भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उस कन्याके योग्य वर इनमेंसे कौन था ?

राजा बोला—रुद्रकिंकर! वह रूपवती कन्या त्रिलोकसुन्दरी धर्मदत्तके योग्य है; क्योंकि इन्द्रदत्त वेदादि शास्त्रोंका ज्ञाता है, अतः वर्णसे वह द्विज कहा जायगा। भाषा जाननेवाला तथा धन-धान्यका विस्तार करनेवाला धनपाल वणिक् कहा जायगा।

तृतीय जो कलाविद् है और रत्नोंका व्यापार करता है, वह शूद्र कहलायेगा। वैताल! सवर्णके लिये ही कन्या योग्य होती है, अतः धनुर्वेद-शास्त्रमें जो निपुण धर्मदत्त है, वह वर्णसे क्षत्रिय कहलायेगा, इसलिये उस क्षत्रिय कन्याका विवाह धर्मदत्तके साथ ही किया जाना चाहिये।

विषयी राजा राज्यके विनाशका कारण बनता है

(राजा धर्मवल्लभ और मन्त्री सत्यप्रकाशकी कथा)

वैतालने पुनः राजासे कहा—राजन्! प्राचीन कालमें रमणीय पुण्यपुर (पूना) नगरमें धर्मवल्लभ नामका एक राजा राज्य करता था। उसका मन्त्री सत्यप्रकाश था। मन्त्रीकी स्त्रीका नाम था लक्ष्मी। एक बार राजा धर्मवल्लभने मन्त्रीसे कहा—‘मन्त्रिवर! आनन्दके कितने भेद हैं? यह मुझे बताओ।’ उसने कहा—‘महाराज! आनन्द चार प्रकारके हैं—(१) ब्रह्मचर्याश्रमका आनन्द जो ब्रह्मानन्द है, वह श्रेष्ठ है। (२) गृहस्थाश्रमका विषयानन्द मध्यम है। (३) वानप्रस्थका धर्मानन्द सामान्य है और (४) संन्यासमें जो शिवानन्दकी प्राप्ति है, वह आनन्द उत्तमोत्तम है। राजन्! इनमें गृहस्थाश्रमका विषयानन्द स्त्री-प्रधान है, क्योंकि गृहस्थाश्रममें स्त्रीके बिना सुख नहीं मिलता।’

यह सुनकर राजा अपने अनुकूल धर्मपरायणा पत्नी प्राप्त करनेके लिये अन्य देशमें चला गया, किंतु उसे मनोऽनुकूल पत्नी नहीं प्राप्त हुई। तब उसने अपने मन्त्रीसे कहा—‘मेरे अनुरूप कोई स्त्री ढूँढ़ो।’ यह सुनकर मन्त्री विभिन्न देशोंमें गया। पर जब कहीं भी उसे राजाके योग्य स्त्री नहीं मिली तो वह सिन्धु देशमें आकर समुद्रकी

ओर बढ़ा। सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ सिन्धुको देखकर वह प्रसन्न हुआ। मन्त्री सत्यप्रकाशने समुद्रसे इस प्रकार प्रार्थना की—‘सभी रत्नोंके आलय, सिन्धुदेशके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। शरणागतवत्सल! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, गङ्गा आदि नदियोंके स्वामी जलाधीश! आपको नमस्कार है। मेरे राजाके लिये आप उत्तम स्त्री-रत्न प्रदान करें। यदि ऐसा आप नहीं करेंगे तो मैं अपने प्राण यहीं दे दूँगा।’ नदीपति सागर यह स्तुति सुनकर प्रसन्न हो गये और उसे जलमें विदुमके पत्नोंवाले, मुक्तारूपी फलसे समन्वित एक वृक्षको दिखाया, जिसके ऊपर मनोरमा, सुकुमारी एक सुन्दरी कन्या स्थित थी। पर कुछ ही क्षणोंमें देखते-ही-देखते वह कन्या वृक्षसहित पुनः जलमें लीन हो गयी।

यह देखकर अतिशय आश्चर्यचकित होकर मन्त्री सत्यप्रकाश पुनः राजाके पास लौट आया और उसने सारी बातें राजाको सुनवाई। पुनः दोनों समुद्रके किनारे आये। राजाने भी मन्त्रीके समान ही कन्याको वृक्षपर बैठा देखा और राजाके देखते ही वह कन्या पूर्ववत् जलमें प्रविष्ट हो गयी। इस अद्भुत दृश्यको देखकर राजा भी समुद्रमें

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