे सात प्रकारके व्यक्ति दुष्ट कहे गये हैं। १०. अकेले ही मधुर-मिष्टान्न भक्षण करनेवाले, वञ्चक, सज्जनोंके निन्दक, शूकरके समान वृत्तिवाले—ये सब पुष्ट संज्ञक व्यक्ति कहे जाते हैं। ११. जो निगम (वेद), आगम (तन्त्र)-का अध्ययन नहीं करता है और न इन्हें सुनता ही है, वह पापात्मा हष्ट कहा जाता है। १२-१३. श्रुति और स्मृति ब्राह्मणोंके ये दो नेत्र हैं। एकसे रहित व्यक्ति काना और दोनोंसे हीन अन्धा कहा जाता है*। १४. अपने सहोदरसे विवाद करनेवाला, माता-पिताके लिये अप्रिय वचन बोलनेवाला खण्ड कहा जाता है। १५. शास्त्रकी निन्दा करनेवाला, चुगलखोर, राजगामी, शूद्रसेवक, शूद्रकी पत्नीसे अनाचरण करनेवाला, शूद्रके घरपर पके हुए अन्नको एक बार भी खानेवाला या शूद्रके घरपर पाँच दिनोंतक निवास करनेवाला व्यक्ति चण्डदोषवाला कहा जाता है। १६. आठ प्रकारके कुष्टोंसे समन्वित, त्रिकुष्टी, शास्त्रमें निन्दित व्यक्तियोंके साथ वार्तालाप करनेवाला अधम व्यक्ति कुष्ट-दोषयुक्त कहा जाता

  • श्रुति स्मृतिश्च विप्राणां नयने द्वे विनिर्मिते। एकेन विकलः काणो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः ॥ (मध्यमपर्व १।५।५७)

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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है। १७. कीटके समान भ्रमण करनेवाला, कुत्सित-दोषसे युक्त व्यापार करनेवाला दतापहारक कहा गया है। १८. कुपण्डित एवं अज्ञानी होते हुए भी धर्मका उपदेश देनेवाला वक्ता है। १९. गुरुजनोंकी वृत्तिको हरण करनेकी चेष्टा करनेवाला तथा काशी-निवासी व्यक्ति यदि बहुत दिन काशीको छोड़कर अन्यत्र निवास करता है, वह कर्दय (कंजूस) है। २०. मिथ्या क्रोधका प्रदर्शन करनेवाला तथा राजा न होते हुए भी दण्ड-विधान करनेवाला व्यक्ति दण्ड (उदण्ड) कहा जाता है। २१. ब्राह्मण, राजा और देव-सम्बन्धी धनका हरण कर, उस धनसे अन्य देवता या ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेवाला या उस धनका भोजन या अन्नको देनेवाला व्यक्ति खरके समान नीच है, जो अक्षर-अभ्यासमें तत्पर व्यक्ति केवल पढ़ता है, किंतु समझता नहीं, व्याकरण-शास्त्रशून्य व्यक्ति पशु है, जो गुरु और देवताके आगे कहता कुछ है और करता कुछ और है, अनाचारी-दुराचारी है वह नीच कहा जाता है। २२. गुणवान् एवं सज्जनोंमें जो दोषका अन्वेषण करता है वह व्यक्ति खल कहलाता है। २३. भाग्यहीन व्यक्तिसे परिहासयुक्त वचन बोलनेवाला तथा चाण्डालोंके साथ निर्लज्ज होकर वार्तालाप

करनेवाला वाचाल कहा जाता है। २४. पक्षियोंके पालनेमें तत्पर, बिल्लीके द्वारा आनीत भक्ष्यको बाँटनेके बहाने बंदरकी भाँति स्वयं भक्षण करनेवाला, व्यर्थमें तृणका छेदक, मिट्टीके ढेलेको व्यर्थमें भेदन करनेवाला, मांस भक्षण करनेवाला और अन्यकी स्त्रीमें आसक्त रहनेवाला व्यक्ति चपल कहलाता है। २५. तैल, उबटन आदि न लगानेवाला, गन्ध और चन्दनसे शून्य, नित्यकर्मको न करनेवाला व्यक्ति मलीमस कहलाता है। २६. अन्यायसे अन्यके घरका धन ले लेनेवाला तथा अन्यायसे धन कमानेवाला, शास्त्र-निषिद्ध धनोंको ग्रहण करनेवाला, देव-पुस्तक, रत्न, मणि-मुक्ता, अश्म, गौ, भूमि तथा स्वर्णका हरण करनेवाला स्तेयी (चोर) कहा जाता है। साथ ही देव-चिन्तन तथा परस्पर कल्याण-चिन्तन न करनेवाले, गुरु तथा माता-पिताका पोषण न करनेवाले और उनके प्रति पालनीय कर्तव्यका आचरण न करनेवाले एवं उपकारी व्यक्तिके साथ समुचित व्यवहार न करनेवाले—ये सभी स्तेयी हैं। इन सभी दोषोंसे युक्त व्यक्ति रक्तपूर्ण नरकमें निवास करते हैं। इनका सम्यक् ज्ञान सम्पन्न हो जानेपर मनुष्य देवत्वको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय ५)

माता, पिता एवं गुरुकी महिमा

श्रीसूतजी बोले—द्विजश्रेष्ठ! चारों वर्णोंके लिये पिता ही सबसे बड़ा अपना सहायक है। पिताके समान अन्य कोई अपना बन्धु नहीं है, ऐसा वेदोंका कथन है। माता-पिता और गुरु—ये तीनों पथप्रदर्शक हैं, पर इनमें माता ही सर्वोपरि है। भाइयोंमें जो क्रमशः बड़े हैं, वे क्रम-क्रमसे

ही विशेष आदरके पात्र हैं। इन्हें द्वादशी, अमावास्या तथा संक्रान्तिके दिन यथारुचि मणियुक्त वस्त्र दक्षिणाके रूपमें देना चाहिये, दक्षिणायन और उत्तरायणमें, विषुव संक्रान्तिमें तथा चन्द्र-सूर्य-ग्रहणके समय यथाशक्ति इन्हें भोजन कराना चाहिये; अनन्तर इन मन्त्रोंसे* इनकी चरण-वन्दना करनी चाहिये;

  • स्वर्गापवर्गप्रदमेकमाद्यं ब्रह्मस्वरूपं पितरं नमामि । यतो जगत् पश्यति चारूपं तं तर्पयामः सलिलैस्तिलैर्युतैः ॥

पितरो जनयन्तीह पितरः पालयन्ति च । पितरो ब्रह्मरूपा हि तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥

यस्माद्विजयते लोकस्तस्माद्धर्मः प्रवर्तते । नमस्तुभ्यं पितः साक्षाद्ब्रह्मरूपं नमोऽस्तु ते ॥

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

क्योंकि विधिपूर्वक वन्दन करनेसे ही सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग और अपवर्ग-रूपी फलको प्रदान करनेवाले एक आद्य ब्रह्मस्वरूप पिताको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनकी प्रसन्नतासे संसार सुन्दररूपमें दिखायी देता है, उन पिताका मैं तिलयुक्त जलसे तर्पण करता हूँ। पिता ही जन्म देता है, पिता ही पालन करता है, पितृगुण ब्रह्मस्वरूप हैं, उन्हें नित्य पुनः-पुनः नमस्कार है। हे पितः ! आपके अनुग्रहसे लोकधर्म प्रवर्तित होता है, आप साक्षात् ब्रह्मरूप हैं, आपको नमस्कार है।

जो अपने उदररूपी विवरमें रखकर स्वयं उसकी सभी प्रकारसे रक्षा करती है, उस परा प्रकृतिस्वरूपा जननीदेवीको नमस्कार है। मातः ! आपने बड़े कष्टसे मुझे अपने उदर-प्रदेशमें धारण किया, आपके अनुग्रहसे मुझे यह संसार देखनेको मिला, आपको बार-बार नमस्कार है। पृथिवीपर जितने तीर्थ और सागर आदि हैं उन सबकी स्वरूपभूता आपको अपनी कल्याण-प्राप्तिके लिये मैं नमस्कार करता हूँ। जिन गुरुदेवके प्रसादसे मैं यशस्करी विद्या प्राप्त की है,

उन भवसागरके सेतुस्वरूप शिवरूप गुरुदेवको मेरा नमस्कार है। अग्रजन्मन् ! वेद और वेदाङ्ग-शास्त्रोंके तत्त्व आपमें प्रतिष्ठित हैं। आप सभी प्राणियोंके आधार हैं, आपको मेरा नमस्कार है। ब्राह्मण सम्पूर्ण संसारके चलते-फिरते परम पावन तीर्थस्वरूप हैं। अतः हे विष्णुरूपी भूदेव ! आप मेरा पाप नष्ट करें, आपको मेरा नमस्कार है।

द्विजो ! जैसे पिता श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पिताके बड़े-छोटे भाई और अपने बड़े भाई भी पिताके समान ही मान्य एवं पूज्य हैं। आचार्य ब्रह्माकी, पिता प्रजापतिकी, माता पृथ्वीकी और भाई अपनी ही मूर्ति हैं। पिता मेरुस्वरूप एवं वसिष्ठ-स्वरूप सनातन धर्ममूर्ति हैं। ये ही प्रत्यक्ष देवता हैं, अतः इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार पितामह एवं पितामही (दादा-दादी)-के भी पूजन-वन्दन, रक्षण, पालन और सेवनकी अत्यन्त महिमा है। इनकी सेवाके पुण्योंकी तुलनामें कोई नहीं है, क्योंकि ये माता-पिताके भी परम पूज्य हैं। (अध्याय ६)

पुराण-श्रवणकी विधि तथा पुराण-वाचककी महिमा

श्रीसूतजी बोले—ब्राह्मणो ! पूर्वकालमें महातेजस्वी ब्रह्माजीने पुराण-श्रवणकी जिस विधिको मुझसे कहा था, उसे मैं आपको सुना रहा हूँ, आप सुनें। इतिहास-पुराणोंके भक्तिपूर्वक सुननेसे ब्रह्महत्या

आदि सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है, जो प्रातः-सायं तथा रात्रिमें पवित्र होकर पुराणोंका श्रवण करता है, उसपर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर संतुष्ट हो जाते हैं*। प्रातःकाल इसके पढ़ने और सुननेवालेसे

