भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 306
  • प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *

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अम्बावती नामक दिव्य नगरीमें आकर बत्तीस मूर्तियोंसे समन्वित, भगवान् शिवद्वारा अभिरक्षित रमणीय और दिव्य सिंहासनको सुशोभित किया। भगवती पार्वतीके द्वारा प्रेषित एक वैताल उनकी रक्षामें सदा तत्पर रहता था। उस वीर राजाने महाकालेश्वरमें जाकर देवाधिदेव महादेवकी पूजा की और अनेक व्यूहोंसे परिपूर्ण धर्म-सभाका निर्माण किया। जिसमें विविध मणियोंसे विभूषित अनेक धातुओंके स्तम्भ थे। शौनकजी! उसने अनेक लताओंसे पूर्ण, पुष्पान्वित स्थानपर अपने

दिव्य सिंहासनको स्थापित किया। उसने वेद-वेदाङ्ग-पारंगत मुख्य ब्राह्मणोंको बुलाकर विधिवत् उनकी पूजाकर उनसे अनेक धर्म-गाथाएँ सुनीं। इसी समय वैताल नामक देवता ब्राह्मणका रूप धारण कर 'आपकी जय हो', इस प्रकार कहता हुआ वहाँ आया और उनका अभिवादन कर आसनपर बैठ गया। उस वैतालने राजासे कहा— 'राजन्! यदि आपको सुननेकी इच्छा हो तो मैं आपको इतिहाससे परिपूर्ण एक रोचक आख्यान सुनाता हूँ*' इसे आप सुनें। (अध्याय ७)

॥ प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड सम्पूर्ण ॥

  • भारतवर्षमें विक्रमादित्य अत्यन्त प्रसिद्ध दानी, परोपकारी और सर्वार्ज्ञ-सदाचारी राजा हुए हैं। स्कन्द आदि पुराणों, बृहत्कथा और द्वात्रिंशत्पुत्तलिका, सिंहासनबत्तीसी, कथासरित्सागर, पुरुष-परीक्षा आदि ग्रन्थोंमें इनका चरित्र वर्णित है। अब इधर कैम्ब्रजके इतिहासके दूसरे भागमें इनका चरित्र आया है। वैसे स्मिथ और रिफिन्स्टन आदिने अनेक विक्रमादित्योंकी चर्चा की है, पर ये महाराज विक्रमादित्य उज्जयिनीके राजा थे और कालिदास, अमरसिंह, वराहमिहिर, वैद्यराज धन्वन्तरि, घटकर्पर आदि नवरत्न इनकी ही राजसभाकी दिव्य विद्वद्भिर्भूतियाँ थे। जिनकी आगे-पीछे कोई उपमा नहीं है। राजा भोजसे लेकर बादशाह अकबरतक सभीने अपनी सभाको वैसे ही नवरत्नोंसे अलंकृत करनेका प्रयत्न किया था।

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