भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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उसकी बातें सुनकर राजाको बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने उन्हें बन्धनमुक्त कर दिया। अनेक प्रकारसे उन्हें अलंकृत कर भोजन कराया और वस्त्र, आभूषण आदि देकर उनका सम्मान किया। साधु वणिकने कहा—‘राजन्! मैंने कारागारमें अनेक कष्ट भोगे हैं, अब मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ, आप मुझे आज्ञा दें।’ इसपर राजाने अपने कोषाध्यक्षके माध्यमसे साधु वणिककी नौका रलों आदिसे परिपूर्ण करवा दी। फिर वह साधु वणिक अपने जामाताके साथ राजाद्वारा सम्मानित हो द्विगुणित धन लेकर रत्नपुरकी ओर चला।
साधु वणिकने अपने नगरके लिये प्रस्थान किया, पर भगवान् सत्यनारायणका पूजन वह उस समय भी भूल गया। भगवान् सत्यदेवने जो कलियुगमें तत्काल फल देते हैं, पुनः तपस्वीका रूप धारणकर वहाँ आकर उससे पूछा—‘साधो! तुम्हारी इस नौकामें क्या है?’ इसपर साधु वणिकने उत्तर दिया—‘आपको देनेके लिये कुछ भी धन मेरे पास नहीं है। नावमें केवल कुछ लताओंके पत्ते भरे पड़े हैं।’ साधु वणिकके ऐसा कहनेपर तपस्वीने कहा—‘ऐसा ही होगा।’ इतना कहकर तपस्वी अन्तर्धान हो गये। उनके ऐसा कहते ही नौकामें धनके बदले केवल पत्ते ही दीखने लगे। यह सब देखकर साधु अत्यन्त चकित एवं चिन्तित हो गया, उसे मूच्छा-सी आ गयी। वह अनेक प्रकारसे विलाप करने लगा। वज्रपात होनेके समान वह स्तब्ध होकर सोचने लगा कि मैं अब क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा धन कहाँ चला गया? जामाताके समझाने-बुझानेपर इसे तपस्वीका शाप समझकर वह पुनः उन्हीं तपस्वीकी शरणमें गया और गलेमें कपड़ा लपेटकर उन तपस्वीको प्रणाम कर कहा—‘महाभाग! आप कौन हैं? कोई गन्धर्व हैं या देवता हैं अथवा साक्षात् परमात्मा हैं?’
प्रभो! मैं आपकी महिमाको लेशमात्र भी नहीं जानता। आप मेरे अपराधोंको क्षमा कर दें और मेरी नौकाके धनको पुनः पूर्ववत् कर दें।’ इसपर तपस्वीरूप भगवान् सत्यनारायणने कहा कि तुमने चन्द्रचूड राजाके सत्यनारायणके मण्डपमें ‘संततिके प्राप्त होनेपर भगवान् सत्यदेवकी पूजा करूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा की थी। तुम्हें कन्या प्राप्त हुई, उसका विवाह भी तुमने किया, व्यापारसे धन भी प्राप्त किया, बंदी-गृहसे तुम मुक्त भी हो गये, पर तुमने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा कभी नहीं की। इससे मिथ्याभाषण, प्रतिज्ञालोप और देवताकी अवज्ञा आदि अनेक दोष हुए, तुम भगवान्का स्मरणतक भी नहीं करते। इसी कारण है मूढ़! तुम कष्ट भोग रहे हो। सत्यनारायणभगवान् सर्वव्यापी हैं, वे सभी फलोंको देनेवाले हैं। उनका अनादर कर तुम कैसे सुख प्राप्त कर सकते हो। तुम भगवान्को याद करो, उनका स्मरण करो। इसपर साधु वणिकको भगवान् सत्यनारायणका स्मरण हो आया और वह पश्चाताप करने लगा। उसके देखते-ही-देखते वहाँ वे तपस्वी भगवान् सत्यनारायणरूपमें परिवर्तित हो गये और तब वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—
‘सत्यस्वरूप, सत्यसंध, सत्यनारायण भगवान् हरिको नमस्कार है। जिस सत्यसे जगत्की प्रतिष्ठा है, उस सत्यस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है। भगवन्! आपकी मायासे मोहित होनेके कारण मनुष्य आपके स्वरूपको जान नहीं पाता और इस दुःखरूपी संसार-समुद्रको सुख मानकर उसीमें लिस रहता है। धनके गर्वसे मैं मूढ़ होकर मदान्धकारसे कर्तव्य और अकर्तव्यकी दृष्टिसे शून्य हो गया। मैं अपने कल्याणको भी नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरे दौरात्म्य-भावके लिये आप क्षमा करें। हे तपोनिधे! आपको नमस्कार है। कृपासागर! आप
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३२२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुझे अपने चरणोंका दास बना लें, जिससे मुझे आपके चरण-कमलोंका नित्य स्मरण होता रहे*।'
इस प्रकार स्तुति कर उस साधु वणिकने एक लाख मुद्रासे पुरोहितके द्वारा घर आकर सत्यनारायणकी पूजा करनेके लिये प्रतिज्ञा की। इसपर भगवानने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम पुत्र-पौत्रसे समन्वित होकर श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर मेरे सत्यलोकको प्राप्त करोगे और मेरे साथ आनन्द प्राप्त करोगे।' यह कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्हित हो गये और साधुने पुनः अपनी यात्रा प्रारम्भ की।
सत्यदेवभगवान्से रक्षित हो वह साधु वणिक एक सप्ताहमें नगरके समीप पहुँच गया और उसने अपने आगमनका समाचार देनेके लिये घरपर दूत भेजा। दूतने घर आकर साधु वणिककी स्त्री लीलावतीसे कहा—'जामाताके साथ सफलमनोरथ साधु वणिक आ रहे हैं।' वह साध्वी लीलावती कन्याके साथ सत्यनारायणभगवान्की पूजा कर रही थी। पतिके आगमनको सुनकर उसने पूजा वहींपर छोड़ दी और पूजाका शेष दायित्व अपनी पुत्रीको सौंपकर वह शीघ्रतासे नौकाके समीप चली आयी। इधर कलावती भी अपनी सखियोंके साथ सत्यनारायणकी जैसे-तैसे पूजा समाप्त कर बिना प्रसाद लिये ही अपने पतिको देखनेके लिये उतावली हो नौकाकी ओर चली गयी।
भगवान् सत्यनारायणके प्रसादके अपमानसे जामातासहित साधु वणिककी नौका जलके मध्य अलक्षित हो गयी। यह देखकर सभी दुःखमें निमग्न हो गये। साधु वणिक भी मूर्च्छित हो
गया। कलावती भी यह देखकर मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी और उसका सारा शरीर आँसुओंसे भीग गया। वह हवाके वेगसे हिलते हुए कैलेके पत्तेके समान काँपने लगी। हा नाथ! हा कान्त! कहकर विलाप करने लगी और कहने लगी—'हे विधाता! आपने मुझे पतिते वियुक्त कर मेरी आशा तोड़ दी। पतिके बिना स्त्रीका जीवन अधूरा एवं निष्फल है।' कलावती आर्तस्वरमें भगवान् सत्यनारायणसे बोली—'हे सत्यसिन्धो! हे भगवान् सत्यनारायण! मैं अपने पतिके वियोगमें जलमें डूबनेवाली हूँ, आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। पतिको प्रकट कर मेरे प्राणोंकी रक्षा करें।' (इस प्रकार जब वह अपने पतिके पादुकाओंको लेकर जलमें प्रवेश करनेवाली ही थी) उसी समय आकाशवाणी हुई—'हे साधो! तुम्हारी पुत्रीने मेरे प्रसादका अपमान किया है। यदि वह पुनः घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसादको ग्रहण कर ले तो उसका पति नौकासहित यहाँ अवश्य दीखेगा, चिन्ता मत करो।' इसपर आश्चर्यचकित हो कलावतीने वैसा ही किया और उसे उसका पति पुनः अपनी नौकासहित दीखने लगा। फिर क्या था? सभी परस्पर आनन्दसे मिले और घर आकर साधु वणिकने एक लाख मुद्राओंसे बड़े समारोहपूर्वक भगवान् सत्यदेवकी पूजा की और आनन्दसे रहने लगा। पुनः कभी भगवान् सत्यदेवकी उपेक्षा नहीं की। उस व्रतके प्रभावसे पुत्र-पौत्रसमन्वित अनेक भोगोंका उपभोग करते हुए सभी स्वर्गलोक चले गये। इस इतिहासको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी विष्युका
- सत्यरूपं सत्यसन्मं सत्यनारायणं हरिम् । यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम् ॥ त्वन्मायामोहितात्मानो न पश्यन्त्यात्मनः शुभम् । दुःखाम्भोधी सदा मग्न दुःखे च सुखमानिनः ॥ मूढोऽहं धनगर्वेण मदान्धीकृतलोचनः । न जाने स्वात्मनः क्षेत्रं कथं पश्यामि मूढधीः ॥ क्षमस्व मम दौरात्यं तपोधाम्ने हरे नमः । आज्ञापयात्मादस्य मे येन ते चरणौ स्मरे ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।२९।४८-५९)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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अत्यन्त प्रिय हो जाता है। अपनी मनःकामनाकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
सूतजी बोले—ऋषिगणो! मैंने सभी व्रतोंमें
श्रेष्ठ इस सत्यनारायणव्रतको कहा। ब्राह्मणके मुखसे निकला हुआ यह व्रत कलिकालमें अतिशय पुण्यप्रद है। (अध्याय २९)
[ श्रीसत्यनारायणव्रत-कथाका षष्ठ अध्याय ]
( सत्यनारायणव्रत-कथा सम्पूर्ण )
पितृशर्मा और उनके वंशज—व्याडि, पाणिनि और वररुचि आदिकी कथा
ऋषियोंने कहा—भगवन्! तीनों दुःखोंके विनाश करनेवाले व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यनारायणव्रतको हमलोगोंने सुना, अब आपसे हमलोग ब्रह्मचर्यका महत्त्व सुनना चाहते हैं।
सूतजी बोले—ऋषियो! कलियुगमें पितृशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था। वह वेदवेदाङ्गोंके तत्त्वोंको जाननेवाला था और पापकर्मोंसे डरता रहता था। कलियुगके भयंकर समयको देखकर वह बहुत चिन्तित हुआ। उसने सोचा कि किस आश्रमके द्वारा मेरा कल्याण होगा, क्योंकि कलिकालमें संन्यास-मार्ग दम्भ और पाखण्डके द्वारा खण्डित हो गया है, वानप्रस्थ तो समाप्त-सा ही है, बस, कहीं-कहीं ब्रह्मचर्य रह गया है, किंतु गार्हस्थ्य-जीवनका कर्म सभी कर्मोंमें श्रेष्ठ माना गया है। अतः इस घोर कलियुगमें मुझे गृहस्थ-धर्मका पालन करनेके लिये विवाह करना चाहिये। यदि भाग्यसे अपनी मनोवृत्तिके अनुसार आचरण करनेवाली स्त्री मिल जाती है, तब मेरा जन्म सफल एवं कल्याणकारी हो जायगा। इस प्रकार विचार करते हुए पितृशर्मोंने उत्तम पत्नी प्राप्त करनेके लिये विश्वेश्वरी जगन्माता भगवतीकी चन्दन आदिसे पूजा कर स्तुति प्रारम्भ की*।