या कुक्षिविरे कृत्वा स्वयं रक्षति सर्वतः । नमामि जननीं देवीं परां प्रकृतिरूपिणीम् ॥ कुच्छेण महता देव्या धारितोऽहं यथोदरे । त्वत्प्रसादाज्जगददृष्टं मातरित्यं नमोऽस्तु ते ॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि सागरादीनि सर्वशः । वसन्ति यत्र तां नौमि मातरं भूतिहेतवे ॥ गुरुदेवप्रसादेन लब्धा विद्यायशस्करी । शिवरूपं नमस्तस्मै संसारार्णवसेतवे ॥ वेदवेदाङ्गशास्त्राणां तत्त्वं यत्र प्रतिष्ठितम् । आधारः सर्वभूतानामग्रजन्मन् नमोऽस्तु ते ॥ ब्राह्मणो जगतां तीर्थं पावनं परमं यतः । भूदेव हर मे पापं विष्णुरूपिन् नमोऽस्तु ते ॥

(मध्यमपर्व १।६।६-१४)

  • इतिहासपुराणानि श्रुत्वा भक्त्याद्विजोत्तमाः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्महत्याशतं च यत् ॥

सायं प्रातस्तथा राज्ञो शुचिर्भूत्वा शृणोतियः । तस्य विष्णुस्तथा ब्रह्मा तुष्ट्यते शङ्करस्तथा ॥

(मध्यमपर्व १।७।३-४)

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं तथा सायंकालमें भगवान् विष्णु और रातमें भगवान् शंकर संतुष्ट होते हैं। पुराण-श्रवण करनेवालेको शुक्ल वस्त्र धारण कर कृष्ण-मृगचर्म तथा कुशके आसनपर बैठना चाहिये। आसन न अधिक ऊँचा हो और न अधिक नीचा। पहले देवता और गुरुकी तीन प्रदक्षिणा करे, तदनन्तर दिव्यालोंको नमस्कार करे। फिर ओंकारमें अधिष्ठित देवताओंको नमस्कार करे एवं शाश्वत धर्ममें अधिष्ठित धर्मशास्त्र-ग्रन्थोंको भी नमस्कार करे।

श्रोताका मुख दक्षिण दिशाकी ओर और वाचकका मुख उत्तरकी ओर हो। पुराण और महाभारत कथाकी यही विधि कही गयी है। हरिवंश, रामायण और धर्मशास्त्रके श्रवणकी इससे विपरीत विधि कही गयी है। अतः निर्दिष्ट विधिसे सुनना या पढ़ना चाहिये। देवालय या तीर्थोंमें इतिहास-पुराणके वाचनके समय सर्वप्रथम उस स्थान और उस तीर्थके माहात्म्यका वर्णन करना चाहिये। अनन्तर पुराणादिका वाचन करना चाहिये। माहात्म्यके श्रवणसे गोदानका फल मिलता है। गुरुकी आज्ञासे माता-पिताका अभिवादन करना चाहिये। ये वेदके समान, सर्वधर्ममय तथा सर्वज्ञानमय हैं। अतः द्विजश्रेष्ठ! माता-पिताकी सेवासे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।

पुराणादि पुस्तकोंका हरण करनेवाला नरकको प्राप्त होता है। वेदादि ग्रन्थों तथा तान्त्रिक मन्त्रोंको स्वयं लिखकर उनका वाचन न करे। वाचकोंको चाहिये कि वेदमन्त्रोंका विपरीत अर्थ न बतलायें और न वेदमन्त्रोंका अशुद्ध पाठ करें। क्योंकि ये दोनों अत्यन्त पवित्र हैं, ऐसा करनेपर उन्हें पावमानी ऋचाओंका सौ बार जप करना चाहिये। पुराणादिके प्रारम्भ, मध्य और अवसानमें तथा मन्त्रमें प्रणवका उच्चारण करना चाहिये।

देवनिर्मित पुस्तकको त्रिदेव-स्वरूप समझकर

गन्ध-पुष्पादिसे उसकी पूजा करनी चाहिये। ग्रन्थके बाँधनेवाले (धागा) सूत्रको नागराज वासुकिका स्वरूप समझना चाहिये। इनका सम्मान न करनेपर दोष होता है। अतः उसका कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिये। ग्रन्थके पत्रोंको भगवान् ब्रह्मा, अक्षरोंको जनार्दन, अक्षरोंमें लगी मात्राओंको अव्यय प्रकृति, लिपिको महेश तथा लिपिकी मात्राओंको सरस्वती समझना चाहिये।

पुराण-वाचकको चाहिये कि पुराण-संहिताओंमें परिगणित सभी व्यास, जैमिनि आदि महर्षियों तथा शंकर, विष्णु आदि देवताओंको आदि, मध्य और अवसानमें नमस्कार करे। इनका स्मरण कर धर्मशास्त्रार्थवेत्ता विप्रको पुराणादिका एकाग्रचित्त हो पाठ करना चाहिये। वाचकको स्पष्टाक्षरोंमें उच्चारण करते हुए सुन्दर ध्वनिमें सभी प्रकारणोंके तात्त्विक अर्थोंको स्पष्ट बतलाना चाहिये। पुराणादि-धर्मसंहिताके श्रवणसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र विशेषतः अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करते हैं एवं सभी कामनाओंको भी प्राप्त कर लेते हैं तथा सभी पापोंसे मुक्त होकर बहुत-से पुण्योंकी प्राप्ति कर लेते हैं।

जो वाचक सदा सम्पूर्ण ग्रन्थके अर्थ एवं तात्पर्यको सम्यक् रूपसे जानता है, वही उपदेश करनेके योग्य है और वही विप्र व्यास कहा जाता है। ऐसे वाचक विप्र जिस नगर या ग्राममें रहते हैं, वह पुण्यक्षेत्र कहा जाता है। वहाँके निवासी धन्य तथा सफल-आत्मा हैं, कृतार्थ हैं एवं उनके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

जैसे सूर्यरहित दिन, चन्द्रशून्य रात्रि, बालकोंसे शून्य गृह तथा सूर्यके बिना ग्रहोंकी शोभा नहीं होती, वैसे ही व्याससे रहित सभाकी भी शोभा नहीं होती।

श्रीसूतजी बोले—द्विजोत्तम! गुरुको चाहिये

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कि अध्यात्मविषयक पुराणका अध्यापन ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, भक्त, शान्त, वैष्णव, क्रोधरहित तथा जितेन्द्रिय शिष्यको कराये। अन्यायसे धनार्जन करनेवाले, निर्भय, दाम्भिक, द्वेषी, निरर्थक और मन्थर गतिवाले एवं सेवारहित, यज्ञ न करनेवाले, पुरुषत्वहीन, कठोर, क्रुद्ध, कृपण, व्यसनी तथा निन्दक शिष्यको दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। पुत्र-पौत्र आदिके अतिरिक्त नम्र व्यक्तिको भी विद्या देनी चाहिये। विद्याको अपने साथ लेकर मर जाना अच्छा है, किंतु अनधिकारी व्यक्तिको विद्या नहीं देनी चाहिये। विद्या कहती है कि मुझे भक्तिहीन, दुर्जन तथा दुष्टात्मा व्यक्तिको प्रदान मत करो, मुझे अप्रमादी, पवित्र, ब्रह्मचारी, सार्थक तथा विधिज्ञ

सज्जनको ही दो। यदि निषिद्ध व्यक्तिको श्रेष्ठ विद्याधन दिया जाता है तो दाता और ग्रहणकर्ता—इन दोनोंमेंसे एक स्वल्प समयमें ही यमपुरी चला जाता है। पढ़नेवालेको चाहिये कि वह आध्यात्मिक, वैदिक, अलौकिक विद्या पढ़ानेवालेको प्रथम सादर प्रणाम कर अध्ययन करे। कर्मकाण्डका अध्ययन बिना ज्योतिषज्ञानके नहीं करना चाहिये। जो विषय शास्त्रोंमें नहीं कहे गये हैं और जो म्लेच्छोद्गारा कथित हैं, उनका कभी भी अभ्यास नहीं करना चाहिये। जो स्वयं धर्माचरण कर धर्मका उपदेश करता है, वही ज्ञान देनेवाला पिता एवं गुरु-स्वरूप है तथा ऐसे ज्ञानदाताका ही धर्म प्रवर्तित होता है। (अध्याय ७-८)

पूर्त-कर्म-निरूपण

सूतजीने कहा—ब्राह्मणो! युगान्तरमें ब्रह्माने जिस अन्तर्वेदि और बहिर्वेदिकी बात बतलायी है, वह द्वापर और कलियुगके लिये अत्यन्त उत्तम मानी गयी है। जो कर्म ज्ञानसाध्य है, उसे अन्तर्वेदिकर्म कहते हैं। देवताकी स्थापना और पूजा बहिर्वेदि (पूर्त)-कर्म है। वह बहिर्वेदिकर्म दो प्रकारका है—कुओं, पोखरा, तालाब आदि खुदवाना और ब्राह्मणोंको संतुष्ट करना तथा गुरुजनोंकी सेवा।

निष्कामभावपूर्वक किये गये कर्म तथा व्यसनपूर्वक किया गया हरिस्मरणादि श्रेष्ठ कर्म अन्तर्वेदि-कर्मके अन्तर्गत आते हैं, इनके अतिरिक्त अन्य कर्म बहिर्वेदिकर्म कहलाते हैं। धर्मका कारण राजा होता है, इसलिये राजाको धर्मका पालन करना चाहिये और राजाका आश्रय लेकर प्रजाको भी बहिर्वेदि (पूर्त)-कर्मोंका पालन करना चाहिये। यों तो बहिर्वेदि (पूर्त)-कर्म सतासी प्रकारके कहे गये हैं, फिर भी इनमें तीन प्रधान हैं—

देवताका स्थापन, प्रासाद और तडाग आदिका निर्माण। इसके अतिरिक्त गुरुजनोंकी पूजापूर्वक पितृपूजा, देवताओंका अधिवासन और उनकी प्रतिष्ठा, देवता-प्रतिमा-निर्माण तथा वृक्षारोपण आदि भी पूर्त-कर्म हैं।

देवताओंकी प्रतिष्ठा उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ-भेदसे तीन प्रकारकी होती है। प्रतिष्ठामें पूजा, हवन तथा दान आदि ये तीन कर्म प्रधान हैं। तीन दिनोंमें सम्पन्न होनेवाले प्रतिष्ठा-विधानोंमें अट्टाईस देवताओंकी पूजा तथा जापकरूपमें सोलह ब्राह्मण रखकर प्रतिष्ठा करानी चाहिये। प्रतिष्ठाकी यह उत्तम विधि कही गयी है। ऐसा करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। मध्यम प्रतिष्ठा-विधिमें यजन करनेवाले चार विद्वान् ब्राह्मण तथा तेईस देवता होते हैं। इसमें नवग्रह, दिक्पाल, वरुण, पृथ्वी, शिव आदि देवताओंकी एक दिनमें ही पूजा सम्पन्न कर देवताकी प्रतिष्ठा की जाती है। जो मात्र गणपति, ग्रह-दिकपाल-वरुण और शिवकी अर्चना कर प्रतिष्ठा-

