भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३०६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
राजाने जब उस कन्याका पता पूछा, तब उसने कहा कि यह एक मुनिकी धर्मपुत्री है। उसी समय उस कन्याके पिता वहाँ आ पहुँचे। मुनिको देखकर राजाने विनयपूर्वक उनसे पूछा—‘मुने! उत्तम धर्म क्या है?’ इसपर महामनीषी मुनि बोले—‘राजन्! असहायका पालन-पोषण, शरणागतकी रक्षा और दया करना यही मुख्य धर्म है। भयभीतको अभय-दान देनेके समान कोई दान नहीं है। उदण्डोंको दण्ड देना चाहिये। पूज्यजनोंकी पूजा करनी चाहिये। गौ एवं ब्राह्मणमें नित्य आदरभाव रखना चाहिये। दण्ड देनेमें समानभाव रखना चाहिये, पक्षपात नहीं करना चाहिये। देवताकी पूजामें छल-छद्म एवं कपटको छोड़कर श्रद्धा-भक्तिरूपी सत्यका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। गुरु एवं श्रेष्ठ जनोंकी पूजामें इन्द्रिय-निग्रह एवं समाहितचित्तताका विशेष ध्यान रखना चाहिये। दान देते समय मृदुताका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। थोड़े-से भी हुए निन्द्य कर्मको बहुत बड़ा अपराध समझकर सर्वथा उससे विरत रहना चाहिये*।’
ऐसा कहकर उस मुनिने अपनी कन्याका विवाह राजकुमारके साथ कर दिया। राजा उसे लेकर अपनी राजधानीकी ओर चला। मार्गमें उसने एक वटवृक्षके नीचे विश्राम किया। उसी समय उसकी पत्नीको खा जानेके लिये एक राक्षस वहाँ आया और कहने लगा कि ‘तुम दोनोंने मेरा स्थान अपवित्र कर दिया है, अतः मैं तुम लोगोंको खा जाऊँगा।’ राजाके क्षमा माँगनेपर उसने पुनः कहा—‘यदि तुम किसी सात वर्षके ब्राह्मण-
बालकको मेरे खानेके लिये प्रस्तुत करो तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।’ राजा राक्षसको वचन देकर अपनी पत्नीके साथ महलमें चला आया।
दूसरे दिन राजाने मन्त्रियोंको सब समाचार कह सुनाया। मन्त्रियोंके परामर्शपर राजाने एक ब्राह्मणको एक लक्ष स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उसके मध्यम पुत्रको राक्षसको समर्पित करनेके लिये राजी कर लिया। उस ब्राह्मणपुत्रने भी पिताके लिये अपना बलिदान देना स्वीकार कर लिया। यथासमय उसे लेकर सभी राक्षसके पास पहुँचे। ज्यों ही बलिदानका समय आया, त्यों ही वह ब्राह्मणका बालक पहले हँसा और फिर उच्च स्वरसे रोने लगा।
वैतालने पूछा—‘राजन्! बताओ कि मृत्युके समय वह ब्राह्मण-बालक पहले क्यों हँसा और बादमें फिर क्यों रोया?’
राजाने कहा—‘वैताल! बड़ा पुत्र पिताको प्रिय होता है और छोटा पुत्र माताको प्रिय होता है। इसलिये माता-पितासे अपनेको उपेक्षित जानकर और अन्य कोई शरण्य न देखकर बड़ी आशासे मध्यम पुत्रने राजाकी शरण ग्रहण की, परंतु अपनी पत्नीका प्रिय चाहनेवाले उस निर्दयी राजा रूपदत्तके हाथमें मृत्युरूपी तलवार देखकर उस ब्राह्मणकुमारको पहले हँसी आ गयी और फिर मेरा यह उत्तम शरीर अधम राक्षसको प्राप्त होगा, यह सोचकर वह दुःखी होकर उच्च स्वरसे रोता हुआ पश्चात्ताप करने लगा। वैताल राजाके इस उत्तरसे बहुत प्रसन्न हुआ।
- तमुवाच मुनिर्धीमान् दयाधर्मप्रपोषणम् । निर्भयस्य समं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ अनहनि दण्डमादद्यादहंपूजाफलं भजेत् । मित्रता गोह्निजे नित्यं समता दण्डनिग्रहे ॥ सत्यता सुरपूजार्थां दमता गुरुपूजने । मृदुता दानसमये संतुष्टिनिन्द्यकर्मणि ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।१९।५-७)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३०७
पढ़ो कम, समझो ज्यादा
(चार मूर्खोंकी कथा)
वैतालने राजासे पुनः कहा—राजन्! रमणीय जयपुरमें वर्धमान नामका एक राजा था। उसके गाँवमें वेदवेदाङ्गपारंगत विष्णुस्वामी नामका एक ब्राह्मण निवास करता था। वह राधा-कृष्णका भक्त था। उसके चार पुत्र थे, जो विभिन्न व्यसनोंमें लगे रहते थे। वे जैसा निन्दित कर्म करते थे, वैसा ही उनका नाम भी निन्दित ही हो गया। पहला पुत्र दूतकर्मा था, दूसरा व्यभिचारी, तीसरा विषयी और चौथा नास्तिक था। संयोगसे दुर्भाग्यवश वे सभी निर्धन हो गये। एक बार वे सभी अपने पिता विष्णुशर्माके पास गये। उन लोगोंने विनयपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और कहा—‘पिताजी! हमलोगोंकी लक्ष्मी कैसे नष्ट हो गयी?’ पिताने कहा—‘दूतकर्मन्! दूतकर्म धनको नष्ट कर देता है। यह पापका मूल है। दूतकर्मसे व्यभिचार, चौर्य और निर्दयता आदि उत्पन्न होते हैं। यह महान् दुष्परिणामकारी है। दूतकर्म करनेके कारण तुम्हारे द्रव्यका नाश हुआ।’ यह सुनकर उसने कहा—‘पितृचरण! आप मुझे कृपया धन-प्राप्तिका सही मार्ग बतायें।’ पिताने कहा—‘तीर्थ और व्रतके प्रभावसे तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँगे। तुम अपने माता-पिताकी बातोंपर ध्यान दो, उनका कहना मानो।’ तदनन्तर पिताने द्वितीय पुत्रसे कहा—‘पुत्र! तुम व्यभिचारी हो। वेश्याका संग बड़ा अशुभ है। तुम इस अशुभ कर्मको त्यागकर ब्रह्मचर्यपूर्वक ब्रह्मपरायण हो। ब्रह्मचर्यव्रत धारण करो।’ तृतीय पुत्र विषयीसे कहा—‘मांस और मदिरा सदा पापकी वृद्धिके कारण हैं, इनके द्वारा तुम चौर्य-कर्म करोगे और नरकगामी होगे, इसलिये
तुम ऐश्वर्यसम्पन्न जगत्पति, सर्वोत्तम भगवान् विष्णुके निमित्त द्रव्योंको समर्पितकर मौन होकर भोजन करो’ और अपने नास्तिक पुत्रसे कहा—‘तुम देवनिन्दा आदि नास्तिकभावको छोड़कर शुद्ध आस्तिकमार्गका अवलम्बन करो, आत्मा शुद्ध-बुद्ध एवं नित्य है और महादेवी चण्डिका महाशक्ति हैं। सभी प्राणियोंके हृदय-गुहामें स्थित देवतागण परमात्माके अङ्ग हैं। उनका ज्ञान प्राप्तकर पापकी शान्तिके लिये उनकी पूजा करो।’
यह सुनकर वे चारों पुत्र अपने पिताके द्वारा निर्दिष्ट साधनोंमें प्रवृत्त हो गये और सुन्दर ज्ञानकी प्राप्तिके लिये सर्वेश्वर शिवकी आराधना भी करने लगे। भगवान् शंकरने वर्षभरमें उन्हें संजीवनी विद्या प्रदान कर दी। वे संजीवनी विद्या प्राप्त कर एक वनमें आये और वहाँ बिखरी व्याघ्रकी अस्थियोंपर विद्याकी परीक्षा करने लगे। प्रथम पुत्रने मरे हुए व्याघ्रकी अस्थियोंको एकत्र करके उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का। उस मन्त्रके प्रभावसे वे अस्थियाँ पंजररूप हो गयीं। दूसरे व्यभिचारी पुत्रने उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का, जिसके प्रभावसे वह पंजर मांस और रुधिरसे सम्पन्न हो गया। विषयी पुत्रने उसके ऊपर अभिमन्त्रित जल छिड़का। फलस्वरूप त्वचा और प्राण उसमें आ गये। सोये हुए व्याघ्रको जीवित करनेके लिये नास्तिक पुत्रने जल छिड़का। मन्त्रके प्रभावसे जीवित होनेपर उस व्याघ्रने उन सभीका भक्षण कर लिया।
वैतालने राजासे पूछा—राजन्! अब आप बतायें कि उन चारोंमें सबसे बड़ा मूर्ख कौन था? राजा बोले—जिसने मरे हुए व्याघ्रको जिलाया,
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३०८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वही सबसे बड़ा मूर्ख है। इस उत्तरसे वैताल अत्यन्त प्रसन्न हो गया।
वैतालने पुनः राजासे कहा— राजा विक्रमादित्य! भगवान् शंकरकी आज्ञासे ही मैं तुम्हारे पास आया था। अनेक प्रकारके प्रश्नोत्तरोंके द्वारा मैंने तुम्हारी परीक्षा ली और तुमने सबका बुद्धिमतापूर्ण उत्तर दिया। इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी भुजाओंमें मेरा निवास रहेगा, जिससे तुम पृथ्वीके समस्त शत्रुओंको जीत लोगे। दस्युओंके द्वारा सभी पुरियाँ, विविध क्षेत्र, नगर आदि नष्ट कर दिये गये हैं। इसलिये शास्त्रमें बताये गये परिमाणके आधारपर पुनः उनकी रचना करवाओ और न्यायपूर्वक पृथ्वीका शासन करो। तुम्हारे राज्यमें
पुनः धर्मकी स्थापना होगी।
इतना कहकर वह वैताल देवीकी आराधनाका निर्देश देकर वहीं अन्तर्हित हो गया। राजा विक्रमादित्यने मुनियोंकी आज्ञासे अश्वमेध-यज्ञ किया और वह चक्रवर्ती राजा हुआ। धर्मपूर्वक राज्य करते हुए अन्तमें राजा विक्रमादित्यने स्वर्गलोक प्राप्त किया*।
राजा विक्रमादित्यके स्वर्गगमनको जानकर शौनकादि महर्षियोंने लोमहर्षण सूतजी महाराजसे पुनः इतिहास एवं पुराणकी पुण्यमयी कथाओंका श्रवण किया और फिर आनन्दित होते हुए वे सभी अपने-अपने स्थानोंकी ओर चले गये।
(अध्याय १—२३)
- इन्हीं राजा विक्रमादित्यने विक्रम-संवत्का प्रवर्तन किया था, जो भारतका मुख्य संवत् है।
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३०९
सत्यनारायणव्रत-कथा