पितृशर्माकी स्तुति सुनकर देवी प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारी स्त्रीके रूपमें विष्णुयशा नामक ब्राह्मणकी कन्याको निर्दिष्ट किया है।’ तदनन्तर पितृशर्मा उस देवी ब्रह्मचारिणीसे विवाह करके मथुरामें निवास करते हुए गृहस्थ-धर्मानुसार जीवन-यापन करने लगा। चारों वेदोंको जाननेवाले उसे चार पुत्र उत्पन्न हुए। जिनके नाम थे—ऋक्, यजुष्, साम तथा अथर्व। ऋक्के पुत्र व्याडि थे, जो न्याय-शास्त्र-विशारद थे। यजुष्के पुत्र लोकविश्रुत मीमांस हुए। सामके पुत्र पाणिनि हुए जो व्याकरण-शास्त्रमें पारंगत थे और अथर्वके पुत्र वररुचि हुए।
एक समय वे चारों पितृशर्माके साथ मगध देशके अधिपति राजा चन्द्रगुप्तकी सभामें गये। अतिशय सम्मानपूर्वक राजाने उन लोगोंका पूजन कर पूछा—‘द्विजगण! कौन-सा ब्रह्मचर्यव्रत श्रेष्ठ है?’ इसपर व्याडिने कहा—‘महाराज! जो व्यक्ति उस परम पुरुषदेवकी न्यायपूर्वक आराधनामें तत्पर रहता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मचारी है।’ मीमांसने कहा—‘राजन्! जो श्रेष्ठ व्यक्ति यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवताओंका यजन करता है और रोचना आदिसे उनका अर्चन एवं तर्पण आदि करता है तथा
- नमः प्रकृत्यै सर्वायै कैवल्यायै नमो नमः । त्रिगुणैक्यस्वरूपायै तुरीयायै नमो नमः ॥ महतत्त्वजनन्यै च द्रुहृकत्र्यै नमो नमः । ब्रह्मातर्नमस्तुभ्यै साहकारपितामहि ॥ पृथगुणायै शुद्धायै नमो मातर्नमो नमः । विद्यायै शुद्धसत्त्वायै लक्ष्यै सत्वरजोमयि ॥ नमो मातरविद्यायै ततः शुद्ध्यै नमो नमः । काल्यै सत्त्वतमोभूत्यै नमो मातर्नमो नमः ॥ स्त्रियै शुद्धरजोमूर्त्यै नमस्त्रैलोक्यवासिनि । नमो रजस्तमोमूर्त्यै दुर्गायै च नमो नमः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।३०।१०-१४)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भगवान् के प्रसादको ग्रहण करता है, वह ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर पाणिनिने कहा—'राजन्! उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरोंसे या परा, पश्यन्ती, मध्यमा वाणीसे शब्दब्रह्मका आराधक तथा लिङ्ग, धातु एवं गणोंसे समन्वित सूत्रपाठोंसे शब्दब्रह्मकी आराधना करनेवाला सच्चा ब्रह्मचारी है और वही ब्रह्मको प्राप्त करता है।' यह सुनकर वररुचिने कहा—'हे मगधाधिपते! जो व्यक्ति उपनीत होकर गुरुकुलमें निवास करता हुआ दण्ड, केश और नखधारी भिक्षार्थी वेदाध्ययनमें तत्पर रहते हुए गुरुकी आज्ञाके अनुसार गुरुके गृहमें निवास करता है, वह ब्रह्मचारी कहा गया है।'
इनके वचनोंको सुनकर पितृशर्मा ने कहा कि
'जो गृहस्थ-धर्ममें रहता हुआ पितरों, देवताओं और अतिथियोंका सम्मान करता है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक ऋतुकालमें ही भार्याका उपगमन करता है, वही मुख्य ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर राजाने कहा—'स्वामिन्! कलिकालके लिये आपका ही कथन उचित, सुगम और उत्तम धर्म है, यही मेरा भी मत है।'
यह कहकर वह राजा पितृशर्माका शिष्य हो गया और उसने अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त किया। पितृशर्मा भी भगवान् श्रीहरिका ध्यान करते हुए हिमालय पर्वतपर जाकर योगध्यानपरायण हो गया।
(अध्याय ३०)
महर्षि पाणिनिका इतिवृत्त
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! सभी तीर्थों, दानों आदि धर्मसाधनोंमें उत्तम साधन क्या है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य क्लेश-सागरको पार कर जाय और मुक्ति प्राप्त कर ले?
सूतजी बोले—प्राचीन कालमें सामके एक श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनका नाम पाणिनि था। कणादके श्रेष्ठ शास्त्रज्ञ शिष्योंसे वे पराजित एवं लज्जित होकर तीर्थटनके लिये चले गये। प्रायः सभी तीर्थोंमें स्नान तथा देवता-पितरोंका तर्पण करते हुए वे केदार-क्षेत्रका जल पानकर भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर हो गये। पत्तोंके आहारपर रहते हुए वे सप्ताहान्तमें जल ग्रहण करते थे। फिर उन्होंने दस दिनतक जल ही ग्रहण किया। बादमें वे दस दिनोंतक केवल वायुके ही आहारपर रहकर भगवान् शिवका ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब अट्टाईस दिन व्यतीत हो गये तो भगवान् शिवने प्रकट
होकर उनसे वर माँगनेको कहा। भगवान् शिवकी इस अमृतमय वाणीको सुनकर उन्होंने गद्गद् वाणीसे सर्वेश्वर, सर्वलिङ्गेश्वर, गिरिजावल्लभ हरकी इस प्रकार स्तुति की—
'महान् रुद्रको नमस्कार है। सर्वेश्वर सर्वहितकारी भगवान् शिवको नमस्कार है। अभय एवं विद्या प्रदान करनेवाले, नन्दीवाहन भगवान् को नमस्कार है। पापका विनाश करनेवाले तथा समस्त लोकोंके स्वामी एवं समस्त मायारूपी दुःखोंका हरण करनेवाले तेजःस्वरूप अनन्तमूर्ति भगवान् शंकरको नमस्कार है*।' देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे मूल विद्या एवं परम शास्त्र-ज्ञान प्रदान करनेकी कृपा करें।
सूतजी बोले—यह सुनकर महादेवजीने प्रसन्न होकर 'अ इ उ ण्' आदि मङ्गलकारी सर्ववर्णमय सूत्रोंको उन्हें प्रदान किया। ज्ञानरूपी सरोवरके
- नमो रुद्राय महते सर्वशाय हितैषिणे । नन्दीसंस्थाय देवाय विद्याभयकराय च ॥
पापान्तकाय भार्याय नमोऽनन्ताय वैधसे । नमो मायाहरेणाय नमस्ते लोकशंकर ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।३१।७-८)
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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सत्यरूपी जलसे जो राग-द्वेषरूपी मलका नाश करनेवाला है, उस मानसतीर्थको प्राप्त करनेपर अर्थात् उस मानसतीर्थमें अवगाहन करनेपर सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। यह महान् मानस-ज्ञान-तीर्थ ब्रह्मके साक्षात्कार करानेमें समर्थ है। पाणिने ! मैंने यह सर्वोत्तम तीर्थ तुम्हें प्रदान किया है, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे। यह कहकर भगवान् रुद्र अन्तर्हित हो गये और पाणिनि अपने
घरपर आ गये। पाणिनिने सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ और लिङ्गसूत्र-रूप व्याकरण शास्त्रका निर्माण कर परम निर्वाण प्राप्त किया*। अतः भार्गवश्रेष्ठ ! तुम मनोमय ज्ञानतीर्थका अवलम्बन करो। उन्हींसे कल्याणमयी सर्वोत्तम तीर्थमयी गङ्गा प्रकट हुई हैं। गङ्गासे बढ़कर उत्तम तीर्थ न कोई हुआ है और न आगे होगा।
(अध्याय ३१)
बोपदेवके चरित्र-प्रसंगमें श्रीमद्भागवत-माहात्म्य
सूतजी बोले—महामुने शौनक ! तोताद्रिमें एक बोपदेव नामके ब्राह्मण रहते थे। वे कृष्णभक्त और वेद-वेदाङ्गपारंगत थे। उन्होंने गोप-गोपियोंसे प्रतिष्ठित वृन्दावन-तीर्थमें जाकर देवाधिदेव जनार्दनकी आराधना की। एक वर्ष बाद भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें अतिशय श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान किया। उसी ज्ञानके द्वारा उनके हृदयमें भागवती कथाका उदय हुआ। जिस कथाको श्रीशुकदेवजीने बुद्धिमान् राजा परीक्षितको सुनाया था, उस सनातनी मोक्ष-स्वरूपा कथाका बोपदेवने हरि-लीलामृत नामसे पुनः वर्णन किया। कथाकी समाप्तिपर जनार्दन भगवान् विष्णु प्रकट हुए और बोले 'महामते ! वर माँगो।' बोपदेवने अतिशय स्नेहमयी वाणीमें कहा—'भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण संसारपर अनुग्रह करनेवाले हैं। आपसे देव, मनुष्य, पशु-पक्षी सभी निर्मित हुए हैं। नरकसे दुःखी प्राणी भी इस कलियुगमें आपके ही नामसे कृतार्थ होते हैं। महर्षि वेदव्यासरचित श्रीमद्भागवतका ज्ञान तो आपने मुझे प्रदान किया है, पुनः यदि आप वर प्रदान करना चाहते हैं तो
उस भागवतका माहात्म्य मुझसे कहें।'
श्रीभगवान् बोले—बोपदेव ! एक समय भगवान् शंकर पार्वतीके साथ दम्भ और पाखण्डसे युक्त बौद्धोंके राज्य प्राप्त होनेपर काशीमें उत्तम भूमि देखकर वहाँ स्थित हो गये। भगवान् शंकरने आनन्दपूर्वक प्रणाम करते हुए कहा—'हे सच्चिदानन्द ! हे विभो ! हे जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले ! आपकी जय हो।' इस प्रकारकी वाणी सुनकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे पूछा—'भगवन् ! आपके समान दूसरा अन्य देवता कौन है जिसे आपने प्रणाम किया।' इसपर भगवान् शिवने कहा—'महादेवि ! यह काशी परम पवित्र क्षेत्र है, यह स्वयं सनातन ब्रह्मस्वरूप है, यह प्रणाम करने योग्य है। यहाँ मैं ससाह-यज्ञ (भागवत-ससाह-यज्ञ) करूँगा।' उस यज्ञ-स्थलकी रक्षाके लिये भगवान् शंकरने चण्डीश, गणेश, नन्दी तथा गुह्यकोंको स्थापित किया और स्वयं ध्यानमें स्थित होकर माता पार्वतीसे सात दिनतक भागवती कथा कहते रहे। आठवें दिन पार्वतीको सोते देखकर उन्होंने पूछा कि 'तुमने कितनी कथा
