भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

चला गया और वहाँ उसने विधिपूर्वक ब्रह्महोत्र सम्पन्न किया। वेदमन्त्रोंके प्रभावसे यज्ञकुण्डसे चार क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई—प्रमर—परमार (सामवेदी), चपहानि—चौहान (कृष्णयजुर्वेदी), त्रिवेदी—गहरवार (शुक्ल यजुर्वेदी) और परिहारक (अथर्ववेदी) क्षत्रिय थे। वे सब ऐरावत-कुलमें

उत्पन्न गजोंपर आरूढ़ होते थे। इन लोगोंने अशोकके वंशजोंको अपने अधीन कर भारतवर्षके सभी बौद्धोंको नष्ट कर दिया।

अवन्तमें प्रमर—परमार राजा हुआ। उसने चार योजन विस्तृत अम्बावती नामक पुरीमें स्थित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। (अध्याय ६)

महाराज विक्रमादित्यके चरित्रका उपक्रम

सूतजी बोले—शौनक! चित्रकूट पर्वतके आस-पासके क्षेत्र (प्रायः आजके पूरे बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड)—में परिहार नामका एक राजा हुआ। उसने रमणीय कलिंगर नगरमें रहकर अपने पराक्रमसे बौद्धोंको परास्त कर पूरी प्रतिष्ठा प्राप्त की। राजपूतानेके क्षेत्र (दिल्ली नगर)—में चपहानि—चौहान नामक राजा हुआ। उसने अति सुन्दर अजमेर नगरमें रहकर सुखपूर्वक राज्य किया। उसके राज्यमें चारों वर्ण स्थित थे। आनर्त (गुजरात)—देशमें शुक्ल नामक राजा हुआ, उसने द्वारकाको राजधानी बनाया।

शौनकजीने कहा—हे महाभाग! अब आप अग्रिवंशी राजाओंका वर्णन करें।

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! इस समय मैं योगनिद्राके वशमें हो गया हूँ। अब आपलोग भी भगवान्का ध्यान करें। अब मैं थोड़ा विश्राम करूँगा। यह सुनकर मुनिगण भगवान् विष्णुके ध्यानमें लीन हो गये। लम्बे अन्तरालके बाद ध्यानसे उठकर सूतजी पुनः बोले—महामुने! कलियुगके सैतीस सौ दस वर्ष व्यतीत होनेपर प्रमर नामक राजाने राज्य करना प्रारम्भ किया। उन्हें महामद (मुहम्मद) नामक पुत्र हुआ, जिसने पिताके शासन-कालके आधे समयतक राज्य किया। उसे देवापि नामक

पुत्र हुआ, उसने भी पिताके ही तुल्य वर्षांतक राज्य किया। उसे देवदूत नामक पुत्र हुआ, उसके गन्धर्वसेन नामक पुत्र हुआ, जिसने पचास वर्षांतक राज्य किया। वह अपने पुत्र शङ्खुका अभिषेक कर वन चला गया। शङ्खुने तीस वर्षांतक राज्यभार सँभाला। उसी समय देवराज इन्द्रने वीरमती नामक एक देवाङ्गनाको पृथ्वीपर भेजा। शङ्खुने वीरमतीसे गन्धर्वसेन नामक पुत्ररत्नको प्राप्त किया। पुत्रके जन्म-समयमें आकाशसे पुष्पवृष्टि हुई और देवताओंने दुंदुभी बजायी। सुखप्रद शीतल-मन्द वायु बहने लगी। इसी समय अपने शिष्योंसहित शिवदृष्टि नामके एक ब्राह्मण तपस्याके लिये वनमें गये और शिवकी आराधनासे वे शिवस्वरूप हो गये।

तीन हजार वर्ष पूर्ण होनेपर जब कलियुगका आगमन हुआ, तब शकोंके विनाश और आर्यधर्मकी अभिवृद्धिके लिये वे ही शिवदृष्टि गृह्यकोंकी निवासभूमि कैलाससे भगवान् शंकरकी आज्ञा पाकर पृथ्वीपर विक्रमादित्य नामसे प्रसिद्ध हुए। वे अपने माता-पिताको आनन्द देनेवाले थे। वे बचपनसे ही महान् बुद्धिमान् थे। बुद्धिविशारद विक्रमादित्य पाँच वर्षकी ही बाल्यावस्थामें तप करने वनमें चले गये। बारह वर्षांतक प्रयत्नपूर्वक तपस्या कर वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हो गये। उन्होंने

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