[भारतवर्षमें सत्यनारायणव्रत-कथा अत्यन्त लोकप्रिय है और जनता-जनार्दनमें इसका प्रचार-प्रसार भी सर्वाधिक है। भारतीय सनातन परम्परामें किसी भी माङ्गलिक कार्यका प्रारम्भ भगवान् गणपतिके पूजनसे एवं उस कार्यकी पूर्णता भगवान् सत्यनारायणकी कथा-श्रवणसे समझी जाती है। वर्तमान समयमें भगवान् सत्यनारायणकी प्रचलित कथा स्कन्दपुराणके रेवाखण्डके नामसे प्रसिद्ध है, जो पाँच या सात अध्यायोंके रूपमें उपलब्ध है। भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वमें भी भगवान् सत्यनारायणव्रत-कथाका उल्लेख मिलता है, जो छः अध्यायोंमें प्राप्त है। यह कथा स्कन्दपुराणकी कथासे मिलती-जुलती होनेपर भी विशेष रोचक एवं श्रेष्ठ प्रतीत होती है। सत्यनारायणव्रत-कथाकी प्रसिद्धिके साथ अनेक शंका-समाधान भी इसपर होते रहते हैं तथा लोग यह भी पूछते हैं कि साधु वणिक, काष्ठविक्रेता, शतानन्द ब्राह्मण, उल्कामुख, तुङ्गध्वज आदि राजाओंने कौन-सी कथाएँ सुनी थीं और वे कथाएँ कहाँ गयीं तथा इस कथाका प्रचार कबसे हुआ? इस सम्बन्धमें यही जानना चाहिये कि कथाके माध्यमसे मूल सत्-तत्त्व परमात्माका ही इसमें निरूपण हुआ है, जिसके लिये गीतामें 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' आदि शब्दोंमें यह स्पष्ट किया गया है कि इस मायामय दुःखद संसारकी वास्तविक सत्ता ही नहीं है। परमेश्वर ही त्रिकालाबाधित सत्य है और एकमात्र वही ज्ञेय, ध्येय एवं उपास्य है। ज्ञान-वैराग्य और अनन्य भक्तिके द्वारा वही साक्षात्कार करनेके योग्य है। भागवत (१०।२।२६)-में भी कहा गया है—
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।
सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः॥
यहाँ भी सत्यव्रत और सत्यनारायणव्रतका तात्पर्य उन शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मासे ही है। इसी प्रकार निम्नलिखित श्लोकमें—
अन्तर्भवैऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्प्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः।
असन्तमव्यन्त्यहिमन्तरेण सन्तं गुणं तं किमु यन्ति सन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२८)
—संसारमें मनीषियोंद्वारा सत्य-तत्त्वकी खोजकी बात निर्दिष्ट है, जिसे प्राप्तकर मनुष्य सर्वथा कृतार्थ हो जाता है और सभी आराधनाएँ उसीमें पर्यवसित होती हैं। निष्काम-उपासनासे सत्यस्वरूप नारायणकी प्राप्ति हो जाती है।
अतः श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन, कथा-श्रवण एवं प्रसाद आदिके द्वारा उन सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्मा भगवान् सत्यनारायणकी उपासनासे लाभ उठाना चाहिये।—सम्पादक]
कथाका उपक्रम—
व्यासजी बोले—एक समयकी बात है, नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने पौराणिक श्रीसूतजीसे विनयपूर्वक पूछा—'भगवन्! संसारके कल्याणके लिये आप यह बतलानेकी कृपा करें कि चारों युगोंमें कौन पूजनीय और कौन सेवनीय है तथा कौन सबके अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है? मानव अनायास ही किसकी आराधनाद्वारा अपनी मङ्गलमयी कामनाको प्राप्त कर सकता
है? ब्रह्मन्! आप ऐसे सत्य उपायको बतलायें जो मनुष्योंकी कीर्तिको बढ़ानेवाला हो।' शौनकादि ऋषियोंद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर श्रीसूतजी भगवान् सत्यनारायणकी प्रार्थना करने लगे—
नवाम्भोजनेत्रं रमाकेलिपात्रं चतुर्बाहुचामीकरं चारुगाम्रम्। जगत्त्राणहेतुं रिपौ धूम्रकेतुं सदा सत्यनारायणं स्तौमि देवम्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२४।४)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
( श्रीसूतजीने प्रार्थना करते हुए कहा— )
‘प्रफुल्लित नवीन कमलके समान नेत्रवाले, भगवती लक्ष्मीके क्रीडापात्र, चतुर्भुज, सुवर्णकान्तिके समान सुन्दर शरीरवाले, संसारकी रक्षा करनेके एकमात्र मूल कारण तथा शत्रुओंके लिये धूम्रकेतुस्वरूप भगवान् सत्यनारायणदेवकी मैं स्तुति करता हूँ।’ श्रीरामं सहलक्ष्मणं सकरुणं सीतान्वितं सात्त्विकं
वैदेहीमुखपद्मलुब्धमधुरं पौलस्त्यसंहारकम्।
वन्दे वन्द्यपदाम्बुजं सुरवरं भक्तानुकम्पाकरं
शत्रुघ्नैन हनूमता च भरतेनासेवितं राघवम्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२४।५)
‘जो भगवान् करुणाके निधान हैं, जिनके चरणकमल वन्दनीय हैं, जो भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, जो लक्ष्मणजीके साथ रहते हैं और माता श्रीसीतासे समन्वित हैं तथा माता वैदेही श्रीजनकनन्दिनीजीके मुख-कमलकी ओर स्निग्धभावसे देखते रहते हैं, उन शत्रुघ्न, हनुमान् तथा भरतसे सेवित, पुलस्त्यकुलका संहार करनेवाले, सत्स्वरूप सुरश्रेष्ठ राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ।’
सूतजीने कहा— ऋषियो! अब मैं आपसे श्रेष्ठ राजाओंके चरित्रोंसे सम्बद्ध एक इतिहासका वर्णन करता हूँ, उसे आपलोग श्रवण करें। यह पवित्र आख्यान कलियुगके सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला, कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, देवताओंद्वारा आभासित, ब्राह्मणोंद्वारा प्रकाशित, विद्वानोंको आनन्दित करनेवाला तथा विशेष रूपसे सत्संगके चर्चस्वरूप है*।
ऋषियो! एक समय योगी देवर्षि नारदजी सबके कल्याणकी कामनासे विविध लोकोंमें भ्रमण करते हुए इस मृत्युलोकमें आये। यहाँ
उन्होंने देखा कि अपने-अपने किये गये कर्मोंके अनुसार संसारके प्राणी नाना प्रकारके क्लेशों एवं दुःखोंसे दुःखी हैं और विविध आधि एवं व्याधिसे ग्रस्त हैं। यह देखकर उन्होंने सोचा कि कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे इन प्राणियोंके दुःखका नाश हो। ऐसा विचारकर वे विष्णुलोकमें गये। वहाँ उन्होंने शङ्खु, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे अलंकृत, प्रसन्नमुख, शान्त, सनक-सनन्दन तथा सनत्कुमारदिसे संस्तुत भगवान् नारायणका दर्शन किया। उन देवाधिदेवका दर्शन कर नारदजी उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—‘वाणी और मनसे जिनका स्वरूप परे है और जो अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं, आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, ऐसे महान् आत्मा निर्गुणस्वरूप आप परमात्माको मेरा नमस्कार है। सभीके आदिपुरुष लोकोपकारपरायण, सर्वत्र व्याप्त, तपोमूर्ति आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।’
देवर्षि नारदकी स्तुति सुनकर भगवान् विष्णु बोले—‘देवर्षि! आप किस कारणसे यहाँ आये हैं? आपके मनमें कौन-सी चिन्ता है? महाभाग! आप सभी बातें बतायें। मैं उचित उपाय कहूँगा।
नारदजीने कहा—प्रभो! लोकोंमें भ्रमण करता हुआ मैं मृत्युलोकमें गया था, वहाँ मैंने देखा कि संसारके सभी प्राणी अनेक प्रकारके क्लेश-तापोंसे दुःखी हैं। अनेक रोगोंसे ग्रस्त हैं। उनकी वैसी दुर्दशा देखकर मेरे मनमें बड़ा कष्ट हुआ और मैं सोचने लगा कि किस उपायसे इन दुःखी प्राणियोंका उद्धार होगा? भगवन्! उनके कल्याणके लिये आप कोई श्रेष्ठ एवं सुगम उपाय बतलानेकी कृपा करें। नारदजीके इन वचनोंको सुनकर भगवान् नारायणने साधु-साधु शब्दोंसे उनका अभिनन्दन
- कलिकल्पविनाशं कामसिद्धिप्रकाशं सुरवरमुखभासं भूसुरेण प्रकाशम्।
विबुधवृषिबिलासं साधुचर्याविशेषं नृपतिवरचरित्रं भोः शृणुव्येतिहासम्॥ (प्रतिसर्गपर्व २।२४।६)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३११
किया और कहा—‘नारदजी! जिस विषयमें आप पूछ रहे हैं, उसके लिये मैं आपको एक सनातन व्रत बतलाता हूँ।’
भगवान् नारायण सत्ययुग और त्रेतायुगमें विष्णुस्वरूपमें फल प्रदान करते हैं और द्वापरमें अनेक रूप धारणकर फल देते हैं, परंतु कलियुगमें सर्वव्यापक भगवान् सत्यनारायण प्रत्यक्ष फल देते हैं, क्योंकि धर्मके चार पाद हैं—सत्य, शौच, तप और दान। इनमें सत्य ही प्रधान धर्म है। सत्यपर ही लोकका व्यवहार टिका है और सत्यमें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है, इसलिये सत्यस्वरूप भगवान् सत्यनारायणका व्रत परम श्रेष्ठ कहा गया है।
नारदजीने पुनः पूछा—भगवन्! सत्यनारायणकी पूजाका क्या फल है और इसकी क्या विधि है? देव! कृपासागर! सभी बातें अनुग्रहपूर्वक मुझे बतायें।
श्रीभगवान् बोले—नारद! सत्यनारायणकी पूजाका फल एवं विधि चतुर्मुख ब्रह्मा भी बतलानेमें समर्थ नहीं हैं, किंतु संक्षेपमें मैं उसका फल तथा विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें—
सत्यनारायणके व्रत एवं पूजनसे निर्धन व्यक्ति धनाढ्य और पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् हो जाता है। राज्यच्युत व्यक्ति राज्य प्राप्त कर लेता है, दृष्टिहीन व्यक्ति दृष्टिसम्पन्न हो जाता है, बंदी बन्धनमुक्त हो जाता है और भयार्त व्यक्ति निर्भय हो जाता है। अधिक क्या? व्यक्ति जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसे वह सब प्राप्त हो जाती है। इसलिये मुने! मनुष्य-जन्ममें भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी अवश्य आराधना करनी चाहिये। इससे वह अपने अभिलषित वस्तुको निःसंदेह शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।
इस सत्यनारायणव्रतके करनेवाले व्रतीको चाहिये