- सूत्रपाठ धातुपाठ गणपाठ तथैव च। लिङ्गसूत्र तथा कृत्वा परं निर्वाणमाप्तवान्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३१।१३-१४)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सुनी।' उन्होंने कहा—'देव! मैंने अमृत-मन्थनपर्यन्त विष्णुचरित्रका श्रवण किया।' इसी कथाको वहीं वृक्षके कोटरमें स्थित शुकरूपी शुकदेव सुन रहे थे। अमृत-कथाके श्रवणसे वे अमर हो गये। मेरी इस आज्ञासे वह शुक् साक्षात् तुम्हारे हृदयमें स्थित है। बौपदेव! तुमने इस दुर्लभ भागवत-माहात्म्यको मेरे द्वारा प्राप्त किया है। अब तुम
जाकर राजा विक्रमके पिता गन्धर्वसेनको नर्मदाके तटपर इसे सुनाओ। हरि-माहात्म्यका दान करना सभी दानोंमें उत्तम दान है। इसे विष्णुभक्त बुद्धिमान् सत्पात्रको ही सुनाना चाहिये। भूखेको अन्न-दान करना भी इसके समान दान नहीं है। यह कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्हित हो गये और बौपदेव बहुत प्रसन्न हो गये। (अध्याय ३२)
श्रीदुर्गासप्तशतीके आदिचरित्रका माहात्म्य
(व्याधकर्मकी कथा)
ऋषियोंने पूछा —सूतजी महाराज! अब आप हमलोगोंको यह बतलानेकी कृपा करें कि किस स्तोत्रके पाठ करनेसे वेदोंके पाठ करनेका फल प्राप्त होता है और पाप विनष्ट होते हैं।
सूतजी बोले —ऋषियो! इस विषयमें आप एक कथा सुनें। राजा विक्रमादित्यके राज्यमें एक ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्रीका नाम था कामिनी। एक बार वह ब्राह्मण श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ करनेके लिये अन्यत्र गया हुआ था। इधर उसकी स्त्री कामिनी जो अपने नामके अनुरूप कर्म करनेवाली थी, पतिके न रहनेपर निन्दित कर्ममें प्रवृत्त हो गयी। फलतः उसे एक निन्द्य पुत्र उत्पन्न हुआ, जो व्याधकर्म नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह भी अपने नामके अनुरूप कर्म करनेवाला था, धूर्त था तथा वेद-पाठसे रहित था। उस ब्राह्मणने अपनी स्त्री एवं पुत्रके निन्दित कर्म और पापमय आचरणको देखकर उन दोनोंको घरसे निकाल दिया तथा स्वयं धर्ममें तत्पर रहते हुए विन्ध्याचल पर्वतपर प्रतिदिन चण्डीपाठ करने लगा। जगदम्बाके अनुग्रहसे अन्तमें वह जीवन्मुक्त हो गया।
इधर वे दोनों माता-पुत्र (कामिनी और
व्याधकर्म) पूर्वपरिचित निषादके पास चले गये और वहीं निवास करने लगे। वहाँ भी वे दोनों अपने निन्दित आचरणको छोड़ न सके और इन्हीं बुरे कर्मोंसे धन-संग्रह करने लगे। व्याधकर्म चौर्य-कर्ममें प्रवृत्त हो गया। ऐसे ही भ्रमण करते हुए दैवयोगसे एक दिन वह व्याधकर्म देवीके मन्दिरमें पहुँचा। वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ कर रहे थे। दुर्गापाठके आदिचरित्र (प्रथम चरित्र)-के किंचित् पाठमात्रके श्रवणसे उसकी दुष्टबुद्धि धर्ममय हो गयी। फलतः धर्मबुद्धिसम्पन्न उस व्याधकर्मने उस श्रेष्ठ विप्रका शिष्यत्त्व ग्रहण कर लिया और अपना सारा धन उन्हें दे दिया। गुरुकी आज्ञासे उसने देवीके मन्त्रका जप किया। बीजमन्त्रके प्रभावसे उसके शरीरसे पापसमूह कृमिके रूपमें निकल गये। तीन वर्षतक इस प्रकार जप करते हुए वह निष्पाप श्रेष्ठ द्विज हो गया। इसी प्रकार मन्त्र-जप और आदिचरित्रका पाठ करते हुए उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये। तदनन्तर वह द्विज काशीमें चला आया। मुनि एवं देवोंसे पूजित महादेवी अन्नपूर्णाका उसने रोचनादि उपचारोंके द्वारा पूजन किया और
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- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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उनकी इस प्रकार स्तुति की—
नित्यानन्दकरी पराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूतारिखिलपापपावनकरी काशीपुराधीश्वरी ।
नानालोककरी महाभयहरी विश्वम्भरी सुन्दरी
विद्यां देहिकृपावलम्बनकरी मातात्रपूर्णाश्वरी * ॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३३।२१)
इस स्तुतिका एक सौ आठ बार जपकर ध्यानमें नेत्रोंको बंदकर वह वहीँ सो गया। स्वप्नमें उसके सम्मुख अन्नपूर्णा शिवा उपस्थित हुई और
उसे ऋग्वेदका ज्ञान प्रदान कर अन्तर्हित हो गयीं। बादमें वह बुद्धिमान् ब्राह्मण श्रेष्ठ विद्या प्राप्तकर राजा विक्रमादित्यके यज्ञका आचार्य हुआ। यज्ञके बाद योग धारणकर हिमालय चला गया।
हे विप्रो! मैंने आपलोगोंको देवीके पुण्यमय आदिचरित्रके माहात्म्यको बतलाया, जिसके प्रभावसे उस व्याधकर्माने ब्राह्मीभाव प्राप्तकर परमोत्तम सिद्धिको प्राप्त कर लिया था।
(अध्याय ३३)
श्रीदुर्गासप्तशतीके मध्यमचरित्रका माहात्म्य
(कात्यायन तथा मगधके राजा महानन्दकी कथा)
सूतजी बोले—शौनक! उज्जयिनी नगरीमें एक हिंसापरायण मद्य-मांस-भक्षी भीमवर्मा नामका क्षत्रिय रहता था। वह अतिशय हिंसा एवं अधर्माचरणके कारण भयंकर व्याधियोंसे ग्रस्त हो गया और युवावस्थामें ही उसकी मृत्यु हो गयी। संयोगवश उसने कभी चण्डीपाठ भी कराया था। जिसके पुण्यके प्रभावसे इतना निकृष्ट पापी भी नरकमें नहीं गया। दूसरे जन्ममें वही राजनीतिपरायण मगधका विख्यात राजा महानन्द हुआ और उसे अपने पूर्वजन्मकी पूरी स्मृति थी। अतिशय समर्थ बुद्धिमान् कात्यायन (वररुचि)-का वह शिष्य हुआ। देवी महालक्ष्मीके बीजसहित मध्यमचरित्रका राजा महानन्दको उपदेश देकर कात्यायन स्वयं
विन्ध्यपर्वतपर शक्ति-उपासनाके लिये चले गये। इधर राजा भी प्रतिदिन महालक्ष्मीकी कस्तूरी, चन्दन आदिसे पूजा कर श्रीदुर्गासप्तशतीके मध्यम-चरित्रका पाठ करने लगा। बारह वर्ष व्यतीत होनेपर शक्तिकी उपासना करनेवाले कात्यायन पुनः अपने शिष्य महानन्दके पास आये और उन्होंने राजासे विधिपूर्वक लक्षचण्डीपाठ करवाया। फलस्वरूप सनातनी भगवती महालक्ष्मी प्रकट हुई और राजाको धर्म, अर्थ, कामसहित मोक्ष भी दे दिया। इस प्रकार महाभाग महानन्दने देवोंके समान अभीष्ट फलोंका उपभोग कर अन्तमें देवताओंसे नमस्कृत हो परम लोकको प्राप्त किया।
(अध्याय ३४)
- 'हे काशीपुरीकी अधीश्वरी अन्नपूर्णाश्वरी! आप नित्य आनन्ददायिनी हैं। शत्रुओंसे अभय प्रदान करनेवाली हैं तथा आप सौन्दर्यरत्नोंकी निधान और समस्त पापोंको नष्टकर पवित्र कर देनेवाली हैं। हे सुन्दरी! आप सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करनेवाली, महान्-महान् भयोंको दूर करनेवाली, विश्वका भरण-पोषण करनेवाली तथा सबके ऊपर अनुग्रह करनेवाली हैं। हे मातः! आप मुझे विद्या प्रदान करें।'
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
श्रीदुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमाके प्रसंगमें
योगाचार्य महर्षि पतञ्जलिका चरित्र
सूतजी बोले—अनेक धातुओंके द्वारा चित्रित रमणीय चित्रकूट पर्वतपर महाविद्वान् उपाध्याय पतञ्जलिमुनि रहते थे। वे वेद-वेदाङ्ग-तत्त्वज्ञ एवं गीता-शास्त्र-परायण थे। वे विष्णुके भक्त, सत्यवक्ता एवं व्याकरण-महाभाष्यके रचयिता भी माने गये हैं। एक समय वे शुद्धात्मा अन्य तीर्थोंमें गये। काशीमें उनका देवीभक्त कात्यायनके साथ शास्त्रार्थ हुआ। एक वर्षतक शास्त्रार्थ चलता रहा, अन्तमें पतञ्जलि पराजित हो गये। इससे लज्जित होकर उन्होंने सरस्वतीकी इस प्रकार आराधना की— नमो देव्यै महामूर्तयै सर्वमूर्तयै नमो नमः। शिवायै सर्वमाङ्गल्यै विष्णुमाये च ते नमः॥ त्वमेव श्रद्धा बुद्धिस्त्वं मेधा विद्या शिवंकरी। शान्तिवाणी त्वमेवासि नारायणि नमो नमः॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३५।५-६)
‘महामूर्ति देवीको नमस्कार है। सर्वमूर्तिस्वरूपिणीको नमस्कार है। सर्वमङ्गलस्वरूपा शिवादेवीको नमस्कार है। हे विष्णुमाये! तुम्हें नमस्कार है। हे नारायण! तुम्हीं श्रद्धा, बुद्धि, मेधा, विद्या तथा कल्याणकारिणी हो। तुम्हीं शान्ति हो, तुम्हीं वाणी हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।’
इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवती सरस्वतीने आकाशवाणीमें कहा—‘विप्रश्रेष्ठ! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरे उत्तरचरित्रका जप करो। उसके प्रभावसे तुम निश्चय ही ज्ञानको प्राप्त करोगे। पतञ्जले! कात्यायन तुमसे परास्त हो जायेंगे।’ देवीकी इस वाणीको सुनकर पतञ्जलिनै विन्ध्यवासिनीदेवीके मन्दिरमें जाकर सरस्वतीकी आराधना की और वे प्रसन्न हो गयीं। इससे उन्होंने पुनः शास्त्रार्थमें कात्यायनको पराजित कर दिया, बादमें उन्होंने कृष्ण-मन्त्र और भक्तिके प्रचारमें तुलसीमाला आदिका भी महत्त्व बढ़ाया। भगवती विष्णुमायाकी कृपासे वे योगाचार्य अत्यन्त चिरजीवी हो गये।
मुनियो! इस प्रकार दुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमा निरूपित हुई। अब आगे आपलोग क्या सुनना चाहते हैं, वह बतायें। सभीका कल्याण हो, कोई भी दुःख प्राप्त न करे। गरुडध्वज, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु मङ्गलमय हैं। भगवान् विष्णु मङ्गलमूर्ति हैं। जो व्यक्ति पवित्र होकर इस इतिहास-समुच्चयको प्रतिदिन सुनता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
(अध्याय ३५)
॥ प्रतिसर्गपर्व द्वितीय खण्ड सम्पूर्ण ॥
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
प्रतिसर्गपर्व
(तृतीय खण्ड)
[भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वका तीसरा खण्ड रामांश और कृष्णांश अर्थात् आल्हा और ऊदल (उदयसिंह)-के चरित्र तथा जयचन्द्र एवं पृथ्वीराज चौहानकी वीर-गाथाओंसे परिपूर्ण है। इधर भारतमें जगनिक भाटरचित आल्हाका वीरकाव्य बहुत प्रचलित है। इसके बुंदेलखण्डी, भोजपुरी आदि कई संस्करण हैं, जिनमें भाषाओंका थोड़ा-थोड़ा भेद है। इन कथाओंका मूल यह प्रतिसर्गपर्व ही प्रतीत होता है। इसीके आधारपर ये रचनाएँ प्रचलित हैं। प्रायः ये कथाएँ लोकरञ्जनके अनुसार अतिशयोक्तिपूर्ण-सी प्रतीत होती हैं, किंतु ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वकी भी हैं। यहाँ इनका सारमात्र प्रस्तुत किया गया है—सम्पादक]
आल्हा-खण्ड (आल्हा-ऊदलकी कथा)-का उपक्रम
ऋषियोंने पूछा—सूतजी महाराज! आपने महाराज विक्रमादित्यके इतिहासका वर्णन किया। द्वारपरयुगके समान उनका शासन धर्म एवं न्यायपूर्ण था और लम्बे समयतक इस पृथ्वीपर रहा। महाभाग! उस समय भगवान् श्रीकृष्णने अनेक लीलाएँ की थीं। आप उन लीलाओंका हमलोगोंसे वर्णन कीजिये, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं।
श्रीसूतजीने मङ्गल-स्मरणपूर्वक कहा— नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
(प्रतिसर्गपर्व ३।१।३)
‘भगवान् नर-नारायणके अवतारस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनके सखा नरश्रेष्ठ अर्जुन, उनकी लीलाओंको प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उनके चरित्रोंका वर्णन करनेवाले वेदव्यासको नमस्कारकर अष्टादश पुराण, रामायण और महाभारत आदि जय नामसे व्यपदिष्ट ग्रन्थोंका वाचन करना चाहिये।’
मुनिगणो! भविष्य नामक महाकल्पके वैवस्वत मन्वन्तरके अट्टाईसवें द्वारपरयुगके अन्तमें कुरुक्षेत्रका प्रसिद्ध महायुद्ध हुआ। उसमें युद्धकर दुरिभमानी सभी कौरवोंपर पाण्डवोंने अठारहवें दिन पूर्ण
विजय प्राप्त की। अन्तिम दिन भगवान् श्रीकृष्णने कालकी दुर्गतिको जानकर योगरूपी सनातन शिवजीकी मनसे इस प्रकार स्तुति की—
शान्तस्वरूपी, सब भूतोंके स्वामी, कपदी, कालकर्ता, जगद्भर्ता, पाप-विनाशक रुद्र! मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप मेरे भक्त पाण्डवोंकी रक्षा कीजिये।
इस स्तुतिको सुनकर भगवान् शंकर नन्दीपर आरूढ़ हो हाथमें त्रिशूल लिये पाण्डवोंके शिविरकी रक्षाके लिये आ गये। उस समय महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गये थे और पाण्डव सरस्वतीके किनारे रहते थे।
मध्यरात्रिमें अश्वत्थामा, भोज (कृतवर्मा) और कृपाचार्य—ये तीनों पाण्डव-शिविरके पास आये और उन्होंने मनसे भगवान् रुद्रकी स्तुति कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। इसपर भगवान् शंकरने उन्हें पाण्डव-शिविरमें प्रवेश करनेकी आज्ञा दे दी। बलवान् अश्वत्थामाने भगवान् शंकरद्वारा प्राप्त तलवारसे धृष्टद्युम्न आदि वीरोंकी हत्या कर दी, फिर वह कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ वापस चला गया। वहाँ एकमात्र पार्षद सूत ही बचा रहा, उसने इस जनसंहारकी सूचना पाण्डवोंको दी। भीम आदि
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३३०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पाण्डवोंने इसे शिवजीका ही कृत्य समझा; वे क्रोधसे तिलमिला गये और अपने आयुधोंसे देवाधिदेव पिनाकीसे युद्ध करने लगे। भीम आदिद्वारा प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र शिवजीके शरीरमें समाहित हो गये। इसपर भगवान् शिवने कहा कि तुम श्रीकृष्णके उपासक हो अतः हमारे द्वारा तुमलोग रक्षित हो, अन्यथा तुमलोग वधके योग्य थे। इस अपराधका फल तुम्हें कलियुगमें जन्म लेकर भोगना पड़ेगा। ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गये और पाण्डव बहुत दुःखी हुए। वे अपराधसे मुक्त होनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये। निःशस्त्र पाण्डवोंने श्रीकृष्णके साथ एकाग्र मनसे शंकरजीकी स्तुति की। इसपर भगवान् शंकरने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उनसे वर माँगनेको कहा।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— देव! पाण्डवोंके जो शस्त्रास्त्र आपके शरीरमें लीन हो गये हैं, उन्हें पाण्डवोंको वापस कर दीजिये और इन्हें शापसे भी मुक्त कर दीजिये।
श्रीशिवजीने कहा— श्रीकृष्णचन्द्र! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। उस समय मैं आपकी मायासे मोहित हो गया था। उस मायाके अधीन होकर मैंने यह शाप दे दिया। यद्यपि मेरा वचन तो मिथ्या नहीं होगा तथापि ये पाण्डव तथा कौरव अपने अंशोंसे कलियुगमें उत्पन्न होकर अंशतः अपने पापोंका फल भोगकर मुक्त हो जायेंगे।
युधिष्ठिर वत्सरजका पुत्र होगा, उसका नाम
बलखानि (मलखान) होगा, वह शिरीष नगरका अधिपति होगा। भीमका नाम वीरण होगा और वह वनरसका राजा होगा। अर्जुनके अंशसे जो जन्म लेगा, वह महान् बुद्धिमान् और मेरा भक्त होगा। उसका जन्म परिमलके यहाँ होगा और नाम होगा ब्रह्मानन्द। महाबलशाली नकुलका जन्म कान्यकुब्जमें रत्नभानुके पुत्रके रूपमें होगा और नाम होगा लक्षण। सहदेव भीमसिंहका पुत्र होगा और उसका नाम होगा देवसिंह। धृतराष्ट्रके अंशसे अजमेरमें पृथ्वीराज जन्म लेगा और द्रौपदी पृथ्वीराजकी कन्याके रूपमें वेला नामसे प्रसिद्ध होगी। महादानी कर्ण तारक नामसे जन्म लेगा। उस समय रक्तबीजके रूपमें पृथ्वीपर मेरा भी अवतार होगा। कौरव माया-युद्धमें निष्पात होंगे तथा पाण्डु-पक्षके योद्धा धार्मिक और बलशाली होंगे।
सूतजी बोले— ऋषियो! यह सब बातें सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराये और उन्होंने कहा 'मैं भी अपनी शक्ति-विशेषसे अवतार लेकर पाण्डवोंकी सहायता करूँगा। मायादेवीद्वारा निर्मित महावती नामकी पुरीमें देशराजके पुत्र-रूपमें मेरा अंश उत्पन्न होगा, जो उदयसिंह (ऊदल) कहलायेगा, वह देवकीके गर्भसे उत्पन्न होगा। मेरे वैकुण्ठधामका अंश आह्लाद नामसे जन्म लेगा, वह मेरा गुरु होगा। अग्रिवंशसे उत्पन्न राजाओंका विनाश कर मैं (श्रीकृष्ण—उदयसिंह) धर्मकी स्थापना करूँगा।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर शिवजी अन्तर्हित हो गये।
राजा शालिवाहन तथा ईशामसीहकी कथा
सूतजीने कहा— ऋषियो! प्रातःकालमें पुत्रशोकसे पीड़ित सभी पाण्डव प्रेतकार्य कर पितामह भीष्मके पास आये। उनसे उन्होंने राजधर्म, मोक्षधर्म और दानधर्मोंके स्वरूपको अलग-अलग रूपसे भलीभाँति समझा। तदनन्तर उन्होंने
उत्तम आचरणोंसे तीन अक्षमेध-यज्ञ किये। पाण्डवोंने छत्तीस वर्षतक राज्य किया और अन्तमें वे स्वर्ग चले गये। कलिधर्मकी वृद्धि होनेपर वे भी अपने अंशसे उत्पन्न होंगे।
अब आप सब मुनिगण अपने-अपने स्थानको
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- प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड *
३३१
पथारें। मैं योगनिद्राके वशीभूत हो रहा हूँ, अब मैं समाधिस्थ होकर गुणातीत परब्रह्मका ध्यान करूँगा। यह सुनकर नैमिषारण्यवासी मुनिगण यौगिक सिद्धिका अवलम्बन कर आत्मसामीप्यमें स्थित हो गये। दीर्घकाल व्यतीत होनेपर शौनकादि मुनि ध्यानसे उठकर पुनः सूतजीके पास पहुँचे।
मुनियोंने पूछा—सूतजी महाराज! विक्रमाख्यानका तथा द्वापरमें शिवकी आज्ञासे होनेवाले राजाओंका आप वर्णन कीजिये।
सूतजी बोले—मुनियो! विक्रमादित्यके स्वर्गलोक चले जानेके बाद बहुतसे राजा हुए। पूर्वमें कपिल स्थानसे पश्चिममें सिन्धु नदीतक, उत्तरमें बदरीक्षेत्रसे दक्षिणमें सेतुबन्धतककी सीमावाले भारतवर्षमें उस समय अठारह राज्य या प्रदेश थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रप्रस्थ, पाञ्चाल, कुरुक्षेत्र, कम्पिल, अन्तर्वेदी, ब्रज, अजमेर, मरुधन्व (मारवाड़), गुर्जर (गुजरात), महाराष्ट्र, द्रविड़ (तमिलनाडु), कलिंग (उड़ीसा), अवन्ती (उज्जैन), उडुप (आन्ध्र), बंग, गौड़, मागध तथा कौशल्य। इन राज्योंपर अलग-अलग राजाओंने शासन किया। वहाँकी भाषाएँ भिन्न-भिन्न रहीं और समय-समयपर विभिन्न धर्म-प्रचारक भी हुए। एक सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर धर्मका विनाश सुनकर शक आदि विदेशी राजा अनेक लोगोंके साथ सिन्धु नदीको पारकर आर्यदेशमें आये और कुछ लोग हिमालयके हिममार्गसे यहाँ आये। उन्होंने आर्योंको जीतकर उनका धन लूट लिया और अपने देशमें लौट गये। इसी समय विक्रमादित्यका पौत्र राजा शालिवाहन पिताके सिंहासनपर आसीन हुआ। उसने शक, चीन आदि देशोंकी सेनापर विजय पायी। बाह्लीक, कामरूप, रोम तथा खुर देशमें उत्पन्न हुए दुष्टोंको पकड़कर उन्हें कठोर दण्ड दिया और उनका सारा कोष
छीन लिया। उसने म्लेच्छों तथा आर्योंकी अलग-अलग देश-मर्यादा स्थापित की। सिन्धु-प्रदेशको आर्योंका उत्तम स्थान निर्धारित किया और म्लेच्छोंके लिये सिन्धुके उस पारका प्रदेश नियत किया।
एक समयकी बात है, वह शकाधीश शालिवाहन हिमशिखरपर गया। उसने हूण देशके मध्य स्थित पर्वतपर एक सुन्दर पुरुषको देखा। उसका शरीर गोरा था और वह श्वेत वस्त्र धारण किये था। उस व्यक्तिको देखकर शकराजने प्रसन्नतासे पूछा—‘आप कौन हैं?’ उसने कहा—‘मैं ईशपुत्र हूँ और कुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ। मैं म्लेच्छ-धर्मका प्रचारक और सत्य-व्रतमें स्थित हूँ।’ राजाने पूछा—‘आपका कौन-सा धर्म है?’
