भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हजार एक सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र श्रावस्त हुए। (इन्होंने श्रावस्ती नामकी नगरी बसायी थी।) उस समय सत्ययुगमें समग्र भारतवर्षमें धर्म अपने तप, शौच, दया तथा सत्य चारों चरणोंसे* विद्यमान था। इन सभी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंने उदयाचलसे अस्ताचलपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर नीति एवं धर्मपूर्वक राज्य किया। महाराज श्रावस्तने पैंतीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र बृहदश्च हुए, उन्होंने चौतीस हजार नौ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र कुवलयाश्च हुए, उन्होंने चौतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया।
महाराज कुवलयाश्चके पुत्र दृढाश्च हुए, जिन्होंने अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् तैंतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र निकुम्भक हुए, उन्होंने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् बत्तीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र संकटाश्च हुए, उन्होंने एक हजार वर्ष कम अर्थात् इकत्तीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र प्रसेनजित् हुए, उन्होंने तीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। इसके बाद रवणाश्च हुए, उन्होंने उनतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र मान्धाता हुए, उन्होंने अपने पितासे एक सौ वर्ष कम अर्थात् उनतीस हजार सात सौ वर्षांतक राज्य किया। महाराज मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्स हुए, उन्होंने उनतीस हजार छः सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र त्रिशदश्च हुए, उनके रथमें तीस श्रेष्ठ घोड़े जुते रहते थे, इसीलिये वे त्रिशदश्चके नामसे विख्यात हुए। राजा त्रिशदश्चके पुत्र अनरण्य हुए, उन्होंने अट्टाईस हजार वर्षांतक शासन किया। महाराज
अनरण्यके पुत्र पृषदश्च हुए, वे छः हजार वर्षांतक राज्य करके अन्तमें पितृलोकको चले गये। अनन्तर हर्यश्च नामके राजा हुए, उन्होंने राजा पृषदश्चसे एक हजार वर्ष कम अर्थात् पाँच हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र वसुमान् हुए, उन्होंने उनसे एक हजार वर्ष कम अर्थात् चार हजार वर्षांतक राज्य किया। तदनन्तर उनको त्रिधन्वा नामका पुत्र हुआ, उसने अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् तीन हजार वर्षांतक राज्य किया। तबतक भारतमें सत्ययुगका द्वितीय पाद समाप्त हो गया।
महाराज त्रिधन्वाके पुत्र त्रय्यारुणि हुए, वे अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् दो हजार वर्षांतक राज्य करके स्वर्ग चले गये। उनके पुत्र त्रिशंकु हुए और उन्होंने मात्र एक हजार वर्ष राज्य किया। छद्मके कारण राजा त्रिशंकु हीनताको प्राप्त हुए। उनके पुत्र हरिश्चन्द्र हुए, इन्होंने बीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र रोहित हुए, उन्होंने पिताके समान ही राज्य किया। उनके पुत्रका नाम हारीत था। राजा हारीतने भी पिताके समान ही दीर्घकालतक राज्य किया। उनके पुत्र चंचुभूप हुए। पिताके तुल्य वर्षांतक उन्होंने राज्य किया। उनके पुत्र विजय हुए। इन्होंने भी पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र रुक हुए, उन्होंने भी पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। ये सभी राजा विष्णुभक्त थे एवं इनकी सेना बहुत विशाल थी। उनके राज्यमें मणि-स्वर्णकी समृद्धि तथा प्रचुर धन-सम्पत्ति सभीको सुलभ थी। उस समय सत्ययुगका पूर्ण धर्म विद्यमान था।
सत्ययुगके तृतीय चरणके मध्यमें राजा रुक्कके पुत्र महाराज सगर हुए। वे शिवभक्त तथा सदाचार-
- मनुस्मृति (१।८६)-में तप, ज्ञान, यज्ञ तथा दान—ये धर्मके चार पाद बताये गये हैं।
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