कि वह प्रातः दन्तधावनपूर्वक स्नानकर पवित्र हो जाय। हाथमें तुलसी-मंजरीको लेकर सत्यमें प्रतिष्ठित भगवान् श्रीहरिका इस प्रकार ध्यान करे—
नारायणं सान्द्रघनावदातं चतुर्भुजं पीतमहार्हवाससम्। प्रसन्नवक्त्रं नवकञ्जलोचनं सन्नन्दनाद्यैरुपसेवितं भजे ॥ करोमि ते व्रतं देव सायंकाले त्वदर्चनम्। श्रुत्वा गाथां त्वदीयां हि प्रसादं ते भजाम्यहम्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२४।२६-२७)
‘सघन मेघके समान अत्यन्त निर्मल, चतुर्भुज, अतिश्रेष्ठ पीले वस्त्रको धारण करनेवाले, प्रसन्नमुख, नवीन कमलके समान नेत्रवाले, सनक-सनन्दनादिसे उपसेवित भगवान् नारायणका मैं सतत चिन्तन करता हूँ। देव! मैं आपके सत्यस्वरूपको धारणकर सायंकालमें आपकी पूजा करूँगा। आपके रमणीय चरित्रको सुनकर आपके प्रसाद अर्थात् आपकी प्रसन्नताका मैं सेवन करूँगा।’
इस प्रकार मनमें संकल्पकर सायंकालमें विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। पूजामें पाँच कलश रखने चाहिये। कदली-स्तम्भ और बंदनवार लगाने चाहिये। स्वर्णमण्डित भगवान् शालग्रामको पुरुषसूक्त (यजु० ३१।१—१६) द्वारा पञ्चामृत आदिसे भलीभाँति स्नान कराकर चन्दन आदि अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये। अनन्तर भगवान्को निम्न मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रणाम करना चाहिये—
नमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि।
चतुःपदार्थदत्रे च नमस्तुभ्यं नमो नमः॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२४।३०)
‘षडैश्वर्यरूप भगवान् सत्यदेवको नमस्कार है, मैं आपका सदा ध्यान करता हूँ। आप धर्म, अर्थ,
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३१२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
काम और मोक्ष—इस चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले हैं, आपको बार-बार नमस्कार है।'
इस मन्त्रका यथाशक्ति जपकर १०८ बार हवन करे। उसके दशांशसे तर्पण तथा उसके दशांशसे मार्जन कर भगवान्की कथाको सुनना चाहिये, जो छः अध्यायोंमें उपनिबद्ध है। भगवान्की इस कथामें सत्य-धर्मकी ही मुख्यता है। कथा-श्रवणके अनन्तर भगवान्के प्रसादको चार भागोंमें विभक्तकर उसे भलीभाँति वितरण करे। प्रथम भाग आचार्यको दे, द्वितीय भाग अपने कुटुम्बको, तृतीय भाग श्रोताओंको और चतुर्थ भाग अपने लिये रखे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराये एवं स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। देवर्षि! इस विधिसे सत्यनारायणकी
पूजा करनी चाहिये। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी पूजा करनेवाला व्रती सभी अभीष्ट कामनाओंको इसी जन्ममें प्राप्त कर लेता है। इस जन्ममें किये गये पुण्यफलको दूसरे जन्ममें भोगा जाता है और दूसरे जन्ममें किये गये कर्मोंका फल मनुष्यको यहाँ भोगना पड़ता है। श्रद्धापूर्वक किया गया सत्यनारायणका व्रत सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है।
नारदजीने कहा—भगवन्! आज ही आपकी आज्ञासे भूमण्डलमें इस सत्यदेव-व्रतको मैं प्रतिष्ठित करूँगा। यह कहकर नारदजी तो पृथ्वीपर व्रतका प्रचार करने चले गये और भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो काशीपुरीमें चले आये। (अध्याय २४)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका प्रथम अध्याय ]
सत्यनारायणव्रत-कथामें शतानन्द ब्राह्मणकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! भगवान् नारायणने स्वयं कृपापूर्वक देवर्षि नारदजीद्वारा जिस प्रकार इस व्रतका प्रचार किया, अब मैं उस कथाको कहता हूँ, आपलोग सुनें—
लोकप्रसिद्ध काशी नगरीमें एक श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो विष्णुव्रतपरायण थे, वे गृहस्थ थे, दीन थे तथा स्त्री-पुत्रवान् थे। वे भिक्षा-वृत्तिसे अपना जीवन-यापन करते थे। उनका नाम शतानन्द था। एक समय वे भिक्षा माँगनेके लिये जा रहे थे। उन विनीत एवं अतिशय शान्त शतानन्दको मार्गमें एक वृद्ध ब्राह्मण दिखायी दिये, जो साक्षात् हरि ही थे। उन वृद्ध ब्राह्मणवेषधारी श्रीहरिने ब्राह्मण शतानन्दसे पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! आप किस निमित्तसे कहाँ जा रहे हैं?' शतानन्द बोले—'सौम्य! अपने पुत्र-कलत्रादिके भरण-पोषणके लिये धन-याचनाकी
कामनासे मैं धनिकोंके पास जा रहा हूँ।'
नारायणने कहा—द्विज! निर्धनताके कारण आपने दीर्घकालसे भिक्षावृत्ति अपना रखी है, इसकी निवृत्तिके लिये सत्यनारायणव्रत कलियुगमें सर्वोत्तम उपाय है। इसलिये मेरे कथनके अनुसार आप कमलनेत्र भगवान् सत्यनारायणके चरणोंकी शरण-ग्रहण करें, इससे दारिद्र्य, शोक और सभी संतापोंका विनाश होता है तथा मोक्ष भी प्राप्त होता है।
करुणामूर्ति भगवान्के इन वचनोंको सुनकर ब्राह्मण शतानन्दने पूछा—'ये सत्यनारायण कौन हैं?'
ब्राह्मणरूपधारी भगवान् बोले—नानारूप धारण करनेवाले, सत्यव्रत, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा निरञ्जन वे देव इस समय विप्रका रूप धारणकर तुम्हारे सामने आये हैं। इस महान् दुःखरूपी संसार-सागरमें पड़े हुए प्राणियोंको तारनेके
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३१३
लिये भगवान् के चरण नौकारूप हैं। जो बुद्धिमान् व्यक्ति हैं, वे भगवान् की शरणमें जाते हैं, किंतु विषयोंमें व्याप्त विषयबुद्धिवाले व्यक्ति भगवान् की शरणमें न जाकर इसी संसार-सागरमें पड़े रहते हैं। इसलिये द्विज! संसारके कल्याणके लिये विविध उपचारोंसे भगवान् सत्यनारायण-देवकी पूजा, आराधना तथा ध्यान करते हुए तुम इस व्रतको प्रकाशमें लाओ।
विप्ररूपधारी भगवान् के ऐसा कहते ही उस ब्राह्मण शतानन्दने मेघोंके समान नीलवर्ण, सुन्दर चार भुजाओंमें शङ्खु, चक्र, गदा तथा पद्म लिये हुए और पीताम्बर धारण किये हुए, नवीन विकसित कमलके समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मधुर मुसकानवाले, वनमालायुक्त और भौरोंके द्वारा चुम्बित चरण-कमलवाले पुरुषोत्तम भगवान् नारायणके साक्षात् दर्शन किये।
भगवान् की वाणी सुनने और उनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेसे उस विप्रके सभी अङ्ग पुलकित हो उठे, आँखोंमें प्रेमाश्रु भर आये। उसने भूमिपर गिरकर भगवान् को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और गद्गद वाणीसे वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—
संसारके स्वामी, जगत् के कारणके भी कारण, अनाथोंके नाथ, कल्याण-मङ्गलको देनेवाले, शरण देनेवाले, पुण्यरूप, पवित्र, अव्यक्त तथा व्यक्त होनेवाले और आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक
तीनों प्रकारके तापोंका समूल उच्छेद करनेवाले भगवान् सत्यनारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। इस संसारके रचयिता सत्यनारायणदेवको नमस्कार है। विश्वके भरण-पोषण करनेवाले शुद्ध सत्स्वरूपको नमस्कार है तथा विश्वका विनाश करनेवाले कराल महाकालस्वरूपको नमस्कार है। सम्पूर्ण संसारका मङ्गल करनेवाले आत्ममूर्तिस्वरूप हे भगवान्! आपको नमस्कार है। आज मैं धन्य हो गया, पुण्यवान् हो गया, आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मन-वाणीसे अगम-अगोचर आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। मैं अपने भाग्यकी क्या सराहना करूँ। न जाने मेरे किस पुण्यकर्मका यह फल था, जो मुझे आपके दर्शन हुए। प्रभो! आपने क्रियाहीन इस मन्द-बुद्धिके शरीरको सफल कर दिया।
लोकनाथ! रमापते! किस विधिसे भगवान् सत्यनारायणका पूजन करना चाहिये, विभो! कृपाकर उसे भी आप बतायें। संसारको मोहित करनेवाले भगवान् नारायण मधुर वाणीमें बोले—‘विप्रेन्द्र! मेरी पूजामें बहुत अधिक धनकी आवश्यकता नहीं, अनायास जो धन प्राप्त हो जाय, उसीसे श्रद्धापूर्वक मेरा यजन करना चाहिये। जिस प्रकार मेरी स्तुतिसे, स्मृतिसे ग्राह-ग्रस्त गजेन्द्र, अजामिल संकटसे मुक्त हो गये, इसी प्रकार इस व्रतके आश्रयसे मनुष्य तत्काल क्लेशमुक्त हो जाता है।’ इस व्रतकी विधिको सुनें—
अभीष्ट कामनाकी सिद्धिके लिये पूजाकी सामग्री
१- दुःखोदधिनिमग्नानां तरणिश्वरणी हरेः। कुशलाः शरणं यान्ति नेतरे विषयात्मिकाः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।२५।१०)
२- प्रणमामि जगन्नाथं जगत्कारणकारणम्। अनाथनाथं शिवदं शरण्यमनधं शुचिम् ॥
अव्यक्तं व्यक्तं यातं तापत्रयविमोचनम् ॥
नमः सत्यनारायणायास्य कर्त्रे नमः शुद्धसत्त्वाय विश्वस्य भर्त्रे। करलाय कालाय विश्वस्य हर्त्रेनमस्ते जगन्मङ्गलायात्मभूर्ते ॥
धन्योऽस्यघ कृती धन्यो भवोऽघ सफलोमम। वाङ्मनोऽगोचरो यस्त्वं मम प्रत्यक्षमागतः ॥
दिष्टं किं वर्णयाम्याहो न जाने कस्य वा फलम्। क्रियाहीनस्य मन्दस्य देहोऽयं फलवान् कृतः ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२५।१५-१९)