ईशपुत्रने कहा—महाराज! सत्यका विनाश हो जानेपर मर्यादारहित म्लेच्छ-प्रदेशमें मैं मसीह बनकर आया और दस्युओंके मध्य भयंकर ईशामसी नामसे एक कन्या उत्पन्न हुई। उसीको म्लेच्छोंसे प्राप्त कर मैंने मसीहत्व प्राप्त किया। मैंने म्लेच्छोंमें जिस धर्मकी स्थापना की है, उसे सुनिये—
‘सबसे पहले मानस और दैहिक मलको निकालकर शरीरको पूर्णतः निर्मल कर लेना चाहिये। फिर इष्ट देवताका जप करना चाहिये। सत्य वाणी बोलनी चाहिये, न्यायसे चलना चाहिये और मनको एकाग्र कर सूर्यमण्डलमें स्थित परमात्माकी पूजा करनी चाहिये, क्योंकि ईश्वर और सूर्यमें समानता है। परमात्मा भी अचल हैं और सूर्य भी अचल हैं। सूर्य अनित्य भूतोंके सारका चारों ओरसे आकर्षण करते हैं। हे भूपाल! ऐसे कृत्यसे वह मसीहा विलीन हो गयी, पर मेरे हृदयमें नित्य विशुद्ध कल्याणकारिणी ईश-मूर्ति प्राप्त हुई है। इसलिये मेरा नाम ईशामसीह प्रतिष्ठित हुआ।’
यह सुनकर राजा शालिवाहने उस म्लेच्छ-
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३३२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पूज्यको प्रणाम किया और उसे दारुण म्लेच्छ-स्थानमें प्रतिष्ठित किया तथा अपने राज्यमें आकर
उस राजाने अश्वमेध-यज्ञ किया और साठ वर्षतक राज्य करके स्वर्गलोक चला गया।
राजा भोज और महामदकी कथा
सूतजीने कहा—ऋषियो! शालिवाहनके वंशमें दस राजा हुए। उन्होंने पाँच सौ वर्षतक शासन किया और स्वर्गवासी हुए। तदनन्तर भूमण्डलपर धर्म-मर्यादा लुप्त होने लगी। शालिवाहनके वंशमें अन्तिम दसवें राजा भोजराज हुए। उन्होंने देशकी मर्यादा क्षीण होती देख दिग्विजयके लिये प्रस्थान किया। उनकी सेना दस हजार थी और उनके साथ कालिदास एवं अन्य विद्वान् ब्राह्मण भी थे। उन्होंने सिन्धु नदीको पार करके गान्धार, म्लेच्छ और काश्मीरके शठ राजाओंको परास्त किया तथा उनका कोष छीनकर उन्हें दण्डित किया। उसी प्रसंगमें आचार्य एवं शिष्यमण्डलके साथ म्लेच्छ महामद नामका व्यक्ति उपस्थित हुआ। राजा भोजने मरुस्थलमें विद्यमान महादेवजीका दर्शन किया। महादेवजीको पञ्चगव्यमिश्रित गङ्गजलसे स्नान कराकर चन्दन आदिसे भक्तिभावपूर्वक उनका पूजन किया और उनकी स्तुति की।
भोजराजने कहा—हे मरुस्थलमें निवास करनेवाले तथा म्लेच्छोंसे गुप्त शुद्ध सच्चिदानन्द-स्वरूपवाले गिरिजापते! आप त्रिपुरासुरके विनाशक तथा नानाविध मायाशक्तिके प्रवर्तक हैं। मैं आपकी
शरणमें आया हूँ, आप मुझे अपना दास समझें। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। इस स्तुतिको सुनकर भगवान् शिवने राजासे कहा—
‘हे भोजराज! तुम्हें महाकालेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। यह वाह्नीक नामकी भूमि है, पर अब म्लेच्छोंसे दूषित हो गयी है। इस दारुण प्रदेशमें आर्य-धर्म है ही नहीं। महामायावी त्रिपुरासुर यहाँ दैत्यराज बलिद्वारा प्रेषित किया गया है। मेरे द्वारा वरदान प्राप्त कर वह दैत्य-समुदायको बद्ध रहा है। वह अयोनिज है। उसका नाम महामद है। राजन्! तुम्हें इस अनार्य देशमें नहीं आना चाहिये। मेरी कृपासे तुम विशुद्ध हो।’ भगवान् शिवके इन वचनोंको सुनकर राजा भोज सेनाके साथ अपने देशमें वापस चला आया।
राजा भोजने द्विजवर्गके लिये संस्कृत वाणीका प्रचार किया और शूद्रोंके लिये प्राकृत भाषा चलायी। उन्होंने पचास वर्षतक राज्य किया और अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त किया। उन्होंने देश-मर्यादाका स्थापन किया। विन्ध्यगिरि और हिमालयके मध्यमें आर्यवर्तकी पुण्यभूमि है, वहाँ आर्यलोग रहते हैं।
देशराज एवं वत्सराज आदि राजाओंका आविर्भाव
सूतजीने कहा—भोजराजके स्वर्गारोहणके पश्चात् उनके वंशमें सात राजा हुए, पर वे सभी अल्पायु, मन्द-बुद्धि और अल्पतेजस्वी हुए तथा तीन सौ वर्षके भीतर ही मर गये। उनके राज्यकालमें पृथ्वीपर छोटे-छोटे अनेक राजा हुए। वीरसिंह नामके सातवें राजाके वंशमें तीन राजा हुए, जो
दो सौ वर्षके भीतर ही मर गये। दसवाँ जो गंगासिंह नामका राजा हुआ, उसने कल्पक्षेत्रमें धर्मपूर्वक अपना राज्य चलाया। अन्तर्वेदीमें कान्यकुब्जपर राजा जयचन्द्रका शासन था। तोमरवंशमें उत्पन्न अनङ्गपाल इन्द्रप्रस्थका राजा था। इस तरहसे गाँव और राष्ट्र (जनपदों)-में बहुतेसे राजा हुए।
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- प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड *
३३३
अग्निवंशका विस्तार बहुत हुआ और उसमें बहुतसे बलवान् राजा हुए। पूर्वमें कपिलस्थान (गङ्गासागर), पश्चिममें बाह्लीक, उत्तरमें चीन देश और दक्षिणमें सेतुबन्ध—इनके बीचमें साठ लाख भूपाल ग्रामपालक थे, जो महान् बलवान् थे। इनके राज्यमें—प्रजाएँ अग्निहोत्र करनेवाली, गौ-ब्राह्मणका हित चाहनेवाली तथा द्वापरयुगके समान धर्म-कार्य करनेमें निपुण थीं। सर्वत्र द्वापरयुग ही मालूम पड़ता था। घर-घरमें प्रचुर धन तथा जन-जनमें धर्म विद्यमान था। प्रत्येक गाँवमें देवताओंके मन्दिर थे। देश-देशमें यज्ञ होते थे। म्लेच्छ भी आर्य-धर्मका सभी तरहसे पालन करते थे। द्वापरके समान ऐसा धर्माचरण देखकर कलिने भयभीत होकर म्लेच्छाके साथ नीलाचल पर्वतपर जाकर हरिकी शरण ली। वहाँ उसने बारह वर्षतक तपश्चर्या की। इस ध्यानयोगात्मक तपश्चर्यासे उसे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन हुआ। राधाके साथ भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर उसने मनसे उनकी स्तुति की।
कलिने कहा—हे भगवन्! आप मेरे साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणामको स्वीकार करें। मेरी रक्षा कीजिये। हे कृपानिधे! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप सभी पापोंका विनाश करते हैं। सभी कालोंका
निर्माण करनेवाले आप ही हैं। सत्ययुगमें आप गौरवर्णके थे, त्रेतामें रक्तवर्ण, द्वापरमें पीतवर्णके थे। मेरे समय (कलियुग)—में आप कृष्णरूपके हैं। मेरे पुत्रोंने म्लेच्छ होनेपर भी अब आर्य-धर्म स्वीकार किया है। मेरे राज्यमें प्रत्येक घरमें द्यूत, मद्य, स्वर्ण, स्त्री-हास्य आदि होना चाहिये। परंतु अग्निवंशमें पैदा हुए क्षत्रियोंने उनका विनाश कर दिया है। हे जनार्दन! मैं आपके चरण-कमलोंकी शरण हूँ। कलियुगकी यह स्तुति सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर कहने लगे—
‘कलिराज! मैं तुम्हारी रक्षाके लिये अंशरूपमें महावतीमें अवतीर्ण होऊँगा, वह मेरा अंश भूमिमें आकर उन महाबली अग्निवंशीय प्रजाओंका विनाश करेगा और म्लेच्छवंशीय राजाओंकी प्रतिष्ठा करेगा।’ यह कहकर भगवान् अदृश्य हो गये और म्लेच्छाके साथ वह कलि अत्यन्त प्रसन्न हो गया।
आगे चलकर इसी प्रकार सम्पूर्ण घटनाएँ घटित हुई। कौरवांशोंकी पराजय और पाण्डवांशोंकी विजय हुई। अन्तमें पृथ्वीराज चौहानने वीरगति प्राप्त की तथा सहोद्गीन (मोहम्मदगोरी) अपने दास कुतुकोद्दीनको यहाँका शासन सौंपकर यहाँसे बहुत-सा धन लूटकर अपने देश चला गया।
॥ प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड सम्पूर्ण ॥
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
प्रतिसर्गपर्व
( चतुर्थ खण्ड )
[ भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वके इस चतुर्थ खण्डका इतिहासकी दृष्टिसे विशेष महत्त्व है। इसमें मुख्यरूपसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा विशेषरूपसे कलियुगके चारों चरणोंका इतिहास, राजवंश और युगधर्म निरूपित है। साथ ही अनेक आचार्यों, संतों, भक्त कवियों तथा पुरी, भारती आदि साधुओंके पूर्वजन्मोंका इतिवृत्त भी संगृहीत हुआ है। इन्हें प्रायः द्वादश आदित्यों, एकादश रुद्रों, अष्ट वसुओं तथा अश्विनीद्वयका अवतार बतलाया गया है। चैतन्य-महाप्रभुकी महिमाका इसमें विशेष निरूपण हुआ है और जगन्नाथजीमें उनके लय होनेकी बात भी आयी है, साथ ही पूर्वापरके सभी आचार्यों तथा संतोंको उनके भक्तिभावसे विशेष प्रभावित दिखलाया गया है। पर वास्तवमें देश-कालकी दृष्टिसे कई विसंगतियाँ दिखलायी पड़ती हैं, जिससे इन अंशोंकी मौलिकतापर संदेह होना भी स्वाभाविक है। 'कल्याण' का सभी आचार्यों, संतों, महात्माओं और सम्प्रदायोंके प्रति समान आदरभाव है और समान श्रद्धा है। अतः इन विसंगतियोंपर ध्यान न देकर सत्संगकी दृष्टिसे संत, महात्माओं एवं भक्तोंकी पवित्र कथाओंको यथासम्भव उपलब्ध मूल संस्करणके अनुसार संक्षिप्त भावानुवादके रूपमें यहाँ प्रस्तुत किया गया है—सम्पादक]