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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विधान किया जाता है, वह कनिष्ठ विधि है। क्षुद्र देवताओंकी भी प्रतिमाएँ नाना प्रकारके वृक्षोंकी लकड़ियोंसे बनायी जाती हैं।

नवीन तालाब, बावली, कुण्ड और जल-पौंसा आदिका निर्माण कर संस्कार-कार्यके लिये गणेशादि-देवपूजन तथा हवनादि कार्य करने चाहिये। तदनन्तर उनमें वापी, पुष्करिणी (नदी) आदिका पवित्र जल तथा गङ्गाजल डालना चाहिये।

एकसठ हाथका प्रासाद उत्तम तथा इससे आधे प्रमाणका मध्यम और इसके आधे प्रमाणसे निर्मित प्रासाद कनिष्ठ माना जाता है। ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवालेको देवताओंकी प्रतिमाके मानसे प्रासादका निर्माण करना चाहिये। नूतन तडागका निर्माण करनेवाला अथवा जीर्ण तडागका नवीन रूपमें निर्माण करनेवाला व्यक्ति अपने सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वापी, कूप, तालाब, बगीचा तथा जलके निर्गम-स्थानको जो व्यक्ति बार-बार स्वच्छ या संस्कृत करता है, वह मुक्तिरूप उत्तम फल प्राप्त करता है। जहाँ विप्रों एवं देवताओंका निवास हो, उनके मध्यवर्ती स्थानमें वापी, तालाब आदिका निर्माण मानवोंको करना चाहिये। नदीके तटपर और श्मशानके समीप उनका निर्माण न करे। जो मनुष्य वापी, मन्दिर आदिकी प्रतिष्ठा नहीं करता, उसे अनिष्टका भय होता है तथा वह पापका भागी भी होता है। अतः जनसंकुल गाँवोंके समीप बड़े तालाब, मन्दिर, कूप आदिका निर्माण कर उनकी प्रतिष्ठा शास्त्रविधिसे करनी चाहिये। उनके शास्त्रीय विधिसे प्रतिष्ठित होनेपर उत्तम फल प्राप्त होते हैं। अतएव प्रयत्नपूर्वक मनुष्य न्यायोपाजित धनसे शुभ मुहूर्तमें शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक प्रतिष्ठा करे। भगवान्के कनिष्ठ, मध्यम या श्रेष्ठ मन्दिरको बनानेवाला व्यक्ति विष्णुलोकको प्राप्त होता है और क्रमिक मुक्तिको प्राप्त करता है।

जो व्यक्ति गिरे हुए या गिर रहे अर्थात् जीर्ण मन्दिरका रक्षण करता है, वह समस्त पुण्योंका फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति विष्णु, शिव, सूर्य, ब्रह्मा, दुर्गा तथा लक्ष्मीनारायण आदिके मन्दिरोंका निर्माण कराता है, वह अपने कुलका उद्धार कर कोटि कल्पतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। उसके बाद वहाँसे मृत्युलोकमें आकर राजा या पूज्यतम धनी होता है। जो भगवती त्रिपुरसुन्दरीके मन्दिरमें अनेक देवताओंकी स्थापना करता है, वह सम्पूर्ण विश्वमें स्मरणीय हो जाता है और स्वर्गलोकमें सदा पूजित होता है। जलकी महिमा अपरम्पार है। परोपकार या देव-कार्यमें एक दिन भी किया गया जलका उपयोग मातृकुल, पितृकुल, भार्याकुल तथा आचार्यकुलकी अनेक पीढ़ियोंको तार देता है। उसका स्वयंका भी उद्धार हो जाता है। अविमुक्त दशार्णव तीर्थमें देवार्चन करनेसे अपना उद्धार होता है तथा अपने पितृ-मातृ आदि कुलोंको भी वह तार देता है। जलके ऊपर तथा प्रासाद (देवालय)-के ऊपर रहनेके लिये घर नहीं बनवाना चाहिये। प्रतिष्ठित अथवा अप्रतिष्ठित शिवलिङ्गको कभी उखाड़ना नहीं चाहिये। इसी प्रकार अन्य देव-प्रतिमाओं और पूजित देववृक्षोंको चालित नहीं करना चाहिये। उसे चालित करनेवाले व्यक्तिको रौरव नरककी प्राप्ति होती है, परंतु यदि नगर या ग्राम उजड़ गये हों, अपना स्थान किसी कारण छोड़ना पड़े या विप्लव मचा हो तो उसकी पुनः प्रतिष्ठा बिना विचारके करनी चाहिये।

शुभ मुहूर्तके अभावमें देवमन्दिर तथा देववृक्ष आदि स्थापित नहीं करने चाहिये। बादमें उन्हें हटानेपर ब्रह्महत्याका दोष लगता है। देवताओंके मन्दिरके सामने पुष्करिणी आदि बनाने चाहिये। पुष्करिणी बनानेवाला अनन्त फल प्राप्तकर ब्रह्मलोकसे पुनः नीचे नहीं आता। (अध्याय ९)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रासाद, उद्यान आदिके निर्माणमें भूमि-परीक्षण तथा वृक्षारोपणकी महिमा

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! देवमन्दिर, तडाग आदिके निर्माण करनेमें सबसे पहले प्रमाणानुसार गृहीत की गयी भूमिका संशोधन कर दस हाथ अथवा पाँच हाथके प्रमाणमें बैलोंसे उसे जुतवाना चाहिये। देवमन्दिरके लिये गृहीत भूमिको सफेद बैलोंसे तथा कूप, बगीचे आदिके लिये काले बैलोंसे जुतवाये। यदि वह भूमि ग्रह-यागके लिये हो तो उसे जुतवानेकी आवश्यकता नहीं, मात्र उसे स्वच्छ कर लेना चाहिये। उस पूर्वोक्त स्थानको तीन दिन जुतवाना चाहिये। फिर उसमें पाँच प्रकारके धान्य बोने चाहिये। देवपक्षमें तथा उद्यानके लिये सात प्रकारके धान्य वपन करने चाहिये। मूँग, उड़द, धान, तिल तथा साँवा—ये पाँच ब्रीहिगण हैं। मसूर और मटर या चना मिलानेसे सात ब्रीहिगण होते हैं। (यदि ये बीज तीन, पाँच या सात रातोंमें अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये—तीन रातवाली भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली भूमि कनिष्ठ है। कनिष्ठ भूमिको सर्वथा त्याग देना चाहिये।) श्वेत, लाल, पीली और काली—इन चार वर्णवाली पृथ्वी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये प्रशंसित मानी गयी है। प्रासाद आदिके निर्माणमें पहले भूमिकी परीक्षा कर लेनी चाहिये। उसकी एक विधि इस प्रकार है—अरनिमात्र (लगभग एक हाथ लम्बा) बिल्वकाष्ठको बारह अंगुलके गड्डेमें, गाड़कर, उसके भूमिसे ऊपरवाले भागमें चारों ओर चार लकड़ियाँ लगाकर

उन्हें ऊनसे लपेटकर तेलसे भिगो ले। इन्हें चार बत्तियोंके रूपमें दीपककी भाँति प्रज्वलित करे। पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बत्ती जलती रहे तो शुभ तथा दक्षिण एवं उत्तरकी ओरकी जलती रहे तो अशुभ माना गया है। यदि चारों बत्तियाँ बुझ जायँ या मन्द हो जायँ तो विपत्तिकारक है१। इस प्रकार सम्यक्-रूपसे भूमिकी परीक्षा कर उस भूमिको सूत्रसे आवेष्टित तथा कीलितकर वास्तुका पूजन करे। तदनन्तर वास्तुबलि देकर भूमि खोदनेवाले खनित्रकी भी पूजा करे। वास्तुके मध्यमें एक हाथके पैमानेमें भूमिको घी, मधु, स्वर्णमिश्रित जल तथा रत्नमिश्रित जलसे ईशानाभिमुख होकर लीप दे, फिर खोदते समय 'आ ब्रह्मन्०२' इस मन्त्रका उच्चारण करे। जो वास्तुदेवताका बिना पूजन किये प्रासाद, तडाग आदिका निर्माण करता है, यमराज उसका आधा पुण्य नष्ट कर देते हैं।

अतः प्रासाद, आराम, उद्यान, महाकूप, गृहनिर्माणमें पहले वास्तुदेवताका विधिपूर्वक पूजन करना चाहिये। जहाँ स्तम्भकी आवश्यकता हो वहाँ साल, खैर, पलास, केसर, बेल तथा बकुल—इन वृक्षोंसे निर्मित यूप कलियुगमें प्रशस्त माने गये हैं। यदि वापी, कूप आदिका विधिहीन खनन एवं आम्र आदि वृक्षोंका विधिहीन रोपण करे तो उसे कुछ भी फल प्राप्त नहीं होता, अपितु केवल अधोगति ही मिलती है। नदीके किनारे, रमशान तथा अपने घरसे दक्षिणकी ओर तुलसीवृक्षका रोपण न करे, अन्यथा यम-यातना भोगनी पड़ती

१-भूमि-परीक्षा, वास्तु-विधान तथा प्रासाद आदिकी प्रतिष्ठा आदिपर विस्तृत विचार समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, बृहत्संहिता, शिल्परत्न, गृहरत्नभूषण आदि ग्रन्थोंमें हुआ है। मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें भी इसकी चर्चा आयी है। इस विद्याका संक्षिप्त उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्रों एवं मनुस्मृति ३।८९ आदिमें भी है। वास्तुविद्याके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता विश्वकर्मा और मय दानव हैं।

२-आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रं राजन्यः शूर इष्व्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्रही धेनुर्विद्वानइवानाशुः सतिः पुरिर्न्याया जिष्णु रथेष्टाः सभेयो युवास्त्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।

(यजु० २२।२२)

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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है। विधिपूर्वक वृक्षोंका रोपण करनेसे उसके पत्र, पुष्प तथा फलके रज-रेणुओं आदिका समागम उसके पितरोंको प्रतिदिन तृप्त करता है।

