भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड *
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अग्निवंशका विस्तार बहुत हुआ और उसमें बहुतसे बलवान् राजा हुए। पूर्वमें कपिलस्थान (गङ्गासागर), पश्चिममें बाह्लीक, उत्तरमें चीन देश और दक्षिणमें सेतुबन्ध—इनके बीचमें साठ लाख भूपाल ग्रामपालक थे, जो महान् बलवान् थे। इनके राज्यमें—प्रजाएँ अग्निहोत्र करनेवाली, गौ-ब्राह्मणका हित चाहनेवाली तथा द्वापरयुगके समान धर्म-कार्य करनेमें निपुण थीं। सर्वत्र द्वापरयुग ही मालूम पड़ता था। घर-घरमें प्रचुर धन तथा जन-जनमें धर्म विद्यमान था। प्रत्येक गाँवमें देवताओंके मन्दिर थे। देश-देशमें यज्ञ होते थे। म्लेच्छ भी आर्य-धर्मका सभी तरहसे पालन करते थे। द्वापरके समान ऐसा धर्माचरण देखकर कलिने भयभीत होकर म्लेच्छाके साथ नीलाचल पर्वतपर जाकर हरिकी शरण ली। वहाँ उसने बारह वर्षतक तपश्चर्या की। इस ध्यानयोगात्मक तपश्चर्यासे उसे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन हुआ। राधाके साथ भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर उसने मनसे उनकी स्तुति की।
कलिने कहा—हे भगवन्! आप मेरे साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणामको स्वीकार करें। मेरी रक्षा कीजिये। हे कृपानिधे! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप सभी पापोंका विनाश करते हैं। सभी कालोंका
निर्माण करनेवाले आप ही हैं। सत्ययुगमें आप गौरवर्णके थे, त्रेतामें रक्तवर्ण, द्वापरमें पीतवर्णके थे। मेरे समय (कलियुग)—में आप कृष्णरूपके हैं। मेरे पुत्रोंने म्लेच्छ होनेपर भी अब आर्य-धर्म स्वीकार किया है। मेरे राज्यमें प्रत्येक घरमें द्यूत, मद्य, स्वर्ण, स्त्री-हास्य आदि होना चाहिये। परंतु अग्निवंशमें पैदा हुए क्षत्रियोंने उनका विनाश कर दिया है। हे जनार्दन! मैं आपके चरण-कमलोंकी शरण हूँ। कलियुगकी यह स्तुति सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर कहने लगे—
‘कलिराज! मैं तुम्हारी रक्षाके लिये अंशरूपमें महावतीमें अवतीर्ण होऊँगा, वह मेरा अंश भूमिमें आकर उन महाबली अग्निवंशीय प्रजाओंका विनाश करेगा और म्लेच्छवंशीय राजाओंकी प्रतिष्ठा करेगा।’ यह कहकर भगवान् अदृश्य हो गये और म्लेच्छाके साथ वह कलि अत्यन्त प्रसन्न हो गया।
आगे चलकर इसी प्रकार सम्पूर्ण घटनाएँ घटित हुई। कौरवांशोंकी पराजय और पाण्डवांशोंकी विजय हुई। अन्तमें पृथ्वीराज चौहानने वीरगति प्राप्त की तथा सहोद्गीन (मोहम्मदगोरी) अपने दास कुतुकोद्दीनको यहाँका शासन सौंपकर यहाँसे बहुत-सा धन लूटकर अपने देश चला गया।
॥ प्रतिसर्गपर्व, तृतीय खण्ड सम्पूर्ण ॥
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