कलियुगमें उत्पन्न आन्ध्रवंशीय राजाओंके वंश-वृक्षका वर्णन
श्रीगणेशजीको नमस्कार है, श्रीराधावल्लभकी जय हो।
नैमिषारण्यवासी ऋषियोंने कहा—सूतजी महाराज! हमलोगोंने आपके द्वारा कहे गये कृष्णांश (उदयसिंह)-के चरित्रको सुना। अब आप अग्रिवंशमें उत्पन्न हुए राजाओं (प्रमर, चयहानि तथा परिहार आदि)-के राजवंशोंका वर्णन करें। जब भगवान् हरि त्रियुगी कहे जाते हैं तो वे कलियुगमें किस प्रकार अवतरित हुए इसे भी आप बतलायें।
सूतजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! आपलोगोंने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। अग्रिवंशके राजाओंके चरित्रको मैं कह रहा हूँ, आपलोग सुनिये। दक्षिण दिशामें अम्बाद्वारा रचित दिव्य अम्बावती नामकी पुरीमें प्रमर नामका एक राजा हुआ। वह राजा सामवेदी था। महाबली उस राजाने अम्बावतीमें छः वर्षांतक राज्य किया। प्रमरका पुत्र महामर (महामद) हुआ, उसने तीन वर्षांतक राज्य किया और उसका पुत्र हुआ देवापि। उसने भी पिताके
समान राज्य किया और उसका पुत्र देवदूत हुआ। देवदूतने भी अपने पिताके समान ही राज्य किया।
देवदूतका महाबलशाली गन्धर्वसेन नामक पुत्र हुआ। गन्धर्वसेन पचास वर्षांतक राज्य करनेके पश्चात् तपस्या करनेके लिये वनमें चला गया। कुछ समयके बाद शिवके आशीर्वादसे उसे विक्रम नामका पुत्र हुआ। महाराज विक्रमने सौ वर्षांतक राज्य किया और उसका पुत्र हुआ देवभक्त। देवभक्तने दस वर्षांतक राज्य किया और वह दुष्ट शकोंद्वारा मारा गया। देवभक्तका पुत्र हुआ शालिवाहन। उसने शकोंको जीतकर साठ वर्षांतक राज्य किया। अनन्तर वह दिवंगत हो गया। उसका पुत्र शालिहोत्र हुआ और शालिहोत्रने पचास वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र शालिवर्धन राजा हुआ, उसने पिताके समान राज्य किया। उसको शकहन्ता नामका पुत्र प्राप्त हुआ, उसका पुत्र सुहोत्र हुआ और उसका पुत्र हुआ हविर्होत्र। उसने भी पिताके समान पचास वर्षांतक राज्य किया और उसका पुत्र इन्द्रपाल हुआ।
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३३५
इन्द्रपालने इन्द्रावती (इन्दौर) नामकी पुरी बनाकर उसमें राज्य किया। इन्द्रपालने भी अपने पिता हविर्होत्रके समान राज्य किया और उसका पुत्र हुआ माल्यवान्। माल्यवान्ने भी माल्यवती नामकी पुरी बनाकर पिताके समान राज्य किया। उसके राज्यमें चार वर्षतक अनावृष्टि होनेसे घोर अकाल पड़ गया। अत्रके दानेका दर्शन भी दुर्लभ हो गया। प्रजाके साथ-साथ राजा भी भूख-प्याससे व्याकुल हो गया। अनावृष्टि दूर करनेके लिये राजाने भगवान् शालग्रामकी शरण ली। राजाके पास नैवेद्य निवेदित करनेके लिये कुछ भी न था। एक स्थानपर पड़े कुछ अनाजके दानोंको राजाने बीन लिया और जिस किसी तरह उन्हें धोकर पवित्र कर उन्हींसे पूजा आदि की। उसकी श्रद्धा-भक्तिसे संतुष्ट होकर भगवान्ने आकाशवाणीद्वारा कहा—‘राजन्! आजसे तुम्हारे वंशजोंके उत्तम राज्यमें पृथ्वीपर कभी भी अनावृष्टिका भय नहीं होगा।’
माल्यवान्का पुत्र शंकर-भक्त शम्भुदत्त हुआ और उसका पुत्र भौमराज हुआ। भौमराजका पुत्र वत्सरज हुआ। उसका पुत्र हुआ भोजराज। भोजराजका पुत्र शम्भुदत्त हुआ। उसने चालीस वर्षतक राज्य किया। शम्भुदत्तका पुत्र बिंदुपाल हुआ। बिंदुपालने बिंदुरखण्ड नामक राष्ट्रका निर्माणकर सुखपूर्वक राज्य किया। बिंदुपालने अपने पिताके समान ही राज्य किया। बिंदुपालका पुत्र राजपाल हुआ और उसको महीनर नामका पुत्र हुआ। महीनरका पुत्र हुआ सोमवर्मा और उसका पुत्र कामवर्मा हुआ।
कामवर्माका पुत्र भूमिपाल हुआ। उसने एक तालाब खुदवाया और उसके किनारे एक सुन्दर नगरका निर्माण कराया। भूमिपालका पुत्र रंगपाल हुआ।
भूमिपालने राजाका पद प्राप्त कर अनेक राजाओंपर विजय प्राप्त की और इस पृथ्वीपर वह वीरसिंहके नामसे विख्यात हुआ। अपने राज्यपर अपने पुत्र रंगपालका अभिषेक कर वह तपस्या करने वनमें चला गया। राजाओंमें उत्तम रंगपालको कल्पसिंह नामका पुत्र हुआ। कल्पसिंहके कोई संतान नहीं हुई। एक बार स्नान करनेके लिये वह गङ्गातटपर गया, वहाँ उसने प्रसन्न होकर द्विजातियोंको दान दिया। निर्जन कल्पक्षेत्रकी पुण्यभूमिको देखकर उस भूमिपर प्रसन्नचित्त हो उसने वहाँ एक नगरका निर्माण कराया। वह नगर ‘कलाप’ नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ। कलापमें उसने राज्य किया और गङ्गाकी कृपासे उसको गंगासिंह नामका पुत्र प्राप्त हुआ। उसने नब्बे वर्षोंतक राज्य किया, किंतु उसके कोई संतान न हुई। अन्तमें युद्ध करते हुए कुरुक्षेत्रमें प्राण त्यागनेके बाद उसने स्वर्गलोकको प्राप्त किया।
सूतजीने पुनः कहा—मुनियो! इस प्रकार पवित्र प्रमरवंश समाप्त हो गया। गंगासिंहके वंशमें उसके बाद जो क्षत्रिय शेष बच गये थे, उनकी स्त्रियोंसे आगे चलकर अनेकों वर्णसंकर पैदा हुए। वे सभी वैश्य-वृत्तिवाले थे। वे सभी म्लेच्छोंके समान पृथ्वीपर निवास करने लगे। इस प्रकार मैंने दक्षिणके* राजाओंके वंशका वर्णन किया।
(अध्याय १)
- सिन्ध आदि इतिहासकार आन्ध्रराजाओंसे लेकर हर्षवर्धनके राज्यतकके कोई ऐतिहासिक सूत्र नहीं देखते। प्रायः चार सौ वर्षोंके इतिहासको घोर अन्धकारमय मानते हैं। पर यहाँ जो वंशवृक्ष निर्दिष्ट हुआ है, यह उन्हीं चार सौ वर्षोंका संक्षिप्त वृत्तान्त समझना चाहिये और आजके ऐतिहासिकोंको इससे लाभ उठाना चाहिये।
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३३६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
राजपूताना तथा दिल्लीनगरके राजवंशका इतिहास
सूतजी बोले—मुनियो! वयहानि (चपहानि) नामके राजाने मध्यदेशमें अपना आधिपत्य स्थापित किया और ब्रह्माद्वारा रचित अजमेर नामक नगरी बसायी। 'अजमेर' शब्दकी व्युत्पत्तिमें कहा गया है कि 'अज' का अर्थ है—ब्रह्मा, 'मा' का अर्थ है लक्ष्मी। लक्ष्मीने वहाँ आकर ब्रह्माजीके लिये एक रम्य नगरका निर्माण किया। अतः यह अजमेर कहलाया१। वयहानिने दस वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र तोमर हुआ। उसने एक वर्षतक भक्तिपूर्वक भगवान् शिवका पार्थिव-पूजन किया। फलस्वरूप भगवान् शिवने प्रसन्न होकर तोमरको इन्द्रप्रस्थ नामका नगर प्रदान किया। तोमरसे उत्पन्न होनेवाले वंशको तोमर नामक क्षत्रिय-वंश कहा जाता है। तोमरका कनिष्ठ पुत्र हुआ चयहानि (चौहान)। वह चयहानि सामलदेवके नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ। उसने सात वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र महादेव हुआ। महादेवने अपने पिताके समान राज्य किया और उसका पुत्र हुआ अजय। अजयका पुत्र वीरसिंह हुआ। वीरसिंहने पचास वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र बिंदुसुर हुआ। बिंदुसुरने पचीस वर्षतक मध्यदेशमें राज्य किया और उसे वीरा नामकी एक कन्या हुई तथा वीरविहातक नामका पुत्र हुआ। बिंदुसुरने शास्त्रोक्त रीतिसे अपनी कन्या वीराका विवाह विक्रमसे कर दिया और मध्यदेशवर्ती अपने राज्यको प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्रको दे दिया।
वीरविहातकके माणिक्य नामका पुत्र हुआ। माणिक्यने पिताके समान ही पचास वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र महासिंह हुआ। पिताके समान उसने भी राज्य किया और उसका पुत्र