जो व्यक्ति छाया, फूल और फल देनेवाले वृक्षोंका रोपण करता है या मार्गमें तथा देवालयमें वृक्षोंको लगाता है, वह अपने पितरोंको बड़े-बड़े पापोंसे तारता है और रोपणकर्ता इस मनुष्य-लोकमें महती कीर्ति तथा शुभ परिणामको प्राप्त करता है और अतीत तथा अनागत पितरोंको स्वर्गमें जाकर भी तारता ही रहता है। अतः द्विजगण! वृक्ष लगाना अत्यन्त शुभदायक है। जिसको पुत्र नहीं है, उसके लिये वृक्ष ही पुत्र हैं, वृक्षारोपणकर्ताके लौकिक-पारलौकिक कर्म वृक्ष ही करते रहते हैं तथा स्वर्ग प्रदान करते हैं। यदि कोई अश्वत्थ-वृक्षका आरोपण करता है तो वही उसके लिये एक लाख पुत्रोंसे भी बढ़कर है। अतएव अपनी सद्गतिके लिये कम-से-कम एक या दो अथवा तीन अश्वत्थ-वृक्ष लगाना ही चाहिये। हजार, लाख, करोड़ जो भी मुक्तिके साधन हैं, उनमें एक अश्वत्थ-वृक्ष लगानेकी बराबरी नहीं कर सकते।

अशोक-वृक्ष लगानेसे कभी शोक नहीं होता, प्लक्ष (पाकड़)-वृक्ष उत्तम स्त्री प्रदान करवाता है। ज्ञानरूपी फल भी देता है। बिल्व-वृक्ष दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है। जामुनका वृक्ष धन देता है, तेंदूका वृक्ष कुलवृद्धि कराता है। दाडिम (अनार)-का वृक्ष स्त्री-सुख प्राप्त कराता है। बकुल पाप-नाशक, वंजुल (तिनिश) बल-बुद्धिप्रद है। धातकी (धव) स्वर्ग प्रदान करता है। वटवृक्ष मोक्षप्रद, आम्रवृक्ष अभीष्ट कामनाप्रद और गुवाक (सुपारी)-का वृक्ष सिद्धिप्रद है। बल्लव, मधुक (महुआ) तथा अर्जुन-वृक्ष सब प्रकारका अन्न प्रदान करता है। कदम्ब-वृक्षसे विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तितिंडी (इमली)-का वृक्ष धर्मदूषक माना गया है। शमी-

वृक्ष रोग-नाशक है। केसरसे शत्रुओंका विनाश होता है। श्वेत वट धनप्रदाता, पनस (कटहल)-वृक्ष मन्द बुद्धिकारक है। मर्कटी (कैंवाच) एवं कदम-वृक्षके लगानेसे संततिका क्षय होता है।

शीशम, अर्जुन, जयन्ती, करवीर, बेल तथा पलाश-वृक्षोंके आरोपणसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। विधिपूर्वक वृक्षका रोपण करनेसे स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और रोपणकर्ताके तीन जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। सौ वृक्षोंका रोपण करनेवाला ब्रह्मरूप और हजार वृक्षोंका रोपण करनेवाला विष्णुरूप बन जाता है। वृक्षके आरोपणमें वैशाख मास श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ अशुभ है। आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद ये भी श्रेष्ठ हैं। आश्विन, कार्तिकमें वृक्ष लगानेसे विनाश या क्षय होता है। श्वेत तुलसी प्रशस्त मानी गयी है। अश्वत्थ, वटवृक्ष और श्रीवृक्षका छेदन करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मघाती कहलाता है। वृक्षच्छेदी व्यक्ति मूक और सैकड़ों व्याधियोंसे युक्त होता है। तितिंडीके बीजोंको इक्षुदण्डसे पीसकर उसे जलमें मिलाकर सींचनेसे अशोककी तथा नारियलके जल एवं शहद-जलसे सींचनेसे आम्रवृक्षकी वृद्धि होती है। अश्वत्थ-वृक्षके मूलसे दस हाथ चारों ओरका क्षेत्र पवित्र पुरुषोत्तम क्षेत्र माना गया है और उसकी छाया जहाँतक पहुँचती है तथा अश्वत्थ-वृक्षके संसर्गसे बहनेवाला जल जहाँतक पहुँचता है, वह क्षेत्र गङ्गाके समान पवित्र माना गया है।

सूतजी पुनः बोले— विप्रश्रेष्ठ! तान्त्रिक पद्धतिके अनुसार सभी प्रतिष्ठादि कार्योंमें शुद्ध दिन ही लेना चाहिये। वृक्षोंके उद्यानमें कुओं अवश्य बनवाना चाहिये। तुलसी-वनमें कोई याग नहीं करना चाहिये। तालाब, बड़े बाग तथा देवस्थानके मध्य सेतु नहीं बनवाना चाहिये। परंतु देवस्थानमें तडाग बनवाना चाहिये। शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठामें अन्य देवोंकी स्थापना

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नहीं करनी चाहिये। इसमें देश-काल (और शैवागमों)-की मर्यादाके अनुसार आचरण करना चाहिये। उनके विपरीत आचरण करनेपर आयुका ह्रास होता है। द्विजगण! तालाब, पुष्करिणी तथा उद्यान आदिका जो परिमाण बताया गया हो,

यदि उससे कम पैमानेपर ये बनाये जायें तो दोष है, किंतु दस हाथके परिमाणमें हों तो कोई दोष नहीं है। यदि वे दो हजार हाथोंसे अधिक प्रमाणमें बनाये गये हों तो उनकी प्रतिष्ठा विधिपूर्वक अवश्य करनी चाहिये। (अध्याय १०-११)

देव-प्रतिमा-निर्माण-विधि

सूतजी बोले!—ब्राह्मणो! अब मैं प्रतिमाका शास्त्रसम्मत लक्षण कहता हूँ। उत्तम लक्षणोंसे रहित प्रतिमाका पूजन नहीं करना चाहिये। पाषाण, काष्ठ, मूर्त्तिका, रत्न, ताम्र एवं अन्य धातु—इनमेंसे किसीकी भी प्रतिमा बनायी जा सकती है*। उनके पूजनसे सभी अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं। मन्दिरके मापके अनुसार शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न प्रतिमा बनवानी चाहिये। घरमें आठ अङ्गुलसे अधिक ऊँची मूर्त्तिका पूजन नहीं करना चाहिये। देवालयके द्वारकी जो ऊँचाई हो उसे आठ भागोंमें विभक्त कर तीन भागके मापमें पिण्डिका तथा दो भागके मापमें देव-प्रतिमा बनाये। चौरासी अङ्गुल (साढ़े तीन हाथ)-की प्रतिमा वृद्धि करनेवाली होती है। प्रतिमाके मुखकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये। मुखके तीन भागके प्रमाणमें चिबुक, ललाट तथा नासिका होनी चाहिये। नासिकाके बराबर ही कान और ग्रीवा बनानी चाहिये। नेत्र दो अङ्गुल-प्रमाणके बनाने चाहिये। नेत्रके मानके तीसरे भागमें आँखकी तारिका बनानी चाहिये। तारिकाके तृतीय भागमें सुन्दर दृष्टि बनानी चाहिये। ललाट, मस्तक तथा ग्रीवा—ये तीनों बराबर मापके हों।

सिरका विस्तार बत्तीस अङ्गुल होना चाहिये। नासिका, मुख और ग्रीवासे हृदय एक सीधमें होना चाहिये। मूर्त्तिकी जितनी ऊँचाई हो उसके आधेमें कटि-प्रदेश बनाना चाहिये। दोनों बाहु, जंघा तथा ऊरु परस्पर समान हों। टखने चार अङ्गुल ऊँचे बनाने चाहिये। पैरके अँगूठे तीन अङ्गुलके हों और उसका विस्तार छः अङ्गुलका हो। अँगूठेके बराबर ही तर्जनी होनी चाहिये। शेष अङ्गुलियाँ क्रमशः छोटी हों तथा सभी अङ्गुलियाँ नखयुक्त बनाये। पैरकी लम्बाई चौदह अङ्गुलमें बनानी चाहिये। अधर, ओष्ठ, वक्षःस्थल, भ्रू, ललाट, गण्डस्थल तथा कपोल भरे-पूरे सुडौल सुन्दर तथा मांसल बनाने चाहिये, जिससे प्रतिमा देखनेमें सुन्दर मालूम हो। नेत्र विशाल, फैले हुए तथा लालिमा लिये हुए बनाने चाहिये।

इस प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न प्रतिमा शुभ और पूज्य मानी गयी है। प्रतिमाके मस्तकमें मुकुट, कण्ठमें हार, बाहुओंमें कटक और अंगद पहनाने चाहिये। मूर्त्ति सर्वाङ्ग-सुन्दर, आकर्षक तथा तत्त् अङ्गोंके आभूषणोंसे अलंकृत होनी चाहिये। भगवान्की प्रतिमामें देवकलाओंका आधान होनेपर भगवत्प्रतिमा प्रत्येकको अपनी ओर बरबस आकृष्ट कर लेती है

  • मत्स्यपुराणमें प्रतिमा-निर्माणके लिये निम्न वस्तुओंको ग्राह्य बतलाया है—

सौवर्ण राजती वापि ताप्त्री रत्नमयी तथा । शैलीदारुमयी चापि लौहसीसमयी तथा ॥

रीतिकाधातुयुक्ता वा ताम्रकांस्यमयीतथा । शुभदारुमयी वापि देवतार्चाप्रशस्त्यते ॥ (२५८ । २०-२१)

सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, रत्न, पत्थर, देवदारु, लोहा-सीसा, पीतल और काँसा-मिश्रित अथवा शुभ काष्ठोंकी बनी हुई देवप्रतिमा प्रशस्त मानी गयी है।

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

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और अभीष्ट वस्तुका लाभ कराती है।

जिसका मुखमण्डल दिव्य प्रभासे जगमगा रहा हो, कानोंमें चित्र-विचित्र मणियोंके सुन्दर कुण्डल तथा हाथोंमें कनक-मालाएँ और मस्तकपर सुन्दर केश सुशोभित हों, ऐसी भक्तोंको वर देनेवाली, स्नेहसे परिपूर्ण, भगवतीकी सौम्य कैशोरी प्रतिमाका निर्माण कराये। भगवती विधिपूर्वक अर्चना करनेपर प्रसन्न होती हैं और उपासकोंके मनोरथोंको पूर्ण करती हैं।

नव ताल (साढ़े चार हाथ)-की विष्णुकी प्रतिमा बनवानी चाहिये। तीन तालकी वासुदेवकी, पाँच तालकी नृसिंह तथा हयग्रीवकी, आठ तालकी

नारायणकी, पाँच तालकी महेशकी, नव तालकी भगवती दुर्गाकी, तीन-तीन तालकी लक्ष्मी और सरस्वतीकी तथा सात तालकी भगवान् सूर्यकी प्रतिमा बनवानेका विधान है।

