भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुझे अपने चरणोंका दास बना लें, जिससे मुझे आपके चरण-कमलोंका नित्य स्मरण होता रहे*।'
इस प्रकार स्तुति कर उस साधु वणिकने एक लाख मुद्रासे पुरोहितके द्वारा घर आकर सत्यनारायणकी पूजा करनेके लिये प्रतिज्ञा की। इसपर भगवानने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम पुत्र-पौत्रसे समन्वित होकर श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर मेरे सत्यलोकको प्राप्त करोगे और मेरे साथ आनन्द प्राप्त करोगे।' यह कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्हित हो गये और साधुने पुनः अपनी यात्रा प्रारम्भ की।
सत्यदेवभगवान्से रक्षित हो वह साधु वणिक एक सप्ताहमें नगरके समीप पहुँच गया और उसने अपने आगमनका समाचार देनेके लिये घरपर दूत भेजा। दूतने घर आकर साधु वणिककी स्त्री लीलावतीसे कहा—'जामाताके साथ सफलमनोरथ साधु वणिक आ रहे हैं।' वह साध्वी लीलावती कन्याके साथ सत्यनारायणभगवान्की पूजा कर रही थी। पतिके आगमनको सुनकर उसने पूजा वहींपर छोड़ दी और पूजाका शेष दायित्व अपनी पुत्रीको सौंपकर वह शीघ्रतासे नौकाके समीप चली आयी। इधर कलावती भी अपनी सखियोंके साथ सत्यनारायणकी जैसे-तैसे पूजा समाप्त कर बिना प्रसाद लिये ही अपने पतिको देखनेके लिये उतावली हो नौकाकी ओर चली गयी।
भगवान् सत्यनारायणके प्रसादके अपमानसे जामातासहित साधु वणिककी नौका जलके मध्य अलक्षित हो गयी। यह देखकर सभी दुःखमें निमग्न हो गये। साधु वणिक भी मूर्च्छित हो
गया। कलावती भी यह देखकर मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी और उसका सारा शरीर आँसुओंसे भीग गया। वह हवाके वेगसे हिलते हुए कैलेके पत्तेके समान काँपने लगी। हा नाथ! हा कान्त! कहकर विलाप करने लगी और कहने लगी—'हे विधाता! आपने मुझे पतिते वियुक्त कर मेरी आशा तोड़ दी। पतिके बिना स्त्रीका जीवन अधूरा एवं निष्फल है।' कलावती आर्तस्वरमें भगवान् सत्यनारायणसे बोली—'हे सत्यसिन्धो! हे भगवान् सत्यनारायण! मैं अपने पतिके वियोगमें जलमें डूबनेवाली हूँ, आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। पतिको प्रकट कर मेरे प्राणोंकी रक्षा करें।' (इस प्रकार जब वह अपने पतिके पादुकाओंको लेकर जलमें प्रवेश करनेवाली ही थी) उसी समय आकाशवाणी हुई—'हे साधो! तुम्हारी पुत्रीने मेरे प्रसादका अपमान किया है। यदि वह पुनः घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसादको ग्रहण कर ले तो उसका पति नौकासहित यहाँ अवश्य दीखेगा, चिन्ता मत करो।' इसपर आश्चर्यचकित हो कलावतीने वैसा ही किया और उसे उसका पति पुनः अपनी नौकासहित दीखने लगा। फिर क्या था? सभी परस्पर आनन्दसे मिले और घर आकर साधु वणिकने एक लाख मुद्राओंसे बड़े समारोहपूर्वक भगवान् सत्यदेवकी पूजा की और आनन्दसे रहने लगा। पुनः कभी भगवान् सत्यदेवकी उपेक्षा नहीं की। उस व्रतके प्रभावसे पुत्र-पौत्रसमन्वित अनेक भोगोंका उपभोग करते हुए सभी स्वर्गलोक चले गये। इस इतिहासको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी विष्युका
- सत्यरूपं सत्यसन्मं सत्यनारायणं हरिम् । यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम् ॥ त्वन्मायामोहितात्मानो न पश्यन्त्यात्मनः शुभम् । दुःखाम्भोधी सदा मग्न दुःखे च सुखमानिनः ॥ मूढोऽहं धनगर्वेण मदान्धीकृतलोचनः । न जाने स्वात्मनः क्षेत्रं कथं पश्यामि मूढधीः ॥ क्षमस्व मम दौरात्यं तपोधाम्ने हरे नमः । आज्ञापयात्मादस्य मे येन ते चरणौ स्मरे ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२९।४८-५९)
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