हुआ चन्द्रगुप्त। चन्द्रगुप्तने पचीस वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र प्रतापवान् हुआ। प्रतापवान्का पुत्र मोहन हुआ। मोहनने तीस वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र श्वेतराय हुआ। श्वेतरायका पुत्र नागवाह हुआ और उसका पुत्र हुआ लोहधार। लोहधारका पुत्र वीरसिंह हुआ, उसका पुत्र विबुध हुआ। विबुधने पचास वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र चन्द्रराय हुआ। चन्द्ररायका पुत्र हरिहर हुआ। उसका पुत्र वसंत, वसंतका पुत्र बलांग और बलांगका पुत्र प्रमथ हुआ। प्रमथका पुत्र अंगराय हुआ और उसका पुत्र विशाल हुआ। विशालका पुत्र शाङ्गदेव और उसका पुत्र मन्त्रदेव हुआ। मन्त्रदेवका पुत्र जयसिंह हुआ। इन सभी राजाओंने पचास-पचास वर्षतक राज्य किया।
जयसिंहने समस्त आर्यदेशको जीतकर वहाँकी धन-सम्पत्तिसे बहुत बड़ा यज्ञ किया, जिससे उसको उत्तम फल प्राप्त हुआ। (इसने ही जयपुर नगर बसाया, जो आज भारतका अत्यन्त रमणीय नगर माना जाता है।) जयसिंहको आनन्ददेव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। बुद्धिमान् जयसिंहने पचास वर्षतक राज्य किया। उसके पुत्र आनन्ददेवने भी अपने पिताके समान ही इस पृथ्वीपर राज्य किया। आनन्ददेवका पुत्र हुआ महान् योद्धा सोमेश्वर। उसने अनंगपालकी ज्येष्ठा पुत्री कीर्तिमालिनीके साथ विवाह किया और उससे तीन पुत्र उत्पन्न हुए। बड़ा पुत्र धृंधुकार मथुराका राजा हुआ। मध्यम पुत्र कृष्णकुमारने पिताके स्थानको प्राप्त किया। तृतीय बलवान् महीराज—पृथ्वीराज दिल्लीपति हुआ। पृथ्वीराजको सहोद्दीन२ नामक राजाने छलसे जीतकर मार डाला और उसने स्वर्ग प्राप्त किया। (अध्याय २)
१-अजस्य ब्रह्मणो मा च लक्ष्मीस्तत्र समागता। तथा च नगरं रम्यमजमेरमतः स्मृतम्॥ (प्रतिसर्गपर्व ४।२।२)
२-सहोद्दीन, शहाबुद्दीन गोरीका संस्कृत रूपान्तर है।
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३३७
ब्राह्मणोंकी उत्पत्तिके प्रसंगमें शुक्लवंश एवं उसके आगे होनेवाले विभिन्न क्षत्रियवंशोंका वर्णन
सूतजी बोले—विप्रवर! अब मैं शुक्लवंशका वर्णन करता हूँ। जब भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका-वृन्दावन आदिकी लीला समाप्त कर अपने परमधामको पधारे, उसके कुछ दिनोंके पश्चात् कलियुगका आगमन हुआ। कलियुगके चार हजार चार सौ वर्ष बीत जानेपर भारतकी भूमि म्लेच्छोंसे आक्रान्त हो गयी। न्यूह नामक यवनने सम्पूर्ण जगत्को म्लेच्छोंसे परिपूर्ण कर दिया था। कलियुगके प्रारम्भिक एक हजार वर्ष बीतनेपर देवराट् महेंद्रने श्रेष्ठ ब्रह्मावर्तमें एक काश्यप नामके ब्राह्मणको भेजा। देवशक्ति आर्यावतीने उसका आनन्दपूर्वक पाणिग्रहण किया। उससे दस पुत्र* उत्पन्न हुए। बादमें काश्यप मिस्र देशमें आ गये। उन्होंने मिस्रमें उत्पन्न दस हजार म्लेच्छोंको वशमें कर पुनः अपने स्थानपर आकर उन्हें अपना शिष्य बना लिया तथा वे सप्तपुरियोंके नष्ट होनेके बाद सरस्वती और दृषद्वती नदीके मध्य श्रेष्ठ ब्रह्मावर्तमें निवास करने लगे। मनुधर्मके अनुयायी राजा काश्यपने अपने पुत्र तपस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्लको बुलाकर उसे मनुधर्मका उपदेश देकर रैवत (गिरनार)-शिखरपर तपस्या करनेके लिये आदेश दिया और अपने नौ पुत्रों तथा शिष्योंको भी सनातन मनुधर्मका उपदेश दिया।
शुक्लने भी रैवतभृंगपर तपस्याके द्वारा सच्चिदानन्दविग्रह जगन्नाथ वासुदेवको संतुष्ट किया। भगवान् द्वारकानाथ प्रसन्न होकर उस विप्रका हाथ पकड़कर समुद्रके किनारे ले आये और दिव्य शोभासम्पन्न अपनी द्वारका नगरी उसे दिखायी। लगभग दो हजार वर्ष बीतनेके बाद अग्निद्वारसे
वह शुक्ल अर्बुद (आबू) पर्वतपर गया और वहाँ उसने अपने तीन भाइयों तथा द्विजोंके साथ बौद्धोंको जीतकर हरिकी कृपासे द्वारकाको पुनः प्रतिष्ठित किया। द्वारकामें कृष्णके ध्यानमें तत्पर रहकर शुक्लने प्रसन्नतापूर्वक निवास किया। उसने पश्चिम भारतवर्षमें दस वर्षतक राज्य किया।
नारायणकी कृपासे शुक्लको विष्वक्सेन नामक पुत्र हुआ, उसने बीस वर्षतक राज्य किया और उसे जयसेन नामका पुत्र हुआ, तीस वर्षतक उसने राज्य किया और उसे विसेन नामक पुत्र हुआ। पचास वर्षतक उसने राज्य किया और उसे प्रमोदा और मोदसिंह नामकी दो संतानें हुईं। विसेनने अपनी कन्या प्रमोदाका विवाह विक्रमके साथ कर दिया और पुत्र मोदसिंहको अपना उत्तम राज्य समर्पित कर दिया। मोदसिंहका पुत्र हुआ सिन्धुवर्मा। उसने पैतृक स्थानको छोड़कर सिन्धुनदीके तटपर राज्य किया। पृथ्वीपर वह स्थान सिन्धुदेशके नामसे प्रसिद्ध हुआ। सिन्धुवर्माका पुत्र सिन्धुद्वीप हुआ और सिन्धुद्वीपका पुत्र श्रीपति हुआ। श्रीपतिने गौतमवंशमें उत्पन्न कच्छदेशमें रहनेवाली काच्छपीसे विवाह किया और पुलिन्द तथा यवनोंको जीतकर वहाँ देश बसाया। सिन्धुकूलमें वह देश श्रीपतिके नामसे प्रसिद्ध हुआ। श्रीपतिका पुत्र हुआ भुजवर्मा। भुजवर्माने शबर और भीलोंको जीतकर देश बसाया, जो इस पृथ्वीपर 'भुजदेश' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। भुजवर्माका पुत्र रणवर्मा और उसका पुत्र चित्रवर्मा हुआ। चित्रवर्माने वनके बीचमें 'चित्र' नामकी एक नगरी बसायी और उसको धर्मवर्मा नामक पुत्र हुआ। उसको कृष्णवर्मा
- उपाध्यायो दीक्षितश्च पाठकः शुक्लमिश्रकौ। अग्रिहोत्री द्विवेदी च त्रिवेदी पाण्ड्य एव च॥
चतुर्वेदीति कथिता नामतुल्यगुणाः स्मृताः। (उत्तरपर्व १।६।४-५, प्रतिसर्गपर्व ४।२१।७-८)
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३३८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
नामक पुत्र हुआ। कृष्णवर्माको उदय नामका पुत्र हुआ। उदयने वनके बीचमें एक सुन्दर 'उदयपुर' नामका नगर बसाया। उसका पुत्र वाप्यकर्मा हुआ। वाप्यकर्माने अनेक वापी-कूप, तड़ाग, सुन्दर-सुन्दर महल आदि बनवाये। वह धर्मात्मा सदा धर्मकार्यमें संलग्न रहता था।
उसी समय एक लाख सैन्यसे युक्त महामदके अनुयायी बीरबलद नामक एक राजाने वाप्यकर्मापर चढ़ाई कर दी, परंतु वाप्यकर्माने पैशाचों और म्लेच्छोंको जीतकर भगवान् कृष्णका कृष्णोत्सव मनाया। वाप्यकर्माको गुहिल नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र कालभोज हुआ। कालभोजका पुत्र हुआ राष्ट्रपाल। राष्ट्रपालने अपने पैतृक स्थानका परित्याग कर सभी मङ्गलोंको प्रदान करनेवाली शारदादेवीकी आराधना की। राष्ट्रपालको वैष्णवी शक्ति प्राप्त हुई। उसके तपसे प्रसन्न हो शारदादेवीने मणिदेवसे रक्षित अत्यन्त रमणीय 'महावती' नामकी पुरी प्रदान की। उस बुद्धिमान् राजा राष्ट्रपालने उस पुरीमें दस वर्षोंतक राज्य किया।
राजा राष्ट्रपालको विजय और प्रजय नामके दो पुत्र प्राप्त हुए। प्रजयने अपने माता-पिताको त्यागकर गङ्गातटपर जाकर बारह वर्षोंतक शारदादेवीकी कठोर तपस्या की। शारदादेवी एक कन्याके रूपमें वेणुवादन करती हुई घोड़ेपर सवार हो राजाके सामने उपस्थित हुई और हँसकर बोली—'राजपुत्र! तुम किसलिये शिवाकी आराधना कर रहे हो? तुम्हें तपस्याका फल मेरे द्वारा शीघ्र ही प्राप्त होगा।' यह सुनकर प्रजयने कहा—'देवि! आपको नमस्कार है, आप मुझे एक नवीन नगर प्रदान करें।' यह सुनकर देवीने प्रजयको
एक सुन्दर घोड़ा प्रदान किया और वे वेणु-वादन करती हुई दक्षिण दिशाकी ओर चली गयीं। वह राजा भी उस अक्षरपर चढ़कर उनके पीछे-पीछे नेत्र बंदकर पश्चिम दिशाकी ओर आया। इसके बाद वह जहाँ मर्कण नामका पक्षिराट् था, वहाँ गया। उसे देखकर वह भयभीत हो गया। तब उस राजाने दोनों नेत्रोंको खोल लिया और कन्याके द्वारा रचित एक शुभ नगरको देखा। उस नगरके उत्तरी भागमें गङ्गा, दक्षिणमें पाण्डुरा, पश्चिममें ईशसरिता तथा पूर्वमें मर्कण पक्षीका स्थान था। यह स्थान कुछ कुब्ज (टेढ़ा) था। कन्याद्वारा निर्मित होने एवं कुछ कुब्ज (टेढ़ा) होनेके कारण यह स्थान कान्यकुब्ज नामसे प्रसिद्ध हुआ*।
