भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 654 में से

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पृष्ठ 345

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्रतिसर्गपर्व

( चतुर्थ खण्ड )

[ भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वके इस चतुर्थ खण्डका इतिहासकी दृष्टिसे विशेष महत्त्व है। इसमें मुख्यरूपसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा विशेषरूपसे कलियुगके चारों चरणोंका इतिहास, राजवंश और युगधर्म निरूपित है। साथ ही अनेक आचार्यों, संतों, भक्त कवियों तथा पुरी, भारती आदि साधुओंके पूर्वजन्मोंका इतिवृत्त भी संगृहीत हुआ है। इन्हें प्रायः द्वादश आदित्यों, एकादश रुद्रों, अष्ट वसुओं तथा अश्विनीद्वयका अवतार बतलाया गया है। चैतन्य-महाप्रभुकी महिमाका इसमें विशेष निरूपण हुआ है और जगन्नाथजीमें उनके लय होनेकी बात भी आयी है, साथ ही पूर्वापरके सभी आचार्यों तथा संतोंको उनके भक्तिभावसे विशेष प्रभावित दिखलाया गया है। पर वास्तवमें देश-कालकी दृष्टिसे कई विसंगतियाँ दिखलायी पड़ती हैं, जिससे इन अंशोंकी मौलिकतापर संदेह होना भी स्वाभाविक है। 'कल्याण' का सभी आचार्यों, संतों, महात्माओं और सम्प्रदायोंके प्रति समान आदरभाव है और समान श्रद्धा है। अतः इन विसंगतियोंपर ध्यान न देकर सत्संगकी दृष्टिसे संत, महात्माओं एवं भक्तोंकी पवित्र कथाओंको यथासम्भव उपलब्ध मूल संस्करणके अनुसार संक्षिप्त भावानुवादके रूपमें यहाँ प्रस्तुत किया गया है—सम्पादक]

कलियुगमें उत्पन्न आन्ध्रवंशीय राजाओंके वंश-वृक्षका वर्णन

श्रीगणेशजीको नमस्कार है, श्रीराधावल्लभकी जय हो।

नैमिषारण्यवासी ऋषियोंने कहा—सूतजी महाराज! हमलोगोंने आपके द्वारा कहे गये कृष्णांश (उदयसिंह)-के चरित्रको सुना। अब आप अग्रिवंशमें उत्पन्न हुए राजाओं (प्रमर, चयहानि तथा परिहार आदि)-के राजवंशोंका वर्णन करें। जब भगवान् हरि त्रियुगी कहे जाते हैं तो वे कलियुगमें किस प्रकार अवतरित हुए इसे भी आप बतलायें।

सूतजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! आपलोगोंने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। अग्रिवंशके राजाओंके चरित्रको मैं कह रहा हूँ, आपलोग सुनिये। दक्षिण दिशामें अम्बाद्वारा रचित दिव्य अम्बावती नामकी पुरीमें प्रमर नामका एक राजा हुआ। वह राजा सामवेदी था। महाबली उस राजाने अम्बावतीमें छः वर्षांतक राज्य किया। प्रमरका पुत्र महामर (महामद) हुआ, उसने तीन वर्षांतक राज्य किया और उसका पुत्र हुआ देवापि। उसने भी पिताके

समान राज्य किया और उसका पुत्र देवदूत हुआ। देवदूतने भी अपने पिताके समान ही राज्य किया।

देवदूतका महाबलशाली गन्धर्वसेन नामक पुत्र हुआ। गन्धर्वसेन पचास वर्षांतक राज्य करनेके पश्चात् तपस्या करनेके लिये वनमें चला गया। कुछ समयके बाद शिवके आशीर्वादसे उसे विक्रम नामका पुत्र हुआ। महाराज विक्रमने सौ वर्षांतक राज्य किया और उसका पुत्र हुआ देवभक्त। देवभक्तने दस वर्षांतक राज्य किया और वह दुष्ट शकोंद्वारा मारा गया। देवभक्तका पुत्र हुआ शालिवाहन। उसने शकोंको जीतकर साठ वर्षांतक राज्य किया। अनन्तर वह दिवंगत हो गया। उसका पुत्र शालिहोत्र हुआ और शालिहोत्रने पचास वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र शालिवर्धन राजा हुआ, उसने पिताके समान राज्य किया। उसको शकहन्ता नामका पुत्र प्राप्त हुआ, उसका पुत्र सुहोत्र हुआ और उसका पुत्र हुआ हविर्होत्र। उसने भी पिताके समान पचास वर्षांतक राज्य किया और उसका पुत्र इन्द्रपाल हुआ।

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