भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पूज्यको प्रणाम किया और उसे दारुण म्लेच्छ-स्थानमें प्रतिष्ठित किया तथा अपने राज्यमें आकर

उस राजाने अश्वमेध-यज्ञ किया और साठ वर्षतक राज्य करके स्वर्गलोक चला गया।

राजा भोज और महामदकी कथा

सूतजीने कहा—ऋषियो! शालिवाहनके वंशमें दस राजा हुए। उन्होंने पाँच सौ वर्षतक शासन किया और स्वर्गवासी हुए। तदनन्तर भूमण्डलपर धर्म-मर्यादा लुप्त होने लगी। शालिवाहनके वंशमें अन्तिम दसवें राजा भोजराज हुए। उन्होंने देशकी मर्यादा क्षीण होती देख दिग्विजयके लिये प्रस्थान किया। उनकी सेना दस हजार थी और उनके साथ कालिदास एवं अन्य विद्वान् ब्राह्मण भी थे। उन्होंने सिन्धु नदीको पार करके गान्धार, म्लेच्छ और काश्मीरके शठ राजाओंको परास्त किया तथा उनका कोष छीनकर उन्हें दण्डित किया। उसी प्रसंगमें आचार्य एवं शिष्यमण्डलके साथ म्लेच्छ महामद नामका व्यक्ति उपस्थित हुआ। राजा भोजने मरुस्थलमें विद्यमान महादेवजीका दर्शन किया। महादेवजीको पञ्चगव्यमिश्रित गङ्गजलसे स्नान कराकर चन्दन आदिसे भक्तिभावपूर्वक उनका पूजन किया और उनकी स्तुति की।

भोजराजने कहा—हे मरुस्थलमें निवास करनेवाले तथा म्लेच्छोंसे गुप्त शुद्ध सच्चिदानन्द-स्वरूपवाले गिरिजापते! आप त्रिपुरासुरके विनाशक तथा नानाविध मायाशक्तिके प्रवर्तक हैं। मैं आपकी

शरणमें आया हूँ, आप मुझे अपना दास समझें। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। इस स्तुतिको सुनकर भगवान् शिवने राजासे कहा—

‘हे भोजराज! तुम्हें महाकालेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। यह वाह्नीक नामकी भूमि है, पर अब म्लेच्छोंसे दूषित हो गयी है। इस दारुण प्रदेशमें आर्य-धर्म है ही नहीं। महामायावी त्रिपुरासुर यहाँ दैत्यराज बलिद्वारा प्रेषित किया गया है। मेरे द्वारा वरदान प्राप्त कर वह दैत्य-समुदायको बद्ध रहा है। वह अयोनिज है। उसका नाम महामद है। राजन्! तुम्हें इस अनार्य देशमें नहीं आना चाहिये। मेरी कृपासे तुम विशुद्ध हो।’ भगवान् शिवके इन वचनोंको सुनकर राजा भोज सेनाके साथ अपने देशमें वापस चला आया।

राजा भोजने द्विजवर्गके लिये संस्कृत वाणीका प्रचार किया और शूद्रोंके लिये प्राकृत भाषा चलायी। उन्होंने पचास वर्षतक राज्य किया और अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त किया। उन्होंने देश-मर्यादाका स्थापन किया। विन्ध्यगिरि और हिमालयके मध्यमें आर्यवर्तकी पुण्यभूमि है, वहाँ आर्यलोग रहते हैं।

देशराज एवं वत्सराज आदि राजाओंका आविर्भाव

सूतजीने कहा—भोजराजके स्वर्गारोहणके पश्चात् उनके वंशमें सात राजा हुए, पर वे सभी अल्पायु, मन्द-बुद्धि और अल्पतेजस्वी हुए तथा तीन सौ वर्षके भीतर ही मर गये। उनके राज्यकालमें पृथ्वीपर छोटे-छोटे अनेक राजा हुए। वीरसिंह नामके सातवें राजाके वंशमें तीन राजा हुए, जो

दो सौ वर्षके भीतर ही मर गये। दसवाँ जो गंगासिंह नामका राजा हुआ, उसने कल्पक्षेत्रमें धर्मपूर्वक अपना राज्य चलाया। अन्तर्वेदीमें कान्यकुब्जपर राजा जयचन्द्रका शासन था। तोमरवंशमें उत्पन्न अनङ्गपाल इन्द्रप्रस्थका राजा था। इस तरहसे गाँव और राष्ट्र (जनपदों)-में बहुतेसे राजा हुए।

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