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३१४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
एकत्रकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। सवा सेरके लगभग गोधूम-चूर्णमें दूध और शक्कर मिलाकर, उस चूर्णको घृतसे युक्तकर हरिको निवेदित करना चाहिये, यह भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। पञ्चामृतके द्वारा भगवान् शालग्रामको स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा ताम्बूलादि उपचारोंसे मन्त्रोंद्वारा उनकी अर्चना करनी चाहिये। अनेक मिष्टान्न तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों एवं ऋतुकालोद्भूत विविध फलों तथा फूलोंसे भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणों तथा स्वजनोंके साथ मेरी कथा, राजा (तुङ्गध्वज)-के इतिहास, भीलोंकी और वणिक (साधु)-की कथाको आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिये। कथाके अनन्तर भक्तिपूर्वक सत्यदेवको प्रणामकर प्रसादका वितरण करना चाहिये। तदनन्तर भोजन करना चाहिये। मेरी प्रसन्नता द्रव्यादिसे नहीं, अपितु श्रद्धा-भक्तिसे ही होती है।
विप्रेन्द्र! इस प्रकार जो विधिपूर्वक पूजा करते हैं, वे पुत्र-पौत्र तथा धन-सम्पत्तिसे युक्त होकर श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करते हैं और अन्तमें मेरा सांनिध्य प्राप्त कर मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं। व्रती जो-जो कामना करता है, वह उसे अवश्य ही प्राप्त हो जाती है।
इतना कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये और वे ब्राह्मण भी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। मन-ही-मन उन्हें प्रणाम कर वे भिक्षाके लिये नगरकी ओर चले गये और उन्होंने मनमें यह निश्चय किया कि
‘आज भिक्षामें जो धन मुझे प्राप्त होगा, मैं उससे भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूँगा।’
उस दिन अनायास बिना माँगे ही उन्हें प्रचुर धन प्राप्त हो गया। वे आश्चर्यचकित हो अपने घर आये। उन्होंने सारा वृत्तान्त अपनी धर्मपत्नीको बताया। उसने भी सत्यनारायणके व्रत-पूजाका अनुमोदन किया। वह पतिकी आज्ञासे श्रद्धापूर्वक बाजारसे पूजाकी सभी सामग्रियोंको ले आयी और अपने बन्धु-बान्धवों तथा पड़ोसियोंको भगवान् सत्यनारायणकी पूजामें सम्मिलित होनेके लिये बुला ले आयी। अनन्तर शतानन्दने भक्तिपूर्वक भगवान्की पूजा की। कथाकी समाप्तिपर प्रसन्न होकर उनकी कामनाओंको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे भक्तवत्सल भगवान् सत्यनारायणदेव प्रकट हो गये। उनका दर्शन कर ब्राह्मण शतानन्दने भगवान्से इस लोकमें तथा परलोकमें सुख एवं पराभक्तिकी याचना की और कहा—‘हे भगवन्! आप मुझे अपना दास बना लें।’ भगवान् भी ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये। यह देखकर कथामें आये सभी जन अत्यन्त विस्मित हो गये और ब्राह्मण भी कृतकृत्य हो गया। वे सभी भगवान्को दण्डवत् प्रणामकर आदरपूर्वक प्रसाद ग्रहणकर ‘यह ब्राह्मण धन्य है, धन्य है’, इस प्रकार कहते हुए अपने-अपने घर चले गये। तभीसे लोकमें यह प्रचार हो गया कि भगवान् सत्यनारायणका व्रत अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला, क्लेशनाशक और भोग-मोक्षको प्रदान करनेवाला है। (अध्याय २५)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका द्वितीय अध्याय ]
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३१५
सत्यनारायणव्रत-कथामें राजा चन्द्रचूडका आख्यान
सूतजी बोले—ऋषियो! प्राचीन कालमें केदारखण्डके मणिपूरक नामक नगरमें चन्द्रचूड नामक एक धार्मिक तथा प्रजावत्सल राजा रहते थे। वे अत्यन्त शान्तस्वभाव, मृदुभाषी, धीर-प्रकृति तथा भगवान् नारायणके भक्त थे। विन्ध्यदेशके म्लेच्छगण उनके शत्रु हो गये। उस राजाका उन म्लेच्छोंसे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा भयानक युद्ध हुआ। उस युद्धमें राजा चन्द्रचूडकी विशाल चतुरङ्गिणी सेना अधिक नष्ट हुई, किंतु कूट-युद्धमें निपुण म्लेच्छोंकी सेनाकी क्षति बहुत कम हुई। युद्धमें दम्भी म्लेच्छोंसे परास्त होकर राजा चन्द्रचूड अपना राष्ट्र छोड़कर अकेले ही वनमें चले गये। तीर्थान्तके बहाने इधर-उधर घूमते हुए वे काशीपुरीमें पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि घर-घर सत्यनारायणकी पूजा हो रही है और यह काशी नगरी द्वारकाके समान ही भव्य एवं समृद्धिशाली हो गयी है।
वहाँकी समृद्धि देखकर चन्द्रचूड विस्मित हो गये और उन्होंने सदानन्द (शतानन्द) ब्राह्मणके द्वारा की गयी सत्यनारायण-पूजाकी प्रसिद्धि भी सुनी, जिसके अनुसरणसे सभी शील एवं धर्मसे समृद्ध हो गये थे। राजा चन्द्रचूड भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनेवाले ब्राह्मण सदानन्द (शतानन्द)-के पास गये और उनके चरणोंपर गिरकर उनसे सत्यनारायण-पूजाकी विधि पूछी तथा अपने राज्यभ्रष्ट होनेकी कथा भी बतलायी और कहा—‘ब्रह्मन्! लक्ष्मीपति भगवान् जनार्दन जिस व्रतसे प्रसन्न होते हैं, पापके नाश करनेवाले उस व्रतको बतलाकर आप मेरा उद्धार करें।’
सदानन्द (शतानन्द) -ने कहा—राजन्! श्रीपति
भगवान्को प्रसन्न करनेवाला सत्यनारायण नामक एक श्रेष्ठ व्रत है, जो समस्त दुःख-शोकादिका शामक, धन-धान्यका प्रवर्धक, सौभाग्य और संततिक प्रदाता तथा सर्वत्र विजय-प्रदायक है। राजन्! जिस किसी भी दिन प्रदोषकालमें इनके पूजन आदिका आयोजन करना चाहिये। कदलीदलके स्तम्भोंसे मण्डित, तोरणोंसे अलंकृत एक मण्डपकी रचनाकर उसमें पाँच कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये और पाँच ध्वजार्ष भी लगानी चाहिये। व्रतीको चाहिये कि उस मण्डपके मध्यमें ब्राह्मणोंके द्वारा एक रमणीय वेदिकाकी रचना करवाये। उसके ऊपर स्वर्णसे मण्डित शिलारूप भगवान् नारायण (शालग्राम)-को स्थापित कर प्रेम-भक्तिपूर्वक चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे। भगवान्का ध्यान करते हुए भूमिपर शयनकर सात रात्रि व्यतीत करे।
यह सुनकर राजा चन्द्रचूडने काशीमें ही भगवान् सत्यनारायणकी शीघ्र ही पूजा की। प्रसन्न होकर रात्रिमें भगवान्ने राजाको एक उत्तम तलवार प्रदान की। शत्रुओंको नष्ट करनेवाली तलवार प्राप्त कर राजा ब्राह्मणश्रेष्ठ सदानन्दको प्रणाम कर अपने नगरमें आ गये तथा छः हजार म्लेच्छ दस्युओंको मारकर उनसे अपार धन प्राप्त किया और नर्मदाके मनोहर तटपर पुनः भगवान् श्रीहरिकी पूजा की। वे राजा प्रत्येक मासकी पूर्णिमाको प्रेम और भक्तिपूर्वक विधि-विधानसे भगवान् सत्यदेवकी पूजा करने लगे। उस व्रतके प्रभावसे वे लाखों ग्रामोंके अधिपति हो गये और साठ वर्षतक राज्य करते हुए अन्तमें उन्होंने विष्णुलोकको प्राप्त किया। (अध्याय २६)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका तृतीय अध्याय ]
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३१६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सत्यनारायणव्रतके प्रसंगमें लकड़हारोंकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! अब इस सम्बन्धमें सत्यनारायणव्रतके आचरणसे कृतकृत्य हुए भिल्लोंकी कथा सुनें। एक समयकी बात है, कुछ निषादगण वनसे लकड़ियाँ काटकर नगरमें लाकर बेचा करते थे। उनमेंसे कुछ निषाद काशीपुरीमें लकड़ी बेचने आये। उन्हींमेंसे एक बहुत प्यासा लकड़हारा विष्णुदास (शतानन्द)-के आश्रममें गया। वहाँ उसने जल पिया और देखा कि ब्राह्मणलोग भगवान्की पूजा कर रहे हैं। भिक्षुक शतानन्दका वैभव देखकर वह चकित हो गया और सोचने लगा—'इतने दरिद्र ब्राह्मणके पास यह अपार वैभव कहाँसे आ गया? इसे तो आजतक मैंने अकिंचन ही देखा था। आज यह इतना महान् धनी कैसे हो गया?' इसपर उसने पूछा—'महाराज! आपको यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ और आपको निर्धनतासे मुक्ति कैसे मिली? यह बतानेका कष्ट करें, मैं सुनना चाहता हूँ।'
शतानन्दने कहा—भाई! यह सब सत्यनारायणकी आराधनाका फल है, उनकी आराधनासे क्या नहीं होता। भगवान् सत्यनारायणकी अनुकम्पाके बिना किंचित् भी सुख प्राप्त नहीं होता।
निषादने उनसे पूछा—महाराज! सत्यनारायण-भगवान्का क्या माहात्म्य है? इस व्रतकी विधि क्या है? आप उनकी पूजाके सभी उपचारोंका वर्णन करें, क्योंकि उपकार-परायण संत-महात्मा अपने हृदयमें सबके लिये समान भाव रखते हैं, किसीसे कोई कल्याणकारी बात नहीं छिपाते।
शतानन्द बोले—एक समयकी बात है, केदारक्षेत्रके मणिपूरक नगरमें रहनेवाले राजा चन्द्रचूड मेरे आश्रममें आये और उन्होंने मुझसे
भगवान् सत्यनारायणव्रत-कथाके विधानको पूछा। हे निषादपुत्र! इसपर मैंने जो उन्हें बताया था, उसे तुम सुनो—