राष्ट्रपालके पुत्र जयपालने दस वर्षोंतक राज्य किया। वेणुवादन करनेके कारण उसको वेणुक नामका पुत्र प्राप्त हुआ। राजा वेणुके देवीके द्वारा प्रदत्त मनोहर कन्यामती नामकी कन्याके साथ विवाह किया। कन्यामतीसे उसे सात पुत्रियाँ उत्पन्न हुई। वे मातृकाओंकी मङ्गल-कलासे समुद्भूत थीं। उनके नाम इस प्रकार हैं—शीतला, पार्वती, कन्या, पुष्पवती, गोवर्धनी, सिन्दूरा तथा काली। ये ही क्रमशः ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा नामसे प्रसिद्ध हुई। अनन्तर उस रानीसे यशोविग्रह नामक पुत्र हुआ। वह बहुत बलवान् धर्मात्मा तथा आर्यदेशका मालिक था। यशोविग्रहने बीस वर्षोंतक इस पृथ्वीपर राज्य किया। उसका पुत्र हुआ महीचन्द्र। महीचन्द्रने भी अपने पिताके समान ही राज्य किया। उसका पुत्र चन्द्रदेव हुआ, चन्द्रदेवका पुत्र मन्दपाल राजा हुआ। उसने दस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र कुम्भपाल हुआ।
- ददर्श नगरं रम्यं कन्याया रचितं शुभम् । उत्तरे तस्य वै गङ्गा दक्षिणेनास पाण्डुरा ॥
पश्चिमे ईशसरिता पूर्व पक्षी स मर्कणः । कुब्जभूतमभूदुर्गमं कान्यकुब्ज इति स्मृतः ॥
(प्रतिसर्गपर्व ४।३।५०-५१)
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- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
३३९
म्लेच्छ और पैशाचधर्मका अनुयायी महामोद राजनीया नामक नगरीका अधिपति था, उसने बहुत-से देशोंको लूटकर धन एकत्र किया था। वह कुम्भपालके पास गया। उसने कुम्भपालको बहुत-सा धन दिया। बुद्धिमान् कुम्भपालने बीस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र देवपाल हुआ।
देवपालने अनंगपाल नामक राजाकी कन्या चन्द्रकान्तिके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। देवपालने कान्यकुब्ज प्राप्तकर अनेक राजाओंको जीतकर अपने पिताके समान राज्य किया। उसे जयचन्द्र और रत्नभानु नामके दो पुत्र हुए। जयचन्द्रने पूर्व और रत्नभानुने उत्तर दिशामें आर्यदेशको जीतकर वैष्णवराज्यको प्राप्त किया। रत्नभानुका
पुत्र लक्षण नामसे विख्यात हुआ। वह कुरुक्षेत्रमें युद्ध करता हुआ दिवंगत हो गया। बुद्धिमान् वैश्यपाल, कुम्भपाल और शुक्लवंश समाप्त हो गया। विष्ण्वसेनके कुलमें उत्पन्न होनेवाले राजा विष्ण्वसेनवंशीय, विसेनके कुलमें उत्पन्न होनेवाले विसेनवंशीय क्षत्रिय, गुहिलके कुलमें उत्पन्न होनेवाले गौहिल क्षत्रिय, राष्ट्रपालके कुलमें उत्पन्न होनेवाले राष्ट्रपालवंशीय क्षत्रिय कहलाये। शुक्लवंशके धुरंधर लक्षणके मरनेके बाद सभी प्रधान क्षत्रिय राजा कुरुक्षेत्रमें समाप्त हो गये। शेष छोटे-छोटे राजा वर्णसंकर तथा म्लेच्छोंसे दूषित होकर भयानक म्लेच्छ-राज्यमें स्थित हो गये।
(अध्याय ३)
परिहारवंश और बंगालके शूरवंश आदिका वर्णन
सूतजी बोले—हे भृगुश्रेष्ठ शौनक! अब आप परिहारवंशके राजाओंका वर्णन सुनें। अथर्ववेदवेत्ता परिहारने सभी बौद्धोंको जीतकर सर्वशक्तिमयी देवीकी श्रद्धापूर्वक आराधना की। सर्वशक्तिमयी देवीने प्रसन्न होकर चित्रकूट पर्वतके ऊपर डेढ़ योजन विस्तृत एक नगरका निर्माण किया। देवताओंके प्रिय इस नगरमें कलिको बंदी बना लिया गया था और यहाँ कलिका कभी प्रवेश नहीं होता, इसलिये यह नगर 'कलिंजर' नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ*। परिहारने उस कलिंजर नामके नगरमें बारह वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र गौरवर्मा हुआ। गौरवर्माने अपने पिताके समान ही राज्य किया। उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने छोटे भाई घोरवर्माको कलिंजरका राज्य सौंप दिया। अनन्तर वह गौड़देशमें चला आया और वहाँ राज्य करने लगा। गौरवर्माका पुत्र सुपर्ण अपने पिताके बाद वहाँका राजा हुआ।
उसका पुत्र रूपण हुआ और रूपणका पुत्र कारवर्मा (कामवर्मा) हुआ।
इधर शक नामके राजाने महालक्ष्मी सनातनी देवीकी आराधना की। तीन वर्षके अन्तमें उस देवीने कामाक्षीका रूप धारण कर अपने भक्तका पालन करनेके लिये वहाँ निवास किया। कामवर्माने पचास वर्षतक राज्य किया। कामवर्माके भोगवर्मा नामका पुत्र और भोगवती नामकी कन्या उत्पन्न हुई। उस राजाने भोगवती नामकी अपनी कन्या विक्रमको प्रदान की और अपना राज्य अपने पुत्र भोगवर्माको दे दिया। भोगवर्माका पुत्र कालिवर्मा हुआ।
कालिवर्माने भक्तिपूर्वक महाकालीकी उपासना की। उससे प्रसन्न होकर वर देनेके लिये भगवती काली स्वयं उपस्थित हुई। भगवती कालीने प्रसन्न होकर अनेक पुष्पोंकी कलियोंकी वर्षा की, जिससे
- नगरं चित्रकूटाद्वा चकार कलिनिर्जरम्। कलिर्नरं भवेद्द्वो अतः कलिंजरो नाम्ना प्रसिद्धोऽभून्महीतले।
नगरेऽस्मिन् सुरप्रिये॥
(प्रतिसर्गपर्व ४।४।३-४)
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३४०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
एक सुन्दर नगर उत्पन्न हुआ। जो कलिकातापुरी (कलकत्ता)-के नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ*। कालिवर्माका पुत्र कौशिक, उसका पुत्र कात्यायन, उसका पुत्र हेमवत, हेमवतका पुत्र शिववर्मा, शिववर्माका पुत्र भववर्मा और भववर्माका पुत्र रुद्रवर्मा हुआ। इन्होंने भी अपने-अपने पिताके समान राज्य किया। रुद्रवर्माका पुत्र भोजवर्मा हुआ। भोजवर्मोंने अपने पिताका राज्य त्यागकर वनप्रदेशमें भोजराष्ट्रका निर्माण किया। भोजवर्माका पुत्र गववर्मा हुआ और उसका पुत्र विंध्यवर्मा राजा हुआ। विंध्यवर्मा अपने छोटे भाईको राज्य सौंपकर वंग (बंगाल)-देश चला गया। विंध्यवर्माका पुत्र सुखसेन, उसका पुत्र बलाक हुआ। बलाकने दस वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र लक्ष्मण (सेन), उसका पुत्र माधव, उसका पुत्र वेशव और वेशवका पुत्र सुरसेन हुआ। सुरसेनका पुत्र नारायण और नारायणका पुत्र शान्तिवर्मा हुआ।
शान्तिवर्मोंने गङ्गाके किनारे शान्तिपुर नामक एक नगर बसाया और वह वहाँ रहने लगा। शान्तिवर्माका पुत्र नदीवर्मा हुआ और उसका पुत्र महान् बलवान् गंगादत्त हुआ। उसने गौड़ (ठाका) राष्ट्रकी ओर जानेवाली दिशामें नदीहा (नदिया) नामक एक रम्य नगरी बसायी। गंगादत्तने एक विशेषज्ञ विद्याधरको बुलाया। उसीके द्वारा यह वेदपरायणपुरी नदीहा रक्षित थी। राजा गंगादत्तने बीस वर्षतक वहाँ राज्य किया। तभीसे उसके कुलमें उत्पन्न होनेवाले गंगावंशी इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए।
गंगादत्तका शाङ्गदेव नामक एक महाबली और
विष्णुभक्त पुत्र हुआ। वह शाङ्गदेव गौड़देशमें जाकर श्रीहरिके ध्यानमें तल्लीन हो गया। शाङ्गदेवने दस वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र गंगादेव हुआ। बीस वर्षतक उसने राज्य किया। गंगादेवका पुत्र अनंग राजा हुआ। बलवान् अनंग गौड़देशका महीपति हुआ। पिताके समान उसने भी राज्य किया। अनंगका पुत्र राजेश्वर, उसका पुत्र नृसिंह और उसका पुत्र कलिवर्मा हुआ। राष्ट्रदेशमें जाकर बलवान् कलिवर्मोंने वहाँके राजाको जीतकर महावती नामक रमणीय पुरीके मध्य सुखपूर्वक राज्य किया। कलिवर्माका पुत्र हुआ धृतिवर्मा। धृतिवर्माका पुत्र महीपति हुआ। जयचन्द्रकी आज्ञासे राजा महीपतिने उर्वीमाया (उर्वीया) नामसे एक प्रसिद्ध नगरीका निर्माण किया और वहाँपर निवास करने लगा। कुरुक्षेत्रमें सभी चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा मारे गये। तब महीपति महावतीका राजा हुआ। बीस वर्षतक महीपतिने राज्य किया। अनन्तर सहोद्दीनके द्वारा सुयोधनके कलांशसे उत्पन्न जो राजा थे वे सभी कुरुक्षेत्रमें मारे गये। परिहारके पुत्र घोरवर्मोंने कलिंजरमें राज्य किया। उसका पुत्र हुआ शादूल। उसके वंशमें जो राजा हुए वे शादूलीय नामसे प्रसिद्ध हुए। महामायाके प्रसादसे सम्पूर्ण भूमिपर शादूलवंशमें उत्पन्न राजा व्याप्त हो गये।
हे शौनक! इस प्रकार अग्निवंशीय राजाओंके कुलका मैंने वर्णन किया, चन्द्र और सूर्यवंशका स्मरण करनेसे जैसे पाप नष्ट हो जाते हैं, ऐसे ही यह अग्निवंश भी पवित्र करनेवाला है। अब मैं अन्य वंशका वर्णन कर रहा हूँ, जिसमें हरि स्वयं उत्पन्न हुए। (अध्याय ४)
- कलिका बहुपुष्पाणां सा चकार स्वहर्षतः। ताभिर्भवं च नगरं संजातं च मनोहरम् ॥
कलिकाता पुरी नाम्ना प्रसिद्धाभूमहीतले। (प्रतिसर्गपर्व ४।४।१३-१४)
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