भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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योगीके पास आया। योगीने यक्षिणीको आकृष्ट करनेवाली विद्या गुणाकरको प्रदान की और कहा—‘वत्स! तुम चालीस दिनतक जलमें स्थित रहकर आधी रातमें इस शुभ मन्त्रका जप करो। ऐसा करनेपर यदि तुम मन्त्र सिद्ध कर लोगे तो मन्त्रकी शक्तिके प्रभावसे वह यक्षिणी तुम्हें प्राप्त हो जायगी। गुणाकरने वैसा ही किया, किंतु वह यक्षिणीको प्राप्त नहीं कर सका। अन्तमें विवश होकर योगीकी आज्ञासे अपने घर लौट आया। उसने अपने माता-पिताको नमस्कार कर वह रात्रि बितायी। दूसरे दिन प्रातः वह गुणाकर सन्यासियोंके एक मठमें गया और वहाँ शिष्य-रूपमें रहने लगा। पञ्चाग्रिके मध्यमें स्थित होकर उसने पवित्र हो यक्षिणीको प्राप्त करनेके लिये कपदीद्वारा बताये गये मन्त्रका पुनः जप करना प्रारम्भ किया, पर यक्षिणी फिर भी नहीं आयी, जिससे उसे बड़ा कष्ट हुआ।’
वैतालने ज्ञानविशारद राजासे पूछा—‘महाभाग! गुणाकर अपनी प्रिया यक्षिणीको क्यों नहीं प्राप्त कर सका?’
राजा बोला—रुद्रकिंकर! साधककी सिद्धिके लिये तीन आवश्यक गुण होने चाहिये—मन, वाणी तथा शरीरका ऐकात्म्य। मन और वाणीकी एकतासे किया गया कर्म परलोकमें सुखप्रद होता है। वाणी
और शरीरसे किया गया कार्य सुन्दर होता है। वह इस जन्ममें आंशिक फल देता है और परलोकमें अधिक फलप्रद होता है। मन और शरीरके द्वारा किया गया कर्म दूसरे जन्ममें सिद्धि प्रदान करता है; परंतु मन, वाणी और शरीर—इन तीनोंकी तन्मयतासे सम्पादित कर्म इस जन्ममें ही शीघ्र फल प्रदान करता है और अन्तमें मोक्ष भी प्रदान करता है। अतः साधकको कोई भी कार्य अत्यन्त मनोयोगसे करना चाहिये।
गुणाकरने यद्यपि दो बार बड़े कष्टपूर्वक मन्त्रका जप किया, किंतु दोनों ही बारकी साधनामें मनोयोगकी कमी रही। जलके भीतर तथा पञ्चाग्रि-सेवन आदिमें शरीरका योग रहा और वाणीसे जप भी होता रहा, किंतु गुणाकरका मन मन्त्रमें न लगकर यक्षिणीमें लगा हुआ था। इसी कारण उसे मन्त्र-शक्तिपर विश्वास भी न हो सका। शरीर और वाणीका योग होते हुए भी मनका योग न रहनेके कारण गुणाकर यक्षिणीको प्राप्त न कर सका, किंतु कर्म तो उसने किया ही था, फलतः परलोकमें वह यक्ष हुआ और यक्ष होकर यक्षिणीको प्राप्त किया। इससे यह सिद्ध हुआ कि किसी भी कार्यकी पूर्ण सिद्धिके लिये मन, वाणी और शरीर—इन तीनोंका ही योग आवश्यक है। इनमें भी मनका योग परम आवश्यक है।
संतानमें समान-भाव रखें
(मझले पुत्रकी कथा)
वैतालने पुनः कहा—राजन्! चित्रकूटमें रूपदत्त नामका एक विख्यात राजा रहता था। एक दिन वह एक मृगका पीछा करते हुए एक वनमें प्रविष्ट हो गया। मध्याह्नकालमें वह एक सरोवरके पास पहुँचा और वहाँ उसने अपनी सखीके साथ कमल-
पुष्पोंका चयन करती हुई एक सुन्दर मुनि-कन्याको देखा। उसके श्रेष्ठ रूपको देखकर राजाने उसे अपनी रानी बनानेका निश्चय किया। वह कन्या भी राजाको देखकर प्रसन्न हुई। दोनों परस्पर प्रीतिपूर्वक एक-दूसरेको देखने लगे। उसकी सखीसे
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