सकामभावसे अथवा निष्कामभावसे किसी भी प्रकार भगवान्की पूजाका मनमें संकल्पकर उनकी पूजा करनी चाहिये। सवा सेर गोधूमके चूर्णको मधु तथा सुगन्धित घृतसे संस्कृतकर नैवेद्यके रूपमें भगवान्को अर्पण करना चाहिये। भगवान् सत्यनारायण (शालग्राम)-को पञ्चामृतसे स्नान करकर चन्दन आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। पायस, अपूप, संयाव, दधि, दुग्ध, ऋतुफल, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य आदिसे भक्तिपूर्वक भगवान्की पूजा करनी चाहिये। यदि वैभव रहे तो और अधिक उत्साह एवं समारोहसे पूजा करनी चाहिये। भगवान् भक्तिसे जितना प्रसन्न होते हैं, उतना विपुल द्रव्योंसे प्रसन्न नहीं होते। भगवान् सम्पूर्ण विश्वके स्वामी एवं आसकाम हैं, उन्हें किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं, केवल भक्तोंके द्वारा श्रद्धासे अर्पित की हुई वस्तुको वे ग्रहण करते हैं। इसीलिये दुर्घोधनके द्वारा की जानेवाली राजपूजाको छोड़कर भगवान्ने विदुरजीके आश्रममें आकर शाक-भाजी और पूजाको ग्रहण किया। सुदामाके तण्डुल-कणको स्वीकार कर भगवान्ने उन्हें मनुष्यके लिये सर्वथा दुर्लभ सम्पत्तियाँ प्रदान कर दीं। भगवान् केवल प्रीतिपूर्वक भक्तिकी ही अपेक्षा करते हैं। गोप, गृध्र, वणिक्, व्याध, हनुमान्, विभीषणके अतिरिक्त अन्य वृत्रासुर आदि दैत्य भी नारायणके सान्निध्यको प्राप्त कर उनके अनुग्रहसे आज भी आनन्दपूर्वक रह रहे हैं।
१- साधूनां समचिन्तानामुपकारवतां सताम् । न गोप्यं विद्यते किंचिदार्तानामार्तिनाशनम् ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२७।८)
२- न तुष्येदद्रव्यसम्भारैर्भक्त्या केवलया यथा । भगवान् परितः पूर्णो न मानं वृणुयात् क्वचित् ॥
दुर्घोधनकृतां त्यक्त्वा राजपूजां जनार्दनः । विदुरस्याश्रमे वासमातिथ्यं जगृहे विभुः ॥
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३१७
निषादपुत्र! मेरी बात सुनकर उस राजा चन्द्रचूड़ने पूजा-सामग्रियोंको एकत्रितकर आदरपूर्वक भगवान्की पूजा की; फलस्वरूप वे अपना नष्ट हुआ द्रव्य प्राप्तकर आज भी आनन्दित हो रहे हैं। इसलिये तुम भी भक्तिसे सत्यनारायणकी उपासना करो। इससे तुम इस लोकमें सुखको प्राप्त कर अन्तमें भगवान् विष्णुका सान्निध्य प्राप्त करोगे।
यह सुनकर वह निषाद कृतकृत्य हो गया। विप्रश्रेष्ठ शतानन्दको प्रणाम कर अपने घर जाकर उसने अपने साथियोंको भी हरि-सेवाका माहात्म्य बताया। उन सबने भी प्रसन्नचित्त हो श्रद्धापूर्वक यह प्रतिज्ञा की कि आज काष्ठको बेचकर हमलोगोंको जितना धन प्राप्त होगा, उससे अपने सभी बन्धु-
बान्धवोंके साथ श्रद्धा एवं विधिपूर्वक हम सत्यनारायणकी पूजा करेंगे। उस दिन उन्हें काष्ठ बेचनेसे पहलेकी अपेक्षा चौगुना धन मिला। घर आकर उन सबने सारी बात स्त्रियोंको बतायी और फिर सबने मिलकर आदरपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा की और कथाका श्रवण किया तथा भक्तिपूर्वक भगवान्का प्रसाद सबको वितरितकर स्वयं भी ग्रहण किया। पूजाके प्रभावसे पुत्र, पत्नी आदिसे समन्वित निषादगणोंने पृथ्वीपर द्रव्य और श्रेष्ठ ज्ञान-दृष्टिको प्राप्त किया। द्विजश्रेष्ठ! उन सबने यथेष्ट भोगोंका उपभोग किया और अन्तमें वे सभी योगिजनोंके लिये भी दुर्लभ वैष्णवधामको प्राप्त हुए। (अध्याय २७)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका चतुर्थ अध्याय ]
सत्यनारायणव्रतके प्रसंगमें साधु वणिक एवं जामाताकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! अब मैं एक साधु वणिककी कथा कहता हूँ। एक बार भगवान् सत्यनारायणका भक्त मणिपूरक नगरका स्वामी महायशस्वी राजा चन्द्रचूड़ अपनी प्रजाओंके साथ व्रतपूर्वक सत्यनारायणभगवान्का पूजन कर रहा था, उसी समय रत्नपुर (रत्नसारपुर)-निवासी महाधनी साधु वणिक अपनी नौकाको धनसे परिपूर्ण कर नदी-तटसे यात्रा करता हुआ वहाँ आ पहुँचा। वहाँ उसने अनेक ग्रामवासियोंसहित मणि-मुक्तासे निर्मित तथा श्रेष्ठ वितानादिसे विभूषित पूजन-मण्डपको देखा, गीत-वाद्य आदिकी ध्वनि तथा वेदध्वनि भी वहाँ उसे सुनायी पड़ी। उस रम्य स्थानको देखकर साधु वणिकने अपने नाविकको
आदेश दिया कि यहाँपर नौका रोक दो। मैं यहाँके आयोजनको देखना चाहता हूँ। इसपर नाविकने वैसा ही किया। नावसे उतरकर उस वणिकने लोगोंसे जानकारी प्राप्त की और वह सत्यनारायण- भगवान्की कथा-मण्डपमें गया तथा वहाँ उसने उन सभीसे पूछा— 'महाशय! आपलोग यह कौन-सा पुण्यकार्य कर रहे हैं?' इसपर उन लोगोंने कहा— 'हमलोग अपने माननीय राजाके साथ भगवान् सत्यनारायणकी पूजा-कथाका आयोजन कर रहे हैं। इसी व्रतके अनुष्ठानसे इन्हें निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है। भगवान् सत्यनारायणकी पूजासे धनकी कामनावाला द्रव्य-लाभ, पुत्रकी कामनावाला उत्तम पुत्र, ज्ञानकी कामनावाला ज्ञान-दृष्टि प्राप्त
सुदाम्न्स्तपङ्कलकणा जग्ध्वा मानुष्यदुर्लभाः । सम्पदोऽदाद्धरिः प्रीत्या भक्तिमात्रमपेक्ष्यते ॥
गोपौ गृध्रो वणिग्व्याधो हनुमान् सविभीषणः । येऽन्ये पापात्मका दैत्या वृत्रकायाधवादयः ॥
नारायणान्तिकं प्राप्य मोदोऽद्यापि यद्दृशाः ।
(प्रतिसर्गपर्व २।२७।१५-१९)
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३१८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करता है और भयातुर मनुष्य सर्वथा निर्भय हो जाता है। इनकी पूजासे मनुष्य अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।'
यह सुनकर उसने गलेमें वस्त्रको कई बार लपेटकर भगवान् सत्यनारायणको दण्डवत् प्रणाम कर सभासदोंको भी सादर प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! मैं संततिहीन हूँ, अतः मेरा सारा ऐश्वर्य तथा सारा उद्यम सभी व्यर्थ है, हे कृपासागर! यदि आपकी कृपासे पुत्र या कन्या मैं प्राप्त करूँगा तो स्वर्णमयी पताका बनाकर आपकी पूजा करूँगा।' इसपर सभासदोंने कहा—'आपकी कामना पूर्ण हो।' तदनन्तर उसने भगवान् सत्यनारायण एवं सभासदोंको पुनः प्रणामकर प्रसाद ग्रहण किया और हृदयसे भगवान्का चिन्तन करता हुआ वह साधु वणिक् सबके साथ अपने घर गया। घर आनेपर माङ्गलिक द्रव्योंसे स्त्रियोंने उसका यथोचित स्वागत किया। साधु वणिक् अतिशय आश्चर्यके साथ मङ्गलमय अन्तःपुरमें गया। उसकी पतिव्रता पत्नी लीलावतीने भी उसकी स्त्रियोचित सेवा की। भगवान् सत्यनारायणकी कृपासे समय आनेपर बन्धु-बान्धवोंको आनन्दित करनेवाली तथा कमलके समान नेत्रोंवाली उसे एक कन्या उत्पन्न हुई। इससे साधु वणिक् अतिशय आनन्दित हुआ और उस समय उसने पर्याप्त धनका दान किया। वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर उसने कन्याके जातकर्म आदि मङ्गलकृत्य सम्पन्न किये। उस बालिकाकी जन्मकुण्डली बनवाकर उसका नाम कलावती रखा। कलानिधि चन्द्रमाकी कलाके समान वह कलावती नित्य बढ़ने लगी। आठ वर्षकी बालिका गौरी, नौ वर्षकी रोहिणी, दस वर्षकी कन्या तथा उसके आगे (अर्थात्) बारह वर्षकी बालिका
प्रीढ़ा या रजस्वला कहलाती है*। समयानुसार कलावती भी बढ़ते-बढ़ते विवाहके योग्य हो गयी। उसका पिता कलावतीको विवाह-योग्य जानकर उसके सम्बन्धकी चिन्ता करने लगा।
काञ्चनपुर नगरमें एक शंखपति नामका वणिक् रहता था। वह कुलीन, रूपवान्, सम्पत्तिशाली, शील और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न था। अपनी पुत्रीके योग्य उस वरको देखकर साधु वणिक्ने शंखपतिका वरण कर लिया और शुभ लग्गमें अनेक माङ्गलिक उपचारोंके साथ अग्निके सानिध्यमें वेद, वाद्य आदि ध्वनियोंके साथ यथाविधि कन्या उसे प्रदान कर दी, साथ ही मणि, मोती, मूँगा, वस्त्राभूषण आदि भी उस साधु वणिक्ने मङ्गलके लिये अपनी पुत्री एवं जामाताको प्रदान किये। साधु वणिक् अपने दामादको अपने घरमें रखकर उसे पुत्रके समान मानता था और वह भी पिताके समान साधु वणिक्का आदर करता था। इस प्रकार बहुत समय बीत गया। साधु वणिक्ने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनेका पहले यह संकल्प लिया था कि 'संतान प्राप्त होनेपर मैं भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूँगा' पर वह इस बातको भूल ही गया। उसने पूजा नहीं की।
कुछ दिनोंके बाद वह अपने जामाताके साथ व्यापारके निमित्त सुदूर नर्मदाके दक्षिण तटपर गया और वहाँ व्यापारनिरत होकर बहुत दिनोंतक ठहरा रहा। पर वहाँ भी उसने सत्यदेवकी किसी प्रकार भी उपासना नहीं की और परिणामस्वरूप भगवान्के प्रकोपका भाजन बनकर वह अनेक संकटोंसे ग्रस्त हो गया। एक समय कुछ चोरोंने एक निस्तब्ध रात्रिमें वहाँके राजमहलसे बहुत-सा द्रव्य तथा मोतीकी मालाको चुरा लिया।
- अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा च रोहिणी॥
दशवर्षा भवेत् कन्या ततः प्रीढ़ा रजस्वला। (प्रतिसर्गपर्व २।२८।२१-२२)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३१९