भगवान्की मूर्तिकी स्थापना तीर्थ, पर्वत, तालाब आदिके समीप करनी चाहिये अथवा नगरके मध्यभागमें या जहाँ ब्राह्मणोंका समूह हो, वहाँ करनी चाहिये। इनमें भी अविमुक्त आदि सिद्ध क्षेत्रोंमें प्रतिष्ठा करनेवालेके पूर्वापर अनन्त कुलोंका उद्धार हो जाता है। कलियुगमें चन्दन, अगुरु, बिल्च, श्रीपर्णिपक तथा पद्मकाष्ठ आदि काष्ठोंके अभावमें मृण्मयी मूर्ति बनवानी चाहिये। (अध्याय १२)

कुण्ड-निर्माण एवं उनके संस्कारकी विधि और ग्रह-शान्तिका माहात्म्य

सूतजी बोले—द्विजश्रेष्ठ! अब मैं यज्ञकुण्डोंके निर्माण एवं उनके संस्कारकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ। कुण्ड दस प्रकारके होते हैं—(१) चौकोर, (२) वृत्त, (३) पद्म, (४) अर्धचन्द्र, (५) योनिकी आकृतिका, (६) चन्द्राकार, (७) पञ्चकोण, (८) सप्तकोण (९) अष्टकोण और (१०) नौ कोणोंवाला।

सबसे पहले भूमिका संशोधन कर भूमिपर पड़े हुए तृण, केश आदि हटा देने चाहिये। फिर उस भूमिपर भस्म और अंगारे घुमाकर भूमि-शुद्धि करनी चाहिये, तदनन्तर उस भूमिपर जल-सिंचनकर बीजारोपण करे और सात दिनेके बाद कुण्ड-निर्माणके लिये खनन करना चाहिये। तत्पश्चात् अभीष्ट उपर्युक्त दस कुण्डोंमेंसे किसीका निर्माण करना चाहिये। कुण्ड-निर्माणार्थ विधिवत् नाप-जोखके लिये सूत्रका उपयोग करे। कामना-भेदसे कुण्ड भी अनेक आकारके होते हैं। कुण्डके अनुरूप ही मेखला भी बनायी जाती है। यज्ञोंमें आहुतियोंकी संख्याका भी अलग-अलग विधान है। विधि-

प्रमाणके अनुसार आहुति देनी चाहिये। मानरहित हवन करनेसे कोई फल नहीं मिलता। अतः बुद्धिमान् मनुष्यको मानका पूर्ण ज्ञान रखकर ही कुण्डका विधिवत् निर्माण कर यज्ञानुष्ठान करना चाहिये।

जिस यज्ञका जितना मान होता है, उसी मानकी ही योजना करनी चाहिये। पचास आहुतियोंका मान सामान्य है, इसके बाद सौ, हजार, अयुत, लक्ष और कोटि होम भी होते हैं। बड़े-बड़े यज्ञ सम्पत्ति रहनेपर हो सकते हैं या राजा-महाराजा कर सकते हैं, मनुष्य अपने-अपने प्राक्तन कर्मके अनुसार सुख-दुःखका उपभोग करता है तथा शुभाशुभ-फल ग्रहोंके अनुसार भोगता है। अतः शान्ति-पुष्टि-कर्ममें ग्रहोंकी शान्ति प्रयत्नपूर्वक परम भक्तिसे करनी चाहिये। दिव्य, अन्तरिक्ष और पृथिवी-सम्बन्धी बड़े-बड़े अद्भुत उत्पातोंके होनेपर शुभाशुभ फल देनेवाली ग्रह-शान्ति करनी चाहिये। इन अवसरोंपर अयुत होम करना चाहिये। काम्य-कर्म या शान्ति-पुष्टिके लिये ग्रहोंका भक्तिपूर्वक नित्य पूजन एवं हवन करना चाहिये। कलियुगमें

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

ग्रहोंके लिये लक्ष एवं कोटि होमका विधान है। गृहस्थको आधिचारिक कर्म नहीं करना चाहिये।

कुण्डोंका शास्त्रानुसार संस्कार करना चाहिये। बिना संस्कार किये होम करनेपर अर्थ-हानि होती है। अतः संस्कार करके होमादि क्रियाएँ करनी चाहिये।

कुण्डोंके स्थानका ओंकारपूर्वक अवक्षण, कुशके जलसे प्रोक्षण, त्रिशूलीकरण तथा सूत्रसे आवेष्टित करना, कीलित करना, अग्निजिह्वाकी भावना करना एवं अग्न्याहरण आदि अठारह संस्कार होते हैं। शुद्धके घरसे अग्नि कभी न लाये। स्त्रीके द्वारा भी अग्नि नहीं मँगवानी चाहिये। शुद्ध एवं पवित्र व्यक्तिद्वारा अग्नि ग्रहण करना चाहिये। तदनन्तर अग्निंका संस्कार करे और उसे अपने अभिमुख रखे। अग्नि-बीज (रं) और शिव-बीज (शं)-से उसका प्रोक्षण करे और शिव-शक्तिका ध्यान करे, इससे अभीष्ट सिद्धिकी प्राप्ति होती है। उसके बाद वायुके सहारे अग्नि प्रज्वलित करे। देवी भगवतीका और भगवान्का अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय आदिसे पूजन करे। अग्नि-पूजनमें इस मन्त्रका उपयोग करे—

‘पितृपिङ्गल दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा।’

यज्ञदत्तमुनिने अग्निंकी तीन जिह्वाएँ बतलायी हैं—हिरण्या, कनका तथा कृष्णा*। समिधा-भेदसे जिन जिह्वा-भेदोंका वर्णन है, उनका उन्हींमें विनियोग करना चाहिये। बहुरूपा, अतिरूपा और सात्त्विका—इनका योग-कर्ममें विनियोग होता है। आज्यहोममें हिरण्या, त्रिमधु (दूध, चीनी और मधु—इन तीनोंके समाहार)-से हवन करनेपर कर्णिका, शुद्ध क्षीरसे

हवन करनेपर रक्ता, नैतिक कर्ममें प्रभा, पुष्पहोममें बहुरूपा, अन्न और पायससे हवन करनेमें कृष्णा, इक्षुहोममें पद्मरागा, पद्महोममें सुवर्णा और लोहिता, बिल्वपत्रसे हवन करनेपर श्वेता, तिल-होममें धूमिनी, काष्ठ होममें करालिका, पितृहोममें लोहितास्या, देवहोममें मनोजवा नामकी अग्निज्वाला कही गयी है। जिन-जिन समिधाओंसे हवन किया जाता है, उन-उन समिधाओंमें ‘वैश्वानर’ नामक अग्निदेव स्थित रहते हैं।

अग्निंके मुखमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक आहुति पड़नेपर अग्नि देवता सभी प्रकारका अश्व्युदय करते हैं। मुखके अतिरिक्त शेष स्थानोंपर आहुति देनेसे अनिष्ट फल होता है। अग्निंकी जिह्वाएँ विशेषरूपसे घृताहुतिमें हिरण्या एवं अन्यान्य आहुतियोंमें गणना, वक्रा, कृष्णाभा, सुप्रभा, बहुरूपा तथा अतिरूपिका नामसे प्रसिद्ध हैं। कुण्डके उदरमें अर्थात् मध्यमें आहुतियाँ देनी चाहिये। इधर-उधर नहीं देनी चाहिये। चन्दन, अगरू, कपूर, पाटला तथा यूथिका (जूही)-के समान अग्निसे प्रादुर्भूत गन्ध सभी प्रकारका कल्याणकारक होता है।

यदि अग्निंकी ज्वाला छिन्न-वृत्त-रूपमें उठती हो तो मृत्युभय होता है और धनका क्षय होता है। अग्नि बुझ जाने तथा अत्यधिक धुआँ होनेपर भी महान् अनिष्ट होता है। ऐसी स्थितियोंमें प्रायश्चित्त करना चाहिये। पहले अट्टाईस आहुतियाँ देकर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। अनन्तर घीसे मूल मन्त्रद्वारा पचीस आहुतियाँ देनी चाहिये। तीनों कालोंमें महास्नान करे तथा श्रद्धा-भक्ति-पूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करे। (अध्याय १३—१५)

  • प्रकारान्तरसे विश्वमूर्ति, स्कूलिङ्गिनी, धूम्रवर्णा, मनोजवा, लोहितास्या, करालास्या तथा काली—ये भी सात प्रकारकी अग्निजिह्वाएँ कही गयी हैं।

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२४९

अग्नि-पूजन-विधि

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! नित्य-नैमित्तिक यागादिकी समाप्तिमें हवन हो जानेपर भगवान् अग्निदेवकी षोडश उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। अग्निको वायुद्वारा प्रदीप्त कर पीठस्थ देवताओंकी पूजा कर हाथमें लाल फूल ले निम्न मन्त्र पढ़कर ध्यान करे—

इष्टं शक्तिस्वस्तिकाभीतिमुच्छेदीर्घेर्दोर्भिधारयन्तं वरान्तम्। हेमाकल्पं पद्मसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्बहिर्बद्धमौलिं जटाभिः ॥

(मध्यमपर्व १।१६।३)

‘भगवान् अग्निदेवता अपने हाथोंमें उत्तम इष्ट (यज्ञपात्र), शक्ति, स्वस्तिक और अभय-मुद्रा धारण किये हैं, देदीप्यमान सुवर्ण-सदृश उनका

स्वरूप है, कमलके ऊपर विराजमान हैं, तीन नेत्र हैं तथा वे जटाओं और मुकुटसे सुशोभित हैं।’

मण्डपके पूर्व आदि द्वारदेशोंमें कामदेव, इन्द्र, वराह तथा कार्तिकेयको आवाहित कर स्थापित करे। तदनन्तर आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा गन्धादि उपचारोंसे पूजन कर आठ मुद्राएँ प्रदर्शित करे। फिर सुवर्ण-वर्णवाले निर्मल, प्रज्वलित, सर्वतोमुख, महाजिह्वा तथा महोदर भगवान् अग्निदेवकी आकाशरूपमें पूजा करे। अग्निकी जिह्वाओंका भी ध्यान करे। इसके बाद भगवान् अग्निदेवका विविध उपचारोंसे पूजन करे*।

(अध्याय १६)

  • सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्रसे तीन पुष्पगुच्छोंद्वारा अग्निदेवको आसन प्रदान करे—

आसन-मन्त्र—त्वमादिः सर्वभूतानां संसारार्णवतारकः। परमज्योतीरूपस्त्वमासनं सफलीकुरु ॥

