भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 334
  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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अत्यन्त प्रिय हो जाता है। अपनी मनःकामनाकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

सूतजी बोले—ऋषिगणो! मैंने सभी व्रतोंमें

श्रेष्ठ इस सत्यनारायणव्रतको कहा। ब्राह्मणके मुखसे निकला हुआ यह व्रत कलिकालमें अतिशय पुण्यप्रद है। (अध्याय २९)

[ श्रीसत्यनारायणव्रत-कथाका षष्ठ अध्याय ]

( सत्यनारायणव्रत-कथा सम्पूर्ण )

पितृशर्मा और उनके वंशज—व्याडि, पाणिनि और वररुचि आदिकी कथा

ऋषियोंने कहा—भगवन्! तीनों दुःखोंके विनाश करनेवाले व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यनारायणव्रतको हमलोगोंने सुना, अब आपसे हमलोग ब्रह्मचर्यका महत्त्व सुनना चाहते हैं।

सूतजी बोले—ऋषियो! कलियुगमें पितृशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था। वह वेदवेदाङ्गोंके तत्त्वोंको जाननेवाला था और पापकर्मोंसे डरता रहता था। कलियुगके भयंकर समयको देखकर वह बहुत चिन्तित हुआ। उसने सोचा कि किस आश्रमके द्वारा मेरा कल्याण होगा, क्योंकि कलिकालमें संन्यास-मार्ग दम्भ और पाखण्डके द्वारा खण्डित हो गया है, वानप्रस्थ तो समाप्त-सा ही है, बस, कहीं-कहीं ब्रह्मचर्य रह गया है, किंतु गार्हस्थ्य-जीवनका कर्म सभी कर्मोंमें श्रेष्ठ माना गया है। अतः इस घोर कलियुगमें मुझे गृहस्थ-धर्मका पालन करनेके लिये विवाह करना चाहिये। यदि भाग्यसे अपनी मनोवृत्तिके अनुसार आचरण करनेवाली स्त्री मिल जाती है, तब मेरा जन्म सफल एवं कल्याणकारी हो जायगा। इस प्रकार विचार करते हुए पितृशर्मोंने उत्तम पत्नी प्राप्त करनेके लिये विश्वेश्वरी जगन्माता भगवतीकी चन्दन आदिसे पूजा कर स्तुति प्रारम्भ की*।

पितृशर्माकी स्तुति सुनकर देवी प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारी स्त्रीके रूपमें विष्णुयशा नामक ब्राह्मणकी कन्याको निर्दिष्ट किया है।’ तदनन्तर पितृशर्मा उस देवी ब्रह्मचारिणीसे विवाह करके मथुरामें निवास करते हुए गृहस्थ-धर्मानुसार जीवन-यापन करने लगा। चारों वेदोंको जाननेवाले उसे चार पुत्र उत्पन्न हुए। जिनके नाम थे—ऋक्, यजुष्, साम तथा अथर्व। ऋक्के पुत्र व्याडि थे, जो न्याय-शास्त्र-विशारद थे। यजुष्के पुत्र लोकविश्रुत मीमांस हुए। सामके पुत्र पाणिनि हुए जो व्याकरण-शास्त्रमें पारंगत थे और अथर्वके पुत्र वररुचि हुए।

एक समय वे चारों पितृशर्माके साथ मगध देशके अधिपति राजा चन्द्रगुप्तकी सभामें गये। अतिशय सम्मानपूर्वक राजाने उन लोगोंका पूजन कर पूछा—‘द्विजगण! कौन-सा ब्रह्मचर्यव्रत श्रेष्ठ है?’ इसपर व्याडिने कहा—‘महाराज! जो व्यक्ति उस परम पुरुषदेवकी न्यायपूर्वक आराधनामें तत्पर रहता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मचारी है।’ मीमांसने कहा—‘राजन्! जो श्रेष्ठ व्यक्ति यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवताओंका यजन करता है और रोचना आदिसे उनका अर्चन एवं तर्पण आदि करता है तथा

  • नमः प्रकृत्यै सर्वायै कैवल्यायै नमो नमः । त्रिगुणैक्यस्वरूपायै तुरीयायै नमो नमः ॥ महतत्त्वजनन्यै च द्रुहृकत्र्यै नमो नमः । ब्रह्मातर्नमस्तुभ्यै साहकारपितामहि ॥ पृथगुणायै शुद्धायै नमो मातर्नमो नमः । विद्यायै शुद्धसत्त्वायै लक्ष्यै सत्वरजोमयि ॥ नमो मातरविद्यायै ततः शुद्ध्यै नमो नमः । काल्यै सत्त्वतमोभूत्यै नमो मातर्नमो नमः ॥ स्त्रियै शुद्धरजोमूर्त्यै नमस्त्रैलोक्यवासिनि । नमो रजस्तमोमूर्त्यै दुर्गायै च नमो नमः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।३०।१०-१४)

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