राजाने चोरीकी बात ज्ञात होनेपर अपने राजपुरुषोंको बुलाकर बहुत फटकारा और कहा कि 'यदि तुमलोगोंने चोरोंका पता लगाकर सारा धन यहाँ दो दिनोंमें उपस्थित नहीं किया तो तुम्हारी असावधानीके लिये तुम्हें मृत्यु-दण्ड दिया जायगा।' इसपर राजपुरुषोंने सर्वत्र व्यापक छान-बीन की, परंतु बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे उन चोरोंका पता नहीं लगा सके। फिर वे सभी एकत्रित होकर विचार करने लगे—'अहो! बड़े कष्टकी बात है, चोर तो मिला नहीं, धन भी नहीं मिला, अब राजा हमलोगोंको परिवारके साथ मार डालेगा। मरनेपर भी हमें प्रेत-योनि प्राप्त होगी। इसलिये अब तो यही श्रेयस्कर है कि 'हमलोग पवित्र नर्मदा नदीमें डूबकर मर जायँ। क्योंकि नर्मदाके प्रभावसे हमें शिवलोककी प्राप्ति होगी।' वे सभी राजपुरुष आपसमें ऐसा निश्चयकर नर्मदा नदीके तटपर गये। वहाँ उन्होंने उस साधु वणिकको देखा और उसके कण्ठमें मोतीकी माला भी देखी। उन्होंने उस साधु वणिकको ही चोर समझ लिया और वे सभी प्रसन्न होकर उन दोनों (साधु
वणिक और उसके जामाता)-को धनसहित पकड़कर राजाके पास ले आये। भगवान् सत्यनारायण भी पूजा करनेमें असत्यका आश्रय लेनेके कारण वणिकके प्रतिकूल हो गये थे। इसी कारण राजाने भी विचार किये बिना ही अपने सेवकोंको आदेश दिया कि इनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर खजानेमें जमा कर दो और इन्हें हथकड़ी लगाकर जेलमें डाल दो। सेवकोंने राजाज्ञाका पालन किया। वणिककी बातोंपर किसीने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। अपने जामाताके साथ वह वणिक अत्यन्त दुःखित हुआ और विलाप करने लगा—'हा पुत्र! मेरा धन अब कहाँ चला गया, मेरी पुत्री और पत्नी कहाँ हैं? विधाताकी प्रतिकूलता तो देखो। हम दुःख-सागरमें निमग्न हो गये। अब इस संकटसे हमें कौन पार करेगा? मैंने धर्म एवं भगवान्के विरुद्ध आचरण किया। यह उन्हीं कर्मोंका प्रभाव है।' इस प्रकार विलाप करते हुए वे ससुर और जामाता कई दिनोंतक जेलमें भीषण संतापका अनुभव करते रहे।
(अध्याय २८)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका पञ्चम अध्याय ]
सत्य-धर्मके आश्रयसे सबका उद्धार
(लीलावती एवं कलावतीकी कथा)
सूतजीने कहा—ऋषियो! आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीनों तापोंको हरण करनेवाले भगवान् विष्णुके मङ्गलमय चरित्रको जो सुनते हैं, वे सदा हरिके धाममें निवास करते हैं, किंतु जो भगवान्का आश्रय नहीं ग्रहण करते—उन्हें विस्मृत कर देते हैं, उन्हें कष्टमय नरक प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुकी पत्नीका नाम कमला (लक्ष्मी) है। इनके चार पुत्र हैं—धर्म, यज्ञ, राजा और चोर। ये सभी लक्ष्मी-प्रिय हैं अर्थात् ये लक्ष्मीकी
इच्छा करते हैं। ब्राह्मणों और अतिथियोंको जो दान दिया जाता है, वह धर्म कहा जाता है, उसके लिये धनकी आवश्यकता है। स्वाहा और स्वधाके द्वारा जो देवयज्ञ और पितृयज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ कहा जाता है, उसमें भी धनकी अपेक्षा होती है। धर्म और यज्ञकी रक्षा करनेवाला राजा कहलाता है, इसलिये राजाको भी लक्ष्मी—धनकी अपेक्षा रहती है। धर्म और यज्ञको नष्ट करनेवाला चोर कहलाता है, वह भी धनकी इच्छासे चोरी करता
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३२०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
है। इसलिये ये चारों किसी-न-किसी रूपमें लक्ष्मीके किंकर हैं। परंतु जहाँ सत्य रहता है, वहीं धर्म रहता है और वहीं लक्ष्मी भी स्थिररूपमें रहती हैं।
वह वणिक् सत्य-धर्मसे च्युत हो गया था (उसने सत्यनारायणका व्रत न कर प्रतिज्ञाभंग की थी)। इसीलिये राजाने उस वणिक्के घरसे भी सारा धन हरण करवा लिया और घरमें चोरी भी हो गयी। बेचारी उसकी पत्नी लीलावती एवं पुत्री कलावतीके साथ अपने वस्त्र-आभूषण तथा मकान बेचकर जैसे-तैसे जीवन-यापन करने लगी।
एक दिन उसकी कन्या कलावती भूखसे व्याकुल होकर किसी ब्राह्मणके घर गयी और वहाँ उसने ब्राह्मणको भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करते हुए देखा। जगन्नाथ सत्यदेवकी प्रार्थना करते हुए देखकर उसने भी भगवान्से प्रार्थना की—‘हे सत्यनारायणदेव! मेरे पिता और पति यदि घरपर आ जायेंगे तो मैं भी आपकी पूजा करूँगी।’ उसकी बात सुनकर ब्राह्मणोंने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ इस प्रकार ब्राह्मणोंसे आश्वसनयुक्त आशीर्वाद प्राप्तकर वह अपने घर वापस आ गयी। रात्रिमें देरसे लौटनेके कारण माताने उससे डाँटते हुए पूछा कि ‘बेटी! इतनी राततक तुम कहाँ रही?’ इसपर उसने उसे प्रसाद देते हुए सत्यनारायणके पूजा-वृत्तान्तको बताया और कहा—‘माँ! मैंने वहाँ सुना कि भगवान् सत्यनारायण कलियुगमें प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं, उनकी पूजा मनुष्यगण सदा करते हैं। माँ! मैं भी उनकी पूजा करना चाहती हूँ, तुम मुझे आज्ञा प्रदान करो। मेरे पिता और स्वामी अपने घर आ जायें, यही मेरी कामना है।’
रातमें ऐसा मनमें निश्चयकर प्रातः वह कलावती शीलपाल नामक एक वणिक्के घरपर धन प्राप्त करनेकी इच्छासे गयी और उसने कहा—‘बन्धो! थोड़ा धन दें, जिससे मैं भगवान् सत्यनारायणकी
पूजा कर सकूँ।’ यह सुनकर शीलपालने उसे पाँच अशर्पिर्याँ दीं और कहा—‘कलावती! तुम्हारे पिताका कुछ ऋण शेष था, मैं उन्हें ही वापस कर रहा हूँ, इसे देकर आज मैं उन्मूल हो गया।’ यह कहकर शीलपाल गया-तीर्थमें श्राद्ध करने चला गया। कन्याने अपनी माँ लीलावतीके साथ उस द्रव्यसे कल्याणप्रद सत्यनारायणव्रतका श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। इससे सत्यनारायण- भगवान् संतुष्ट हो गये।
उधर नर्मदा-तटवासी राजा अपने राजमहलमें सो रहा था। रात्रिके अन्तिम प्रहरमें ब्राह्मण-वेषधारी भगवान् सत्यनारायणने स्वप्नमें उससे कहा—‘राजन्! तुम शीघ्र उठकर उन निर्दोष वणिकोंको बन्धनमुक्त कर दो। वे दोनों बिना अपराधके ही बंदी बना लिये गये हैं। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।’ इतना कहकर वे अन्तर्हित हो गये। राजा निद्रासे सहसा जग उठा। वह परमात्माका स्मरण करने लगा। प्रातःकाल राजा अपनी सभामें आया और उसने अपने मन्त्रीसे देखे गये स्वप्नका फल पूछा। महामन्त्रीने भी राजासे कहा—‘राजन्! बड़े आश्चर्यकी बात है, मुझे भी आज ऐसा ही स्वप्न दिखलायी पड़ा। अतः उस वणिक् और उसके जामाताको बुलाकर भलीभाँति पूछ-ताछ कर लेनी चाहिये।’ राजाने उन दोनोंको बंदी-गृहसे बुलवाया और पूछा—‘तुम दोनों कहाँ रहते हो और तुम कौन हो?’ इसपर साधु वणिक्ने कहा—‘राजन्! मैं रत्नपुरका निवासी एक वणिक् हूँ। मैं व्यापार करनेके लिये यहाँ आया था, पर दैववश आपके सेवकोंने हमें चोर समझकर पकड़ लिया। साथमें यह मेरा जामाता है। बिना अपराधके ही हमें मणि-मुक्ताकी चोरी लगी है। राजेन्द्र! हम दोनों चोर नहीं हैं। आप भलीभाँति विचार कर लें।’
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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उसकी बातें सुनकर राजाको बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने उन्हें बन्धनमुक्त कर दिया। अनेक प्रकारसे उन्हें अलंकृत कर भोजन कराया और वस्त्र, आभूषण आदि देकर उनका सम्मान किया। साधु वणिकने कहा—‘राजन्! मैंने कारागारमें अनेक कष्ट भोगे हैं, अब मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ, आप मुझे आज्ञा दें।’ इसपर राजाने अपने कोषाध्यक्षके माध्यमसे साधु वणिककी नौका रलों आदिसे परिपूर्ण करवा दी। फिर वह साधु वणिक अपने जामाताके साथ राजाद्वारा सम्मानित हो द्विगुणित धन लेकर रत्नपुरकी ओर चला।
साधु वणिकने अपने नगरके लिये प्रस्थान किया, पर भगवान् सत्यनारायणका पूजन वह उस समय भी भूल गया। भगवान् सत्यदेवने जो कलियुगमें तत्काल फल देते हैं, पुनः तपस्वीका रूप धारणकर वहाँ आकर उससे पूछा—‘साधो! तुम्हारी इस नौकामें क्या है?’ इसपर साधु वणिकने उत्तर दिया—‘आपको देनेके लिये कुछ भी धन मेरे पास नहीं है। नावमें केवल कुछ लताओंके पत्ते भरे पड़े हैं।’ साधु वणिकके ऐसा कहनेपर तपस्वीने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ इतना कहकर तपस्वी अन्तर्धान हो गये। उनके ऐसा कहते ही नौकामें धनके बदले केवल पत्ते ही दीखने लगे। यह सब देखकर साधु अत्यन्त चकित एवं चिन्तित हो गया, उसे मूच्छा-सी आ गयी। वह अनेक प्रकारसे विलाप करने लगा। वज्रपात होनेके समान वह स्तब्ध होकर सोचने लगा कि मैं अब क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा धन कहाँ चला गया? जामाताके समझाने-बुझानेपर इसे तपस्वीका शाप समझकर वह पुनः उन्हीं तपस्वीकी शरणमें गया और गलेमें कपड़ा लपेटकर उन तपस्वीको प्रणाम कर कहा—‘महाभाग! आप कौन हैं? कोई गन्धर्व हैं या देवता हैं अथवा साक्षात् परमात्मा हैं?’
प्रभो! मैं आपकी महिमाको लेशमात्र भी नहीं जानता। आप मेरे अपराधोंको क्षमा कर दें और मेरी नौकाके धनको पुनः पूर्ववत् कर दें।’ इसपर तपस्वीरूप भगवान् सत्यनारायणने कहा कि तुमने चन्द्रचूड राजाके सत्यनारायणके मण्डपमें ‘संततिके प्राप्त होनेपर भगवान् सत्यदेवकी पूजा करूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा की थी। तुम्हें कन्या प्राप्त हुई, उसका विवाह भी तुमने किया, व्यापारसे धन भी प्राप्त किया, बंदी-गृहसे तुम मुक्त भी हो गये, पर तुमने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा कभी नहीं की। इससे मिथ्याभाषण, प्रतिज्ञालोप और देवताकी अवज्ञा आदि अनेक दोष हुए, तुम भगवान्का स्मरणतक भी नहीं करते। इसी कारण है मूढ़! तुम कष्ट भोग रहे हो। सत्यनारायणभगवान् सर्वव्यापी हैं, वे सभी फलोंको देनेवाले हैं। उनका अनादर कर तुम कैसे सुख प्राप्त कर सकते हो। तुम भगवान्को याद करो, उनका स्मरण करो। इसपर साधु वणिकको भगवान् सत्यनारायणका स्मरण हो आया और वह पश्चाताप करने लगा। उसके देखते-ही-देखते वहाँ वे तपस्वी भगवान् सत्यनारायणरूपमें परिवर्तित हो गये और तब वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—
‘सत्यस्वरूप, सत्यसंध, सत्यनारायण भगवान् हरिको नमस्कार है। जिस सत्यसे जगत्की प्रतिष्ठा है, उस सत्यस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है। भगवन्! आपकी मायासे मोहित होनेके कारण मनुष्य आपके स्वरूपको जान नहीं पाता और इस दुःखरूपी संसार-समुद्रको सुख मानकर उसीमें लिस रहता है। धनके गर्वसे मैं मूढ़ होकर मदान्धकारसे कर्तव्य और अकर्तव्यकी दृष्टिसे शून्य हो गया। मैं अपने कल्याणको भी नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरे दौरात्म्य-भावके लिये आप क्षमा करें। हे तपोनिधे! आपको नमस्कार है। कृपासागर! आप
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३२२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुझे अपने चरणोंका दास बना लें, जिससे मुझे आपके चरण-कमलोंका नित्य स्मरण होता रहे*।'
इस प्रकार स्तुति कर उस साधु वणिकने एक लाख मुद्रासे पुरोहितके द्वारा घर आकर सत्यनारायणकी पूजा करनेके लिये प्रतिज्ञा की। इसपर भगवानने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम पुत्र-पौत्रसे समन्वित होकर श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर मेरे सत्यलोकको प्राप्त करोगे और मेरे साथ आनन्द प्राप्त करोगे।' यह कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्हित हो गये और साधुने पुनः अपनी यात्रा प्रारम्भ की।
सत्यदेवभगवान्से रक्षित हो वह साधु वणिक एक सप्ताहमें नगरके समीप पहुँच गया और उसने अपने आगमनका समाचार देनेके लिये घरपर दूत भेजा। दूतने घर आकर साधु वणिककी स्त्री लीलावतीसे कहा—'जामाताके साथ सफलमनोरथ साधु वणिक आ रहे हैं।' वह साध्वी लीलावती कन्याके साथ सत्यनारायणभगवान्की पूजा कर रही थी। पतिके आगमनको सुनकर उसने पूजा वहींपर छोड़ दी और पूजाका शेष दायित्व अपनी पुत्रीको सौंपकर वह शीघ्रतासे नौकाके समीप चली आयी। इधर कलावती भी अपनी सखियोंके साथ सत्यनारायणकी जैसे-तैसे पूजा समाप्त कर बिना प्रसाद लिये ही अपने पतिको देखनेके लिये उतावली हो नौकाकी ओर चली गयी।
भगवान् सत्यनारायणके प्रसादके अपमानसे जामातासहित साधु वणिककी नौका जलके मध्य अलक्षित हो गयी। यह देखकर सभी दुःखमें निमग्न हो गये। साधु वणिक भी मूर्च्छित हो
गया। कलावती भी यह देखकर मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी और उसका सारा शरीर आँसुओंसे भीग गया। वह हवाके वेगसे हिलते हुए कैलेके पत्तेके समान काँपने लगी। हा नाथ! हा कान्त! कहकर विलाप करने लगी और कहने लगी—'हे विधाता! आपने मुझे पतिते वियुक्त कर मेरी आशा तोड़ दी। पतिके बिना स्त्रीका जीवन अधूरा एवं निष्फल है।' कलावती आर्तस्वरमें भगवान् सत्यनारायणसे बोली—'हे सत्यसिन्धो! हे भगवान् सत्यनारायण! मैं अपने पतिके वियोगमें जलमें डूबनेवाली हूँ, आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। पतिको प्रकट कर मेरे प्राणोंकी रक्षा करें।' (इस प्रकार जब वह अपने पतिके पादुकाओंको लेकर जलमें प्रवेश करनेवाली ही थी) उसी समय आकाशवाणी हुई—'हे साधो! तुम्हारी पुत्रीने मेरे प्रसादका अपमान किया है। यदि वह पुनः घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसादको ग्रहण कर ले तो उसका पति नौकासहित यहाँ अवश्य दीखेगा, चिन्ता मत करो।' इसपर आश्चर्यचकित हो कलावतीने वैसा ही किया और उसे उसका पति पुनः अपनी नौकासहित दीखने लगा। फिर क्या था? सभी परस्पर आनन्दसे मिले और घर आकर साधु वणिकने एक लाख मुद्राओंसे बड़े समारोहपूर्वक भगवान् सत्यदेवकी पूजा की और आनन्दसे रहने लगा। पुनः कभी भगवान् सत्यदेवकी उपेक्षा नहीं की। उस व्रतके प्रभावसे पुत्र-पौत्रसमन्वित अनेक भोगोंका उपभोग करते हुए सभी स्वर्गलोक चले गये। इस इतिहासको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी विष्युका
- सत्यरूपं सत्यसन्मं सत्यनारायणं हरिम् । यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम् ॥ त्वन्मायामोहितात्मानो न पश्यन्त्यात्मनः शुभम् । दुःखाम्भोधी सदा मग्न दुःखे च सुखमानिनः ॥ मूढोऽहं धनगर्वेण मदान्धीकृतलोचनः । न जाने स्वात्मनः क्षेत्रं कथं पश्यामि मूढधीः ॥ क्षमस्व मम दौरात्यं तपोधाम्ने हरे नमः । आज्ञापयात्मादस्य मे येन ते चरणौ स्मरे ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२९।४८-५९)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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अत्यन्त प्रिय हो जाता है। अपनी मनःकामनाकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
सूतजी बोले—ऋषिगणो! मैंने सभी व्रतोंमें
श्रेष्ठ इस सत्यनारायणव्रतको कहा। ब्राह्मणके मुखसे निकला हुआ यह व्रत कलिकालमें अतिशय पुण्यप्रद है। (अध्याय २९)
[ श्रीसत्यनारायणव्रत-कथाका षष्ठ अध्याय ]
( सत्यनारायणव्रत-कथा सम्पूर्ण )
पितृशर्मा और उनके वंशज—व्याडि, पाणिनि और वररुचि आदिकी कथा
ऋषियोंने कहा—भगवन्! तीनों दुःखोंके विनाश करनेवाले व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यनारायणव्रतको हमलोगोंने सुना, अब आपसे हमलोग ब्रह्मचर्यका महत्त्व सुनना चाहते हैं।
सूतजी बोले—ऋषियो! कलियुगमें पितृशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था। वह वेदवेदाङ्गोंके तत्त्वोंको जाननेवाला था और पापकर्मोंसे डरता रहता था। कलियुगके भयंकर समयको देखकर वह बहुत चिन्तित हुआ। उसने सोचा कि किस आश्रमके द्वारा मेरा कल्याण होगा, क्योंकि कलिकालमें संन्यास-मार्ग दम्भ और पाखण्डके द्वारा खण्डित हो गया है, वानप्रस्थ तो समाप्त-सा ही है, बस, कहीं-कहीं ब्रह्मचर्य रह गया है, किंतु गार्हस्थ्य-जीवनका कर्म सभी कर्मोंमें श्रेष्ठ माना गया है। अतः इस घोर कलियुगमें मुझे गृहस्थ-धर्मका पालन करनेके लिये विवाह करना चाहिये। यदि भाग्यसे अपनी मनोवृत्तिके अनुसार आचरण करनेवाली स्त्री मिल जाती है, तब मेरा जन्म सफल एवं कल्याणकारी हो जायगा। इस प्रकार विचार करते हुए पितृशर्मोंने उत्तम पत्नी प्राप्त करनेके लिये विश्वेश्वरी जगन्माता भगवतीकी चन्दन आदिसे पूजा कर स्तुति प्रारम्भ की*।
पितृशर्माकी स्तुति सुनकर देवी प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारी स्त्रीके रूपमें विष्णुयशा नामक ब्राह्मणकी कन्याको निर्दिष्ट किया है।’ तदनन्तर पितृशर्मा उस देवी ब्रह्मचारिणीसे विवाह करके मथुरामें निवास करते हुए गृहस्थ-धर्मानुसार जीवन-यापन करने लगा। चारों वेदोंको जाननेवाले उसे चार पुत्र उत्पन्न हुए। जिनके नाम थे—ऋक्, यजुष्, साम तथा अथर्व। ऋक्के पुत्र व्याडि थे, जो न्याय-शास्त्र-विशारद थे। यजुष्के पुत्र लोकविश्रुत मीमांस हुए। सामके पुत्र पाणिनि हुए जो व्याकरण-शास्त्रमें पारंगत थे और अथर्वके पुत्र वररुचि हुए।