संसार-रूपी सागरसे उद्धार करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियोंमें आदि, परम ज्योतिः-स्वरूप हे अग्निदेव! आप इस आसनको ग्रहण कर मुझे सफल बनायें। अनन्तर करबद्ध प्रार्थना करे—

प्रार्थना-मन्त्र—वैश्वानर नमस्तेऽस्तु नमस्ते हव्यवाहन। स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ शान्तिं कुरु नमोऽस्तु ते ॥

हे हव्यवाहन वैश्वानरदेव! आप देवताओंमें श्रेष्ठ हैं, आपका स्वागत है, आपको नमस्कार है, आप शान्ति प्रदान करें।

पाद्य-मन्त्र—नमस्ते भगवन् देव आपो नारायणात्मक। सर्वलोकहितार्थाय पाद्यं च प्रतिगृह्णाताम् ॥

नर-नारायणस्वरूप हे भगवान् वैश्वानरदेव! आपको नमस्कार है। आप समस्त संसारके हितके लिये इस पाद्य-जलको ग्रहण करें।

अर्घ्य-मन्त्र—नारायण परं धाम ज्योतीरूप सनातन। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं विश्वरूप नमोऽस्तु ते ॥

हे विश्वरूप! आप ज्योतीरूप हैं, आप ही सनातन, परम धाम एवं नारायण हैं, आपको नमस्कार है, आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्घ्यको ग्रहण करें।

आचमनीय-मन्त्र—जगदादित्यरूपेण प्रकाशयति यः सदा। तस्मै प्रकाशरूपाय नमस्ते जातवेदसे ॥

जो आदित्यरूपसे सम्पूर्ण संसारको नित्य प्रकाशित करते रहते हैं, ऐसे उन जातवेदा तथा प्रकाशस्वरूप भगवान् वैश्वानरको नमस्कार है। हे अग्निदेव! इस आचमनीय जलको आप ग्रहण करें।

स्नानीय-मन्त्र—धनञ्जय नमस्तेऽस्तु सर्वपापप्रणाशन। स्नानीयं ते मया दत्तं सर्वकामार्थसिद्धये ॥

सभी पापोंका नाश करनेवाले हे धनञ्जयदेव! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये मेरे द्वारा दिये गये इस स्नानीय जलको आप ग्रहण करें।

अङ्गप्रोक्षण एवं वस्त्र-मन्त्र—हुताशन महाबाहो देवदेव सनातन। शरणं ते प्रगच्छामि देहि मे परमं पदम् ॥

हे देवदेव सनातन महाबाहु हुताशन! मैं आपकी शरण हूँ, मुझे आप परम पद प्रदान करें (मेरे द्वारा प्रदत्त इस अङ्गप्रोक्षण एवं वस्त्रको आप स्वीकार करें)।

अलंकार-मन्त्र—ज्योतिषां ज्योतीरूपस्त्वमनादिनिधनाच्युत। मया दत्तमलंकारमलंकुरु नमोऽस्तु ते ॥

अपने स्थानसे कभी च्युत न होनेवाले हे अग्निदेव! आपका न आदि है न अन्त। आप ज्योतियोंके परमज्योतीरूप हैं, आपको मेरा नमस्कार है। मेरे दिये गये इस अलंकारको आप अलंकृत करें।

गन्ध-मन्त्र—देवीदेवा मुदं यान्ति यस्य सम्यक्समागमात्। सर्वदोषोपशान्त्यर्थं गन्धोऽयं प्रतिगृह्णाताम् ॥

हे देव! आपके सम्यक् संनिधानसे सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं। सम्पूर्ण दोषोंकी शान्तिके लिये मेरे द्वारा दिये गये इस गन्धको आप ग्रहण करें।

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२५०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

विविध कर्मोंमें अग्निके नाम तथा होम-द्रव्योंका वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं शास्त्रसम्मत-विधिके अनुसार किये गये विविध यज्ञोंमें अग्निके नामोंका वर्णन करता हूँ। शतार्ध-होममें, पाँच सौ संख्यातककी आहुतिवाले यज्ञोंमें अग्निको काश्यप कहा गया है। इसी प्रकार आज्य-होममें विष्णु, तिल-यागमें वनस्पति, सहस्त्र-यागमें ब्राह्मण, अयुत-यागमें हरि, लक्ष-होममें वहि, कोटि-होममें हुताशन, शान्तिक कर्मोंमें वरुण, मारण-कर्ममें अरुण, नित्य-होममें अनल, प्रायश्चित्तमें हुताशन तथा अन्न-यज्ञमें लोहित नाम कहा गया है। देवप्रतिष्ठामें लोहित, वास्तुयाग, मण्डप तथा पद्मक-यागमें प्रजापति, प्रणा-यागमें नाग, महादानमें हविर्भुक्, गोदानमें रुद्र, कन्यादानमें योजक तथा तुला-पुरुष-दानमें धातारूपसे अग्निदेव स्थित रहते हैं। इसी प्रकार वृष्टोत्सर्गमें अग्निका सूर्य, वैश्वदेवकर्ममें पावक, दीक्षाग्रहणमें जनार्दन, उत्पीडनमें काल, शवदाहमें कव्य, पर्णदाहमें यम, अस्थिदाहमें शिखण्डिक, गर्भाधानमें मरुत्, सीमन्तमें पिङ्गल, पुंसवनमें इन्द्र, नामकरणमें पार्थिव, निष्क्रमणमें हाटक, प्राशनमें शुचि, चूडाकरणमें षडानन, त्रतोपदेशमें समुद्रव, उपनयनमें वीतिहोत्र, समावर्तनमें

धनञ्जय, उदरमें जठर, समुद्रमें वडवानल, शिखामें विभु तथा स्वरादि शब्दोंमें सरीसृप नाम है। अश्वाग्निका मन्थर, रथाग्निका जातवेदस्, गजाग्निका मन्दर, सूर्याग्निका विन्ध्य, तोयाग्निका वरुण, ब्राह्मणाग्निका हविर्भुक्, पर्वताग्निका नाम ऋतुभुक् है। दावाग्निको सूर्य कहा जाता है। दीपाग्निका नाम पावक, गृह्याग्निका धरणीपति, घृताग्निका नल और सूतिकाग्निका नाम राक्षस है।

जिन द्रव्योंका होममें उपयोग किया जाता है, उनका निश्चित प्रमाण होता है। प्रमाणके बिना किया गया द्रव्योंका होम फलदायक नहीं होता। अतः शास्त्रके अनुसार प्रमाणका परिज्ञान कर लेना चाहिये। घी, दूध, पञ्चगव्य, दधि, मधु, लाजा, गुड, ईख, पत्र-पुष्प, सुपारी, समिध, व्रीहि, डंटलके साथ जपापुष्प और केसर, कमल, जीवन्ती, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), नारियल, कूष्माण्ड, ककड़ी, गुरुच, तिटुक, तीन पतोंवाली दूब आदि अनेक होम-द्रव्य कहे गये हैं। भूजपत्र, शमी तथा समिधा प्रादेशमात्रके होने चाहिये। बिल्वपत्र तीन पत्रयुक्त, किंतु छिन्न-भिन्न नहीं होना चाहिये।

पुष्प-मन्त्र —विष्णुस्त्वं हि ब्रह्मा च ज्योतिषां गतिरीश्वर। गृहाण पुष्पं देवेश सानुलेपं जगद् भवेत् ॥

हे देवेश! आप ही ब्रह्मा, विष्णु तथा ज्योतियोंकी गति हैं और आप ही ईश्वर हैं। आप इस पुष्पको ग्रहण करें, जिससे सारा संसार पुष्पगन्धसे सुवासित हो जाय।

धूप-मन्त्र —देवतानां पितृणां च सुखमेकं सनातनम्। धूपोऽयं देवदेवेश गृह्णातां मे धनञ्जयः ॥

हे देवदेवेश धनञ्जय! आप देवताओं और पितरोंके सुख प्राप्त करनेमें एकमात्र सनातन आधार हैं। आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस धूपको ग्रहण करें।

दीप-मन्त्र —त्वमेकः सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च। परमात्मा पराकारः प्रदीपः प्रतिगृह्णाताम् ॥

परमात्मन्! आप सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंमें व्याप्त हैं। आपकी आकृति परम उत्कृष्ट है। आप इस दीपकको ग्रहण करें।

नैवेद्य-मन्त्र —नमोऽस्तु यज्ञपतये प्रभवे जातवेदसे। सर्वलोकहितार्थाय नैवेद्यं प्रतिगृह्णाताम् ॥

हे यज्ञपति जातवेदा! आप शक्तिशाली हैं तथा समस्त संसारका कल्याण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। मेरे द्वारा प्रदत्त इस नैवेद्यको आप ग्रहण करें। परम अन्नस्वरूप मधु भी नैवेद्यके रूपमें निवेदित करे तथा यज्ञसूत्र भी अर्पित करे। अन्तमें समस्त कर्म भगवान् अग्निदेवको निवेदित कर दे—

हुताशन नमस्तुभ्यं नमस्ते रुक्मवाहन। लोकनाथ नमस्तेऽस्तु नमस्ते जातवेदसे ॥

हे हुताशनदेव! आपको नमस्कार है, रुक्मवाहन लोकनाथ! आपको नमस्कार है, हे जातवेदा! आपको नमस्कार है, नमस्कार है!

