भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
श्रीदुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमाके प्रसंगमें
योगाचार्य महर्षि पतञ्जलिका चरित्र
सूतजी बोले—अनेक धातुओंके द्वारा चित्रित रमणीय चित्रकूट पर्वतपर महाविद्वान् उपाध्याय पतञ्जलिमुनि रहते थे। वे वेद-वेदाङ्ग-तत्त्वज्ञ एवं गीता-शास्त्र-परायण थे। वे विष्णुके भक्त, सत्यवक्ता एवं व्याकरण-महाभाष्यके रचयिता भी माने गये हैं। एक समय वे शुद्धात्मा अन्य तीर्थोंमें गये। काशीमें उनका देवीभक्त कात्यायनके साथ शास्त्रार्थ हुआ। एक वर्षतक शास्त्रार्थ चलता रहा, अन्तमें पतञ्जलि पराजित हो गये। इससे लज्जित होकर उन्होंने सरस्वतीकी इस प्रकार आराधना की— नमो देव्यै महामूर्तयै सर्वमूर्तयै नमो नमः। शिवायै सर्वमाङ्गल्यै विष्णुमाये च ते नमः॥ त्वमेव श्रद्धा बुद्धिस्त्वं मेधा विद्या शिवंकरी। शान्तिवाणी त्वमेवासि नारायणि नमो नमः॥
(प्रतिसर्गपर्व २।३५।५-६)
‘महामूर्ति देवीको नमस्कार है। सर्वमूर्तिस्वरूपिणीको नमस्कार है। सर्वमङ्गलस्वरूपा शिवादेवीको नमस्कार है। हे विष्णुमाये! तुम्हें नमस्कार है। हे नारायण! तुम्हीं श्रद्धा, बुद्धि, मेधा, विद्या तथा कल्याणकारिणी हो। तुम्हीं शान्ति हो, तुम्हीं वाणी हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।’
इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवती सरस्वतीने आकाशवाणीमें कहा—‘विप्रश्रेष्ठ! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरे उत्तरचरित्रका जप करो। उसके प्रभावसे तुम निश्चय ही ज्ञानको प्राप्त करोगे। पतञ्जले! कात्यायन तुमसे परास्त हो जायेंगे।’ देवीकी इस वाणीको सुनकर पतञ्जलिनै विन्ध्यवासिनीदेवीके मन्दिरमें जाकर सरस्वतीकी आराधना की और वे प्रसन्न हो गयीं। इससे उन्होंने पुनः शास्त्रार्थमें कात्यायनको पराजित कर दिया, बादमें उन्होंने कृष्ण-मन्त्र और भक्तिके प्रचारमें तुलसीमाला आदिका भी महत्त्व बढ़ाया। भगवती विष्णुमायाकी कृपासे वे योगाचार्य अत्यन्त चिरजीवी हो गये।
मुनियो! इस प्रकार दुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमा निरूपित हुई। अब आगे आपलोग क्या सुनना चाहते हैं, वह बतायें। सभीका कल्याण हो, कोई भी दुःख प्राप्त न करे। गरुडध्वज, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु मङ्गलमय हैं। भगवान् विष्णु मङ्गलमूर्ति हैं। जो व्यक्ति पवित्र होकर इस इतिहास-समुच्चयको प्रतिदिन सुनता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
(अध्याय ३५)
॥ प्रतिसर्गपर्व द्वितीय खण्ड सम्पूर्ण ॥
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