भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

राजाने जब उस कन्याका पता पूछा, तब उसने कहा कि यह एक मुनिकी धर्मपुत्री है। उसी समय उस कन्याके पिता वहाँ आ पहुँचे। मुनिको देखकर राजाने विनयपूर्वक उनसे पूछा—‘मुने! उत्तम धर्म क्या है?’ इसपर महामनीषी मुनि बोले—‘राजन्! असहायका पालन-पोषण, शरणागतकी रक्षा और दया करना यही मुख्य धर्म है। भयभीतको अभय-दान देनेके समान कोई दान नहीं है। उदण्डोंको दण्ड देना चाहिये। पूज्यजनोंकी पूजा करनी चाहिये। गौ एवं ब्राह्मणमें नित्य आदरभाव रखना चाहिये। दण्ड देनेमें समानभाव रखना चाहिये, पक्षपात नहीं करना चाहिये। देवताकी पूजामें छल-छद्म एवं कपटको छोड़कर श्रद्धा-भक्तिरूपी सत्यका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। गुरु एवं श्रेष्ठ जनोंकी पूजामें इन्द्रिय-निग्रह एवं समाहितचित्तताका विशेष ध्यान रखना चाहिये। दान देते समय मृदुताका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। थोड़े-से भी हुए निन्द्य कर्मको बहुत बड़ा अपराध समझकर सर्वथा उससे विरत रहना चाहिये*।’

ऐसा कहकर उस मुनिने अपनी कन्याका विवाह राजकुमारके साथ कर दिया। राजा उसे लेकर अपनी राजधानीकी ओर चला। मार्गमें उसने एक वटवृक्षके नीचे विश्राम किया। उसी समय उसकी पत्नीको खा जानेके लिये एक राक्षस वहाँ आया और कहने लगा कि ‘तुम दोनोंने मेरा स्थान अपवित्र कर दिया है, अतः मैं तुम लोगोंको खा जाऊँगा।’ राजाके क्षमा माँगनेपर उसने पुनः कहा—‘यदि तुम किसी सात वर्षके ब्राह्मण-

बालकको मेरे खानेके लिये प्रस्तुत करो तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।’ राजा राक्षसको वचन देकर अपनी पत्नीके साथ महलमें चला आया।

दूसरे दिन राजाने मन्त्रियोंको सब समाचार कह सुनाया। मन्त्रियोंके परामर्शपर राजाने एक ब्राह्मणको एक लक्ष स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उसके मध्यम पुत्रको राक्षसको समर्पित करनेके लिये राजी कर लिया। उस ब्राह्मणपुत्रने भी पिताके लिये अपना बलिदान देना स्वीकार कर लिया। यथासमय उसे लेकर सभी राक्षसके पास पहुँचे। ज्यों ही बलिदानका समय आया, त्यों ही वह ब्राह्मणका बालक पहले हँसा और फिर उच्च स्वरसे रोने लगा।

वैतालने पूछा—‘राजन्! बताओ कि मृत्युके समय वह ब्राह्मण-बालक पहले क्यों हँसा और बादमें फिर क्यों रोया?’

राजाने कहा—‘वैताल! बड़ा पुत्र पिताको प्रिय होता है और छोटा पुत्र माताको प्रिय होता है। इसलिये माता-पितासे अपनेको उपेक्षित जानकर और अन्य कोई शरण्य न देखकर बड़ी आशासे मध्यम पुत्रने राजाकी शरण ग्रहण की, परंतु अपनी पत्नीका प्रिय चाहनेवाले उस निर्दयी राजा रूपदत्तके हाथमें मृत्युरूपी तलवार देखकर उस ब्राह्मणकुमारको पहले हँसी आ गयी और फिर मेरा यह उत्तम शरीर अधम राक्षसको प्राप्त होगा, यह सोचकर वह दुःखी होकर उच्च स्वरसे रोता हुआ पश्चात्ताप करने लगा। वैताल राजाके इस उत्तरसे बहुत प्रसन्न हुआ।

  • तमुवाच मुनिर्धीमान् दयाधर्मप्रपोषणम् । निर्भयस्य समं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ अनहनि दण्डमादद्यादहंपूजाफलं भजेत् । मित्रता गोह्निजे नित्यं समता दण्डनिग्रहे ॥ सत्यता सुरपूजार्थां दमता गुरुपूजने । मृदुता दानसमये संतुष्टिनिन्द्यकर्मणि ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।१९।५-७)

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