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  • मध्यमपर्व, प्रथम भाग *

२५१

इनमें शास्त्र-निर्दिष्ट प्रमाणसे न्यूनता या अधिकता नहीं होनी चाहिये। अभीष्ट-प्राप्तिके निमित्त किये

जानेवाले शान्तिकर्म शास्त्रोक्त रीतिसे सम्पन्न होने चाहिये। (अध्याय १७-१८)

यज्ञ-पात्रोंका स्वरूप और पूर्णाहुतिकी विधि

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! यज्ञक्रियाके उपयोगमें आनेवाली सुवाके निर्माणमें—श्रीपणी, शिशपा, क्षीरी (दूधवाले वृक्ष), बिल्व और खदिरके काष्ठ प्रशस्त माने गये हैं। याग-क्रियामें इनसे बने सुवाके उपयोगसे सिद्धि प्राप्त होती है। देव-प्रतिष्ठामें आँवला, खदिर और केसरके वृक्षको भी सुवाके लिये शास्त्रज्ञोंने उत्तम कहा है। सुवा प्रतिष्ठाकार्यमें, सम्प्राशन तथा संस्कार-कर्ममें और यज्ञादि कार्योंमें प्रयुक्त होता है। सुवाके निर्माणमें बिल्व-काष्ठ ग्रहण करना चाहिये, परंतु उसके ग्रहणके समय रिक्ता आदि तिथियाँ न हों। उस काष्ठको ग्रहण करनेवाला व्यक्ति पहले उपवास करे और मद्य, मांस आदि सभी वस्तुओंका परित्याग कर दे, स्त्री-सम्पर्कसे भी दूर रहे। एक काष्ठसे सुवा और स्तुक् दोनोंका निर्माण किया जा सकता है। इनका निर्माण शास्त्रोक्त विधिके अनुसार करना चाहिये। दर्वी अर्थात् करछुलका निर्माण स्वर्ण या ताँबेसे किया जाना चाहिये। यदि काष्ठसे करछुल बनानी हो तो गंभारी-वृक्ष, तेंदूका वृक्ष और दूधवाले वृक्षके काष्ठसे बारह अङ्गुलकी बनानी चाहिये। उसका नीचेका मण्डल दो अङ्गुलका होना चाहिये। यज्ञ-साधनमें यह उपयोगी है। ताँबेकी करछुल चालीस तोले, प्रायः आधा किलोकी होती है और उसका मण्डल पाँच अङ्गुलका तथा लम्बाई आठ हाथकी होती है। यही दर्वी (करछुल) पायस-निर्माणमें उपयोगी है। आज्य-शोधनके लिये दस तोलेकी ताम्रमयी करछुल होती है। इसके अभावमें पीपलके काष्ठसे सोलह अङ्गुलके मापमें दर्वी (करछुल) बनाये। आज्य-स्थाली ताँबेकी

या मिट्टीकी भी हो सकती है।

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं पूर्णाहुतिकी विधि बतला रहा हूँ, इसके अनुष्ठानसे यज्ञ पूर्ण होता है। अतएव पूर्णाहुति विधिपूर्वक करनी चाहिये। पूर्णाहुतिके बाद यज्ञमें आवाहित किये गये देवताओंको अर्घ्य देना चाहिये।

यदि यज्ञ अपूर्ण रहे तो यजमान श्रीविहीन हो जाता है और यज्ञ पूर्ण फलप्रद नहीं होता। सुवामें चरु रखकर भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। यज्ञ सम्पन्न हो जानेपर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर यजमान घरमें प्रवेश कर कुल-देवताओंकी प्रार्थना करे—प्रतिष्ठा-यागमें पूर्णाहुतिके समय 'सप्त ते०' (यजु० १७।७९), 'देहि मे०' (यजु० ३।५०), 'पूर्णा दर्वि०' (यजु० ३।४९) तथा 'पुनन्तु०' (यजु० १९।३९) इन मन्त्रोंका पाठ करे तथा नित्य-नैमित्तिक यागमें 'पुनन्तु०', 'पूर्णा दर्वि०', 'सप्त ते०' तथा 'देहि मे०'—का पाठ करे। विद्वानोंको इनमें अपने कुल-परम्पराका भी विचार करना चाहिये। पूर्णाहुति खड़ा होकर सम्पन्न करना चाहिये, बैठकर नहीं। ग्रहहोम तथा शतहोममें एक पूर्णाहुति देनी चाहिये। सहस्रयागमें दो, अयुत-होममें चार, सहस्र पुष्पहोममें एक, मृदु पुष्प-होममें एक, शत इक्षु-होममें दो, गर्भाधान, अन्नप्राशन, सीमन्तोन्नयन संस्कारोंमें और प्रायश्चित्तादि कर्म तथा नैमित्तिक वैश्वदेव-यागमें एक पूर्णाहुति देनेका विधान है।

मन्त्रोच्चारणमें ऋषि-छन्द, विनियोगादिका प्रयोग करना चाहिये। यदि इनका प्रयोग न किया जाय

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२५२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तो फल-प्राप्तिमें न्यूनता होती है। 'सप्त तेः' इस ब्राह्मण-मन्त्रके कौण्डिन्य ऋषि, जगती छन्द और अग्नि देवता हैं। 'देहि मेः' इस मन्त्रके प्रजापति ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और प्रजापति देवता हैं। 'पूर्णा दक्षिः' इस मन्त्रके शतक्रतु ऋषि, अनुष्टुप् छन्द एवं अग्नि देवता हैं। 'पुनन्तुः' इस मन्त्रके पवन ऋषि, जगती छन्द तथा देवता अग्नि हैं।

इस रीतिसे तत्तद् मन्त्रोंके उच्चारणके समय ऋषि, छन्द एवं देवताका स्मरण करना चाहिये। जप-कालमें मन्त्रोंकी संख्या अवश्य पूरी करनी चाहिये। निर्दिष्ट संख्याके बिना किया गया जप फलदायी नहीं होता। अयुत-होम, लक्ष-होम और कोटि-होममें जिन ऋत्विक् ब्राह्मणोंका वर्ण किया जाय, वे शान्त एवं काम-क्रोधरहित हों। ऋत्विजोंकी संख्या अभीष्ट होमानुसार करनी चाहिये। प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजाकर एवं दक्षिणा प्रदान कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक याग-कर्म करनेवाला व्यक्ति वसु, आदित्य और मरुदग्गणोंके द्वारा शिवलोकमें पूजित होता है तथा अनेक कल्पोंतक वहाँ

निवास कर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है। जो किसी कामनाके बिना अर्थात् निष्काम-भावपूर्वक ईश्वरार्पण-बुद्धिसे लक्ष-होम करता है, वह अपने अभीष्टको प्राप्त कर परमपद प्राप्त कर लेता है। पुत्रार्थी पुत्र, धनार्थी धन, भार्यार्थी भार्या और कुमारी शुभ पतिको प्राप्त करती है। राज्यभ्रष्ट राज्य तथा लक्ष्मीकी कामनावाला व्यक्ति अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है। जो व्यक्ति निष्कामभावपूर्वक कोटि-होम करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। ब्रह्माने स्वयं बतलाया है कि कोटि-होम लक्ष-होमसे सौ गुना श्रेष्ठ है। ऋत्विज् ब्राह्मणोंके अभावमें आचार्य भी होता बन सकता है। आसनोंमें कुशासन प्रशस्त माना गया है।

देवता पद्मासनपर स्थित रहते हैं और वास भी करते हैं, अतः पद्मासनस्थ होकर ही अर्चना करनी चाहिये। 'देवो भूत्वा देवान् यजेत' इस न्यायके अनुसार पद्मासनस्थ देवताओंका अर्चन पद्मासनस्थ होकर ही करना चाहिये। यदि ऐसा न किया जाय तो सम्पूर्ण फल यक्षिणी हरण कर लेती है। (अध्याय १९-२१)

॥ प्रथम भाग सम्पूर्ण ॥

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

मध्यमपर्व

( द्वितीय भाग )

यज्ञादि कर्मोंके मण्डल-निर्माणका विधान तथा कौञ्ज्यादि पक्षियोंके दर्शनका फल

सूतजीने कहा—ब्राह्मणगण! अब मैं आपलोगोंसे पुराणोंमें वर्णित मण्डल-निर्माणके विषयमें कहूँगा। बुद्धिमान् व्यक्ति हाथसे नापकर मण्डलका माप निश्चित करे। फिर उसे तत्त् स्थानोंमें विधि-विहित लाल आदि रंग भरे। उनमें देवताओंके अस्त्र-विशेष बाहर, मध्य और कोणमें लिखकर प्रदर्शित करे। शम्भु, गौरी, ब्रह्मा, राम और कृष्ण आदिका अनुक्रमसे निर्देश करे। फिर सीमा-रेखाको एक अङ्गुल ऊँचा उन-उन अर्ध-भागोंसे युक्त करे। शिव और विष्णुके महायागमें शम्भुसे प्रारम्भ कर देवताओंकी परिकल्पना—ध्यान करे। प्रतिष्ठामें रामपर्यन्त, जलाशयमें कृष्णपर्यन्त और दुर्गायागमें ब्रह्मादिकी परिकल्पना करे। मण्डलका निर्माण अधम ब्राह्मण एवं शूद्र न करे। सूतजीने पुनः कहा—अब मैं कौञ्ज्याका स्वरूप बतलाता हूँ। सभी शास्त्रोंमें उसका उल्लेख मिलता है जो गोपनीय है। यह कौञ्ज्य (पक्षी-विशेष)-महाकौञ्ज्य, मध्य-कौञ्ज्य और कनिष्ठ-कौञ्ज्य-भेद तीन प्रकारका

वर्णित है। इसका दर्शन सैकड़ों जन्मोंमें किये गये पापोंको नष्ट करता है। मयूर, वृषभ, सिंह, कौञ्ज्य और कपिको घरमें, खेतमें और वृक्षपर भूलसे भी देख ले तो उसको नमस्कार करे, ऐसा करनेसे दर्शकके सैकड़ों ब्रह्महत्याजनित पाप नष्ट हो जाते हैं। उनके पोषणसे कीर्ति मिलती है और दर्शनसे धन तथा आयु बढ़ती है। मयूर ब्रह्माका, वृषभ सदाशिवका, सिंह दुर्गाका, कौञ्ज्य नारायणका, बाघ त्रिपुरसुन्दरी लक्ष्मीका रूप है। स्नानकर यदि प्रतिदिन इनका दर्शन किया जाय तो ग्रहदोष मिट जाता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक इनका पोषण करना चाहिये। सभी यज्ञोंमें सर्वतोभद्रमण्डल सभी प्रकारकी पुष्टि प्रदान करता है। सर्वशक्तिमान् ईश्वरने साधकोंके हितके लिये उसका प्रकाश किया है। सम्पूर्ण स्मार्त-यागोंमें सर्वतोभद्रमण्डलका विशेषरूपसे निर्माण किया जाता है और तत्-तत् स्थानोंमें तत्-तत् रंगोंसे पूरित किया जाता है।

(अध्याय १-२)

यज्ञादि कर्ममें दक्षिणाका माहात्म्य, विभिन्न कर्मोंमें पारिश्रमिक व्यवस्था और कलश-स्थापनका वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! शास्त्रविहित यज्ञादि कार्य दक्षिणारहित एवं परिमाणविहीन कभी नहीं करना चाहिये। ऐसा यज्ञ कभी सफल नहीं होता। जिस यज्ञका जो माप बतलाया गया है, उसीके अनुसार विधान करना चाहिये। मानरहित यज्ञ करनेवाले व्यक्ति नरकमें जाते हैं। आचार्य, होता, ब्रह्मा तथा जितने भी सहयोगी हों, वे सभी

