भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 348, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थ खण्ड *
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ब्राह्मणोंकी उत्पत्तिके प्रसंगमें शुक्लवंश एवं उसके आगे होनेवाले विभिन्न क्षत्रियवंशोंका वर्णन
सूतजी बोले—विप्रवर! अब मैं शुक्लवंशका वर्णन करता हूँ। जब भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका-वृन्दावन आदिकी लीला समाप्त कर अपने परमधामको पधारे, उसके कुछ दिनोंके पश्चात् कलियुगका आगमन हुआ। कलियुगके चार हजार चार सौ वर्ष बीत जानेपर भारतकी भूमि म्लेच्छोंसे आक्रान्त हो गयी। न्यूह नामक यवनने सम्पूर्ण जगत्को म्लेच्छोंसे परिपूर्ण कर दिया था। कलियुगके प्रारम्भिक एक हजार वर्ष बीतनेपर देवराट् महेंद्रने श्रेष्ठ ब्रह्मावर्तमें एक काश्यप नामके ब्राह्मणको भेजा। देवशक्ति आर्यावतीने उसका आनन्दपूर्वक पाणिग्रहण किया। उससे दस पुत्र* उत्पन्न हुए। बादमें काश्यप मिस्र देशमें आ गये। उन्होंने मिस्रमें उत्पन्न दस हजार म्लेच्छोंको वशमें कर पुनः अपने स्थानपर आकर उन्हें अपना शिष्य बना लिया तथा वे सप्तपुरियोंके नष्ट होनेके बाद सरस्वती और दृषद्वती नदीके मध्य श्रेष्ठ ब्रह्मावर्तमें निवास करने लगे। मनुधर्मके अनुयायी राजा काश्यपने अपने पुत्र तपस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्लको बुलाकर उसे मनुधर्मका उपदेश देकर रैवत (गिरनार)-शिखरपर तपस्या करनेके लिये आदेश दिया और अपने नौ पुत्रों तथा शिष्योंको भी सनातन मनुधर्मका उपदेश दिया।
शुक्लने भी रैवतभृंगपर तपस्याके द्वारा सच्चिदानन्दविग्रह जगन्नाथ वासुदेवको संतुष्ट किया। भगवान् द्वारकानाथ प्रसन्न होकर उस विप्रका हाथ पकड़कर समुद्रके किनारे ले आये और दिव्य शोभासम्पन्न अपनी द्वारका नगरी उसे दिखायी। लगभग दो हजार वर्ष बीतनेके बाद अग्निद्वारसे
वह शुक्ल अर्बुद (आबू) पर्वतपर गया और वहाँ उसने अपने तीन भाइयों तथा द्विजोंके साथ बौद्धोंको जीतकर हरिकी कृपासे द्वारकाको पुनः प्रतिष्ठित किया। द्वारकामें कृष्णके ध्यानमें तत्पर रहकर शुक्लने प्रसन्नतापूर्वक निवास किया। उसने पश्चिम भारतवर्षमें दस वर्षतक राज्य किया।
नारायणकी कृपासे शुक्लको विष्वक्सेन नामक पुत्र हुआ, उसने बीस वर्षतक राज्य किया और उसे जयसेन नामका पुत्र हुआ, तीस वर्षतक उसने राज्य किया और उसे विसेन नामक पुत्र हुआ। पचास वर्षतक उसने राज्य किया और उसे प्रमोदा और मोदसिंह नामकी दो संतानें हुईं। विसेनने अपनी कन्या प्रमोदाका विवाह विक्रमके साथ कर दिया और पुत्र मोदसिंहको अपना उत्तम राज्य समर्पित कर दिया। मोदसिंहका पुत्र हुआ सिन्धुवर्मा। उसने पैतृक स्थानको छोड़कर सिन्धुनदीके तटपर राज्य किया। पृथ्वीपर वह स्थान सिन्धुदेशके नामसे प्रसिद्ध हुआ। सिन्धुवर्माका पुत्र सिन्धुद्वीप हुआ और सिन्धुद्वीपका पुत्र श्रीपति हुआ। श्रीपतिने गौतमवंशमें उत्पन्न कच्छदेशमें रहनेवाली काच्छपीसे विवाह किया और पुलिन्द तथा यवनोंको जीतकर वहाँ देश बसाया। सिन्धुकूलमें वह देश श्रीपतिके नामसे प्रसिद्ध हुआ। श्रीपतिका पुत्र हुआ भुजवर्मा। भुजवर्माने शबर और भीलोंको जीतकर देश बसाया, जो इस पृथ्वीपर 'भुजदेश' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। भुजवर्माका पुत्र रणवर्मा और उसका पुत्र चित्रवर्मा हुआ। चित्रवर्माने वनके बीचमें 'चित्र' नामकी एक नगरी बसायी और उसको धर्मवर्मा नामक पुत्र हुआ। उसको कृष्णवर्मा
- उपाध्यायो दीक्षितश्च पाठकः शुक्लमिश्रकौ। अग्रिहोत्री द्विवेदी च त्रिवेदी पाण्ड्य एव च॥
चतुर्वेदीति कथिता नामतुल्यगुणाः स्मृताः। (उत्तरपर्व १।६।४-५, प्रतिसर्गपर्व ४।२१।७-८)
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