भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- मध्यमपर्व, तृतीय भाग *
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दिव्य, भौम एवं अन्तरिक्षजन्य उत्पात तथा उनकी शान्तिके उपाय१
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं विविध प्रकारके अपशकुनो, उत्पातों एवं उनके फलोंका वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग सावधान होकर सुनें। जिस व्यक्तिकी लगन-कुण्डली अथवा गोचरमें पाप-ग्रहोंका योग हो तो उसकी शान्ति करानी चाहिये। दिव्य, अन्तरिक्ष और भौम—ये तीन प्रकारके उत्पात होते हैं। ग्रह, नक्षत्र आदिसे जो अनिष्टकी आशंका होती है वह दिव्य उत्पात कहलाता है। उल्कापात, दिशाओंका दाह (मण्डलोंका उदय, सूर्य-चन्द्रके ईर्द-गिर्द पड़नेवाले घेरैका दिखायी देना), आकाशमें गन्धर्वनगरका दर्शन, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि अन्तरिक्षजन्य उत्पात हैं। जलाशयों, वृक्षों, पर्वतों तथा पृथ्वीसे प्रकट होनेवाले भूकम्प आदि उत्पात भौम उत्पात कहलाते हैं। अन्तरिक्ष एवं दिव्य उत्पातोंका प्रभाव एक ससाहतक रहता है। इसकी शान्तिके लिये तत्काल उपाय करना चाहिये अन्यथा वे बहुत कालतक प्रभावी रहते हैं। देवताओंका हँसना, रुधिर-खाव होना, अकस्मात् बिजली एवं वज्रका गिरना, हिंसा और निर्दयताका बढ़ना, सर्पोंका आरोहण करना—ये सब दैव दुर्निमित्त हैं। मेघसे उत्पन्न वृष्टि केवल शिलातलपर ही गिरे तो एक ससाहेके अंदर उत्पन्न प्राणी नष्ट हो जाते हैं। एक राशिपर शनि, मंगल और सूर्य—ये पापग्रह स्थित हो जायँ और पृथ्वी अकस्मात् धुएँसे ढकी दीखे तो भारी जनसंहारकी सम्भावना होती है। यदि बृहस्पति अपनी राशिका अतिचार२ करे और शनि वहाँ स्थित न हो तो राज्य-नष्ट होनेकी सम्भावना रहती है। यदि सूर्य कुछ समयतक न दिखायी दे और दिशाओंमें दाह
होने लगे, धूमकेतु दिखायी दे और बार-बार भूकम्प होता हो तथा राजाके जन्म-दिनमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़े तो वह उसके लिये भारी दुर्निमित्त है। भयंकर आँधी-तूफान आ जाय, ग्रहोंका आपसमें युद्ध दिखलायी दे, तीन महीनेमें ही दूसरा ग्रहण लग जाय अथवा उल्कापात हो, आकाश और भूमिपर मेढ़क दौड़ने लगे, हल्दीके समान पीली वृष्टि हो, पत्थरोंमें सिंह और बिल्लीकी आकृति दिखलायी पड़े तो राष्ट्रमें दुर्भिक्ष और राजाका विनाश होता है। चैत्रमें अथवा कुम्भके सूर्यमें (फाल्गुन मासमें) नदीका वेग अकस्मात् बहुत बढ़ जाय तो राष्ट्रमें विप्लव होता है। ये सब सूर्यजन्य अद्भुत उत्पात हैं। हवन आदिद्वारा इनकी शान्ति करानी चाहिये। 'आ कृष्णोन्' (यजु० ३३।४३) इस सूर्यमन्त्रद्वारा हवन कराना चाहिये। धान्यादिका निस्सार हो जाना, गौओंका निस्तेज हो जाना, कुओंका जल सहसा सूख जाना—ये सब भी सूर्यजनित उत्पात हैं, इनकी शान्तिके लिये कमल-पुष्पोंसे एक सहस्र आहुतियाँ देनी चाहिये। विकृत पक्षी, पाण्डुवर्ण कपोत, श्वेत उल्लू, काला कौआ और कराकुल पक्षी यदि घरमें गिरें तो उस घरमें महान् उत्पात मच जाता है। गलेकी मालाएँ आपसमें टकराने लगे, सद्यः उत्पन्न बालकको दाँत हो, देवताओंकी मूर्तियाँ हँसती हों, मूर्तियोंमें पसीना दीख पड़े और घड़ेमें अथवा घरमें सर्प और मण्डूकका प्रसव हो जाय तो उस घरकी गृहिणी छः मासके अंदर नष्ट हो जाती है। घरपर या वृक्षपर बिजली कड़कड़ाकर गिरने और आगकी ज्वालाएँ दिखायी देनेपर महान् उत्पात होता है। इन सबकी
१-इन उत्पातोंका तथा इनकी शान्तियोंका विस्तृत विधान आथर्वण शाक्तिकल्प एवं अथर्वपरिशिष्टादिमें दिया गया है। मत्स्यपुराणके २२८ से २३८ तकके अध्यायोंमें भी यह विषय विवेचित है।
२-एक राशिका भोगकाल समाप्त हुए बिना तीव्रगतिसे आगे चला जाना। यह स्थिति केवल मंगलसे लेकर शनितकके ग्रहोंकी होती है।
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