विधिवत् हों।

अस्सी वराटों (कौड़ियों)-का एक पण होता है। सोलह पणोंका एक पुराण कहा जाता है, सात पुराणोंकी एक रजतमुद्रा तथा आठ रजतमुद्राओंकी एक स्वर्णमुद्रा कही जाती है, जो यज्ञ आदिमें दक्षिणा दी जाती है। बड़े उद्यानोंकी प्रतिष्ठा-यज्ञमें दो स्वर्णमुद्राएँ, कूपोत्सर्गमें आधी स्वर्णमुद्रा (निष्क),

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२५४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तुलसी एवं आमलकी-यागमें एक स्वर्णमुद्रा (निष्क) दक्षिणारूपमें विहित है। लक्ष-होममें चार स्वर्ण-मुद्रा, कोटि-होम, देव-प्रतिष्ठा तथा प्रासादके उत्सर्गमें अठारह स्वर्ण-मुद्राएँ दक्षिणारूपमें देनेका विधान है। तडाग तथा पुष्करिणी-यागमें आधी-आधी स्वर्णमुद्रा देनी चाहिये। महादान, दीक्षा, वृषोत्सर्ग तथा गया-श्राद्धमें अपने विभवके अनुसार दक्षिणा देनी चाहिये। महाभारतके श्रवणमें अस्सी रत्ती तथा ग्रहयाग, प्रतिष्ठाकर्म, लक्षहोम, अयुतहोम तथा कोटिहोममें सौ-सौ रत्ती सुवर्ण देना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्रोंमें निर्दिष्ट सत्पात्र व्यक्तिको ही दान देना चाहिये, अपात्रको नहीं। यज्ञ, होममें द्रव्य, काष्ठ, घृत आदिके लिये शास्त्र-निर्दिष्ट विधिका ही अनुसरण करना चाहिये। यज्ञ, दान तथा व्रतादि कर्मोंमें दक्षिणा (तत्काल) देनी चाहिये। बिना दक्षिणाके ये कार्य नहीं करने चाहिये। ब्राह्मणोंका जब वरण किया जाय तब उन्हें रत्न, सुवर्ण, चाँदी आदि दक्षिणारूपमें देना चाहिये। वस्त्र एवं भूमि-दान भी विहित हैं। अन्यान्य दानों एवं यज्ञोंमें दक्षिणा एवं द्रव्योंका अलग-अलग विधान है। विधानके अनुसार नियत दक्षिणा देनेमें असमर्थ होनेपर यज्ञ-कार्यकी सिद्धिके लिये देव-प्रतिमा, पुस्तक, रत्न, गाय, धान्य, तिल, रुद्राक्ष, फल एवं पुष्प आदि भी दिये जा सकते हैं। सूतजी पुनः बोले—ब्राह्मणो! अब मैं पूर्णपात्रका स्वरूप बतलाता हूँ। उसे सुनै। काम्य-होममें एक मुष्टिके पूर्णपात्रका विधान है। आठ मुट्ठी अन्नको एक कुञ्चिका कहते हैं। इसी प्रमाणसे पूर्णपात्रोंका निर्माण करना चाहिये। उन पात्रोंको अलग कर द्वार-प्रदेशमें स्थापित करे।

कुण्ड और कुड्मलोंके निर्माणके पारिश्रमिक इस प्रकार हैं—चौकोर कुण्डके लिये रौप्यादि,

सर्वतोभद्रकुण्डके लिये दो रौप्य, महासिंहासनके लिये पाँच रौप्य, सहस्सार तथा मेरुपृष्ठकुण्डके लिये एक बैल तथा चार रौप्य, महाकुण्डके निर्माणमें द्विगुणित स्वर्णपाद, वृत्तकुण्डके लिये एक रौप्य, पञ्चकुण्डके लिये वृषभ, अर्धचन्द्रकुण्डके लिये एक रौप्य, योनिकुण्डके निर्माणमें एक धेनु तथा चार माशा स्वर्ण, शैवयागमें तथा उद्यापनमें एक माशा स्वर्ण, इष्टिकाकरणमें प्रतिदिन दो पण पारिश्रमिक देना चाहिये। खण्ड-कुण्ड-(अर्ध गोलाकार-) निर्माताको दस वराट (एक वराट बराबर अस्सी कौड़ी), इससे बड़े कुण्डके निर्माणमें एक काकिणी (माशेका चौथाई भाग), सात हाथके कुण्ड-निर्माणमें एक पण, बृहत्कूपके निर्माणमें प्रतिदिन दो पण, गृह-निर्माणमें प्रतिदिन एक रत्ती सोना, कोष्ठ बनवाना हो तो आधा पण, रंगसे रँगनेमें एक पण, वृक्षोंके रोपणमें प्रतिदिन डेढ़ पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसी तरह पृथक् कर्मोंमें अनेक रीतिसे पारिश्रमिकका विधान किया गया है। यदि नापित सिरसे मुण्डन करे तो उसे दस काकिणी देनी चाहिये। स्त्रियोंके नख आदिके रञ्जनके लिये काकिणीके साथ पण भी देना चाहिये। धानके रोपणमें एक दिनका एक पण पारिश्रमिक होता है। तैल और क्षारसे वर्जित वस्त्रकी धुलाईके लिये एक पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसमें वस्त्रकी लम्बाईके अनुसार कुछ वृद्धि भी की जा सकती है। मिट्टीके खोदनेमें, कुदाल चलानेमें, इक्षुदण्डके निष्पीडन तथा सहस्त्र पुष्प-चयनमें दस-दस काकिणी पारिश्रमिक देना चाहिये। छोटी माला बनानेमें एक काकिणी, बड़ी माला बनानेमें दो काकिणी देना चाहिये। दीपकका आधार काँसे या पीतलका होना चाहिये। इन दोनोंके अभावमें मिट्टीका भी आधार बनाया जा सकता है*।

  • भविष्यपुराणका यह अध्याय इतिहासकी दृष्टिसे बड़े महत्त्वका है। केवल कोटिल्य अर्थशास्त्र और शुक्रनीतिसे ही भारतकी प्राचीन

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२५५

सूतजी पुनः बोले—ब्राह्मणो! अब मैं कलशोंके विषयमें निश्चित मत प्रकट करता हूँ, जिसका उपयोग करनेसे मङ्गल होता है और यात्रामें सिद्धि प्राप्त होती है। कलशमें सात अङ्ग अथवा पाँच अङ्ग होते हैं। कलशमें केवल जल भरनेसे ही सिद्धि नहीं होती, इसमें अक्षत और पुष्पोंसे देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन भी करना चाहिये—ऐसा न करनेसे पूजन निष्फल हो जाता है। वट, अश्वत्थ, धव-वृक्ष और बिल्व-वृक्षके पल्लवोंको कलशके ऊपर रखे*। कलश सोना, चाँदी, ताँबा या मृत्तिकाके बनाये जाते हैं। कलशका निर्माण

अपनी सामर्थ्यके अनुसार करे। कलश अभेद्य, निशिच्छद्र, नवीन, सुन्दर एवं जलसे पूरित होना चाहिये। कलशके निर्माणके विषयमें भी निश्चित प्रमाण बतलाया गया है। बिना मानके बना हुआ कलश उपयुक्त नहीं माना गया है। जहाँ देवताओंका आवाहन-पूजन किया जाय, उन्हींकी संनिधिमें कलशकी स्थापना करनी चाहिये। व्यतिक्रम करनेपर फलका अपहरण राक्षस कर लेते हैं। स्वस्तिक बनाकर उसके ऊपर निर्दिष्ट विधिसे कलश स्थापित कर वरूणादि देवताओंका आवाहन करके उनका पूजन करना चाहिये। (अध्याय ३-५)

चतुर्विध मास-व्यवस्था एवं मलमास-वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं (विभिन्न प्रकारके) मासोंका वर्णन करता हूँ। मास चार प्रकारके होते हैं—चान्द्र, सौर, सावन तथा नाक्षत्र। शुक्ल प्रतिपदासे लेकर अमावास्यातकका मास चान्द्र-मास कहा जाता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तिमें प्रवेश करनेका समय सौर-मास कहलाता है। पूरे तीस दिनोंका सावन-मास होता है। अश्विनीसे लेकर रेवतीपर्यन्त नाक्षत्र-मास होता है। सूर्योदयसे दूसरे सूर्योदयतक जो दिन होता है, उसे सावन-दिन कहते हैं। एक तिथिमें चन्द्रमा जितना भोग करता है, वह चान्द्र-दिवस कहलाता है। राशिके तीसवें भागको सौर-दिन कहते हैं। दिन-रातको मिलाकर अहोरात्र होता है। किसी भी तिथिको लेकर तीस-दिन बाद आनेवाली तिथितकका समय सावन-मास होता है। प्रायश्चित्त, अन्नप्राशन तथा मन्त्रोपासनमें, राजाके कर-ग्रहणमें,

व्यवहारमें, यज्ञमें तथा दिनकी गणना आदिमें सावन-मास ग्राह्य है। सौर-मास विवाहदि-संस्कार, यज्ञ-व्रत आदि सत्कर्म तथा स्नानादिमें ग्राह्य है। चान्द्र-मास पार्वण, अष्टकाश्राद्ध, साधारण श्राद्ध, धार्मिक कार्यों आदिके लिये उपयुक्त है। चैत्र आदि मासोंमें तिथिको लेकर जो कर्म विहित हैं, वे चान्द्र-माससे करने चाहिये। सोम या पितृगणोंके कार्य आदिमें नाक्षत्र-मास प्रशस्त माना गया है। चित्रा नक्षत्रके योगसे चैत्री पूर्णिमा होती है, उससे उपलक्षित मास चैत्र कहा जाता है। चैत्र आदि जो बारह चान्द्र-मास हैं, वे तत्-तत्-नक्षत्रके योगसे तत्-तत्-नामवाले होते हैं।

जिस महीनेमें पूर्णिमाका योग न हो, वह प्रजा, पशु आदिके लिये अहितकर होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों नित्य तिथिका भोग करते हैं। जिन तीस दिनोंमें संक्रमण न हो, वह मलिल्लुच,

मुद्राओं एवं पारिश्रमिकका पता चलता है। अन्य किसी पुराण या धार्मिक ग्रन्थोंमें इनका कोई संकेत नहीं किया गया है। गीताप्रेससे प्रकाशित 'माक्सवाद और रामराज्य' पुस्तकके पारिश्रमिकवाले प्रकरणमें इसपर पूरा विचार किया गया है तथा 'कल्याण' सन् १९६४ ई० के अङ्कमें भी इसपर विचार प्रकट किया गया है।

  • प्रचलित परम्परामें आम, पीपल, बरगद, प्लक्ष (पाकड़) तथा उदुम्बर (गूलर)—ये पञ्च-पल्लव कहे गये हैं।

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