भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 290
  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२७९

भात, धान्य आदिका आभास होना; घरमें ताँबा, काँसा, लोहा, सीसा तथा पीतल आदिका रखा दिखायी देनेका आभास होना; ऐसे उत्पातपर धनके नाश होनेकी सम्भावना रहती है और अनेक व्याधियाँ होती हैं, राजा भयंकर उपद्रव तथा बन्धनमें पड़ जाता है। गौ, अश्व तथा सेवकोंका विनाश होता है। दन्तपंक्तिको छोड़कर दाँतोंके ऊपर दाँतोंका निकलना, शलाकाके समान दाँत निकलना—ये भी दोषकारक हैं। बर्तनोंमें, घड़ोंमें यदि बादलके गरजनेकी आवाज सुनायी दे तो गृहस्वामीपर विपत्तिकी सम्भावना होती है—ये शुक्रग्रहजनित दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये शुक्रवारके दिन दही, मधु, घृतयुक्त शमीपत्रसे हवन करे तथा दो सफेद वस्त्र, पयस्विनी श्वेत गौ और सुवर्णकी शुक्रकी प्रतिमाका दान करना चाहिये।

मन्दिरकी जमीन यदि रक्त वर्णकी अथवा पुष्पित दिखलायी दे तो वहाँ भी उत्पातकी सम्भावना होती है। आकाशमें जलती हुई आग दिखायी दे तो स्त्री-पुरुषोंकी हानि और राष्ट्रमें विप्लवकी सम्भावना होती है। सभी ओषधियाँ और सस्य रसविहीन हो जायँ; हाथी, घोड़े, मतवाले होकर हिंसक हो जायँ; राजाके लिये नगर तथा गाँवमें सभी शत्रु हो जायँ; गौ, महिष आदि पशु अनायास उत्पात मचाने लगे; घरके दरवाजेमें गोह और शंखिनी प्रवेश करे तो अशुभ समझना चाहिये; इससे राज-पीड़ा और धन-हानि होती है। ये सभी उत्पात शनिग्रहजनित समझने चाहिये। इनकी शान्तिके लिये विविध सस्यों तथा समिधाओंसे शनिवारके दिन 'शं नो देवी' (यजु० ३६।१२) इस मन्त्रसे दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और चरुसे भी हवन करना चाहिये। नीली सवत्सा पयस्विनी गाय, दो वस्त्र, सोना, चाँदी, शनिकी

प्रतिमा आदि दक्षिणामें ब्राह्मणको देनी चाहिये।

बादलके गरजे बिना लाल-पीली शिलावृष्टिका दिखलायी देना, बिना हवाके वृक्षका हिलना-डुलना दिखलायी देना, इन्द्रध्वज तथा इन्द्रधनुषका गिरना, दिनमें सियारोंका तथा रात्रिमें उलूकका रोना, एक बैलका दूसरे बैलके ककुदपर मुँह रखकर रँभाना, ऐसे दोष होनेपर देशमें पापकी वृद्धि होती है तथा राजा राज्य एवं धर्मसे च्युत हो जाता है। गौ और ब्राह्मणमें परस्पर द्वन्द्व मच जाता है, वाहन नष्ट हो जाते हैं। यदि आकाशमें ध्वजकी छाया दिखलायी पड़े तो राष्ट्रमें महान् विप्लव होता है। यदि जलमें जलती हुई आग दिखलायी दे और सिर अथवा शरीरपर बिजली गिर जाय तो उसका जीवन दुर्लभ हो जाता है। दरवाजोंके किनारेपर अथवा स्तम्भपर अग्नि अथवा धूम दिखलायी दे तो मृत्युका भय होता है। आकाशमें वज्राघात, अग्निकी ज्वालाके मध्य धुआँ, नगरके मध्य किसी अनहोनी घटनाका दिखलायी देना, शव ले जाते समय उस शवका उठकर बैठ जाना; स्थापित लिङ्गका गमन करना; भूकम्प, आँधी-तूफान, उल्कापात होना; बिना समय वृक्षोंमें फल-फूल लगना—ये सभी उत्पात राहुजन्य हैं। इनकी शान्तिके लिये दही, मधु, घी, दूब, अक्षत आदिसे 'कया नश्चित्र' (यजु० २७।३९) इस मन्त्रद्वारा रविवारके दिन दस हजार आहुतियाँ राहुके लिये दे, चरुसे भी हवन करे। पयस्विनी कपिला गौ, अतसी, तिल, शंख और युग्मवस्त्र ब्राह्मणको दानमें दे। वारुणहोम भी करे। इससे सारे दोष-पाप नष्ट हो जाते हैं।

यदि जम्बूक, गृध्र, कौए आदि भीषण ध्वनि करते हों तथा भयंकर नृत्य करते हों तो मृत्युकी आशंका होती है, जलती हुई आगके समान

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth