भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
३२१
उसकी बातें सुनकर राजाको बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने उन्हें बन्धनमुक्त कर दिया। अनेक प्रकारसे उन्हें अलंकृत कर भोजन कराया और वस्त्र, आभूषण आदि देकर उनका सम्मान किया। साधु वणिकने कहा—‘राजन्! मैंने कारागारमें अनेक कष्ट भोगे हैं, अब मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ, आप मुझे आज्ञा दें।’ इसपर राजाने अपने कोषाध्यक्षके माध्यमसे साधु वणिककी नौका रलों आदिसे परिपूर्ण करवा दी। फिर वह साधु वणिक अपने जामाताके साथ राजाद्वारा सम्मानित हो द्विगुणित धन लेकर रत्नपुरकी ओर चला।
साधु वणिकने अपने नगरके लिये प्रस्थान किया, पर भगवान् सत्यनारायणका पूजन वह उस समय भी भूल गया। भगवान् सत्यदेवने जो कलियुगमें तत्काल फल देते हैं, पुनः तपस्वीका रूप धारणकर वहाँ आकर उससे पूछा—‘साधो! तुम्हारी इस नौकामें क्या है?’ इसपर साधु वणिकने उत्तर दिया—‘आपको देनेके लिये कुछ भी धन मेरे पास नहीं है। नावमें केवल कुछ लताओंके पत्ते भरे पड़े हैं।’ साधु वणिकके ऐसा कहनेपर तपस्वीने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ इतना कहकर तपस्वी अन्तर्धान हो गये। उनके ऐसा कहते ही नौकामें धनके बदले केवल पत्ते ही दीखने लगे। यह सब देखकर साधु अत्यन्त चकित एवं चिन्तित हो गया, उसे मूच्छा-सी आ गयी। वह अनेक प्रकारसे विलाप करने लगा। वज्रपात होनेके समान वह स्तब्ध होकर सोचने लगा कि मैं अब क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा धन कहाँ चला गया? जामाताके समझाने-बुझानेपर इसे तपस्वीका शाप समझकर वह पुनः उन्हीं तपस्वीकी शरणमें गया और गलेमें कपड़ा लपेटकर उन तपस्वीको प्रणाम कर कहा—‘महाभाग! आप कौन हैं? कोई गन्धर्व हैं या देवता हैं अथवा साक्षात् परमात्मा हैं?’
प्रभो! मैं आपकी महिमाको लेशमात्र भी नहीं जानता। आप मेरे अपराधोंको क्षमा कर दें और मेरी नौकाके धनको पुनः पूर्ववत् कर दें।’ इसपर तपस्वीरूप भगवान् सत्यनारायणने कहा कि तुमने चन्द्रचूड राजाके सत्यनारायणके मण्डपमें ‘संततिके प्राप्त होनेपर भगवान् सत्यदेवकी पूजा करूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा की थी। तुम्हें कन्या प्राप्त हुई, उसका विवाह भी तुमने किया, व्यापारसे धन भी प्राप्त किया, बंदी-गृहसे तुम मुक्त भी हो गये, पर तुमने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा कभी नहीं की। इससे मिथ्याभाषण, प्रतिज्ञालोप और देवताकी अवज्ञा आदि अनेक दोष हुए, तुम भगवान्का स्मरणतक भी नहीं करते। इसी कारण है मूढ़! तुम कष्ट भोग रहे हो। सत्यनारायणभगवान् सर्वव्यापी हैं, वे सभी फलोंको देनेवाले हैं। उनका अनादर कर तुम कैसे सुख प्राप्त कर सकते हो। तुम भगवान्को याद करो, उनका स्मरण करो। इसपर साधु वणिकको भगवान् सत्यनारायणका स्मरण हो आया और वह पश्चाताप करने लगा। उसके देखते-ही-देखते वहाँ वे तपस्वी भगवान् सत्यनारायणरूपमें परिवर्तित हो गये और तब वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—
‘सत्यस्वरूप, सत्यसंध, सत्यनारायण भगवान् हरिको नमस्कार है। जिस सत्यसे जगत्की प्रतिष्ठा है, उस सत्यस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है। भगवन्! आपकी मायासे मोहित होनेके कारण मनुष्य आपके स्वरूपको जान नहीं पाता और इस दुःखरूपी संसार-समुद्रको सुख मानकर उसीमें लिस रहता है। धनके गर्वसे मैं मूढ़ होकर मदान्धकारसे कर्तव्य और अकर्तव्यकी दृष्टिसे शून्य हो गया। मैं अपने कल्याणको भी नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरे दौरात्म्य-भावके लिये आप क्षमा करें। हे तपोनिधे! आपको नमस्कार है। कृपासागर! आप
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section 12:12:12 From Digitized by Sarvagya Sharda Peeth