भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 654 में से

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पृष्ठ 312
  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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प्रविष्ट हो गया तथा उसी कन्याके साथ पातालमें पहुँच गया और मन्त्री वापस लौट आया।

राजाने कहा—वरानने! मैं तुम्हारे लिये यहाँ आया हूँ। गान्धर्व विवाहसे मुझे प्राप्त करो। उसने हँसकर कहा—‘नृपश्रेष्ठ! जब कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथि आयेगी, तब मैं देवी-मन्दिरमें आकर तुम्हें मिलूँगी।’ राजा लौट आया और पुनः कृष्ण चतुर्दशीके दिन हाथमें तलवार लेकर देवीके मन्दिरमें गया। वह कन्या राजासे पूर्व ही मन्दिरमें पहुँच चुकी थी। उसी समय बकवाहन नामके एक राक्षसने आकर उस कन्याका स्पर्श किया। यह देखकर राजा क्रोधान्ध हो गया। उसने राक्षसका सिर तलवारसे काट दिया। पुनः उस कन्यासे कहा—‘भामिनि! तुम सत्य बताओ, यह कौन था और यहाँ कैसे आया?’ उसने कहा—‘राजन्! मैं विद्याधरकी कन्या हूँ। मेरा नाम मदवती है। मैं पिताजीकी प्रिय कन्या हूँ। एक बार मैं किसी समय वनमें गयी थी और भोजनके समय पिता-माताके पास घरमें नहीं पहुँच सकी थी। मेरे पिताजीने ध्यानके द्वारा सारा वृत्तान्त जान लिया, उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि मदवती! कृष्ण चतुर्दशीको तुमको राक्षस ग्रहण करेगा।’ जब मुझे शापकी बात मालूम हुई, तब मैंने रोते हुए पिताजीसे पूछा—‘देव! मेरी इस शापसे मुक्ति कब होगी?’ उन्होंने कहा—‘पुत्री! जब कृष्ण चतुर्दशीको कोई राजा तुम्हारा वरण करेगा, तब तुम्हारे शापकी निवृत्ति हो जायगी।’

मदवतीने कहा—राजन्! आपके अनुग्रहसे आज

मैं शापसे मुक्त हो गयी हूँ। आपकी आज्ञा पाकर अब मैं अपने पिताके घर जाना चाहती हूँ। यह सुनकर राजाने कहा—‘तुम मेरे साथ मेरे घर चलो। इसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे पिताके पास ले चलूँगा।’ वह राजाकी बात मानकर राजाके महलमें आ गयी और राजासे उसका विवाह हो गया। उस राजाके नगरमें महान् उत्सव हुआ। मन्त्रीने देखा कि राजाके साथ एक दिव्य कन्या भी आयी है। कुछ दिनों बाद मन्त्री एकाएक मृत्युको प्राप्त हो गया।

वैतालने पूछा—राजन्! बताओ, उस मन्त्रीके मरनेमें क्या कारण है? क्या रहस्य है?

राजा विक्रमने कहा—मन्त्री सत्यप्रकाश राजाका मित्र और प्रजाका परम हितैषी था। उसके ही समुद्योगसे राजाको श्रेष्ठ मदवती नामकी विद्याधर-कन्या रानीके रूपमें प्राप्त हुई थी, किंतु मदवतीके साथ विवाहके बाद मन्त्री सत्यप्रकाशने देखा कि राजा मदवतीको पाकर विलासी होते जा रहे हैं और राज्य एवं प्रजाकी उपेक्षा करने लगे हैं। दिन-रात विषय-सुखमें ही लिस रहने लगे हैं। यह देखकर उसने समझ लिया कि अब शीघ्र ही इस राज्यका विनाश होनेवाला है; क्योंकि जब राजा विषयी एवं स्वार्थी बन जाता है, तब राज्यका नाश अवश्य होता है। ऐसी स्थितिमें मेरी मन्त्रणाएँ भी व्यर्थ सिद्ध होंगी, अतः राज्यके विनाशको मैं अपनी आँखोंसे न देख सकूँ, इसलिये पहले ही मैं अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर देता हूँ। वैताल! यही समझकर मन्त्री सत्यप्रकाशने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया।

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