भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 338
  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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उनकी इस प्रकार स्तुति की—

नित्यानन्दकरी पराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी

निर्धूतारिखिलपापपावनकरी काशीपुराधीश्वरी ।

नानालोककरी महाभयहरी विश्वम्भरी सुन्दरी

विद्यां देहिकृपावलम्बनकरी मातात्रपूर्णाश्वरी * ॥

(प्रतिसर्गपर्व २।३३।२१)

इस स्तुतिका एक सौ आठ बार जपकर ध्यानमें नेत्रोंको बंदकर वह वहीँ सो गया। स्वप्नमें उसके सम्मुख अन्नपूर्णा शिवा उपस्थित हुई और

उसे ऋग्वेदका ज्ञान प्रदान कर अन्तर्हित हो गयीं। बादमें वह बुद्धिमान् ब्राह्मण श्रेष्ठ विद्या प्राप्तकर राजा विक्रमादित्यके यज्ञका आचार्य हुआ। यज्ञके बाद योग धारणकर हिमालय चला गया।

हे विप्रो! मैंने आपलोगोंको देवीके पुण्यमय आदिचरित्रके माहात्म्यको बतलाया, जिसके प्रभावसे उस व्याधकर्माने ब्राह्मीभाव प्राप्तकर परमोत्तम सिद्धिको प्राप्त कर लिया था।

(अध्याय ३३)

श्रीदुर्गासप्तशतीके मध्यमचरित्रका माहात्म्य

(कात्यायन तथा मगधके राजा महानन्दकी कथा)

सूतजी बोले—शौनक! उज्जयिनी नगरीमें एक हिंसापरायण मद्य-मांस-भक्षी भीमवर्मा नामका क्षत्रिय रहता था। वह अतिशय हिंसा एवं अधर्माचरणके कारण भयंकर व्याधियोंसे ग्रस्त हो गया और युवावस्थामें ही उसकी मृत्यु हो गयी। संयोगवश उसने कभी चण्डीपाठ भी कराया था। जिसके पुण्यके प्रभावसे इतना निकृष्ट पापी भी नरकमें नहीं गया। दूसरे जन्ममें वही राजनीतिपरायण मगधका विख्यात राजा महानन्द हुआ और उसे अपने पूर्वजन्मकी पूरी स्मृति थी। अतिशय समर्थ बुद्धिमान् कात्यायन (वररुचि)-का वह शिष्य हुआ। देवी महालक्ष्मीके बीजसहित मध्यमचरित्रका राजा महानन्दको उपदेश देकर कात्यायन स्वयं

विन्ध्यपर्वतपर शक्ति-उपासनाके लिये चले गये। इधर राजा भी प्रतिदिन महालक्ष्मीकी कस्तूरी, चन्दन आदिसे पूजा कर श्रीदुर्गासप्तशतीके मध्यम-चरित्रका पाठ करने लगा। बारह वर्ष व्यतीत होनेपर शक्तिकी उपासना करनेवाले कात्यायन पुनः अपने शिष्य महानन्दके पास आये और उन्होंने राजासे विधिपूर्वक लक्षचण्डीपाठ करवाया। फलस्वरूप सनातनी भगवती महालक्ष्मी प्रकट हुई और राजाको धर्म, अर्थ, कामसहित मोक्ष भी दे दिया। इस प्रकार महाभाग महानन्दने देवोंके समान अभीष्ट फलोंका उपभोग कर अन्तमें देवताओंसे नमस्कृत हो परम लोकको प्राप्त किया।

(अध्याय ३४)

  • 'हे काशीपुरीकी अधीश्वरी अन्नपूर्णाश्वरी! आप नित्य आनन्ददायिनी हैं। शत्रुओंसे अभय प्रदान करनेवाली हैं तथा आप सौन्दर्यरत्नोंकी निधान और समस्त पापोंको नष्टकर पवित्र कर देनेवाली हैं। हे सुन्दरी! आप सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करनेवाली, महान्-महान् भयोंको दूर करनेवाली, विश्वका भरण-पोषण करनेवाली तथा सबके ऊपर अनुग्रह करनेवाली हैं। हे मातः! आप मुझे विद्या प्रदान करें।'

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