भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 336, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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सत्यरूपी जलसे जो राग-द्वेषरूपी मलका नाश करनेवाला है, उस मानसतीर्थको प्राप्त करनेपर अर्थात् उस मानसतीर्थमें अवगाहन करनेपर सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। यह महान् मानस-ज्ञान-तीर्थ ब्रह्मके साक्षात्कार करानेमें समर्थ है। पाणिने ! मैंने यह सर्वोत्तम तीर्थ तुम्हें प्रदान किया है, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे। यह कहकर भगवान् रुद्र अन्तर्हित हो गये और पाणिनि अपने
घरपर आ गये। पाणिनिने सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ और लिङ्गसूत्र-रूप व्याकरण शास्त्रका निर्माण कर परम निर्वाण प्राप्त किया*। अतः भार्गवश्रेष्ठ ! तुम मनोमय ज्ञानतीर्थका अवलम्बन करो। उन्हींसे कल्याणमयी सर्वोत्तम तीर्थमयी गङ्गा प्रकट हुई हैं। गङ्गासे बढ़कर उत्तम तीर्थ न कोई हुआ है और न आगे होगा।
(अध्याय ३१)
बोपदेवके चरित्र-प्रसंगमें श्रीमद्भागवत-माहात्म्य
सूतजी बोले—महामुने शौनक ! तोताद्रिमें एक बोपदेव नामके ब्राह्मण रहते थे। वे कृष्णभक्त और वेद-वेदाङ्गपारंगत थे। उन्होंने गोप-गोपियोंसे प्रतिष्ठित वृन्दावन-तीर्थमें जाकर देवाधिदेव जनार्दनकी आराधना की। एक वर्ष बाद भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें अतिशय श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान किया। उसी ज्ञानके द्वारा उनके हृदयमें भागवती कथाका उदय हुआ। जिस कथाको श्रीशुकदेवजीने बुद्धिमान् राजा परीक्षितको सुनाया था, उस सनातनी मोक्ष-स्वरूपा कथाका बोपदेवने हरि-लीलामृत नामसे पुनः वर्णन किया। कथाकी समाप्तिपर जनार्दन भगवान् विष्णु प्रकट हुए और बोले 'महामते ! वर माँगो।' बोपदेवने अतिशय स्नेहमयी वाणीमें कहा—'भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण संसारपर अनुग्रह करनेवाले हैं। आपसे देव, मनुष्य, पशु-पक्षी सभी निर्मित हुए हैं। नरकसे दुःखी प्राणी भी इस कलियुगमें आपके ही नामसे कृतार्थ होते हैं। महर्षि वेदव्यासरचित श्रीमद्भागवतका ज्ञान तो आपने मुझे प्रदान किया है, पुनः यदि आप वर प्रदान करना चाहते हैं तो
उस भागवतका माहात्म्य मुझसे कहें।'
श्रीभगवान् बोले—बोपदेव ! एक समय भगवान् शंकर पार्वतीके साथ दम्भ और पाखण्डसे युक्त बौद्धोंके राज्य प्राप्त होनेपर काशीमें उत्तम भूमि देखकर वहाँ स्थित हो गये। भगवान् शंकरने आनन्दपूर्वक प्रणाम करते हुए कहा—'हे सच्चिदानन्द ! हे विभो ! हे जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले ! आपकी जय हो।' इस प्रकारकी वाणी सुनकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे पूछा—'भगवन् ! आपके समान दूसरा अन्य देवता कौन है जिसे आपने प्रणाम किया।' इसपर भगवान् शिवने कहा—'महादेवि ! यह काशी परम पवित्र क्षेत्र है, यह स्वयं सनातन ब्रह्मस्वरूप है, यह प्रणाम करने योग्य है। यहाँ मैं ससाह-यज्ञ (भागवत-ससाह-यज्ञ) करूँगा।' उस यज्ञ-स्थलकी रक्षाके लिये भगवान् शंकरने चण्डीश, गणेश, नन्दी तथा गुह्यकोंको स्थापित किया और स्वयं ध्यानमें स्थित होकर माता पार्वतीसे सात दिनतक भागवती कथा कहते रहे। आठवें दिन पार्वतीको सोते देखकर उन्होंने पूछा कि 'तुमने कितनी कथा
- सूत्रपाठ धातुपाठ गणपाठ तथैव च। लिङ्गसूत्र तथा कृत्वा परं निर्वाणमाप्तवान्॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३१।१३-१४)
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