भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 654 में से

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पृष्ठ 346
  • प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *

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इन्द्रपालने इन्द्रावती (इन्दौर) नामकी पुरी बनाकर उसमें राज्य किया। इन्द्रपालने भी अपने पिता हविर्होत्रके समान राज्य किया और उसका पुत्र हुआ माल्यवान्। माल्यवान्ने भी माल्यवती नामकी पुरी बनाकर पिताके समान राज्य किया। उसके राज्यमें चार वर्षतक अनावृष्टि होनेसे घोर अकाल पड़ गया। अत्रके दानेका दर्शन भी दुर्लभ हो गया। प्रजाके साथ-साथ राजा भी भूख-प्याससे व्याकुल हो गया। अनावृष्टि दूर करनेके लिये राजाने भगवान् शालग्रामकी शरण ली। राजाके पास नैवेद्य निवेदित करनेके लिये कुछ भी न था। एक स्थानपर पड़े कुछ अनाजके दानोंको राजाने बीन लिया और जिस किसी तरह उन्हें धोकर पवित्र कर उन्हींसे पूजा आदि की। उसकी श्रद्धा-भक्तिसे संतुष्ट होकर भगवान्ने आकाशवाणीद्वारा कहा—‘राजन्! आजसे तुम्हारे वंशजोंके उत्तम राज्यमें पृथ्वीपर कभी भी अनावृष्टिका भय नहीं होगा।’

माल्यवान्का पुत्र शंकर-भक्त शम्भुदत्त हुआ और उसका पुत्र भौमराज हुआ। भौमराजका पुत्र वत्सरज हुआ। उसका पुत्र हुआ भोजराज। भोजराजका पुत्र शम्भुदत्त हुआ। उसने चालीस वर्षतक राज्य किया। शम्भुदत्तका पुत्र बिंदुपाल हुआ। बिंदुपालने बिंदुरखण्ड नामक राष्ट्रका निर्माणकर सुखपूर्वक राज्य किया। बिंदुपालने अपने पिताके समान ही राज्य किया। बिंदुपालका पुत्र राजपाल हुआ और उसको महीनर नामका पुत्र हुआ। महीनरका पुत्र हुआ सोमवर्मा और उसका पुत्र कामवर्मा हुआ।

कामवर्माका पुत्र भूमिपाल हुआ। उसने एक तालाब खुदवाया और उसके किनारे एक सुन्दर नगरका निर्माण कराया। भूमिपालका पुत्र रंगपाल हुआ।

भूमिपालने राजाका पद प्राप्त कर अनेक राजाओंपर विजय प्राप्त की और इस पृथ्वीपर वह वीरसिंहके नामसे विख्यात हुआ। अपने राज्यपर अपने पुत्र रंगपालका अभिषेक कर वह तपस्या करने वनमें चला गया। राजाओंमें उत्तम रंगपालको कल्पसिंह नामका पुत्र हुआ। कल्पसिंहके कोई संतान नहीं हुई। एक बार स्नान करनेके लिये वह गङ्गातटपर गया, वहाँ उसने प्रसन्न होकर द्विजातियोंको दान दिया। निर्जन कल्पक्षेत्रकी पुण्यभूमिको देखकर उस भूमिपर प्रसन्नचित्त हो उसने वहाँ एक नगरका निर्माण कराया। वह नगर ‘कलाप’ नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ। कलापमें उसने राज्य किया और गङ्गाकी कृपासे उसको गंगासिंह नामका पुत्र प्राप्त हुआ। उसने नब्बे वर्षोंतक राज्य किया, किंतु उसके कोई संतान न हुई। अन्तमें युद्ध करते हुए कुरुक्षेत्रमें प्राण त्यागनेके बाद उसने स्वर्गलोकको प्राप्त किया।

सूतजीने पुनः कहा—मुनियो! इस प्रकार पवित्र प्रमरवंश समाप्त हो गया। गंगासिंहके वंशमें उसके बाद जो क्षत्रिय शेष बच गये थे, उनकी स्त्रियोंसे आगे चलकर अनेकों वर्णसंकर पैदा हुए। वे सभी वैश्य-वृत्तिवाले थे। वे सभी म्लेच्छोंके समान पृथ्वीपर निवास करने लगे। इस प्रकार मैंने दक्षिणके* राजाओंके वंशका वर्णन किया।

(अध्याय १)

  • सिन्ध आदि इतिहासकार आन्ध्रराजाओंसे लेकर हर्षवर्धनके राज्यतकके कोई ऐतिहासिक सूत्र नहीं देखते। प्रायः चार सौ वर्षोंके इतिहासको घोर अन्धकारमय मानते हैं। पर यहाँ जो वंशवृक्ष निर्दिष्ट हुआ है, यह उन्हीं चार सौ वर्षोंका संक्षिप्त वृत्तान्त समझना चाहिये और आजके ऐतिहासिकोंको इससे लाभ उठाना चाहिये।

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