एक समय वे चारों पितृशर्माके साथ मगध देशके अधिपति राजा चन्द्रगुप्तकी सभामें गये। अतिशय सम्मानपूर्वक राजाने उन लोगोंका पूजन कर पूछा—‘द्विजगण! कौन-सा ब्रह्मचर्यव्रत श्रेष्ठ है?’ इसपर व्याडिने कहा—‘महाराज! जो व्यक्ति उस परम पुरुषदेवकी न्यायपूर्वक आराधनामें तत्पर रहता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मचारी है।’ मीमांसने कहा—‘राजन्! जो श्रेष्ठ व्यक्ति यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवताओंका यजन करता है और रोचना आदिसे उनका अर्चन एवं तर्पण आदि करता है तथा
- नमः प्रकृत्यै सर्वायै कैवल्यायै नमो नमः । त्रिगुणैक्यस्वरूपायै तुरीयायै नमो नमः ॥ महतत्त्वजनन्यै च द्रुहृकत्र्यै नमो नमः । ब्रह्मातर्नमस्तुभ्यै साहकारपितामहि ॥ पृथगुणायै शुद्धायै नमो मातर्नमो नमः । विद्यायै शुद्धसत्त्वायै लक्ष्यै सत्वरजोमयि ॥ नमो मातरविद्यायै ततः शुद्ध्यै नमो नमः । काल्यै सत्त्वतमोभूत्यै नमो मातर्नमो नमः ॥ स्त्रियै शुद्धरजोमूर्त्यै नमस्त्रैलोक्यवासिनि । नमो रजस्तमोमूर्त्यै दुर्गायै च नमो नमः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।३०।१०-१४)
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३२४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भगवान् के प्रसादको ग्रहण करता है, वह ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर पाणिनिने कहा—'राजन्! उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरोंसे या परा, पश्यन्ती, मध्यमा वाणीसे शब्दब्रह्मका आराधक तथा लिङ्ग, धातु एवं गणोंसे समन्वित सूत्रपाठोंसे शब्दब्रह्मकी आराधना करनेवाला सच्चा ब्रह्मचारी है और वही ब्रह्मको प्राप्त करता है।' यह सुनकर वररुचिने कहा—'हे मगधाधिपते! जो व्यक्ति उपनीत होकर गुरुकुलमें निवास करता हुआ दण्ड, केश और नखधारी भिक्षार्थी वेदाध्ययनमें तत्पर रहते हुए गुरुकी आज्ञाके अनुसार गुरुके गृहमें निवास करता है, वह ब्रह्मचारी कहा गया है।'
इनके वचनोंको सुनकर पितृशर्मा ने कहा कि
'जो गृहस्थ-धर्ममें रहता हुआ पितरों, देवताओं और अतिथियोंका सम्मान करता है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक ऋतुकालमें ही भार्याका उपगमन करता है, वही मुख्य ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर राजाने कहा—'स्वामिन्! कलिकालके लिये आपका ही कथन उचित, सुगम और उत्तम धर्म है, यही मेरा भी मत है।'
यह कहकर वह राजा पितृशर्माका शिष्य हो गया और उसने अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त किया। पितृशर्मा भी भगवान् श्रीहरिका ध्यान करते हुए हिमालय पर्वतपर जाकर योगध्यानपरायण हो गया।
(अध्याय ३०)
महर्षि पाणिनिका इतिवृत्त
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! सभी तीर्थों, दानों आदि धर्मसाधनोंमें उत्तम साधन क्या है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य क्लेश-सागरको पार कर जाय और मुक्ति प्राप्त कर ले?
सूतजी बोले—प्राचीन कालमें सामके एक श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनका नाम पाणिनि था। कणादके श्रेष्ठ शास्त्रज्ञ शिष्योंसे वे पराजित एवं लज्जित होकर तीर्थटनके लिये चले गये। प्रायः सभी तीर्थोंमें स्नान तथा देवता-पितरोंका तर्पण करते हुए वे केदार-क्षेत्रका जल पानकर भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर हो गये। पत्तोंके आहारपर रहते हुए वे सप्ताहान्तमें जल ग्रहण करते थे। फिर उन्होंने दस दिनतक जल ही ग्रहण किया। बादमें वे दस दिनोंतक केवल वायुके ही आहारपर रहकर भगवान् शिवका ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब अट्टाईस दिन व्यतीत हो गये तो भगवान् शिवने प्रकट
होकर उनसे वर माँगनेको कहा। भगवान् शिवकी इस अमृतमय वाणीको सुनकर उन्होंने गद्गद् वाणीसे सर्वेश्वर, सर्वलिङ्गेश्वर, गिरिजावल्लभ हरकी इस प्रकार स्तुति की—
'महान् रुद्रको नमस्कार है। सर्वेश्वर सर्वहितकारी भगवान् शिवको नमस्कार है। अभय एवं विद्या प्रदान करनेवाले, नन्दीवाहन भगवान् को नमस्कार है। पापका विनाश करनेवाले तथा समस्त लोकोंके स्वामी एवं समस्त मायारूपी दुःखोंका हरण करनेवाले तेजःस्वरूप अनन्तमूर्ति भगवान् शंकरको नमस्कार है*।' देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे मूल विद्या एवं परम शास्त्र-ज्ञान प्रदान करनेकी कृपा करें।
सूतजी बोले—यह सुनकर महादेवजीने प्रसन्न होकर 'अ इ उ ण्' आदि मङ्गलकारी सर्ववर्णमय सूत्रोंको उन्हें प्रदान किया। ज्ञानरूपी सरोवरके
- नमो रुद्राय महते सर्वशाय हितैषिणे । नन्दीसंस्थाय देवाय विद्याभयकराय च ॥
पापान्तकाय भार्याय नमोऽनन्ताय वैधसे । नमो मायाहरेणाय नमस्ते लोकशंकर ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।३१।७-८)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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सत्यरूपी जलसे जो राग-द्वेषरूपी मलका नाश करनेवाला है, उस मानसतीर्थको प्राप्त करनेपर अर्थात् उस मानसतीर्थमें अवगाहन करनेपर सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। यह महान् मानस-ज्ञान-तीर्थ ब्रह्मके साक्षात्कार करानेमें समर्थ है। पाणिने ! मैंने यह सर्वोत्तम तीर्थ तुम्हें प्रदान किया है, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे। यह कहकर भगवान् रुद्र अन्तर्हित हो गये और पाणिनि अपने
घरपर आ गये। पाणिनिने सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ और लिङ्गसूत्र-रूप व्याकरण शास्त्रका निर्माण कर परम निर्वाण प्राप्त किया*। अतः भार्गवश्रेष्ठ ! तुम मनोमय ज्ञानतीर्थका अवलम्बन करो। उन्हींसे कल्याणमयी सर्वोत्तम तीर्थमयी गङ्गा प्रकट हुई हैं। गङ्गासे बढ़कर उत्तम तीर्थ न कोई हुआ है और न आगे होगा।
(अध्याय ३१)
बोपदेवके चरित्र-प्रसंगमें श्रीमद्भागवत-माहात्म्य
सूतजी बोले—महामुने शौनक ! तोताद्रिमें एक बोपदेव नामके ब्राह्मण रहते थे। वे कृष्णभक्त और वेद-वेदाङ्गपारंगत थे। उन्होंने गोप-गोपियोंसे प्रतिष्ठित वृन्दावन-तीर्थमें जाकर देवाधिदेव जनार्दनकी आराधना की। एक वर्ष बाद भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें अतिशय श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान किया। उसी ज्ञानके द्वारा उनके हृदयमें भागवती कथाका उदय हुआ। जिस कथाको श्रीशुकदेवजीने बुद्धिमान् राजा परीक्षितको सुनाया था, उस सनातनी मोक्ष-स्वरूपा कथाका बोपदेवने हरि-लीलामृत नामसे पुनः वर्णन किया। कथाकी समाप्तिपर जनार्दन भगवान् विष्णु प्रकट हुए और बोले 'महामते ! वर माँगो।' बोपदेवने अतिशय स्नेहमयी वाणीमें कहा—'भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण संसारपर अनुग्रह करनेवाले हैं। आपसे देव, मनुष्य, पशु-पक्षी सभी निर्मित हुए हैं। नरकसे दुःखी प्राणी भी इस कलियुगमें आपके ही नामसे कृतार्थ होते हैं। महर्षि वेदव्यासरचित श्रीमद्भागवतका ज्ञान तो आपने मुझे प्रदान किया है, पुनः यदि आप वर प्रदान करना चाहते हैं तो
उस भागवतका माहात्म्य मुझसे कहें।'
श्रीभगवान् बोले—बोपदेव ! एक समय भगवान् शंकर पार्वतीके साथ दम्भ और पाखण्डसे युक्त बौद्धोंके राज्य प्राप्त होनेपर काशीमें उत्तम भूमि देखकर वहाँ स्थित हो गये। भगवान् शंकरने आनन्दपूर्वक प्रणाम करते हुए कहा—'हे सच्चिदानन्द ! हे विभो ! हे जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले ! आपकी जय हो।' इस प्रकारकी वाणी सुनकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे पूछा—'भगवन् ! आपके समान दूसरा अन्य देवता कौन है जिसे आपने प्रणाम किया।' इसपर भगवान् शिवने कहा—'महादेवि ! यह काशी परम पवित्र क्षेत्र है, यह स्वयं सनातन ब्रह्मस्वरूप है, यह प्रणाम करने योग्य है। यहाँ मैं ससाह-यज्ञ (भागवत-ससाह-यज्ञ) करूँगा।' उस यज्ञ-स्थलकी रक्षाके लिये भगवान् शंकरने चण्डीश, गणेश, नन्दी तथा गुह्यकोंको स्थापित किया और स्वयं ध्यानमें स्थित होकर माता पार्वतीसे सात दिनतक भागवती कथा कहते रहे। आठवें दिन पार्वतीको सोते देखकर उन्होंने पूछा कि 'तुमने कितनी कथा
- सूत्रपाठ धातुपाठ गणपाठ तथैव च। लिङ्गसूत्र तथा कृत्वा परं निर्वाणमाप्तवान्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३१।१३-१४)
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