भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 654 में से

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पृष्ठ 292

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्रतिसर्गपर्व

(प्रथम खण्ड)

[वास्तवमें भविष्यपुराणके भविष्य नामकी सार्थकता प्रतिसर्गपर्वमें ही चरितार्थ हुई दीखती है। वंशानुकीर्तन सभी पुराणोंका मुख्य लक्षण है—‘वंशानुकीर्तनं चेति पुराणं पञ्चलक्षणम्।’ यह विषय सभी पुराणोंमें प्राप्त होता है। भविष्यपुराणमें तो कई स्थानोंपर आया है, पर प्रतिसर्गपर्वने आधुनिक इतिहासका मार्ग प्रशस्त कर दिया है। अरबी-फारसी और उर्दूमें इतिहासको तवारीख (तारीख) कहते हैं। सभी घटनाओंका उल्लेख तारीख (तिथि, वर्ष) क्रमपूर्वक हुआ है। अंग्रेजीमें भी इतिहासका सही नाम ‘क्रानिकल्स’ है। भारतीय दृष्टिमें कालका प्रवाह अनन्त है। एक सृष्टिके बाद दूसरी सृष्टिमें कल्प-महाकल्प लगे हुए हैं—जैसे—‘इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कल्प सात अरु बीसा ॥’ इसलिये किसी एक कल्पका ही वर्णन एक पुराणमें सम्भव होता है। प्रतिसर्गपर्व अपनेको वाराह-कल्पमें वैवस्वत मन्वन्तरका ही इतिहास-निर्देशक बतला रहा है और बड़ी सावधानीसे सत्ययुग, त्रेतायुग आदिके दीर्घायु राजाओंके राज्य आदिका उल्लेख कर रहा है। बादमें कलियुगी राजाओंके वंशका भी वर्णन करता है। प्रस्तुत विवरणमें नामोंकी विशेष शुद्धिके लिये वाल्मीकीय रामायण, विष्णुपुराण, वायुपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, श्रीमद्भागवतके साथ अन्य ग्रन्थों एवं ऐतिहासिक, पौराणिक कोषोंसे भी सहायता ली गयी है।—सम्पादक]

सत्ययुगके राजवंशका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

‘भगवान् नर-नारायणके अवतारस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनके सखा नरश्रेष्ठ अर्जुन, उनकी लीलाओंको प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उनके चरित्रोंका वर्णन करनेवाले वेदव्यासको नमस्कार कर अष्टादश पुराण, रामायण और महाभारत आदि जय नामसे व्यपदिष्ट ग्रन्थोंका वाचन करना चाहिये।’

महामुनि आचार्य शौनकजीने पूछा—मुने! ब्रह्माकी आयुके उत्तरार्धमें भविष्य नामके महाकल्पमें प्रथम वर्षके तीसरे दिन वैवस्वत नामक मन्वन्तरके अट्टाईसवें सत्ययुगमें कौन-कौन राजा हुए? आप उनके चरित्र तथा राज्यकालका वर्णन करें।

सूतजी बोले—श्वेतवाराहकल्पमें ब्रह्माके वर्षके तीसरे दिन सातवें मुहूर्तके प्रारम्भ होनेपर महाराज वैवस्वत मनु उत्पन्न हुए। उन्होंने सरयू नदीके तटपर दिव्य सौ वर्षांतक तपस्या की और उनकी छींक्से उनके पुत्ररूपमें राजा इक्ष्वाकुका जन्म हुआ।

ब्रह्माके वरदानसे उन्होंने दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति की। राजा इक्ष्वाकु भगवान् विष्णुके परम भक्त थे। उन्हींकी कृपासे उन्होंने छत्तीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र विकुक्षि हुए, अपने पिता इक्ष्वाकुसे सौ वर्ष कम अर्थात् पैंतीस हजार नौ सौ वर्षांतक राज्य करके वे स्वर्ग पधार गये। उनके पुत्र रिपुञ्जय हुए और उन्होंने भी पिता विकुक्षिसे सौ वर्ष कम अर्थात् पैंतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र ककुत्स्थ हुए। उन्होंने पैंतीस हजार सात सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र अनेना हुए, उन्होंने पैंतीस हजार छः सौ वर्षांतक राज्य किया। अनेनाके पुत्र पृथु नामसे विख्यात हुए। उन्होंने पैंतीस हजार पाँच सौ वर्षांतक राज्य किया और उनके पुत्र विष्ण्वश्व हुए, उन्होंने पैंतीस हजार चार सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र अद्वि हुए, उन्होंने पैंतीस हजार तीन सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र भद्राश्व हुए, जिन्होंने पैंतीस हजार दो सौ वर्षांतक राज्य किया। राजा भद्राश्वके पुत्र युवनाश्व हुए, उन्होंने पैंतीस

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