भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सुनी।' उन्होंने कहा—'देव! मैंने अमृत-मन्थनपर्यन्त विष्णुचरित्रका श्रवण किया।' इसी कथाको वहीं वृक्षके कोटरमें स्थित शुकरूपी शुकदेव सुन रहे थे। अमृत-कथाके श्रवणसे वे अमर हो गये। मेरी इस आज्ञासे वह शुक् साक्षात् तुम्हारे हृदयमें स्थित है। बौपदेव! तुमने इस दुर्लभ भागवत-माहात्म्यको मेरे द्वारा प्राप्त किया है। अब तुम
जाकर राजा विक्रमके पिता गन्धर्वसेनको नर्मदाके तटपर इसे सुनाओ। हरि-माहात्म्यका दान करना सभी दानोंमें उत्तम दान है। इसे विष्णुभक्त बुद्धिमान् सत्पात्रको ही सुनाना चाहिये। भूखेको अन्न-दान करना भी इसके समान दान नहीं है। यह कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्हित हो गये और बौपदेव बहुत प्रसन्न हो गये। (अध्याय ३२)
श्रीदुर्गासप्तशतीके आदिचरित्रका माहात्म्य
(व्याधकर्मकी कथा)
ऋषियोंने पूछा —सूतजी महाराज! अब आप हमलोगोंको यह बतलानेकी कृपा करें कि किस स्तोत्रके पाठ करनेसे वेदोंके पाठ करनेका फल प्राप्त होता है और पाप विनष्ट होते हैं।
सूतजी बोले —ऋषियो! इस विषयमें आप एक कथा सुनें। राजा विक्रमादित्यके राज्यमें एक ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्रीका नाम था कामिनी। एक बार वह ब्राह्मण श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ करनेके लिये अन्यत्र गया हुआ था। इधर उसकी स्त्री कामिनी जो अपने नामके अनुरूप कर्म करनेवाली थी, पतिके न रहनेपर निन्दित कर्ममें प्रवृत्त हो गयी। फलतः उसे एक निन्द्य पुत्र उत्पन्न हुआ, जो व्याधकर्म नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह भी अपने नामके अनुरूप कर्म करनेवाला था, धूर्त था तथा वेद-पाठसे रहित था। उस ब्राह्मणने अपनी स्त्री एवं पुत्रके निन्दित कर्म और पापमय आचरणको देखकर उन दोनोंको घरसे निकाल दिया तथा स्वयं धर्ममें तत्पर रहते हुए विन्ध्याचल पर्वतपर प्रतिदिन चण्डीपाठ करने लगा। जगदम्बाके अनुग्रहसे अन्तमें वह जीवन्मुक्त हो गया।
इधर वे दोनों माता-पुत्र (कामिनी और
व्याधकर्म) पूर्वपरिचित निषादके पास चले गये और वहीं निवास करने लगे। वहाँ भी वे दोनों अपने निन्दित आचरणको छोड़ न सके और इन्हीं बुरे कर्मोंसे धन-संग्रह करने लगे। व्याधकर्म चौर्य-कर्ममें प्रवृत्त हो गया। ऐसे ही भ्रमण करते हुए दैवयोगसे एक दिन वह व्याधकर्म देवीके मन्दिरमें पहुँचा। वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ कर रहे थे। दुर्गापाठके आदिचरित्र (प्रथम चरित्र)-के किंचित् पाठमात्रके श्रवणसे उसकी दुष्टबुद्धि धर्ममय हो गयी। फलतः धर्मबुद्धिसम्पन्न उस व्याधकर्मने उस श्रेष्ठ विप्रका शिष्यत्त्व ग्रहण कर लिया और अपना सारा धन उन्हें दे दिया। गुरुकी आज्ञासे उसने देवीके मन्त्रका जप किया। बीजमन्त्रके प्रभावसे उसके शरीरसे पापसमूह कृमिके रूपमें निकल गये। तीन वर्षतक इस प्रकार जप करते हुए वह निष्पाप श्रेष्ठ द्विज हो गया। इसी प्रकार मन्त्र-जप और आदिचरित्रका पाठ करते हुए उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये। तदनन्तर वह द्विज काशीमें चला आया। मुनि एवं देवोंसे पूजित महादेवी अन्नपूर्णाका उसने रोचनादि उपचारोंके द्वारा पूजन किया और
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